Published on Jul 30, 2023 Updated 0 Hours ago

अब जबकि यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है, तो जर्मनी ने आख़िरकार यूक्रेन का समर्थन करते हुए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के मूल्यों को बचाने के लिए ऐतिहासिक क़दम उठाए हैं.

रूस-यूक्रेन संघर्ष: मूल्यों पर आधारित कूटनीति के दावों को हक़ीक़त से मिलाने की कोशिश
रूस-यूक्रेन संघर्ष: मूल्यों पर आधारित कूटनीति के दावों को हक़ीक़त से मिलाने की कोशिश

जर्मनी के विदेश नीति वाले बाज़ार में मूल्यों की चर्चा कोई नई बात नहीं है. लेकिन, ऐसा लगता है कि यूक्रेन पर रूस के हमले ने आख़िरकार जर्मनी को इन चर्चाओं को हक़ीक़त में तब्दील करने की ओर बढ़ा दिया है. जर्मनी की राजनीति में पिछला हफ़्ता बेहद उठा-पटक वाला और बिल्कुल नई राह पर चलने वाला रहा है.

22 फ़रवरी को जर्मनी के चांसलर ओलाफ़ शोल्ज़- जो हैम्बर्ग के रहने वाले सोशल डेमोक्रेट नेता हैं- ने पूर्वी यूक्रेन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की उकसावे वाली कार्रवाई के जवाब में नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन को रोकने की बात कही. जर्मन चांसलर का ये क़दम कई सतहों पर नाटकीय था; अपनी ऊर्जा संबंधी ज़रूरतों के लिए रूस पर निर्भर रहने के चलते, पूर्व चांसलर एंगेला मर्केल (एक क्रिश्चियन डेमोक्रेट नेता) समेत जर्मनी के कई नेता इस पाइपलाइन परियोजना को बंद करने को लेकर घबराते थे. जर्मनी की रूस नीति में इस बदलाव लाने वाले क़दम के लिए ओलाफ़ शोल्ज़ को इसलिए और भी श्रेय दिया जाना चाहिए, क्योंकि ये उनकी पार्टी की नीतियों के उलट है: अतीत में सोशल डेमोक्रेट नेताओं की रूस के प्रति कुछ ज़्यादा ही नरम रहने (Russlandversteher) के लिए आलोचना की जाती रही है.

27 फ़रवरी को जर्मनी की संसद में एक झकझोर देने वाले भाषण में शोल्ज़ ने ऐलान किया कि यूक्रेन का समर्थन करके जर्मनी यूरोप, लोकतंत्र और ‘इतिहास के सही पाले’ में खड़ा होगा’.

24 फ़रवरी को यूक्रेन में युद्ध की शुरुआत के बाद से ओलाफ़ शोल्ज़ ने तीन और भी उल्लेखनीय क़दम उठाए हैं. पहला, कुछ हिचक के बाद वो रूस के साथ स्विफ्ट (SWIFT) के लेन-देन पर प्रतिबंध लगाने को राज़ी हो गए हैं. ऐसा करके जर्मनी ने रूस को बेहद सख़्त मगर महंगा संदेश दिया है, क्योंकि इससे ख़ुद जर्मनी को वित्तीय नुक़सान होने का अंदेशा है. दूसरा, अपने कठिन इतिहास के चलते जर्मनी ने संघर्ष वाले इलाक़ों में हथियारों के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है; इसी नीति को ध्यान में रखते हुए, जर्मनी ने पिछले महीने एस्टोनिया के यूक्रेन को हथियार भेजने पर रोक लगा दी थी. ओलाफ़ शोल्ज़ ने इस रुख़ में भी अभूतपूर्व बदलाव वाला क़दम उठाया है. 27 फ़रवरी को जर्मनी की संसद में एक झकझोर देने वाले भाषण में शोल्ज़ ने ऐलान किया कि यूक्रेन का समर्थन करके जर्मनी यूरोप, लोकतंत्र और ‘इतिहास के सही पाले’ में खड़ा होगा’. इसके लिए ओलाफ़ शोल्ज़ ने जर्मनी द्वारा उठाए जा रहे जिन ठोस क़दमों का ज़िक्र किया, उनमें यूक्रेन को सैन्य आपूर्ति करना सबसे अहम था: ‘रूस का हमला एक निर्णायक मौक़ा है. पुतिन की आक्रमणकारी सेना से रक्षा के लिए अपनी पूरी क्षमता से यूक्रेन की मदद करना हमारा कर्तव्य है.’ अब जर्मनी, यूक्रेन को स्टिंगर मिसाइलें और टैंकरोधी हथियारों की आपूर्ति करेगा. और जर्मनी द्वारा अपना नेटो का रक्षा ख़र्च बढ़ाने का एलान करने वाला तीसरा क़दम भी उतना ही महत्वपूर्ण है. इस तरह से जर्मनी ने एक सुरक्षा देने वाले देश के तौर पर अपने उभार का संकेत दिया है.

