Author : Vikrom Mathur

Published on Oct 04, 2023 Updated 0 Hours ago

वैश्विक स्थिरता के लिए केवल सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करना ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इसके लिए OECD देशों द्वारा सतत उपभोग लक्ष्यों (SCGs) को भी अपनाने की ज़रूरत है.

OECD देशों के लिए बेहद ज़रूरी है सतत उपभोग लक्ष्यों (SCGs) को अपनाना!

न्यूयॉर्क में हाल ही में 18-19 सितंबर को आयोजित हुई SDG समिट में पूरी दुनिया के देश एक साथ जुटे और सबने मिलकर सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्रगति की समीक्षा की, साथ ही बदलाव के संभावित तौर-तरीक़ों पर विस्तृत चर्चा की. 2023 की यह समिट ऐसे समय में आयोजित की गई है, जो वर्ष 2030 के एजेंडा एवं सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने की निर्धारित समयसीमा के आधे कार्यकाल का साल है.

देखा जाए तो सभी के हितों को सुरक्षित करने के बारे में लंबी-चौड़ी बातें तो की जाती हैं, लेकिन जब सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की बात आती है, तो इसकी पूरी ज़िम्मेदारी विकासशील देशों पर थोप दी जाती है और उनसे अपने पर्यावरण एवं सामाजिक सूचकों में सुधार लाने को कहा जाता है. विडंबना यह है कि इस मुद्दे पर विकसित देशों की ज़िम्मेदारी के बारे में चुप्पी साध ली जाती और यहां तक कि उनकी करतूतों को छिपा दिया जाता है. ज़ाहिर है कि ऐतिहासिक रूप से वैश्विक संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा ये धनी देश ही उपभोग करते हैं. वर्तमान में भी ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) और यूरोपीय संघ (EU) के चंद अमीर देशों द्वारा की जाने वाली वैश्विक संसाधनों की प्रति व्यक्ति खपत, विकासशील देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा है. इतना ही नहीं इन अमीर देशों द्वारा होने वाले CO2 उत्सर्जन, पैदा किए जाने वाले ई-कचरे एवं उपभोग के तौर-तरीक़े का वैश्विक पर्यावरण पर गंभीर और व्यापक प्रभाव पड़ता है. इस संबंध में हाल ही में आयोजित SDG समिट जैसे फोरम द्वारा वर्तमान हालात का अनुमान लगाने के लिए अमल में लाई जाने वाली प्रक्रिया, निगरानी एवं मूल्यांकन जैसी तमाम क़वायदों की ज़िम्मेदारी जिस तरह से विकासशील देशों के ऊपर मढ़ दी गई है, वो किसी भी लिहाज़ से उचित नहीं है और इसमें कई खामियां हैं.

वर्तमान में भी ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) और यूरोपीय संघ (EU) के चंद अमीर देशों द्वारा की जाने वाली वैश्विक संसाधनों की प्रति व्यक्ति खपत, विकासशील देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा है. इतना ही नहीं इन अमीर देशों द्वारा होने वाले CO2 उत्सर्जन, पैदा किए जाने वाले ई-कचरे एवं उपभोग के तौर-तरीक़े का वैश्विक पर्यावरण पर गंभीर और व्यापक प्रभाव पड़ता है.

जिन वैश्विक संस्थाओं द्वारा इस मूल्यांकन को किया जाता है, वे रैंकिंग, प्रदर्शन आधारित वर्गीकरण और अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों का पलान किए जाने की आड़ में विकासशील देशों पर तमाम दबावों को डालती हैं. वहीं इस प्रकार के मानक दबाव से छुटकारा पाने के लिए विकासशील देशों को पर्याप्त वित्तीय मदद भी मुहैया नहीं कराई जाती है. इसका कारण यह है कि ओवरसीज डेवलपमेंट एड (ODA) में OECD देशों का योगदान तेज़ी से कम होता जा रहा है. सच्चाई यह है कि वर्ष 2018 से 2022 के बीच OECD की डेवलपमेंट असिस्टेंस कमेटी (DAC) के सदस्य देशों ने ODA में अपनी सकल राष्ट्रीय आय (GNI) का सिर्फ़ 0.31 प्रतिशत से 0.36 प्रतिशत तक का ही अंशदान किया है. यह योगदान SDG 17 (टिकाऊ विकास के लिए वैश्विक साझेदारी) के अंतर्गत सभी हाई इनकम और OECD डेवलपमेंट असिस्टेंस कमेटी के देशों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय रियायती पब्लिक फाइनेंस के लिए निर्धारित GNI के 1 प्रतिशत से बेहद कम है.

