Published on Feb 29, 2024 Updated 0 Hours ago

गिफ्ट सिटी के ज़रिए भारत की महत्वाकांक्षा अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था जोड़ने, पूंजी का प्रवाह सुनिश्चित करने और कारोबार के लिए एक दोस्ताना माहौल में दुनिया के वित्तीय बाज़ारों से जोड़ने की है.

GIFT सिटी के ज़रिए भारत का निवेश बढ़ाने वाला नज़रिया

गांधीनगर स्थित गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक (GIFT) सिटी को आत्मनिर्भर भारत की ज़िंदा मिसाल कहा जा रहा है. ये देश का पहला ग्रीनफील्ड स्मार्ट सिटी है, जहां अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाओं का केंद्र (IFSC) है. गिफ्ट सिटी बहुआयामी सेवाओं वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ)[1] के तौर पर काम करता है. यहां कारोबार करने वाली कंपनियों और बैंकों को टैक्स में रियायतें दी जाती हैं और यहां का विनियमन ढांचा भी सरल है. 2020 में स्थापित की गई इंटरनेशनल फाइनेंस सर्विस सेंटर अथॉरिटी यहां के एकीकृत नियामक संस्थान के तौर पर काम करता है और वित्तीय उत्पादों सेवाओं और संस्थाओं की निगरानी करता है. इनमें IFSC बैंकिग इकाइयां (IBUs) चलाने वाली बैंकिंग कंपनियां भी शामिल हैं.

 

GIFT सिटी का मक़सद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय क्षेत्रों जैसे कि फ्रांस के ला डिफेंस और जापान के शिंजुकु से मुक़ाबला करना है. ये स्मार्ट सिटी कारोबार के लिए दोस्ताना माहौल के ज़रिए, भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने, पूंजी के प्रवाह को प्रोत्साहन देने और दुनिया भर के वित्तीय बाज़ारों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने की आकांक्षा रखता है.

 

विदेश में निवेश करने वाली भारतीय कंपनियों को अपने ही देश में कारोबार के लिए बढ़ावा देना

 

मार्च 2023 में सिलिकॉन वैली बैंक (SVB) के बंद होने और क्रेडिट सुइस के दिवालिया होने ने 2008 के वित्तीय संकट की याद दिला दी थी. इसकी वजह से भारत की बहुत सी स्टार्टअप कंपनियों में पूंजी निवेश थम गया था. पिछले कई सालों से स्टार्टअप कंपनियों के बीचऑफशोरिंगका जुमला बहुत लोकप्रिय था. भारत स्थित बहुत सी कंपनियों ने अपने मालिकाना हक़ की संरचना वैश्विक स्तर की बना ली थी. लेकिन, अमेरिका के कुछ बैंकों के तबाह होने की घटनाओं ने भारत की कई स्टार्टअप कंपनियों कोऑनशोरिंगयानी वापस भारत में कारोबार बढ़ाने के लिए प्रेरित किया. सिलिकॉन वैली बैंक में जमा स्टार्टअप कंपनियों की एक अरब डॉलर की रक़म में से 20 करोड़ डॉलर अब गिफ्ट सिटी में काम कर रहे बैंकों में ट्रांसफर किया जा रहा है, जो विदेशी मुद्रा के लेन-देन का एक सुरक्षित ठिकाना है.

 

इस चलन का लाभ उठाते हुए IFSC प्राधिकरण ने एक श्वेत पत्र प्रकाशित किया है, जिसमें गिफ्ट सिटी को कारोबार के ऐसे केंद्र के तौर पर विकसित करने की योजना के बारे में विस्तार से बताया गया है, जिससे विदेश से संचालित हो रही भारतीय कंपनियों के संचालन कोरिवर्स फ्लिपयानी अपना ठिकाना भारत को बनाने के लिए प्रेरित किया जा सके. इस श्वेत पत्र में क़ानूनी (SAFE के समझौते और विदेशी बाज़ारों में लिस्टिंग) और वित्तीय (टैक्स में रियायतें और एंजेल टैक्स से छूट) सुधार करने के सुझाव दिए गए हैं.

