Author : Aditya Bhan

Published on Jul 18, 2023 Updated 0 Hours ago

भारत ने नागोर्नो-काराबाख़ संघर्ष में खुल्लमखुल्ला ख़ुद को आर्मीनिया (Armenia) के साथ खड़ा किया है और इसके परिणामस्वरूप अज़रबैजान और उसका साथ देने वाले देशों, जिनमें तुर्की (Turkey) और पाकिस्तान (Pakistan) भी शामिल हैं, का मुक़ाबला करने का फ़ैसला किया है.

India’s PINAKA export to Armenia: आर्मीनिया को भारत का ‘पिनाका’ निर्यात उसे तुर्की के ख़िलाफ़ खड़ा करेगा!
India’s PINAKA export to Armenia: आर्मीनिया को भारत का ‘पिनाका’ निर्यात उसे तुर्की के ख़िलाफ़ खड़ा करेगा!

भारत के विदेश नीति के गलियारों में पिछले दिनों आर्मीनिया (Armenia) के साथ सरकारी स्तर पर हुए समझौते की काफ़ी चर्चा हुई है. इस समझौते के तहत आर्मीनिया के सशस्त्र बलों को 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर की क़ीमत का पिनाका (PINAKA) मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (MBRL), एंटी-टैंक युद्ध सामग्री और अलग-अलग किस्म के गोला-बारूद एवं युद्ध के सामान की सप्लाई की जाएगी. हालांकि, भारत को एक प्रभावी यूरेशियाई नीति को आकार देकर उसे आगे बढ़ाने के लिए सावधानी पूर्वक निर्यात के फ़ैसले की सामरिक जटिलता (geopolitics) को समझने की ज़रूरत है.  

ये फ़ैसला उस वक़्त लिया गया है जब आर्मीनिया हाल ही में भड़के दशकों पुराने नागोर्नो-काराबाख़ संघर्ष को लेकर अज़रबैजान के ख़िलाफ़ उलझा हुआ है.

विशेष महत्व की बात है पिनाका MBRL के रूप में आर्मीनिया को लंबी दूरी की आर्टिलरी के निर्यात को हरी झंडी देना. ये फ़ैसला उस वक़्त लिया गया है जब आर्मीनिया हाल ही में भड़के दशकों पुराने नागोर्नो-काराबाख़ संघर्ष को लेकर अज़रबैजान के ख़िलाफ़ उलझा हुआ है. भारत के प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों के द्वारा बनाए गए और भारतीय थल सेना के द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे पिनाका की बैटरी में छह लॉन्चर, लोडिंग सिस्टम, रडार, नेटवर्क आधारित सिस्टम से संपर्क और एक कमांड पोस्ट हैं. पिनाका की क्षमता 44 सेकेंड में 12 रॉकेट दागने की है, एक बैटरी एक वर्ग किलोमीटर के इलाक़े में निशाना साध सकती है

पृष्ठभूमि 

वैसे तो आर्मीनिया भारत के द्वारा स्वदेश में विकसित पिनाका सिस्टम का पहला अंतर्राष्ट्रीय ख़रीदार बन गया है, लेकिन उसने अतीत में भी भारत से दूसरे प्रकार की रक्षा प्रणाली का आयात किया है. मिसाल के तौर पर 2020 में भारत ने आर्मीनिया को चार स्वाति वेपन लोकेटिंग रडार को सप्लाई करने का 43 मिलियन अमेरिकी डॉलर का ऑर्डर हासिल किया था. ये रडार आने वाले तोप के गोले पर निगरानी रख सकता है और जवाबी कार्रवाई के लिए दुश्मन की गन की जगह के बारे में एकदम सही जानकारी दे सकता है

उस्मानी (Ottoman) साम्राज्य को फिर से स्थापित करने और मध्य एशिया के तुर्क या उससे मिलती-जुलती भाषा बोलने वाले देशों को साझा सशस्त्र बलों के साथ एक अखंड औद्योगिक क्षेत्र में मिलाने की कोशिश में तुर्की अज़रबैजान के साथ गठबंधन का फ़ायदा उठाकर इस क्षेत्र में अपनी पकड़ को मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है.

इसके अलावा, भारत ने वित्तीय वर्ष 2021-22 के दौरान लगभग 13,000 करोड़ के रक्षा निर्यात का रिकॉर्ड हासिल किया. इस निर्यात में प्राइवेट सेक्टर का हिस्सा 70 प्रतिशत था. अनावश्यक बाधाओं को हटाने और प्राइवेट सेक्टर को प्रोत्साहन देने से निर्यात में बढ़ोतरी के इस रुझान में मध्य से लेकर दीर्घकाल में और तेज़ी आने की संभावना बढ़ जाती है. लेकिन आर्मीनिया को भारत के रक्षा निर्यात को पूरी तरह से 2025 तक भारत के 35,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात के लक्ष्य को हासिल करने के नज़रिये के आशय से देखना अदूरदर्शिता होगी. 

