भारत में एफडीआई नीति में संशोधन कर अंतरिक्ष सेक्टर में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी तो दे दी गई है, लेकिन देश में राष्ट्रीय अंतरिक्ष क़ानून के अभाव में यह क़दम कितना कारगर साबित होगा, इस पर संदेह बना हुआ है.
भारत की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी यानी इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) ने वर्ष 2023 में रिकॉर्ड उपलब्धि हासिल करते हुए सात मिशनों का कुशलता से संचालन किया था. इतना ही नहीं, इसी साल भारत ने चंद्रमा पर सफलतापूर्वक अंतरिक्ष यान उतारा और इसके साथ ही इस उपलब्धि को हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया. इसरो की अंतरिक्ष में उपलब्धियों का सिलसिला थमने वाला नहीं है. इसरो द्वारा चंद्रयान 3 और आदित्य एल 1 मिशन की क़ामयाबी के पश्चात इस साल 12 महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशन संचालित करने की योजना पर ज़ोरशोर से कार्य किया जा रहा है. वर्ष 2024 "गगनयान का वर्ष" है. इस साल भारत अपने पहले मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन गगनयान की तैयारी में जुटा है. गगनयान मिशन के अंतर्गत तीन अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की सतह से 400 किलोमीटर ऊपर स्थित कक्षा में ले जाया जाएगा. निसंदेह तौर पर इसरो के मिशनों की इस क़ामयाबी ने एक तरफ भारत को एक बड़ी अंतरिक्ष ताक़त बना दिया है और दिनों दिन भारत की इस शक्ति में इज़ाफा हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत ने अपने स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया है, यानी भारत द्वारा अंतरिक्ष सेक्टर में निजी भागीदारी को संस्थागत रूप प्रदान किया जा रहा है.
भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति में स्पेस सेक्टर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, ऐसे में अंतरिक्ष क्षेत्र से कमाई के लिहाज़ से भारत सरकार द्वारा स्थापित ये कंपनियां और संस्थान ख़ासे अहम हैं.
भारत में अंतरिक्ष से संबंधित गतिविधियों में सख़्त सरकारी नियंत्रण को समाप्त करने की शुरुआत वर्ष 2020 में हुई थी. यह वो साल था जब भारतीय स्पेस सेक्टर में निजी भागीदारी को बढ़ाते हुए अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधारों की प्रक्रिया प्रारंभ की गई थी. भारत सरकार ने वर्ष 2023 में इंडियन स्पेस पॉलिसी यानी भारतीय अंतरिक्ष नीति बनाई थी. इस नीति का मकसद अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी सेक्टर की भागीदारी को संस्थागत बनाने एवं गैर-सरकारी संस्थाओं को अंतरिक्ष क्षमताएं स्थापित करने और उनमें बढ़ोतरी की स्वीकृति देना था. वर्ष 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति के मुताबिक़ इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर यानी भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) एक स्वतंत्र इकाई के तौर पर काम करेगा और देश के भीतर अंतरिक्ष-संबंधित गतिविधियों की अनुमति प्रदान करेगा एवं इनकी निगरानी भी करेगा. इसके साथ ही भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग के अंतर्गत पूर्ण सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) का गठन किया गया है. NSIL सरकारी वित्तपोषण से विकसित की गई अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों और प्लेटफार्मों के व्यावसायीकरण से संबंधित गतिविधियों को देखती है. भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति में स्पेस सेक्टर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, ऐसे में अंतरिक्ष क्षेत्र से कमाई के लिहाज़ से भारत सरकार द्वारा स्थापित ये कंपनियां और संस्थान ख़ासे अहम हैं.
रोज़मर्रा के जीवन में स्पेस टेक्नोलॉजी की भूमिका बढ़ती जा रही है. आज दूरसंचार से लेकर टेलीमेडिसिन तक, खनन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तक और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का महत्व बढ़ गया है. कहने का मतलब है कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आज लोगों के जीने के तरीक़े को बदल रही है. वर्तमान में खाद्य सुरक्षा को मज़बूती प्रदान करने यानी खाद्यान्न के नुक़सान को कम करने, आपूर्ति श्रृंखला में सुधारने जैसे कार्यों में उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है. वहीं, उपग्रहों के ज़रिए पृथ्वी की निगरानी की जाती है, ताकि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों का सटीक आकलन किया जा सके. इतना ही नहीं, तमाम देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को सशक्त करने के लिए अंतरिक्ष में सैन्य परिचालन क्षमताओं को स्थापित कर रहे हैं. ज़ाहिर है कि अंतरिक्ष से जुड़ी इन सभी गतिविधियों को संचालित करने के लिए सिर्फ़ सरकारी निवेश पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है. देखा जाए तो अंतरिक्ष से संबंधित गतिविधियों के व्यावसायिक उपयोग का भविष्य कहीं न कहीं निजी क्षेत्र से होने वाले निवेश पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. उल्लेखनीय है कि यह निजी निवेश विदेशी कंपनियों द्वारा भी किए जाएंगे. ऐसे में स्पेस सेक्टर में निजी निवेश को संस्थागत बनाने के लिए भारत को लचीला रुख अख़्तियार करने की ज़रूरत है, साथ ही निजी कंपनियों के लिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस यानी बिजनेस करने के लिए सुगमता बढ़ाने की भी आवश्यकता है.