 

गिफ्ट सिटी में लगभग 400 कंपनियों ने अपने दफ़्तर खोल लिए हैं. इनमें बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र की कंपनियां सबसे अधिक हैं. कुल मिलाकर, गिफ्ट सिटी में बीस हज़ार से ज़्यादा लोग काम कर रहे हैं. लेकिन, एक मज़बूत बाज़ार के टर्नओवर वाली तरक़्क़ी करती वित्तीय व्यवस्था को बढ़ावा देने की राह में नियमन संबंधी कई चुनौतियां बनी हुई हैं.

 

बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के सेक्टर के अवसर

 

भारतीय और विदेशी बैंक, ज़रूरी लाइसेंस हासिल करके गिफ्ट IFSC में IBU की स्थापना कर सकते हैं. पांच बड़े वैश्विक और 14 भारतीय बैंकों ने पहले की अपनी इकाइयां यहां स्थापित कर ली हैं, जो काम भी कर रही हैं. जुलाई 2023 तक गिफ्ट सिटी की कुल बैंकिंग संपत्ति 41.20 अरब डॉलर पहुंच चुकी थी और यहां कुल मिलाकर 508 अरब डॉलर का लेन-देन हो रहा था.

 

शेयर बाज़ार के नियंत्रण के क़ानूनों के मुताबिक़, भारतीय बैंकों की IBU को विदेशी शाखाएं माना जाता है और ये बदली जा सकने वाली विदेशी मुद्रा के लेन-देन कर सकते हैं. यहां IBU की जिन गतिविधियों को इजाज़त प्राप्त है उनमें भारत या विदेश में रहने वालों के विदेशी मुद्रा के खाते खोलना, जमा स्वीकार करना क़र्ज़ और कारोबार के लिए वित्त के ज़रिए क़र्ज़ को विस्तार देना, पूंजी को बढ़ावा देना, बीमा की सेवाएं देना और विदेशी मुद्रा का फंड जुटाने जैसे कई कारोबार शामिल हैं. IBU को ख़ज़ाने की वैश्विक या फिर क्षेत्रीय इकाइयां स्थापित करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है.

 

बैंक, हर कंपनी की ख़ास ज़रूरत के मुताबिक़ सेवाएं देकर स्टार्टअप कंपनियों से रहे वित्तीय प्रवाह का अधिकतम लाभ उठाने का सक्रियता से प्रयास कर रहे हैं. मिसाल के तौर पर बैंक ऑफ बड़ौदा की गिफ्ट सिटी शाखा अमेरिकी डॉलर, ब्रिटिश पाउंड और यूरो में लेन-देन पर आधारित इंटरनेट बैंकिंग सेवाओं के लिएवर्ल्ड स्टार्ट अपकी सुविधा देती है.

 

विदेशी बैंकों की IBU को गिफ्ट IFSC में अधिग्रहण करने के लिए वित्त उपलब्ध कराने की इजाज़त देने से, कारोबार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं और भारतीय कंपनियों को स्वदेश में दूसरी कंपनियों को ख़रीदने के लिए फंड का एक अतिरिक्त स्रोत भी मुहैया कराया जा सकता है. इन IBU द्वारा अधिग्रहण के लिए वित्त [2] की सुविधा देने में ऑफशोर डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट्स (ODIs)[3] को स्वीकार्य समझौते के तौर पर मान्यता मिलेगी.

 

घरेलू अर्थव्यवस्था में बकाया ODIs की क़ीमत दिसंबर 2023 में 1.49 ख़रब रुपए पहुंच गई थी, जिससे अकेले 2023 में ही 63 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी का पता चलता है. सरकार, गिफ्ट सिटी में काम कर रही बैंकिंग इकाइयों को ऐसे ODIs जारी करने के लिए नियमों को और सरल बनाना चाहती है. जैसे कि उनको होने वाली आमदनी पर दोहरे कराधान को ख़त्म करना. इसके अलावा IBUs को अप्रवासी ODI रखने वालों पर लगने वाले टैक्स से छूट दी जानी चाहिए, ताकि टैक्स संबंधी पेचीदगियां और आमदनी के वितरण की जटिलताएं कम हो सकें. इस प्रस्ताव का मक़सद विदेशी बैंकों की IBUs को अपने ग्राहकों को ODIs जारी करने के लिए प्रेरित करना और वित्तीय सेक्टर में विकास और सहयोग को बढ़ावा देना है.

