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ये खुलासा ऐसे समय हुआ जब थाईलैंड में कोविड-19 के मामलों में बढ़ोतरी के लिए वहां के लोग म्यांमार से आए प्रवासी कामगारों को ज़िम्मेदार बता रहे हैं .
जनवरी के मध्य में घटी एक भयावह घटना में थाईलैंड में अवैध रूप से घुसे 19 रोहिंग्याओं और उनको पनाह देने के आरोप में एक थाई महिला को गिरफ़्तार कर लिया गया. म्यांमार के यांगून में 100 रोहिंग्याओं वाले एक और समूह का पता चला. दोनों ही समूहों में शामिल रोहिंग्या लोग बेहतर जीवन की तलाश में मलेशिया जाने की तैयार कर रहे थे. ऐसी ख़बरें भी आईं कि थाईलैंड-म्यांमार सीमा पर मानव-तस्करी की घटनाओं में लिप्त होने के आरोप में करीब 33 थाई अधिकारियों समेत कुछ आम नागरिकों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी.
ये खुलासा ऐसे समय हुआ जब थाईलैंड में कोविड-19 के मामलों में बढ़ोतरी के लिए वहां के लोग म्यांमार से आए प्रवासी कामगारों को ज़िम्मेदार बता रहे हैं. करीब दो महीने तक इसको लेकर नफ़रत भरी टीका-टिप्पणियों और ज़बरदस्त भ्रम का दौर रहा. आख़िर में प्रधानमंत्री प्रयुत चान ओचा ने पूरे मामले पर बड़ी चालाकी से बताया कि कोविड संक्रमण में ये इज़ाफ़ा थाई सीमा में अवैध रूप से घुसे विदेशी कामगारों की वजह से हुआ है और म्यांमार से आए वैध प्रवासियों का इससे कोई लेना-देना नहीं है. हालांकि, इस पूरे प्रकरण से एक अच्छी बात भी निकलकर सामने आई. वो ये कि थाईलैंड में प्रवासी कामगारों ख़ासतौर से म्यांमार से आए श्रमिकों के कठिनाई भरे जीवन के बारे में लोगों को पता चल पाया.
बहरहाल, म्यांमार में खुले आसमान के नीचे हिरासती अड्डों से बचकर भाग निकले मुस्लिम अल्पसंख्यकों को लेकर चिंताएं बढ़ती ही जा रही हैं. मानव तस्करी में शामिल गिरोह कई रास्तों के ज़रिए इन लोगों को बाहर भेज रहे हैं. हाल ही में पता चला है कि थाईलैंड और म्यांमार के कामगार दोनों देशों के बीच खुली सरहद का लाभ उठाकर अवैध रूप से सीमा पार कर रहे हैं. इनमें से कुछ लोगों को कोविड के चलते लागू लॉकडाउन के दौरान नौकरियों और कारोबार के सुनहरे मौके मिल गए हैं. मानव तस्करी में शामिल गिरोह रोहिंग्या समेत कई दूसरे लोगों को बिना वैध दस्तावेज़ों के चोरी-छिपे थाईलैंड पहुंचा देते हैं. यहां से उन्हें आगे मलेशिया ले जाया जाता है. म्यांमार और थाईलैंड दोनों जगह सक्रिय ऐसे गिरोह बदले में इन लोगों से मोटी रकम वसूलते हैं.
मानव तस्करी में शामिल गिरोह कई रास्तों के ज़रिए इन लोगों को बाहर भेज रहे हैं. हाल ही में पता चला है कि थाईलैंड और म्यांमार के कामगार दोनों देशों के बीच खुली सरहद का लाभ उठाकर अवैध रूप से सीमा पार कर रहे हैं.
म्यांमार और थाईलैंड के बीच मानव तस्करी की रोकथाम, सुरक्षा, पुनर्वास, पुनर्मिलन, कानून की पालना और न्याय को लेकर पहले से एक समझौता है. इसी के तहत दोनों देश मानव तस्करी के शिकार एक-दूसरे के नागरिकों को अपने-अपने वतन वापस भेज देते हैं, मगर रोहिंग्या के मामले में न केवल म्यांमार बल्कि थाईलैंड भी अलग ही नीति अपनाता हैं. रोहिंग्या लोग विस्थापित जीवन जी रहे हैं और कोई भी देश इन्हें अपना नागरिक नहीं मानता.
