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विभिन्न राज्यों में पार्टिकुलेट मैटर के लिए पायलट ईटीएस योजना शुरू करने के साथ कार्बन बाजार स्थापित करने का फैसला लेकर भारत ने सही राह पकड़ी है.
भारत में करोड़ों लोग बेहद प्रदूषित हवा को भीतर खिंचते हैं, जिसमें पीएम 2.5 पार्टिकल्स यानी कणों के साथ ही जहरीली गैस जैसे, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डायऑक्साइड और नाइट्रोजन डायऑक्साइड का समावेश होता है. आईक्यू एयर के अनुसार वर्ष 2021 में भारत में पीएम 2.5 स्तर था, जो डब्ल्यूएचओ के मार्गदर्शक मूल्य से 11 गुना ज्यादा है. वर्ष 2021 में भारत दुनिया का पांचवां सबसे प्रदूषित देश था. विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के 63 शहर तो दुनिया के 100 सबसे प्रदूषित स्थानों में काफी ऊपर हैं. इसमें भी 10 भारतीय शहर तो टॉप 15 शहरों में आते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इन्स्टीट्यूट के डाटा के अनुसार यदि डब्ल्यूएचओ के मार्गदर्शक स्तर के हिसाब से पीएम 2.5 के स्तर को कम कर दिया गया तो दिल्ली में रहने वाले लोगों की जिंदगी में दस वर्ष और जुड़ जाएंगे. इतना ही नहीं लैंसेट कमिशन की ओर से प्रदूषण और स्वास्थ्य पर की गई एक स्टडी ने पाया गया कि वर्ष 2019 में वायु प्रदूषण की वजह से 16.7 लाख मौतें हुई हैं. यह उस वर्ष हुई कुल मौतों का लगभग 17.8 प्रतिशत है.
वर्ष 2021 में भारत दुनिया का पांचवां सबसे प्रदूषित देश था. विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के 63 शहर तो दुनिया के 100 सबसे प्रदूषित स्थानों में काफी ऊपर हैं. इसमें भी 10 भारतीय शहर तो टॉप 15 शहरों में आते हैं.
सभी आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भारत का पीएम 2.5 का स्तर बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि इसका प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था, कार्यबल के साथ हमारे नागरिकों के जीवन स्तर पर भी पड़ रहा है. इस मसले का मुकाबला करने के लिए भारत में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण विशेषत: पीएम 2.5 पार्टिकल्स फैलाने वाले कारणों को लेकर एक सूक्ष्म विश्लेषण जरूरी है. सेंट लुई स्थित वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के अध्ययनकर्ताओं ने भारत समेत विभिन्न देशों में पीएम 2.5 एक्सपोजर तथा पीएम 2.5 में होने वाले क्षेत्रीय योगदान को रिकार्ड करने के लिए एक अध्ययन किया. उसके विश्लेषण ने यह खुलासा किया कि भारत में घरेलू और व्यावसायिक खाना पकाना, प्रकाश व्यवस्था और गर्म करने की पद्धति ही पीएम 2.5 कण का मुख्य स्त्रोत थे. 2017 में पीएम 2.5 स्तर होने से कुल 28 प्रतिशत का योगदान इनका ही पाया गया था. भारत के वातावरण में पीएम 2.5 कण का लगभग 15 प्रतिशत योगदान देकर औद्योगिक गतिविधियां दूसरे स्थान पर थीं. इसके साथ ही औद्योगिक प्रक्रियाओं की वजह से ही नाइट्रोजन और सल्फर जैसे घातक कम्पाउंड्स भी हवा में पहुंचते हैं, जिसकी वजह से अल्पावधि और दीर्घकालीन परिणाम होते हैं. नतीजतन, औद्योगिक क्षेत्र की ओर से प्रदूषकों के उत्सर्जन को कम करने के लिए लक्षित हस्तक्षेप, भारत का वायु प्रदूषण कम करने की दिशा में एक लंबा रास्ता तय कर सकता है.