 

विवादों के निस्तारण की कमियां

 

IBUs अपने आपको अनूठी स्थिति में पाती हैं. क्योंकि, उन्हें भारत के एक दूसरे से टकराने वाले अपने क़जानूनों और IFSC के भीतर काल्पनिक नियमों के बीच तालमेल बिठाने की ज़रूरत पड़ती है. उनके सामने जो एक बड़ी चुनौती है, वो गिफ्ट सिटी के लेन-देन और IBUs के लिए विवादों के निपटारे की एक अच्छी व्यवस्था का अभाव है. संभावित निवेशकों और बाहर से लौटकर भारत में निवेश करने वालों को शायद आने वाली जटिलताओं की आशंका से भय लगेगा, जो विवादों के निपटारे के दौरान पैदा हो सकती हैं और इस तरह के विवादों का अंत में भारी-भरकम रक़म से निपटारा होने का डर बना रहेगा.

 

वैसे तो IFSC प्राधिकरण IFSC के अंतर्गत IBUs की सभी तरह की बैंकिंग गतिविधियों की निगरानी करता है. लेकिन, इन लेन-देनों की वजह से पैदा होने वाले विवादों के लिए कोई विशेष अदालत या फिर विवादों के निपटारे का मंच नहीं है. ऐसी अदालतों का होना चुनौतियां पैदा करता है, ख़ास तौर से उन मामलों में जिनमें कई सिविल और आपराधिक विवाद जैसे कि फर्ज़ीवाड़ा हों. मिसाल के तौर पर भारत के प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग क़ानून 2002 (PMLA) ऐसी स्थितियों में भारत के बाहर भी लागू हो सकता है, जिसमें सीमा के आर-पार के ऐसे अपराध शामिल हों, जिनका ताल्लुक़ सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से भारत से जुड़ा हो सकता है और जो भारतीय कंपनियों की विदेशी शाखाओं या उनकी सहायक कंपनियों से जुड़े हो सकते हैं. इसी तरह, रिज़र्व बैंक के दिशा निर्देश भी बैंकिंग कंपनियों की शाखाओं और बहुमत की भागीदारी विदेश में स्थापित वाली सहायक कंपनियों पर भी तब तक लागू होते हैं, जब तक वो मेज़बान देश के घरेलू क़ानूनों से टकराते हों.

 

इसके चलते, वैसे तो IBU को विदेशी मुद्रा के नियमन के नज़रिए से एकविदेशी शाखामाना जा सकता है. मगर, क़र्ज़ की वसूली जैसे दूसरे पहलुओं की पड़ताल भारत के घरेलू क़ानून कर सकते हैं. IFSC में दाखिल होने वाली नई कंपनियों और बैंकों के लिए इस क़ानूनी टकराव को लेकर जानकारी रखना ज़रूरी है.

 

2023-24 के केंद्रीय बजट में विदेशी बैंकों की IFSC बैंकिंग इकाइयों और भारत के आयात निर्यात बैंक (EXIM बैंक) की सहयोगी शाखा द्वारा व्यापार की रिफाइनेंसिंग के लिए अधिग्रहण के वित्त की व्यवस्था का प्रस्ताव रखा था. इसने मध्यस्थता और संबंधित सेवाओं की बुनियाद रखी थी और इसमें ODI को वैध कॉन्ट्रैक्ट माना गया था. गिफ्ट सिटी के विकास को और बढ़ावा देने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ये भी जोड़ा था कि जो देश डिजिटल निरंतरता के समाधान चाह रहे हैं, उनको डेटा एंबेसी स्थापित करने की सुविधा भी दी जाएगी.

