Author : Oommen C. Kurian

Published on Feb 01, 2024 Updated 0 Hours ago
भारत में चिकित्सा शिक्षा: सरकारी बुनियादी ढांचे के निर्माण के ज़रिए हर किसी तक पहुंचना

ये लेखशिक्षा का पुनर्मूल्यांकन | अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस 2024” सीरीज़ का हिस्सा है. 

ऐतिहासिक रूप से भारत में ज़्यादातर डॉक्टर अलग-अलग प्रवेश की बाधाओं और सीमित अवसरों की वजह से समाज के अपेक्षाकृत समृद्ध वर्ग से आते हैं. भारत के ग्रामीण क्षेत्रों ने लगातार स्वास्थ्य कर्मियों की कमी का सामना किया है. इस स्थिति के पीछे कई कारण ज़िम्मेदार है. प्राइवेट सेक्टर के हेल्थ प्रोफेशनल अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने से हिचकिचाते हैं जबकि सरकारी क्षेत्र को इन जगहों पर पर्याप्त संख्या में स्वास्थ्य कर्मियों को काम करने के लिए आकर्षित करने और उन्हें तैनात करने में जूझना पड़ता है. प्रोफेशनल वर्ग की आकांक्षाओं को देखते हुए शहरी क्षेत्र अलग-अलग कारणों से स्वास्थ्य कर्मियों के लिए ज़्यादातर आकर्षक है. ये आकांक्षाएं हैं ज़्यादा कमाई की संभावना, आधुनिक उपकरणों एवं सुविधाओं तक पहुंच समेत बेहतर कामकाज की स्थिति, बेहतर जीवन स्तर, सुरक्षित माहौल और डॉक्टर के बच्चों के लिए शिक्षा का बेहतर अवसर. इसके अलावा ज़्यादातर मेडिकल ग्रेजुएट पोस्ट ग्रेजुएट स्पेशलाइज़ेशन करना चाहते हैं जिसकी वजह से वो तुरंत नौकरी नहीं करना चाहते हैं, ख़ास तौर पर ग्रामीण परिवेश में सरकारी क्षेत्र की नौकरी. साथ ही सरकारी क्षेत्र की तुलना में प्राइवेट सेक्टर में ज़्यादा वेतन के प्रलोभन के कारण डॉक्टर अक्सर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से जुड़ना नहीं चाहते हैं

अतीत में विस्तार के अवसरों के दौरान मेडिकल शिक्षा के निजीकरण ने ज़्यादा ट्यूशन फीस और कैपिटेशन जैसी चुनौतियां भी पेश की. इससे मेडिकल शिक्षा तक निचले सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले छात्रों की पहुंच कम हो गई. 

80 के दशक से शुरुआत करें तो मेडिकल कॉलेज की संख्या, ख़ास तौर पर प्राइवेट सेक्टर में, और मेडिकल सीट की उपलब्ध संख्या में बढ़ोतरी के बावजूद भारत के भीतर ज़्यादातर अविकसित क्षेत्रों में स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या में बरकरार कमी की वजह से स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में उम्मीद के मुताबिक सुधार नहीं हुआ. अतीत में विस्तार के अवसरों के दौरान मेडिकल शिक्षा के निजीकरण ने ज़्यादा ट्यूशन फीस और कैपिटेशन जैसी चुनौतियां भी पेश की. इससे मेडिकल शिक्षा तक निचले सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले छात्रों की पहुंच कम हो गई. 

हालांकि भारत में मेडिकल शिक्षा का परिदृश्य एक आदर्श बदलाव के दौर से गुज़र रहा है, ख़ास तौर पर पिछले दशक में. अब प्राइवेट सेक्टर के दबदबे से मज़बूत सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की तरफ महत्वपूर्ण बदलाव हो रहा है. ये लेख ग्रैजुएट मेडिकल कॉलेज के उदाहरण का इस्तेमाल करके इस कायापलट की खोजबीन करता है. साथ ही हर किसी तक मेडिकल शिक्षा को सुलभ और भारत में स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच को बढ़ाने में सरकारी मेडिकल कॉलेज की भूमिका पर ज़ोर देता है