ऐसे में वैश्विक स्थिरता को हासिल करने के लिए ‘टिकाऊ उपभोग लक्ष्य (SCG)’ एक मददगार नज़रिया हो सकता है. ज़िम्मेदार खपत एवं उत्पादन पर आधारित SDG 12 ने इस समस्या को लेकर अभी तक कुछ भी नहीं किया है. उल्लेखनीय है कि SCG के अंतर्गत अलग-अलग देशों के द्वारा विभिन्न पहलों के ज़रिए प्रति व्यक्ति खपत को कम करने के लिए कई लक्ष्यों को निर्धारित किया जाएगा. इन लक्ष्यों को पाने के लिए जो बातें कहीं गई हैं, उनकी प्रगति की जांच-परख के लिए पारदर्शी निगरानी प्रक्रियाओं को अपनाने की ज़रूरत होगी, साथ ही वैश्विक स्तर पर तय किए गए विशेष एवं समयबद्ध सूचकों का इस्तेमाल सुनिश्चित करना होगा. संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में SDG समिट की तरह ही SCG समिट आयोजित करनी होगी और यह एक टिकाऊ दुनिया बनाने के लिए एक पुख़्ता दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है. यह ध्यान रखना अहम है कि OECD देश, जो कि वैश्विक संसाधनों, कार्बन बजट और सीमित इकोसिस्टम सेवाओं के एक बड़े हिस्से का उपयोग करना जारी रखे हुए हैं, उन्हें SCGs को अपनाने के लिए सक्रिय क़दम उठाने चाहिए. विकासशील देशों, ख़ास तौर पर इन देशों के विशेषज्ञ संस्थान इसके लिए मापदंड व लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं और नियमित तौर पर ताज़ा हालातों का अनुमान लगाने एवं प्रदर्शन मूल्यांकन की प्रक्रिया की अगुवाई कर सकते हैं.

भारत का मिशन LiFE (पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली) इस दिशा में एक क्रांतिकारी विचार है. मिशन LiFE वैश्विक स्तर पर टिकाऊ उपभोग लक्ष्यों (SCGs) के विचार को प्रोत्साहित करने के लिए एक बेहतरीन पहल है. नई दिल्ली में हाल ही में संपन्न हुए G20 सम्मेलन को दौरान कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने मिशन LiFE कार्यक्रम के महत्व को स्वीकार किया है. ज़ाहिर है कि मिशन LiFE पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़े ख़तरों का सामना करने में उल्लेखनीय रूप से मददगार साबित हो सकता है. बेतरतीब और गैर-टिकाऊ तरीक़े से संसाधनों का उपभोग करने से जहां एक ओर अधिक अपशिष्ट पैदा होता है, ज़्यादा कार्बन उत्सर्जन होता है और वनों की अत्यधिक कटाई होती है, वहीं इसके पर्यावरण पर कई दूसरे गंभीर प्रभाव भी पड़ते हैं. ऐसे में जीवनशैली में बदलाव का आह्वान करना प्रभावशाली क़दम साबित हो सकता है. G20 के सदस्य देशों में कुल वैश्विक आबादी का 60 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है और अगर इन देशों के नागरिक खपत को कम करते हैं, तो वे जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में अपना उल्लेखनीय योगदान दे सकते हैं.

SCGs का खाका तैयार करना

शुरुआती दौर में SCGs को मिशन LiFE के अंतर्गत सूचीबद्ध किए गए सात विषयों, जैसे कि पानी की बचत, ऊर्जा की बचत, अपशिष्ट कम करना, ई-कचरे में कमी लाना, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के उपयोग में कमी, टिकाऊ खाद्य प्रणालियों को अपनाना और स्वस्थ जीवन शैली को अपनाने के साथ एकीकृत किया जा सकता है.