 

उद्योग को उम्मीद है कि 2024-25 के बजट में पूंजी खाते को बदलने के मामले में बैंकिंग सेवाओं का और उदारीकरण किया जाएगा. गिफ्ट सिटी में वित्तीय तकनीक के सकारात्मक माहौल का लाभ उठाते हुए, सरकार कई सुधारों की परिकल्पना कर सकती है, ताकि IFSC में बैंकिंग सेक्टर की तरक़्क़ी को मज़बूती दे सके. IBUs के लिए प्लेटफॉर्म की सेवाएं देने वाली IFSC संस्थाओं में रजिस्ट्रेशन की वाजिब ज़रूरतों के साथ तमाम तरह के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफ़ॉर्म और वॉयस ब्रोकर तक पहुंच बनाना बहुत अहम है. इसके अतिरिक्त IBUs को संबंधित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे कि ब्रिटेन की वित्तीय नियंत्रण अथॉरिटी (FCA UK) और सिंगापुर की मॉनिटरी अथॉरिटी (MAS) द्वारा विनियमित मंचों में शामिल होने की इजाज़त देकर अप्रवासी भागीदारों को आकर्षित किया जा सकता है.

 

IFSC अथॉरिटी के श्वेत पत्र में गिफ्ट IFSC में कार्यरत संस्थाओं की भारतीय सहायक शाखाओं के लिए ODS की सुविधा देने का सुझाव दिया गया है, ताकि ये सहायक शाखाएं विदेशों में विलय की संभावनाएं तलाश सकें. विलय को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की बारीक़ प्रक्रियाओं से छूट देते हुए विवादों के निस्तारण की सरल प्रक्रिया सुनिश्चित करने से होल्डिंग कंपनियों को वापस भारत की ओरआकर्षित कियाजा सकता है.

 

विवादों के निस्तारण की एक मज़बूत और बहुआयामी व्यवस्था तभी पूर्ण हो सकती है, जब गिफ्ट सिटी में विशेष कारोबारी अदालतें स्थापित की जाएं और उनमें ऐसे जज बहाल किए जाएं जिनको कारोबार की अच्छी समझ हो. इससे केवल मध्यस्थता [4] की प्रक्रिया में मदद मिलेगी बल्कि ऐसी अदालतें अपने फ़ैसले प्रभावी ढंग से लागू भी करा सकेंगी. मध्यम से दूरगामी अवधि में जोखिम कम करने का लक्ष्य ऐसे फ़ैसले देने वाली उन्नत संस्थाओं की स्थापना से हासिल किया जा सकता है, जो निवेशकों और उद्यमियों की लेन-देन संबंधी आशंकाओं को दूर कर सकें.

 

विदेशी निवेश और उदारीकृत रेमिटेंस योजना के तहत निवेश के प्रतिबंधों में विनियमन की छूट देकर, गिफ्ट IFSC में स्टार्टअप कंपनियों को टैक्स में निरपेक्षता प्रदान करके और बौद्धिक संपंदा के संरक्षण का एक मज़बूत ढांचा और सॉफ्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर सुनिश्चित करने से गिफ्ट (GIFT) IFSC को भारतीय बाज़ारों की संभावनाएं तलाशने वाले एक वैश्विक स्टार्टअप केंद्र के तौर पर स्थापित किया जा सकता है.

 

सिलिकॉन वैली बैंक और क्रेडिट सुइस जैसे बड़े बैंकों की नाकामी के बीच एक सुरक्षित बैंकिंग व्यवस्था की ज़रूरत उभरकर सामने आई है. बहुचर्चित यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) समेत अपनी अन्य डिजिटल क्षमताओं के साथ भारत एक सस्ते वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में उभर सकता है और गिफ्ट सिटी में बिना किसी बाधा वाली बैंकिंग का अनुभव मुहैया करा सकता है.

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[1] SEZs function as foreign territories for trade, applying tariff rules and goods entering the same are regarded as imports.

[2] Acquisition financing essentially refers to funding raised by an entity to acquire another company.

[3] ODIs are investment vehicles enabling foreign investors into Indian equities such as swaps, participatory notes and forwards.

[4] Arbitration refers to a dispute resolution process, with minimal judicial intervention, where the parties themselves decide the arbitrators and procedures to reach a settlement in the form of an ‘award’.

 

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