ऐतिहासिक संदर्भ

अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में 1970 के बाद सरकारी मेडिकल ट्रेनिंग सेक्टर का विस्तार ठहराव के दौर में पहुंच गया. इसके विपरीत 1980 के बाद प्राइवेट सेक्टर ने मज़बूत विकास को देखा है. शुरुआत में 60 के दशक के दौरान दक्षिण भारत में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की शुरुआत हुई और 70 के दशक में उत्तर तक इसका विस्तार हो गया. वैसे तो सरकारी क्षेत्र के मेडिकल कॉलेज भी इस अवधि के दौरान बढ़े लेकिन 90 के दशक में अच्छा प्रदर्शन करने वाले उत्तर के प्रांतों और दक्षिणी राज्यों में प्राइवेट संस्थानों में बढ़ोतरी देखी गई. 90 के दशक में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज कम समृद्ध प्रांतों में भी खुले. 2010 तक प्राइवेट सेक्टर में सिर्फ ज़्यादा मेडिकल कॉलेज हो गए बल्कि सरकारी क्षेत्र की तुलना में अधिक छात्रों का प्रवेश भी हो गया. इस तरह भारत में मेडिकल शिक्षा की उपलब्धता में वित्तीय क्षमता महत्वपूर्ण फैक्टर बन गई. 2010 के बाद मेडिकल शिक्षा में प्राइवेट सेक्टर का दबदबा सामान्य हो गया था.

विदेश जाने की ये ऊंची दर भारत के मेडिकल शिक्षा परिदृश्य के एक महत्वपूर्ण पहलू को रेखांकित करती है जहां सबसे प्रतिष्ठित संस्थान अक्सर विदेश, विशेष रूप से विकसित देशों, में करियर बनाने के अड्डे के रूप में काम करते हैं.

1980 से सार्वजनिक मेडिकल शिक्षा में ठहराव और भारत में निजी संस्थानों में बढ़ोतरी के बाद शीर्ष मेडिकल कॉलेज, ख़ास तौर पर देश के बेहतरीन माने जाने वाले, से पढ़ाई करने वाले छात्रों में एक उल्लेखनीय रुझान का उदय हुआ. 1989 से 2000 के बीच भारत के अग्रणी मेडिकल कॉलेज में कराए गए अध्ययन ने एक हैरान करने वाले रुझान का खुलासा किया: इन कॉलेज के आधे से ज़्यादा (54 प्रतिशत) छात्रों ने विदेश के अवसरों को लपका, ख़ास तौर पर अमेरिका में. विदेश जाने की ये ऊंची दर भारत के मेडिकल शिक्षा परिदृश्य के एक महत्वपूर्ण पहलू को रेखांकित करती है जहां सबसे प्रतिष्ठित संस्थान अक्सर विदेश, विशेष रूप से विकसित देशों, में करियर बनाने के अड्डे के रूप में काम करते हैं. ये घटना सिर्फ भारतीय मेडिकल छात्रों के पूरी दुनिया में जाने को उजागर करती है बल्कि भारत के द्वारा शीर्ष मेडिकल प्रतिभा को देश में बनाए रखने में सामने रही चुनौतियों को भी रेखांकित करती है जो अक्सर बेहतर भविष्य और आधुनिक रिसर्च के अवसरों के लिए विदेश चले जाते हैं. 

उपलब्ध आंकड़े क्या कहते हैं

उपलब्ध आंकड़े भारत में मेडिकल कॉलेज के विकास को लेकर एक महत्वपूर्ण विस्तार का संकेत देते हैं, ख़ास तौर पर साल 2000 के बाद. 1970 के बाद से मेडिकल कॉलेज का विकास धीरे-धीरे था. 1971 में 98 मेडिकल कॉलेज की तुलना में दशक ख़त्म होने तक इसमें मामूली बढ़ोतरी हुई और ये संख्या बढ़कर 107 हो गई. 80 के दशक में केवल 21 मेडिकल कॉलेज जुड़े और 90 के दशक में 19 और कॉलेज बढ़े. वैसे तो सरकारी और प्राइवेट सेक्टर के मेडिकल कॉलेज का अलग-अलग डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है लेकिन रिसर्च से संकेत मिलता है कि सार्वजनिक सेक्टर में ठहराव की इस अवधि के दौरान ही मेडिकल शिक्षा में प्राइवेट सेक्टर के विकास की शुरुआत हुई

