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Published on Jan 31, 2024 Updated 0 Hours ago

RECs को मूल रूप से RPO अनिवार्यताओं के साथ अनुपालन को सुविधाजनक बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था और ये निम्न कार्बन ऊर्जा उत्पादन को लेकर वैकल्पिक मूल्यांकन के लिए चैनल के तौर पर काम करते हैं.

नवीकरणीय ख़रीद दायित्व: ज़िम्मेदारी से भागते राज्य

पृष्ठभूमि

विद्युत अधिनियम 2003 (EA 2003) की अनिवार्यता के रूप में स्थापित किए गए राज्य विद्युत विनियामक आयोगों (SERCs) ने नवीकरणीय ऊर्जा (RE) स्रोतों से एक निश्चित प्रतिशत बिजली की ख़रीद के लिए वितरण कंपनियों पर नवीकरणीय ख़रीद दायित्व (RPOs) आयद किए. जनवरी 2016 में शुल्क नीति में संशोधन के साथ SERCs को मार्च 2022 तक या केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर जारी अधिसूचनाओं के मुताबिक ऊर्जा की कुल खपत (पनबिजली को छोड़कर) में सौर ऊर्जा की ख़रीद को न्यूनतम 8 प्रतिशत तक आरक्षित करने की आवश्यकता थी. जुलाई 2018 में केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए समान रूप से सौर और ग़ैर-सौर नवीकरणीय ऊर्जा के लिए नवीकरणीय ख़रीद दायित्व के दीर्घकालिक विकास मार्ग को अधिसूचित किया. सौर आधारित बिजली के लिए 10.5 प्रतिशत के साथ 2022 तक RPO के 21 प्रतिशत तक पहुंचने की बात कही गई थी. भारत सरकार के बिजली मंत्रालय (MOP) के 22 जुलाई 2022 के आदेश के मुताबिक 2021-22 के आगे RPO हिस्सेदारी के 2030 तक कुल ऊर्जा खपत के 43 प्रतिशत तक पहुंच जाने की उम्मीद है. 2022-23 के लिए पनबिजली ख़रीद दायित्व (HPO) समेत सकल RPO लक्ष्य 24.61 प्रतिशत था. राज्य सरकारों के RPO लक्ष्य कम से कम 30 प्रतिशत नीचे हैं. 

नवीकरणीय ख़रीद दायित्व (RPOs) के केंद्रीय लक्ष्यों की अनुपालना में “जल-समृद्ध राज्य”, “नवीकरणीय ऊर्जा समृद्ध” राज्यों से बेहतर स्कोर करते हैं.

अनुपालन

नवीकरणीय ख़रीद दायित्व (RPOs) के केंद्रीय लक्ष्यों की अनुपालना में “जल-समृद्ध राज्य”, “नवीकरणीय ऊर्जा समृद्ध” राज्यों से बेहतर स्कोर करते हैं. 2022-23 में 88.4 प्रतिशत RPO अनुपालन के साथ सिक्किम रैंकिंग में सबसे ऊपर था, 78.2 प्रतिशत के साथ हिमाचल प्रदेश दूसरे और 60.4 प्रतिशत के साथ उत्तराखंड का तीसरा स्थान रहा. “नवीकरणीय ऊर्जा समृद्ध” राज्यों में 46.7 प्रतिशत के स्कोर के साथ कर्नाटक की सबसे ऊंची अनुपालना थी, 36.3 प्रतिशत के साथ केरल दूसरे और 28.5 प्रतिशत के साथ आंध्र प्रदेश का तीसरा स्थान रहा. RPO का लचर अनुपालन और क्रियान्वयन, वितरण कंपनियों द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा अपनाए जाने के लिए प्रमुख चुनौतियां बनी हुई हैं. 

नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र

नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र (RECs), नवीकरणीय ख़रीद दायित्वों (RPOs) के पूरक की भूमिका निभाते हैं. ये एक व्यापार-आधारित उपकरण हैं. RECs को मूल रूप से RPO अनिवार्यताओं के साथ अनुपालन को सुविधाजनक बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था और ये निम्न कार्बन ऊर्जा उत्पादन को लेकर वैकल्पिक मूल्यांकन के लिए चैनल के तौर पर काम करते हैं. वितरण कंपनियां, ओपन-एक्सेस उपभोक्ता और कैप्टिव बिजली संयंत्रों के पास REC की ख़रीद का विकल्प था ताकि वो अपने RPO पूरे कर सकें. REC का मूल्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से ग्रिड में शामिल की गई 1 MWh (मेगावाट घंटा) बिजली के बराबर है. राजस्थान, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्य, जिनके पास नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन की ऊंची संपन्नता है, राज्य विद्युत विनियामक आयोगों (SERCs) द्वारा तय किए गए RPO लक्ष्यों से ज़्यादा नवीकरणीय ऊर्जा आधारित ऊर्जा उत्पन्न करते हैं. हालांकि दिल्ली, पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्य, जिनके पास नवीकरणीय ऊर्जा की कम क्षमता है, अपने RPO लक्ष्य से काफ़ी कम नवीकरणीय ऊर्जा आधारित बिजली पैदा करते हैं. RECs की संरचना इस असंतुलन के निपटारे के लिए तैयार की गई है. नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक या तो केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (CERC) द्वारा तय किए गए वरीयतापूर्ण शुल्क पर नवीकरणीय ऊर्जा आधारित बिजली बेचते हैं या REC के स्वरूप में पर्यावरणीय लाभ की बिक्री करते हैं. 

नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक या तो केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (CERC) द्वारा तय किए गए वरीयतापूर्ण शुल्क पर नवीकरणीय ऊर्जा आधारित बिजली बेचते हैं या REC के स्वरूप में पर्यावरणीय लाभ की बिक्री करते हैं. 

REC तंत्र की शुरुआत के बाद से 53 प्रतिशत से ज़्यादा RECs को वितरण कंपनियों द्वारा ख़रीदा गया है, जबकि कैप्टिव बिजली उत्पादकों (CPPs) और ओपन एक्सेस (OA) उपभोक्ताओं द्वारा 45 प्रतिशत से ज़्यादा की ख़रीद की गई है. डिस्कॉम द्वारा अपने RPOs को ऑफसेट करने के लिए 3.6 करोड़ से अधिक RECs की ख़रीद की गई है, और ओपन एक्सेस उपभोक्ताओं और CPPs द्वारा 3.1 करोड़ से अधिक RECs की ख़रीद की गई है. मार्च 2022 तक, 1043 नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं (4.5 GW क्षमता के साथ) और 4 डिस्कॉम REC तंत्र के तहत निबंधित थीं. REC के तहत पंजीकृत क्षमता का 56 प्रतिशत से भी ज़्यादा हिस्सा पवन ऊर्जा उत्पादकों का है, और 22 प्रतिशत से भी अधिक क्षमता सौर बिजली संयंत्रों के लिए निबंधित हैं. तमिलनाडु राज्य के पास REC के तहत सबसे ऊंची पंजीकृत क्षमता (1.2 GW से ज़्यादा) है.

REC बाज़ार उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं, और केवल कुछ मुट्ठी भर राज्य ही या तो नवीकरणीय ऊर्जा या RECs की ख़रीद के ज़रिए अपनी RPO को पूरा करते हैं. वितरण कंपनियों द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा अपनाए जाने को बढ़ावा देने में REC तंत्र की नाकामी RPO अनिवार्यताओं की दीर्घकालिक ग़ैर-अनुपालना को प्रदर्शित करती है जिसे बर्दाश्त किया जाता है. REC प्रमाणन दरें 2014-15 के अपने शिखर से नीचे गिर गई हैं, और बिना बिका भंडार 2023 में 1.9 करोड़ से ज़्यादा हो चुका है. 2022 तक RECs का आदान-प्रदान केवल CERC द्वारा अनुमोदित बिजली एक्सचेंजों पर किया जाता था. CERC द्वारा निर्धारित न्यूनतम क़ीमत (फ्लोर प्राइस) और फारबियरेंस (सीलिंग या अधिकतम) मूल्य के बैंड के भीतर ये आदान-प्रदान किए जा रहे थे. 2010-12 के बाद से सौर REC की अधिकतम क़ीमत में 90 प्रतिशत से ज़्यादा की गिरावट आई है और ग़ैर-सौर REC के मूल्य में 30 प्रतिशत से अधिक की कमी हुई है. दिसंबर 2023 तक कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लगभग 5 प्रतिशत ही REC मान्यता प्राप्त है. किसी ख़ास वितरण कंपनी के लोड प्रोफाइल के लिए सबसे उपयुक्त RE प्रकार ख़रीदने की स्वतंत्रता RPO लक्ष्यों के संदर्भ में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. 