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स्त्रोत: https://urbanemissions.info/india-air-quality/india-satpm25/
भारत की सरकार ने हाल ही में सही दिशा में कदम उठाए हैं. लोकसभा में ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2022 पेश किया गया है, जिसका उद्देश्य ऊर्जा संरक्षण कानून (ईसीए), 2001 में संशोधन करना है. इस विधेयक को आठ अगस्त 2022 को मंजूरी दी गई. इसका उद्देश्य 2070 तक भारत को नेट-जीरो अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में परिवर्तन की कोशिशों को समर्थन देकर उसकी निरंतरता पर ध्यान केंद्रित करना है. इस कानून में भारत को डीकार्बनाइज करने के अनेक प्रावधान हैं. इसमें सबसे अहम है कि यह कानून भारत की सरकार (जीओआई) को भारत में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम स्थापित करने का अधिकार प्रदान करता है ताकि भारत के सबसे पहले स्वीकृत कार्बन ट्रेडिंग मार्केट का कानूनी ढांचा तैयार किया जा सके. इस फैसले का भारत के औद्योगिक क्षेत्र पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा और इसकी वजह से औद्योगिक उत्सर्जन में कमी आने के साथ ही स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के साथ निजी क्षेत्र की कंपनियों में ऊर्जा दक्षता भी बढ़ सकेगी.
भारत की सरकार ने हाल ही में सही दिशा में कदम उठाए हैं. लोकसभा में ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2022 पेश किया गया है, जिसका उद्देश्य ऊर्जा संरक्षण कानून (ईसीए), 2001 में संशोधन करना है.
लोगों पर हानिकारक गैसों जैसे CO2, N2O आदि के पड़ने वाले नकारात्मक बाहरी प्रभाव को आंतरिक करने के लिए उत्सर्जन व्यापार प्रणाली यानी एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम्स् (ईटीएस) के मूल में इन गैसों के उत्सर्जन पर एक मूल्य लगाया गया है. अन्य शब्दों में अपनी औद्योगिक प्रक्रियाओं के दौरान जो प्रतिष्ठान इन गैसों का उत्सर्जन करते हैं, उन्हें इस उत्सर्जन की वजह से लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभाव के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए उन पर टैक्स लगाया जाता है. इस प्रणाली की वजह से औद्योगिक इकाइयों को अपनी व्यवस्था में सुधार करने और स्वच्छ, पर्यावरणपूरक औद्योगिक प्रक्रियाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि आम जनता के लिए साफ- सुथरी हवा उपलब्ध हो और सरकार को भी अच्छा खासा राजस्व मिल सकें. यह प्रणाली सभी का भला करती है.
उत्सर्जन बाजार का सबसे आम रूप जो चलन में है उसमें ‘कैप एंड ट्रेड’ मॉडल अपनाया जाता है, जहां सरकार विशेष औद्योगिक क्षेत्र के लिए कुल उत्सर्जन की समग्र ‘कैप’ (उच्चतम सीमा) निर्धारित कर देती है. सरकार इसके बाद नियंत्रित प्रतिष्ठानों को या तो परमिट्स आवंटित करती है या नीलाम करती है, ताकि उन प्रतिष्ठानों को एक निश्चित मात्रा में प्रदूषक उत्सर्जित करने का अधिकार दिया जा सके. इन परमिट्स को बाद में पर्यावरण शेयर बाजार में खरीदा और बेचा जा सकता है. इस शेयर बाजार में आपूर्ति और मांग को देखते हुए बाजार की शक्तियां ही इन परमिट्स का एक निर्धारित मूल्य तय करती है. यदि कोई प्रतिष्ठान अपनी निर्धारित सीमा से अधिक उत्सर्जन करता है तो उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता है. समय के साथ सरकार उत्सर्जन की उच्चतम सीमा को घटाती है, ताकि कुल उत्सर्जन भी घटाया जा सके.