निसंदेह तौर पर SCGs की क़ामयाबी के लिए OECD की सक्रिय रूप से भागीदारी बेहद ज़रूरी है. उदाहरण के तौर पर OECD देश न केवल दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं, बल्कि सबसे बड़े उपभोक्ता भी हैं, ऐसे में इन राष्ट्रों की सक्रिय भागीदारी टिकाऊ उपभोग लक्ष्यों की सफलता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है. अगर OECD देश SCGs को अपनाते हैं, तो ऐसा करके वे वैश्विक मापदंड स्थापित कर सकते हैं. बेतरतीब तरीक़े से उपभोग संसाधनों की कमी की वजह बन सकता है, नतीज़तन वस्तुओं के दाम बढ़ सकते हैं और इससे आर्थिक अस्थिरता के हालात भी पैदा हो सकते हैं. ज़ाहिर है कि ऐसे में देश टिकाऊ उपभोग को प्रोत्साहन देकर न केवल घरेलू स्तर पर, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने में सहायता कर सकते हैं.

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में SDG समिट की तरह ही SCG समिट आयोजित करनी होगी और यह एक टिकाऊ दुनिया बनाने के लिए एक पुख़्ता दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है.

भारत द्वारा जिस प्रकार प्रभावशाली ढंग से मिशन LiFE की परिकल्पना को दुनिया के समक्ष रखा गया है और इस कार्यक्रम की अगुवाई की गई है, उससे यह स्पष्ट है कि SCGs वैश्विक स्तर पर विकासशील देशों के हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व कर सकते हैं. OECD देश टिकाऊ उपभोग लक्ष्यों को अपनाकर जहां एक तरफ विकासशील देशों को एकजुटता का सशक्त संकेत देते हैं, वहीं बराबरी वाले और निष्पक्ष विश्व को लेकर अपनी प्रतिबद्धता को भी जताते हैं. ऐसा करना जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध हमारे क़दमों को भी फलीभूत करेगा, यानी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में जिन देशों की अधिक भागीदारी है, वे जलवायु कार्रवाई में किसी न किसी रूप में अपना ज़्यादा योगदान देंगे.

SCGs के महत्व को दर्शाने वाले निम्न सात महत्वपूर्ण विषय हैं, जिन पर OECD देशों द्वारा गंभीरता से कार्य किया जा सकता है:

  1. जल संरक्षण: SDGs में वर्ष 2030 तक दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति तक निष्पक्ष तरीक़े से साफ और किफायती पेयजल की उपलब्धता की बात कही गई है. इसमें विश्व के तमाम देशों में लोगों तक साफ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एकीकृत जल प्रबंधन गतिविधियों को व्यापक पैमाने पर अपनाना शामिल है. ज़ाहिर है कि जल संरक्षण से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए लक्षित दिशा में कार्य करने की ज़रूरत है, तभी इसको लेकर तेज़ प्रगति हो सकती है. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सही दिशा में कार्य हो रहा है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए साफ पेयजल के दोहन की मात्रा एक बड़ा सूचक हो सकता है. कुल मिलाकर देखें तो पूरी दुनिया में हर साल 3.9 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर स्वच्छ जल का दोहन होता है, इसमें से अकेले OECD देशों ने ही वर्ष 2020 में 1 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर से ज़्यादा साफ पानी का दोहन किया है. जबकि सबसे कम विकसित देशों ने वर्ष 2020 में सिर्फ़ 2 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर से अधिक साफ पेयजल का उपभोग किया है. ज़मीन से साफ पानी के दोहन को कम करने के लिए कृषि, उद्योग एवं घरेलू इस्तेमाल के लिए पानी के समझदारी के साथ उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई क़दम उठाए जा सकते हैं.
  1. ऊर्जा संरक्षण: अगर घरेलू स्तर पर और व्यक्तिगत स्तर पर उर्जा के उपयोग में बदलाव किया जाए एवं ऊर्जा संरक्षण के संबंधित उपायों को बढ़ावा दिया जाए तो ऊर्जा खपत को काफ़ी कम किया जा सकता है. इसको प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत के ज़रिए मापा और जांचा जा सकता है. जहां तक OECD जैसे हाई इनकम वाले देशों की बात है, तो इन देशों में वर्ष 1965 से 2022 तक लगातार प्रति व्यक्ति ऊर्जा उपभोग में बढ़ोतरी दर्ज़ की गई है. OECD देशों की वर्ष 2022 में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत वैश्विक औसत की 2.5 गुना थी, जबकि कम इनकम वाले देशों में प्रति व्यक्ति औसत ऊर्जा खपत से क़रीब 46 गुना अधिक थी. SCGs के माध्यम से बिल्डिंगों में, परिवहन के साधनों में और उद्योगों में ऊर्जा का कुशलता से उपयोग करने का आह्वान किया जा सकता है और इसके लिए विभिन्न संकेतों के ज़रिए समग्र ऊर्जा उपभोग की निगरानी की जा सकती है.
  1. अपशिष्ट में कमी: अनुमान के मुताबिक़ पूरी दुनिया में जितने खाद्य पदार्थों का उत्पादन किया जाता है, उसका लगभग एक तिहाई हिस्सा बर्बाद हो जाता है. खाद्य पदार्थों की यह बर्बादी व्यापक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को बढ़ाती है. भोजन की इस बर्बादी को बेहतर रिसाइक्लिंग, उससे खाद बनाने और अपशिष्ट को कम करने जैसी दूसरी पहलों के ज़रिए रोका जा सकता है. म्युनिसिपल वेस्ट जेनरेशन, जिसमें कुल अपशिष्ट उत्पादन की 10 प्रतिशत हिस्सेदारी है, में OECD देशों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दिखाई दी है. आंकड़ों के मुताबिक़ वर्ष 2015 में OECD देशों में एक व्यक्ति द्वारा औसतन वार्षिक 520 किलोग्राम म्युनिसिपल वेस्ट उत्पन्न किया गया था. इस आंकड़े में अभी भी वृद्धि की संभावना है. म्युनिसिपल कचरे को घरों में ही अलग-अलग करने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना और कचरे से घरेलू खाद बनाने को प्रोत्साहन देना एक बेहतर समाधान हो सकता है. SCG को वर्ष 2030 तक म्युनिसिपल ठोस कचरे में कमी लाने का लक्ष्य निर्थारित करना चाहिए.

भारत द्वारा जिस प्रकार प्रभावशाली ढंग से मिशन LiFE की परिकल्पना को दुनिया के समक्ष रखा गया है और इस कार्यक्रम की अगुवाई की गई है, उससे यह स्पष्ट है कि SCGs वैश्विक स्तर पर विकासशील देशों के हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व कर सकते हैं.

  1. ई-कचरे में कमी लाना: पूरे विश्व में शहरी इलाक़ों में ई-कचरे की बढ़ती मात्रा और इसके निस्तारण एवं प्रसंस्करण से संबंधित तकनीक़ों की कमी हाल के समय में एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरी है. नतीज़तन ज़्यादा ई-कचरे को ऐसे ही बिना निस्तारण के लैंडफिल में फेंक दिया जाता है और इसके चलते व्यापक स्तर पर पर्यावरणीय एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां सामने आती हैं. वर्ष 2016 के आंकड़ों की बात करें तो ई-कचरे के मामले में पूरी दुनिया में OECD देशों की हालत सबसे बदतर थी. इन देशों में प्रति व्यक्ति 20 से 30 किलोग्राम ई-कचरा निकला था. SCG यह सुनिश्चित करने के लिए लक्ष्य निर्धारित कर सकता है कि वर्ष 2030 तक जो भी डिजिटल उपकरण बेचे जाएं, उन्हें इस प्रकार से डिज़ाइन किया जाए कि उनकी लाइफ साइकिल अधिक हो और ख़राब होने पर उन्हें ठीक किया जा सके, साथ ही समुचित तरीक़े से रिसाइक्लिंग भी की जा सके. यहां मापने योग्य संकेतक उन डिजिटल उपकरणों का प्रतिशत है, जो इको-डिज़ाइन फीचर्स से लैस हैं.
  1. सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उपयोग को कम करना: अक्सर सिंगल यूज़ प्लास्टिक को यू हीं लैंडफिल में फेंक दिया जाता है, या फिर यह बहकर समुद्र में पहुंच जाता है. यह घातक सिंगल यूज़ प्लास्टिक वन्यजीवों के लिए एक बड़ा ख़तरा है. हालांकि, सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उपयोग पर लगाम लगाने के लिए वर्तमान में व्यापक स्तर पर कोशिशें की गई हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं हैं. सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर पूर्ण पाबंदी लगाने के लिए अभी काफ़ी कुछ किया जाना बाक़ी है. SCGs का लक्ष्य वर्ष 2030 तक सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उपयोग में व्यापक स्तर पर कमी लाने का होना चाहिए. इसकी प्रगति को प्रति व्यक्ति उपयोग किए जाने वाले सिंगल यूज़ प्लास्टिक के वजन/मात्रा के ज़रिए मापा जा सकता है.