थाईलैंड में लाखों प्रवासी कामगार रहते हैं, इनमें करीब एक लाख तीस हज़ार शरणार्थी और शरण की तलाश में आए लोग शामिल हैं. थाईलैंड में म्यांमार के राजनीतिक बंदियों और रोहिंग्या लोगों को भी शरण दी गई है. 1980 के दशक के मध्य से थाईलैंड की पश्चिमी सीमा पर बने शरणार्थी और विस्थापित लोगों के कैंपों में म्यामांर की फ़ौजी कार्रवाई से बचकर आने वाले लोगों को पनाह दी जाती रही है. आज इन कैंपों में एक लाख से भी ज़्यादा शरणार्थी रहते हैं. म्यांमार में शांति प्रक्रिया सिरे न चढ़ पाने की वजह से इनको वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हो सकी है.
हाल के वर्षों में म्यांमार में मानवाधिकारों से जुड़ी बदतर परिस्थितियों के शिकार रोहिंग्याओं के प्रति थाईलैंड के बर्ताव ने लोगों का ध्यान खींचा है. थाईलैंड काफ़ी लंबे समय से मानव तस्कर गिरोह का अड्डा बना हुआ है. ये गिरोह विस्थापित रोहिंग्या लोगों और बांग्लादेशी प्रवासियों को मलेशिया समेत कई दूसरे देशों में अवैध रूप से भेजने का काम करते हैं. 2015 में दक्षिणी थाईलैंड में मानव तस्करी से जुड़े अड्डों और बड़ी संख्या में इंसानी कब्रों से जुड़े ख़ौफ़नाक “खुलासे” के बाद दुनिया में भारी हो हल्ला मचा था.
प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत थाईलैंड अपनी सीमा पर पहुंचे शरण मांगने वालों के दावों को तत्काल नहीं ठुकरा सकता.
इस बात का भी पता चल चुका है कि थाई अधिकारियों को कई सालों से इन अड्डों की मौजूदगी के बारे सबकुछ मालूम था. और तो और वो ख़ुद इस गड़बड़झाले में शामिल थे. इस खुलासे के बाद थाईलैंड और मलेशिया ने तत्काल कार्रवाई करते हुए कई वरिष्ठ अधिकारियों और राजनेताओं को उनके पदों से हटा दिया. हालांकि इसके बाद जो कुछ हुआ वो बेहद क्रूर था.
ख़तरे का सामना कर रहे लोगों की मदद करने या उनके साथ हमदर्दी दिखाने की बजाए थाईलैंड ने 2017 से त्रिस्तरीय कार्ययोजना पर अमल चालू कर दिया. इस कार्ययोजना के तहत थाईलैंड की नौसेना रोहिंग्या लोगों को लाने वाली नौकाओं को तट के निकट रोक सकती है. इसके बाद वो इस बात की तस्दीक करते हैं कि नौका में सवार लोग मलेशिया या इंडोनेशिया जाना चाहते हैं. फिर उन्हें ईंधन, खाना, पानी जैसे ज़रूरी सामान मुहैया करवाकर आगे रवाना कर दिया जाता है. हालांकि अगर कोई जहाज़ या नाव थाईलैंड के तट पर पहुंच जाती है थाई नौसेना उसे अपने कब्ज़े में ले लेती है.
थाईलैंड के घरेलू कानून के तहत रोहिंग्याओं के साथ अवैध आप्रवासियों जैसा सलूक किया जाता है. उन्हें अनिश्चित काल के लिए आप्रवासियों के लिए बने मैले-कुचैले कैंपों या हवालातों में बंद कर दिया जाता है. उन्हें संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संस्था द्वारा शरणार्थी का दर्जा दिए जाने से जुड़ी प्रक्रिया में शामिल होने की इजाज़त नहीं दी जाती. प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत थाईलैंड अपनी सीमा पर पहुंचे शरण मांगने वालों के दावों को तत्काल नहीं ठुकरा सकता. कानून के मुताबिक थाईलैंड पनाह चाहने वाले रोहिंग्या लोगों को अपने यहां आने और सुरक्षा की मांग करने से नहीं रोक सकता.
पनाह मांगने वाले, शरणार्थी और राष्ट्रविहीन लोग थाईलैंड के घरेलू आप्रवासी कानून के तहत अवैध समझे जाते हैं. उन्हें या तो हवालातों में बंद कर दिया जाता है या फिर वापस भेज दिया जाता है.