इस फैसले से न सिर्फ़ रोज़गार के अवसर पैदा होंगे, बल्कि यह आधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाने और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं को सशक्त करने में भी मददगार साबित होगा.
भारत सरकार ने हाल ही में अंतरिक्ष सेक्टर में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की मंजूरी देने के लिए एफडीआई पॉलिसी में संशोधन किया है. केंद्र द्वारा यह सुधार वर्ष 2020 के संयुक्त एफडीआई पॉलिसी सर्कुलर के पैरा 5.2.12 के अंतर्गत किए गए थे. ऐसा माना जा रहा है कि अंतरिक्ष सेक्टर में 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति देने से इस क्षेत्र में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे. जैसे कि इस फैसले से न सिर्फ़ रोज़गार के अवसर पैदा होंगे, बल्कि यह आधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाने और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं को सशक्त करने में भी मददगार साबित होगा. भारत सरकार के मुताबिक़, “अंतरिक्ष सेक्टर में निवेश बढ़ने से गैर-सरकारी कंपनियां अंतरिक्ष उत्पादों की विशेषज्ञता प्राप्त कर सकेंगी, वैश्विक स्तर की परिचालन क्षमता हासिल कर सकेंगी, साथ ही वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अपने हिस्सेदारी को बढ़ा सकेंगी.”
स्पेस फाउंडेशन ने वर्ष 2023 की दूसरी तिमाही की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 546 बिलियन अमेरिकी डॉलर की हो चुकी है. ऐसी उम्मीद है कि अगले पांच वर्षों में वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 800 बिलियन अमेरिकी डॉलर की हो जाएगी. ज़ाहिर है कि वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत भी एक महत्वपूर्ण भागीदार है. भारत का घरेलू अंतरिक्ष मार्केट 6,400 करोड़ रुपये (8.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का है, यानी वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2 प्रतिशत है. IN-SPACe के अनुसार वर्ष 2033 तक भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 35,200 करोड़ रुपये (44 बिलियन अमेरिका डॉलर) तक पहुंच सकती है. यानी कि वर्ष 2033 तक ग्लोबल स्पेस इकोनॉमी में भारत की हिस्सेदारी क़रीब 8 से 10 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी. पूरी दुनिया में अंतरिक्ष सेक्टर में ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा का माहौल है. विश्व के 90 से अधिक देशों में अंतरिक्ष उद्योग में 10,000 से अधिक कंपनियां कार्यरत हैं और लगभग 5,000 निवेशक हैं. अनुमान के मुताबिक़ वर्ष 2050 तक स्पेस इंडस्ट्री एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की हो जाएगी.
भारत में अंतरिक्ष सेक्टर में कार्यरत स्टार्ट-अप्स की संख्या 200 से ज़्यादा है. ध्रुव स्पेस, स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल और दिगंतरा जैसी निजी कंपनियां भारतीय स्पेस सेक्टर में सक्रिय हैं और तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं. ये कंपनियां निजी उपग्रहों के प्रक्षेपण से लेकर दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले प्रक्षेपण यानों के विकास, साथ ही अंतरिक्ष मलबे की छानबीन से लेकर अंतरिक्ष से संबंधित तमाम उपकरणों और घटकों के निर्माण तक तमाम तरह की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों को विकसित करने के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं. आज जब हम अपने अंतरिक्ष मिशनों की क़ामयाबी और संशोधित एफडीआई नीति की सफलता पर गर्व कर रहे हैं, तो हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत में अंतरिक्ष गतिविधियों से संबंधित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क यानी नियामक ढांचे का होना भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है. हैरानी की बात है कि अंतरिक्ष सेक्टर में एक ताक़तवर देश होने के बावज़ूद, भारत में कोई राष्ट्रीय अंतरिक्ष क़ानून नहीं है. हालांकि, वर्ष 2017 के ड्राफ्ट स्पेस एक्टिविटी बिल और वर्ष 2022 में इस बिल में संशोधन के ज़रिए इस दिशा में कोशिशें ज़रूर की गई हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि अभी तक भारत में अंतरिक्ष से संबंधित कोई मुकम्मल क़ानून नहीं बनाया जा सका है.