मेडिकल कॉलेज की संख्या में असली बढ़ोतरी की शुरुआत 21वीं शताब्दी में हुई और 1999-2000 के 147 की तुलना में 2009-10 तक मेडिकल कॉलेज की संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा होकर 300 हो गई. 2023-24 तक मेडिकल कॉलेज की संख्या बढ़कर 704 हो गई. पिछले दशक के बाद के हिस्से में ये विकास, जो कि पहले आंकड़े से पता चलता है, भारत के द्वारा अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने और प्रति व्यक्ति डॉक्टर की उपलब्धता के अनुपात की समस्या का समाधान करने की प्रतिबद्धता से मेल खाता है जो कि हेल्थकेयर को हर किसी तक पहुंचाने में सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण भाग है. मौजूदा सरकार के द्वारा नए मेडिकल कॉलेज बनाने के प्रयास का इस बढ़ोतरी में अहम योगदान रहा है. ये मेडिकल प्रोफेशनल की भारत की बढ़ती मांग की प्रतिक्रिया में शैक्षणिक विस्तार के व्यापक रुझान को दिखाता है. पिछले दशक के ज़ोरदार रुझान के उलट 2019-20 में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की तुलना में सरकारी मेडिकल कॉलेज की कुल संख्या बढ़ गई

आंकड़ा 1: भारत में MBBS कॉलेज की संख्या में बढ़ोतरी

स्रोत: लेखक के द्वारा अलग-अलग सरकारी स्रोतों से इकट्ठा

दूसरे आंकड़े में दिखाए गए MBBS सीट की संख्या कॉलेज की संख्या में बढ़ोतरी के समानांतर विकास के बारे में बताती है. 70 के दशक की शुरुआत में MBBS सीट की संख्या 12,000 से कुछ ही ज़्यादा थी. ये उस समय चिकित्सा शिक्षा की सीमित क्षमता, ख़ास तौर पर सरकारी क्षेत्र में, के बारे में बताता है. 90 के दशक के आख़िर तक इस संख्या में अपेक्षाकृत ठहराव बना रहा. लेकिन साल 2000 से मेडिकल सीट की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी हुई और ये 2000-01 में बढ़कर 18,168 हो गई और फिर 2010-11 तक इसमें काफी उछाल देखा गया और कुल सीट की संख्या बढ़कर 29,263 हो गई. 2023-24 तक कुल उपलब्ध MBBS सीट की संख्या बढ़कर 1,07,948 हो गई. मेडिकल कॉलेज की संख्या के रुझान के मुताबिक 2019-20 में सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS सीट की संख्या भी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में सीट से ज़्यादा हो गई

आंकड़ा 2: भारत में MBBS सीट की संख्या में बढ़ोतरी

स्रोत: लेखक के द्वारा अलग-अलग सरकारी स्रोतों से इकट्ठा 

सरकारी क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के निर्माण की वजह से पिछले दशक में ये तेज़ विस्तार सिर्फ हेल्थकेयर प्रोफेशनल की कमी को लेकर भारत की प्रतिक्रिया का संकेत देता है बल्कि बेहतर सरकारी मेडिकल शिक्षा और ट्रेनिंग के माध्यम से अपने हेल्थकेयर सिस्टम को मज़बूत करने की भारत की व्यापक रणनीति को भी दिखाता है. सीट में भारी बढ़ोतरी, विशेष रूप से सरकारी क्षेत्र में जहां सीट पिछले दशक के मुकाबले बढ़कर लगभग तीन गुनी हो गई, शायद बढ़ती जनसंख्या और स्वास्थ्य देखभाल की सेवाओं को बेहतर करने की ज़रूरत, ख़ास तौर पर ग्रामीण और अविकसित क्षेत्रों में, का सीधा जवाब है. ये 80 के दशक की तुलना में नीतियों में स्पष्ट बदलाव है जिसने सरकारी क्षेत्र में ठहराव और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को बढ़ावा दिया और जिसकी वजह से प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की संख्या में तेज़ बढ़ोतरी हुई

सीट में भारी बढ़ोतरी, विशेष रूप से सरकारी क्षेत्र में जहां सीट पिछले दशक के मुकाबले बढ़कर लगभग तीन गुनी हो गई, शायद बढ़ती जनसंख्या और स्वास्थ्य देखभाल की सेवाओं को बेहतर करने की ज़रूरत, ख़ास तौर पर ग्रामीण और अविकसित क्षेत्रों में, का सीधा जवाब है.