तुर्की का बढ़ता असर और नागोर्नो-काराबाख़ संघर्ष 

अंकारा से पूरी दुनिया में तुर्की के साम्राज्य को स्थापित करने का तुर्की का लक्ष्य आधुनिक समय के काकेशियन और यूरेशिया के दूसरे हिस्सों में समझ में आने योग्य है. ये नस्लवादी विचारधारा एक ऐसे साम्राज्य की संभावना पर ध्यान देती है जिसमें तुर्क जैसी भाषा बोलने वाले सभी देश और क्षेत्र शामिल हैं, चाहे वो भाषा तुर्की में बोली जाने वाली भाषा से कितनी ही अलग क्यों न हो और उस क्षेत्र की आबादी की मंज़ूरी हासिल हो या न हो. ये सिद्धांत तुर्की की विदेश नीति का मार्ग-निर्देशन करता रहा है और अब भी कर रहा है. अकादमिक दुनिया से जुड़े दिमित्रिओस अरिस्टोपाउलोस के शब्दों में, “मुस्लिम ब्रदरहुड को इसके समर्थन और उत्तरी सीरिया में इसके आक्रमण से लेकर लीबिया के गृह युद्ध में इसके शामिल होने के साथ-साथ ग्रीस एवं यूरोप के ख़िलाफ़ अवैध प्रवासन की चेतावनी, अर्तसाख (नागोर्नो-काराबाख़) में युद्ध और कुर्दों पर ज़ुल्म- ये सभी कुछ और नहीं बल्कि तुर्की की विस्तारवादी नीति पर आधारित तुर्की के बढ़ते असर के सिद्धांत के एजेंडे का हिस्सा हैं”.

उस्मानी (Ottoman) साम्राज्य को फिर से स्थापित करने और मध्य एशिया के तुर्क या उससे मिलती-जुलती भाषा बोलने वाले देशों को साझा सशस्त्र बलों के साथ एक अखंड औद्योगिक क्षेत्र में मिलाने की कोशिश में तुर्की अज़रबैजान के साथ गठबंधन का फ़ायदा उठाकर इस क्षेत्र में अपनी पकड़ को मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है. 2020 में तुर्की के हुक्म पर अज़रबैजान ने स्वशासन वाले अर्तसाख क्षेत्र के साथ-साथ आर्मीनिया पर हमला किया था. इसका मक़सद तुर्की को आर्मीनिया के स्यूनिक प्रांत, जिसे ज़ैंगेज़ुर क्षेत्र भी कहा जाता है, के ज़रिए अज़रबैजान के साथ जोड़ना है. ये क्षेत्र आर्मीनिया को ईरान, अज़रबैजान और नखचिवन को जोड़ता है, जो ऐतिहासिक रूप से आर्मीनिया का एक क्षेत्र है और अब अज़रबैजान के नियंत्रण में है. तुर्की ने इस आक्रमण के लिए इंतज़ाम, गोला-बारूद, सैनिक, ISIS आतंकवादियों और दूसरे भाड़े के सैनिकों से मदद की थी. इस आक्रमण के बाद अज़रबैजान के सैनिकों ने शांति समझौते के लिए चल रही बातचीत के बावजूद दक्षिणी आर्मीनिया के क्षेत्र पर कब्ज़ा जारी रखा. 

कई भू-राजनीतिक मतभेदों के होते हुए भी अज़रबैजान के द्वारा भारत और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने के दावे के बावजूद पाकिस्तान के साथ अज़रबैजान की बढ़ती मिलनसारिता भारत के लिए एक तकलीफ़ देने वाला तथ्य है. 

अज़रबैजान ने एक बार फिर आर्मीनिया पर 13 सितंबर 2022 को हमला कर दिया. अज़रबैजान की घुसपैठ रूस के द्वारा कराए गए युद्ध विराम, जो ऊपरी तौर पर दो दिन के बाद अमल में आया, के बावजूद जारी है. आर्मीनिया भारत को छोड़कर किसी भी अन्य देश की सैन्य सहायता के बिना अपने दम पर अपनी संप्रभुता पर ख़तरे का सामना कर रहा है. 