RPO के तहत फ्लोटिंग सोलर, अपतटीय (ऑफशोर) पवन, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा भंडारण शामिल नहीं हैं. एक अलग सौर RPO को ऐसे समय में अनिवार्य किया गया था जब सौर ऊर्जा की क़ीमतें 10 रु प्रति किलोवाट से ऊपर थीं और कोई भी वितरण कंपनी इसे अनिवार्य अलग दायित्व के बिना नहीं ख़रीदती थी. अब नवीकरणीय ऊर्जा के सभी संसाधनों में सबसे सस्ता उत्पादन स्रोत सौर है. सौर और ग़ैर-सौर RPOs का विलय करना और उन्हें प्रतिस्थापन के योग्य बनाना एक ऐसा विकल्प है जिसे वितरण कंपनियां पसंद कर सकती हैं. महाराष्ट्र विद्युत नियामक आयोग (MERC) ने ग़ैर-अनुपालन के लिए ऊंचे जुर्माने लगाए हैं और RPO अनिवार्यता पर अधिक अनुपालन के लिए प्रोत्साहनों की शुरुआत की है. इसमें हरेक साल के लिए नवीकरणीय ऊर्जा की कुल ख़रीद के लक्ष्य में संचयी कमी के लिए वितरण लाइसेंसधारियों की सालाना राजस्व आवश्यकताओं (ARR) में 0.10 रु प्रति किलोवाट की दर से कमी किया जाना शामिल है. साथ ही, MERC 2021-22 तक केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित सालाना प्रतिशत तक MERC द्वारा विशेष रूप से तय किए गए RPO लक्ष्य तक से अधिक ख़रीदी गई अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा बिजली पर 0.25 रु प्रति किलोवाट तक के प्रोत्साहन की छूट देता है.

नए नियम राज्य और केंद्र के स्तरों पर तकनीकी और नीतिगत संदर्भों में REC तंत्र से जुड़ी अनिश्चितता और जोख़िम बढ़ा सकते हैं. 

2022 में REC विनियम जो दिसंबर में लागू हुए, उनका लक्ष्य REC तंत्र का पुनर्गठन करना था. नए विनियमनों ने टेक्नोलॉजी द्वारा REC गुणकों की परिकल्पना सामने रखी, बिकने तक की मियाद के लिए RECs की वैधता को अनंत रूप से बढ़ा दिया, और सबसे महत्वपूर्ण रूप से, REC व्यापार के लिए न्यूनतम और अधिकतम क़ीमत की शर्त हटा दी. नए नियम राज्य और केंद्र के स्तरों पर तकनीकी और नीतिगत संदर्भों में REC तंत्र से जुड़ी अनिश्चितता और जोख़िम बढ़ा सकते हैं. 

समस्याएं

बाज़ार और विनियमन से जुड़ी भारी अनिश्चितताओं के चलते राज्य और केंद्र के स्तरों पर REC बाज़ार के सीमित रहने की आशंका है. REC बाज़ार को संभावित रूप से अवशोषित कर लेने वाले कार्बन बाज़ार की योजनाबद्ध शुरुआत, और उत्सर्जन में कटौती लाने वाले अन्य समाधानों से प्रतिस्पर्धा, अनिश्चितता को और बढ़ा देती है. नवीकरणीय ऊर्जा की ख़रीद के हालिया तौर-तरीक़े, जैसे प्रतिस्पर्धी बोली, ग्रीन टर्म अहेड मार्केट (GTAM) और इंटीग्रेटेड डे-अहेड मार्केट (या ग्रीन डे अहेड मार्केट या GDAM) जैसे उपकरण और शुल्क माफ़ करने वाले अंतर-राज्य ट्रांसमिशन सिस्टम (ISTS), अब RPO अनुपालन के लिए REC के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं. अगर खुदरा बिजली में प्रतिस्पर्धा शुरू की जाती है तो वितरण कंपनियों द्वारा उभरते तंत्र को पसंद किए जाने की संभावना है, जो REC तंत्र की तुलना में ज़्यादा पारदर्शिता और पूर्वानुमान क्षमता रखते हैं. 

स्रोत: ग्रिड इंडिया

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Authors

Vinod Kumar Tomar

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Vinod Kumar, Assistant Manager, Energy and Climate Change Content Development of the Energy News Monitor Energy and Climate Change. Member of the Energy News Monitor production ...

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Lydia Powell

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Ms Powell has been with the ORF Centre for Resources Management for over eight years working on policy issues in Energy and Climate Change. Her ...

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Akhilesh Sati

Akhilesh Sati

Akhilesh Sati is a Programme Manager working under ORFs Energy Initiative for more than fifteen years. With Statistics as academic background his core area of ...

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