कई विस्थापित रोहिंग्या लोग कोविड के ख़ौफ़ की वजह से पूरे 2020 में समंदर में ही रहने को मजबूर हो गए. हालांकि इंडोनेशिया और बांग्लादेश जैसे कुछ देशों ने उन्हें अपने भूभाग में प्रवेश करने की अनुमति दे दी लेकिन दुनिया भर के मानवतावादी संस्थाओं की ओर से कई बार अनुरोध किए जाने के बावजूद थाईलैंड ने उन्हें अपनी सीमा के भीतर दाखिल होने की इजाज़त नहीं दी. इसके चलते नावों में सवार इन विस्थापितों में से कई लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हो गए और कइयों की तो मौत तक हो गई. अपने तट की ओर आने वाली नई नौकाओं को “पीछे धकेलने” की इस अमानवीय नीति पर फिर से विचार कर इसे जितनी जल्दी हो सके ख़त्म करने की ज़रूरत है. अगर अधिकारियों ने उनकी पहचान अवैध आप्रवासियों की बजाए पीड़ित के तौर पर की है तो उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए काम करने के जायज़ अधिकार मिलने चाहिए.
थाईलैंड के ठीक उलट मलेशिया संयुक्त राष्ट्र की मान्यता के साथ शरणार्थियों ख़ासतौर से रोहिंग्याओं को एक बेहतर जीवन और रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराता है. संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग कार्यालय के दस्तावेज़ों में एक लाख से भी ज़्यादा रोहिंग्या शरणार्थियों के नाम दर्ज हैं. इंडोनेशिया में भी करीब 6 हज़ार रोहिंग्या लोग ऐसी ही परिस्थितियों में रह रहे हैं.
ये बात बिल्कुल साफ़ है कि शरणार्थियों से जुड़े थाई कानूनों और नीतियों में कई खामियां हैं. थाईलैंड 1951 में हुए शरणार्थी सम्मेलन या 1967 में लागू इससे जुड़े प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं है. लिहाजा यहां पनाह चाहने वालों और शरणार्थियों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े घरेलू नियम-कानून नहीं बनाए गए हैं. पनाह मांगने वाले, शरणार्थी और राष्ट्रविहीन लोग थाईलैंड के घरेलू आप्रवासी कानून के तहत अवैध समझे जाते हैं. उन्हें या तो हवालातों में बंद कर दिया जाता है या फिर वापस भेज दिया जाता है. ऐसे में इन लोगों के दुर्व्यवहार, शोषण, और मानव तस्करी का शिकार होने का ख़तरा और बढ़ जाता है. वैसे तो थाईलैंड ने शरणार्थियों और पनाह चाहने वालों को मज़बूती से संरक्षण देने का भरोसा दिया है लेकिन हक़ीक़त यही है कि ये बस कोरे आश्वासन बनकर ही रह गए हैं. आजतक उसने अपने वादों पर अमल नहीं किया है.
इस वक़्त पूरी दुनिया में दक्षिण पूर्व एशिया ही वो क्षेत्र है जहां शरणार्थी संकट बहुत तेज़ी से फैल रहा है. इस वक़्त यहां शरणार्थियों और राष्ट्रविहीन लोगों से निपटने के लिए एक सकारात्मक प्रारूप की दरकार है. ऐतिहासिक रूप से थाईलैंड जुल्मोसितम से बचकर आने वाले लोगों को शरण देता रहा है, ऐसे में उसे अपनी इसी छवि के मुताबिक काम करने के बारे में सोचना चाहिए. इसके साथ ही म्यांमार से अपने मज़बूत होते कूटनीतिक रिश्तों के बूते थाईलैंड उसे रोहिंग्याओं को वापस बुलाने के लिए अनुकूल माहौल बनाने को भी प्रेरित कर सकता है. रोहिंग्याओं को नज़रअंदाज़ करते रहने से आगे चलकर किसी भी देश का भला नहीं होगा और इससे मानव अधिकार से जुड़े मौजूदा नाज़ुक हालात और बिगड़ जाएंगे.
यह लेख मूल रूप से ओआरएफ साउथ एशिया वीकली में छपा है.
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Sreeparna Banerjee is an Associate Fellow in the Strategic Studies Programme. Her work focuses on the geopolitical and strategic affairs concerning two Southeast Asian countries, namely ...
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