मूल्यों पर केंद्रित राजनीति

एक ऐसे देश में जहां वाद-विवाद और परिचर्चा वाले लोकतंत्र को बहुत ऊंचा दर्ज़ा हासिल है (कई बार तो ये परिचर्चा एक ऐसी रणनीति बन जाता है जहां सिर्फ़ बहस चलती रहती है और कोई क़दम नहीं उठाया जाता है), और जिस पर इतिहास का बहुत भारी बोझ है, उस देश का अपने फ़ैसलों और क़दमों से ज़्यादा ज़िम्मेदारी उठाने को कम करके नहीं आंका जा सकता है. इस मामले में शोल्ज़ के नेतृत्व की भूमिका काफ़ी अहम रही है. हालांकि, निश्चित रूप से ऐसे फ़ैसले करने में उन्हें अपने गठबंधन में भागीदार ग्रीन पार्टी से काफ़ी मदद मिली है, जो सिद्धांतों और मूल्यों के नाम पर सत्ता में आए हैं. जर्मनी की सक्रिय भूमिका हम सबके लिए उत्साह बढ़ाने वाली है और शायद ये यूरोपीय संघ में भी बदलाव के उत्प्रेरक का काम कर रही है: आप इसकी मिसाल यूरोपीय संघ द्वारा यूक्रेन के लिए हथियार ख़रीदने के अभूतपूर्व फ़ैसले के रूप में देख रहे हैं. हो सकता है कि कोई ये सभी क़दम उठाने के समय को लेकर सवाल उठाए: निश्चित रूप से बेहतर यही होता कि पुतिन के यूक्रेन पर आक्रमण करने से पहले ये संकेत दिए जाते, और युद्ध को शुरू होने से पहले रोका जा सकता था. लेकिन, अब जबकि जर्मनी मूल्यों पर अपनी बातों को हक़ीक़त में तब्दील कर रहा है, तो ये वक़्त पीछे मुड़कर देखने का नहीं, आगे बढ़ने का है.

जर्मनी की सक्रिय भूमिका हम सबके लिए उत्साह बढ़ाने वाली है और शायद ये यूरोपीय संघ में भी बदलाव के उत्प्रेरक का काम कर रही है

ये बिल्कुल साफ़ है कि ओलाफ़ शोल्ज़ ने हार्ड पावर की अहमियत को उस तरह समझा है, जैसा उनके पहले के जर्मन नेता नहीं समझ सके थे. एक प्रतिबद्ध यूरोपीय नेता के तौर पर शोल्ज़ को ये भी पता है कि यूक्रेन को लेकर पुतिन की आक्रामकता, पूरे यूरोप की सुरक्षा के लिए ख़तरा है. लेकिन, ये सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या ओलाफ़ शोल्ज़ अपनी निगाहें वैश्विक मंच पर भी टिकाएंगे और वहां पर वो नेतृत्व प्रदान कर सकेंगे, जिसकी आज सख़्त ज़रूरत है? जर्मनी के पड़ोस में सिर्फ़ पुतिन ही इकलौते तानाशाही नेता नहीं हैं, जो बड़े इरादे रखते हैं; चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी ताइवान को लेकर ऐसे ही दुस्साहस का प्रदर्शन करते रहे हैं. यूक्रेन के संकट ने इन दोनों खिलाड़ियों को अब तक और क़रीब लाने का ही काम किया है. तो क्या, ओलाफ़ शोल्ज़ ऐसे चांसलर बनेंगे, जो चीन को ‘साझीदार, प्रतिद्वंदी और दुश्मन’ कहने वाले यूरोप के ज़बानी जमाख़र्च से ऊपर उठेंगे, और आख़िकार चीन की भी वैसी ही आलोचना करेंगे, जिस तरह उन्होंने रूस की निंदा की है?

हैम्बर्ग के मेयर के तौर पर ओलाफ़ शोल्ज़ अपने शहर में चीन का निवेश आकर्षित कर पाने में सफल रहे थे. जर्मनी के चांसलर के तौर पर अब उनके सामने प्रशासन का ऐसा ढांचा खड़ा करने की ज़िम्मेदारी है, जिससे यूरोप महाद्वीप को सुरक्षित बनाया जा सके- और समान विचारधारा वाले लोकतांत्रिक भागीदारों को चीन के विस्तारवाद से बचाया जा सके?

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Authors

Amrita Narlikar

Amrita Narlikar

Professor Amrita Narlikar is the President of the German Institute for Global and Area Studies (GIGA), Honorary Fellow of Darwin College (University of Cambridge), Non-Resident ...

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Samir Saran

Samir Saran

Samir Saran is the President of the Observer Research Foundation (ORF), India’s premier think tank, headquartered in New Delhi with affiliates in North America and ...

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