अज़रबैजान और तुर्की के साथ भारत के रिश्ते 

कई भू-राजनीतिक मतभेदों के होते हुए भी अज़रबैजान के द्वारा भारत और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने के दावे के बावजूद पाकिस्तान के साथ अज़रबैजान की बढ़ती मिलनसारिता भारत के लिए एक तकलीफ़ देने वाला तथ्य है. ऐसे में ये हैरानी की बात नहीं है कि भारत ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए अज़रबैजान को न्योता देने से परहेज किया. इसके साथ-साथ भारत और भूटान ने कथित तौर पर 4 अगस्त 2022 को लंदन में अज़रबैजान के दूतावास पर कट्टर शिया संगठनों के द्वारा धावा बोलने के बाद गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की तरफ़ से अज़रबैजान के समर्थन में एक घोषणापत्र पर दस्तख़त करने से भी रोका. 

अज़रबैजान और भारत के बीच बढ़ता मतभेद मुख्य रूप से नागोर्नो-काराबाख़ और कश्मीर को लेकर कूटनीतिक गठबंधन से पैदा होता है. भारत ने जहां आर्मीनिया का बढ़-चढ़कर समर्थन करने का विकल्प चुना वहीं हिंसा पर तुरंत नियंत्रण के लिए आक्रमणकारी (अज़रबैजान) से अपील करने की अपनी “सैद्धांतिक स्थिति” को बनाए रखा. इसके अलावा हाल के वर्षों में साझा अभ्यास और शैक्षणिक कार्यक्रमों के मामले में अज़रबैजान और पाकिस्तान की सेना के बीच सैन्य साझेदारी महत्वपूर्ण रूप से गहरी हुई है. 

जहां तक तुर्की की बात है तो उसने एक तरफ़ जहां भारत के तत्कालीन राज्य जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 ख़त्म करने के फ़ैसले की आलोचना की, वहीं दूसरी तरफ़ अलग-अलग मंचों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र में खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया. ये कश्मीर को लेकर आर्मीनिया के द्वारा भारत के समर्थन के ठीक उलट है. आर्मीनिया कश्मीर के पूरे क्षेत्र को भारत के अखंड हिस्से के रूप में देखता है. 

संभावना

कमाल अतातुर्क की पुण्यतिथि पर 10 नवंबर 2016 को तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने खुले तौर पर एलान किया कि “तुर्क साम्राज्य तुर्की से बड़ा है” और ये भी कि तुर्की की “भौतिक सीमा दिलों की सीमा से अलग है” और दिलों की सीमा में अन्य कई क्षेत्रों के साथ-साथ “मोसुल, किरकुक, हुमुस और स्कोपजे” भी शामिल है. तुर्की की इस महत्वाकांक्षा के रास्ते में ईसाई देश आर्मीनिया खड़ा है जिसे सभ्यता का उद्गम स्थल माना जाता है और ईसाई परंपरा में माना जाता है कि नोआ की नौका (जल प्रलय के समय जिस पर सवार होकर सभी प्राणी बचे) ने अरारात पर्वत के शिखर पर आराम किया था

भारत के द्वारा आर्मीनिया को रक्षा निर्यात का फ़ैसला तुर्की को एक शक्तिशाली संदेश है कि वो कश्मीर समेत भारत की आंतरिक नीति पर अपने रास्ते को बदल ले.

हाल के दिनों में आर्मीनिया को पिनाका MBRL समेत अन्य सैन्य उपकरणों का निर्यात करके भारत ने नागोर्नो-काराबाख़ के संघर्ष में ख़ुद को खुल्लमखुल्ला आर्मीनिया के साथ खड़ा किया है और इसके परिणामस्वरूप अज़रबैजान और उसका साथ देने वाले देशों, जिनमें तुर्की और पाकिस्तान के साथ-साथ तुर्की की विस्तारवादी तुर्क साम्राज्य की महत्वाकांक्षा भी शामिल है, का मुक़ाबला करने का फ़ैसला किया है. इस तरह भारत के द्वारा आर्मीनिया को रक्षा निर्यात का फ़ैसला तुर्की को एक शक्तिशाली संदेश है कि वो कश्मीर समेत भारत की आंतरिक नीति पर अपने रास्ते को बदल ले. मौजूदा समय में भारत अब अपने वैश्विक हितों की तलाश में गुटनिरपेक्ष दृष्टिकोण का पालन करने के बदले किसी का पक्ष लेने के लिए तत्पर है

 

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Dr. Aditya Bhan is a Fellow at ORF. He is passionate about conducting research at the intersection of geopolitics national security technology and economics. Aditya has ...

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