SCGs का लक्ष्य वर्ष 2030 तक सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उपयोग में व्यापक स्तर पर कमी लाने का होना चाहिए. इसकी प्रगति को प्रति व्यक्ति उपयोग किए जाने वाले सिंगल यूज़ प्लास्टिक के वजन/मात्रा के ज़रिए मापा जा सकता है.

  1. टिकाऊ खाद्य प्रणालियों को अपनाना: पूरी दुनिया में टिकाऊ कृषि पद्धतियों के लेकर ज़बरदस्त जागरूकता दिखाई देती है. हालांकि, टिकाऊ कृषि के इन तरीक़ों को प्रोत्साहित करने के लिए पर्याप्त मात्रा में निवेश करने की ज़रूरत है. ऐसे में SCGs के अंतर्गत इस तरह का लक्ष्य निर्धारित किया जा सकता है, जो वर्ष 2030 तक भोजन के टिकाऊ उत्पादन को सुनिश्चित करें. इसके लिए एक विश्वसनीय उपाय यह हो सकता है कि टिकाऊ कृषि पद्धतियों या फिर टिकाऊ एक्वाकल्चर मापदंड़ों के अंतर्गत खाद्य सामग्रियों को प्रमाणित करने की प्रक्रिया को बढ़ाया जाए.
  1. स्वस्थ जीवन शैली को अपनाना: शहरी क्षेत्रों में स्वस्थ जीवन शैली को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. इसक एक तरीक़ा यह भी हो सकता है कि वर्ष 2030 तक लोगों को सार्वजनिक परिवहन का अधिक से अधिक से उपयोग करने, साथ ही व्यापक स्तर पर वॉकिंग एवं साइकिलिंग के लिए प्रेरित किया जाए, ताकि वे स्वास्थ्य को लेकर सचेत रहें, साथ ही पर्यावरण संरक्षण में योगदान दें.

विकासशील देशों की अगुवाई वाले विशेषज्ञ संस्थान इन सतत उपभोग लक्ष्यों को हासिल करने का नेतृत्व कर सकते हैं. इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हर स्तर पर प्रतिबद्धता की ज़रूरत है, फिर चाहे वो नीति निर्माताओं के स्तर पर हो, या फिर व्यवसायों, समुदायों और व्यक्तियों के स्तर पर. ऐसा करना OECD देशों की तरफ से पर्यावरण संरक्षण में अहम योगदान साबित होगा, क्यों कि इन देशों की भागीदारी SCGs की क़ामयाबी के लिए अनिवार्य है. इस तरह के प्रयास संभावित रूप से आर्थिक रूप से भी लाभकारी हैं, क्योंकि टिकाऊ प्रथाओं को अमल में लाए जाने से इनोवेशन, रोज़गार सृजन और दीर्घकालिक स्थिरता के लक्ष्य को भी हासिल किया जा सकता है.


विक्रम माथुर ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.

Author

Vikrom Mathur

Vikrom Mathur

Vikrom Mathur is Senior Fellow at ORF. Vikrom curates research at ORF’s Centre for New Economic Diplomacy (CNED). He also guides and mentors researchers at CNED. ...

Read More +

Related Search Terms