जिस प्रकार से देश में अंतरिक्ष प्रक्षेपण स्टेशनों का निर्माण या फिर व्यावसायिक उपयोग के लिए अंतरिक्ष स्टेशनों को बनाने, उपग्रहों के बड़े समूहों का विकास करने और अंतरिक्ष में पाए जाने वाले प्राकृतिक संसाधन की खोज, दोहन एवं उपयोग में निजी कंपनियों की ओर से लगातार निवेश बढ़ाया जा रहा है
देखा जाए तो 2023 की नई अंतरिक्ष पॉलिसी वैधानिक ढांचे पर आधारित नहीं है. ज़ाहिर है कि प्रशासनिक मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए क़ानूनी फ्रेमवर्क के मुताबिक़ नीति को बनाना बेहद ज़रूरी है. इसके साथ ही इस अंतरिक्ष नीति में न तो इसरो की मार्केटिंग और व्यावसायिक सहयोगी एंट्रिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (Antrix) की भूमिका को लेकर साफ-साफ कुछ कहा गया है और न ही बौद्धिक संपदा के विभिन्न आयामों, अंतर्राष्ट्रीय क़ानून की प्रतिबद्धताओं समेत तमाम दूसरे मसलों को लेकर भी इसमें कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया है. इन सभी मुद्दों से जो भी चिंताए सामने आती हैं, उनका निराकरण केवल एक राष्ट्रीय अंतरिक्ष क़नून के माध्यम से ही किया जा सकता है. आज की हक़ीक़त यह है कि भारत में अरबों डॉलर का स्पेस सेक्टर संसद द्वारा पारित किए गए किसी क़ानून के बगैर कार्य कर रहा है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि अंतरिक्ष जैसे संवेदनशील सेक्टर में बिना किसी क़ानून के माध्यम से सिर्फ़ शासनादेश के ज़रिए निजी कंपनियों को कार्य करने की मंजूरी देना ख़तरे से खाली नहीं है. कहा जा सकता है कि यह ज़ल्दबाज़ी में उठाया गया क़दम है और भविष्य में कभी भी सरकार के इस क़दम को अदालत में चुनौती दी जा सकती है. जिस प्रकार से देश में अंतरिक्ष प्रक्षेपण स्टेशनों का निर्माण या फिर व्यावसायिक उपयोग के लिए अंतरिक्ष स्टेशनों को बनाने, उपग्रहों के बड़े समूहों का विकास करने और अंतरिक्ष में पाए जाने वाले प्राकृतिक संसाधन की खोज, दोहन एवं उपयोग में निजी कंपनियों की ओर से लगातार निवेश बढ़ाया जा रहा है, उससे निश्चित तौर पर संदेह का माहौल बनेगा और कहीं न कहीं जवाबदेही, पारदर्शिता एवं सरकार की ज़िम्मेदारी को लेकर सवाल भी उठेंगे. उल्लेखनीय है कि ऐसी परिस्थितियों में एंट्रिक्स-देवास विवाद जैसे करोड़ों डॉलर के तमाम और विवाद भी सामने आएंगे.
20वीं सदी में अंतरिक्ष क्षेत्र की गतिविधियों के संचालन में भू-राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका थी, लेकिन वर्तमान में स्पेस सेक्टर में अर्थनीति का बोलबाला है, यानी इसमें अरबों-खरबों डॉलर का बाज़ार शामिल है और आर्थिक पहलुओं से ही इसे निर्धारित किया जा रहा है. हालांकि, आज जिस प्रकार से भारतीय अंतरिक्ष सेक्टर में नई-नई व्यावसायिक संभावनाएं बन रही हैं, उनके लिहाज़ से SpaceX, वर्जिन गैलेक्टिक और ब्लू ओरिजिन जैसी स्पेस सेक्टर की दुनिया की शीर्ष कंपनियों के लिए आकर्षण पैदा होना लाज़िमी है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रीय अंतरिक्ष क़ानून की गैरमौज़ूदगी में भारत की नई उदार अंतरिक्ष नीति किस प्रकार से कार्य करेगी. ज़ाहिर है कि भारत जैसी एक ज़िम्मेदार अंतरिक्ष ताक़त को, जिसके पास अपने दम पर उपग्रह निर्माण से लेकर उनके प्रक्षेपण तक की काबिलियत है, उसे अंतरिक्ष सेक्टर में निजी निवेश को बढ़ावा देने में नियम-क़ानून पर आधारित नज़रिए का अनुपालन करने की अपनी प्रतिबद्धता को कभी नहीं भूलना चाहिए.
संदीपा भट्ट बी. लॉ की प्रोफेसर हैं और पश्चिम बंगाल नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंसेज, कोलकाता में सेंटर फॉर एविएशन एंड स्पेस लॉ की निदेशक हैं.
आदित्य वारिअथ महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, मुंबई में सेंटर फॉर रिसर्च इन एयर एंड स्पेस लॉ के सहायक प्रोफेसर और समन्वयक हैं.
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Sandeepa Bhat B. is a Professor of Law and Director of the Centre for Aviation and Space Laws at the West Bengal National University of ...
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Adithya Variath is an Assistant Professor and Coordinator of the Centre for Research in Air and Space Law at Maharashtra National Law University, Mumbai. ...
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