इस ढर्रे में अहम मोड़ सरकार के द्वारा सरकारी मेडिकल शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर फिर से ध्यान देने के साथ आया. हाल के वर्षों में सरकार के द्वारा नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोलने और मौजूदा कॉलेज के विस्तार की दिशा में लगातार कोशिश की गई है. इसकी वजह से केवल MBBS सीट की कुल संख्या में बढ़ोतरी हुई है बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों, ख़ास तौर पर ग्रामीण एवं अविकसित क्षेत्रों, में ज़्यादा समान रूप से सीट का वितरण भी सुनिश्चित हुआ है. इस पहल का मक़सद हेल्थकेयर प्रोफेशनल की महत्वपूर्ण कमी का समाधान करना और देश भर में हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करना है. 2014 से सरकारी क्षेत्र में उल्लेखनीय तौर पर 317 नए मेडिकल कॉलेज की स्थापना हुई है. इसकी वजह से मेडिकल प्रोफेशन की आकांक्षा रखने वालों के लिए अवसरों का विस्तार हुआ है और इसने देश में हेल्थकेयर संस्थानों की संख्या में बहुत ज़्यादा योगदान दिया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक केवल 2020 और 2021 के बीच सरकारी क्षेत्र में मेडिकल कॉलेज की संख्या 280 से बढ़कर 396 हो गई

आगे का रास्ता 

हाल के वर्षों में सरकारी क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विस्तार का एक संभावित असर मेडिकल शिक्षा का लोकतंत्रीकरण (हर किसी तक पहुंच) है. समाज के एक बड़े तबके तक MBBS सीट को उपलब्ध बनाकर सरकार प्रभावी रूप से उन सामाजिक-आर्थिक बाधाओं को कम कर सकती है जिन्होंने पारंपरिक रूप से मेडिकल शिक्षा तक समान पहुंच में रुकावट डाली है. ये समावेशिता भारत की जनसंख्या की अलग-अलग ज़रूरत को दर्शाने वाले अलग-अलग वर्ग से मेडिकल वर्कफोर्स को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है. इसके अलावा सरकारी मेडिकल कॉलेज और सीट की अधिक संख्या का लोगों तक स्वास्थ्य देखभाल पहुंचाने के मामले में भी असर है, ख़ास तौर पर ग्रामीण और अविकसित क्षेत्रों में. इन क्षेत्रों में सरकारी मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई करने वाले छात्रों के काम करने की संभावना ज़्यादा है. साथ ही वो हेल्थकेयर प्रोफेशनल की भारी कमी की समस्या का समाधान कर सकते हैं और हेल्थकेयर सेवाओं की समग्र क्वालिटी को बेहतर बना सकते हैं. ये सरकार के द्वारा हर किसी तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने (यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज) और सभी के लिए एक समान हेल्थकेयर सुनिश्चित करने के लक्ष्य के साथ मेल खाता है

ये ऐसा कदम है जो देश के विकास और कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है. इन संस्थानों की स्थापना केवल शिक्षा का अवसर मुहैया कराती है बल्कि ज़रूरतमंद लोगों के नज़दीक तक मेडिकल सेवाओं को भी ले जाती है.

भारत सरकार के द्वारा मेडिकल शिक्षा के इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने की पहल अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के उद्देश्यों यानी शांति और विकास में शिक्षा की भूमिका को स्वीकार करने के अनुरूप है. मेडिकल कॉलेज और उसके बाद हेल्थकेयर सेक्टर में काम करने वाले लोगों की संख्या बढ़ाकर भारत अपने देश के लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहा है. ये ऐसा कदम है जो देश के विकास और कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है. इन संस्थानों की स्थापना केवल शिक्षा का अवसर मुहैया कराती है बल्कि ज़रूरतमंद लोगों के नज़दीक तक मेडिकल सेवाओं को भी ले जाती है. इस तरह क्वालिटी शिक्षा और हेल्थकेयर तक एक समान पहुंच के व्यापक लक्ष्य में भी योगदान करती है

ओमन सी. कुरियन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो और हेल्थ इनिशिएटिव के प्रमुख हैं.

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