ईटीएस उपक्रम को दुनिया में काफी पहले से लागू किया जा रहा है. 2005 में ही ईयू-ईटीएस योजना के साथ दुनिया का पहला कार्बन बाजार स्थापित हो गया था. वर्तमान में 32 ईटीएस उपक्रम कार्यरत हैं, जिसमें 38 नेशनल तथा 31 सब-नेशनल अधिकार क्षेत्र शामिल हैं.
अत: उत्सर्जन बाजार प्रोत्साहन और दंडित, जिसे कैरट एंड स्टिक कहा जाता है, की नीति अपनाकर हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में परिवर्तन को उत्प्रेरित करता है :
ईटीएस उपक्रम को दुनिया में काफी पहले से लागू किया जा रहा है. 2005 में ही ईयू-ईटीएस योजना के साथ दुनिया का पहला कार्बन बाजार स्थापित हो गया था. वर्तमान में 32 ईटीएस उपक्रम कार्यरत हैं, जिसमें 38 नेशनल तथा 31 सब-नेशनल अधिकार क्षेत्र शामिल हैं. उल्लेखनीय है कि दुनिया के सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक चीन ने भी 2021 से अपने यहां अपना अनिवार्य ईटीएस उपक्रम लागू किया है और फिलहाल वहां दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन बाजार है.
ईटीएस उपक्रमों का मुख्य उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करते हुए ग्लोबल वार्मिंग से निपटना है, लेकिन वे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मार्ग अपनाकर वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने में भी अहम भूमिका अदा कर सकते हैं. ईटीएस योजना की वजह से स्वच्छ हवा हासिल करने के कुछ प्रमुख तरीके यह भी हो सकते हैं.:
ईयू-ईटीएस योजना ने 2005 से कार्बन उत्सर्जन में 43 प्रतिशत की कमी ला दी है, जिससे साफ है कि ईटीएस उपक्रम कार्बन उत्सर्जन कम करने में प्रभावी साबित हुए हैं. हालांकि इन योजनाओं के अन्य लाभ जैसे जहरीली गैस के उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण पूरक नवाचार को मिलने वाली उत्प्रेरणा की ओर अक्सर अनदेखी की जाती है. इसके अलावा इसी तरह के ढांचे का उपयोग पार्टिकुलेट मैटर के लिए करते हुए सरकार वायु प्रदूषण से एक नई और प्रभावी प्रक्रिया के माध्यम से निपट सकती है.
ईयू-ईटीएस योजना ने 2005 से कार्बन उत्सर्जन में 43 प्रतिशत की कमी ला दी है, जिससे साफ है कि ईटीएस उपक्रम कार्बन उत्सर्जन कम करने में प्रभावी साबित हुए हैं.
यहां उल्लेखनीय है कि अकेले ईटीएस उपक्रम के दम पर भारत अपनी वायु प्रदूषण की समस्या को हल नहीं कर सकता. औद्योगिक इकाइयों से होने वाले उत्सर्जन से निपटने में यह उपयोगी साधन हो सकते हैं, लेकिन ऐसी योजनाओं से कृषि उपज को जलाने, घरेलू ईंधन की खपत तथा परिवहन क्षेत्र जैसे अन्य स्त्रोत से होने वाले प्रदूषण का हल नहीं निकाला जा सकता. सरकार को मौजूदा वायु प्रदूषण में कमी लाने वाले कार्यक्रमों, जैसे राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के लिए वित्त पोषण बढ़ाने और इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अधिक लक्षित हस्तक्षेप शुरू करने की आवश्यकता पर विचार करना चाहिए. हालांकि भारत में कार्बन बाजार की स्थापना की राह खोलकर और विभिन्न राज्यों में पार्टिकुलेट मैटर के लिए ईटीएस योजनाओं का पायलट शुरू कर भारत ने यह दिखा दिया है कि वह अपनी वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सही दिशा में जा रहा है.
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