वैश्विक स्तर पर देखें तो इस वक्त कोयले की खपत सबसे ज्यादा एशिया, खासकर चीन और भारत में दिख रही है. इस आधार पर ये कहा जा सकता है कि 2030 के दशक में हम कोयले की उच्चतम मांग की दिशा में बढ़ रहे हैं
भारत ने 2030 तक अपने कोयला उत्पादन को बढ़ाकर एक अरब टन (BT) करने का फैसला किया है. 2030 तक कोयले की मांग 1,192 से बढ़कर 1,325 मिलियन टन (MT) होने का अनुमान है.
सबसे पहले कैप्टिव और नॉन कैप्टिव कोयला उत्पादन में अंतर समझना ज़रूरी है. कैप्टिव कोयला उत्पादन उसे कहते हैं, जब कोई कंपनी खदान से निकले कोयले का खुद ही किसी विशेष काम के लिए उत्पादन करें. कैप्टिव कोयला खदान से निकले कोयले को सिर्फ इसका खनन करने वाली कंपनी ही इस्तेमाल कर सकती है जबकि नॉन कैप्टिव कोयला उत्पादन में खनन करने वाली कंपनी इसका खुद इस्तेमाल करने के साथ-साथ बेच भी सकती है. कैप्टिव कोयले के उत्पादन में 90 के दशक से 2010 के दशक तक काफी तेज़ वृद्धि हुई. 1998-99 से 2008-09 के बीच निजी कंपनियों को दी गई कैप्टिव खदानों में सालाना औसतन 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई. 2002-03 से 2012-13 के बीच नीलामी से आवंटित खदानों में 20.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. 2012-13 से 2022-23 के बीच इसमें 12 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई. 2022-23 में निजी क्षेत्र को नीलामी से आवंटित कोयला खदानों से कोयले के उत्पादन में सालाना 36 प्रतिशत की वृद्धि हुई. ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि मौजूदा दशक में भी इन खदानों से कोयला उत्पादन की वृद्धि दर दोहरे अंकों यानी 10 प्रतिशत से ज्यादा रहेगी.
कोयला उत्पादन में कमी की एक वजह ये भी हो सकती है कि कंपनियां अब कोयले की बजाए रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल करने लगी हैं. इससे कोयले की मांग में कमी आई है.
2013 से पहले और 2013 के बाद के दशक में कोकिंग और नॉन कोकिंग कोयले का उत्पादन इसे लेकर नीति में बदलाव को दिखाता है. पिछले दो दशक में कोयला नीति में एक बड़ा परिवर्तन ये रहा कि पहले निजी कंपनियों को कोयला खदानें आवंटित की जाती थी, अब उन्हें नीलामी के ज़रिए कोयला खदानें हासिल करनी पड़ रही हैं. सरकार भी अब घरेलू कोयला उत्पादन के लक्ष्य तय करने लगी हैं. 2019 में कोयला मंत्रालय ने ऐलान किया था कि कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) को 2023-24 तक एक अरब टन कोयला उत्पादन करना चाहिए. हालांकि इस लक्ष्य को अभी हासिल नहीं किया जा सका है. वैसे खास बात ये है कि कोयला नीति में बदलाव के बाद वाले दशक की तुलना में पहले वाले दशक में कोयले का घरेलू उत्पादन ज्यादा तेज़ रफ्तार से बढ़ा. ये बात निजी कंपनियों के लिए ज्यादा सही है. कोकिंग और नॉन कोकिंग कोयले का आयात भी 2013 के बाद वाले दशक की तुलना में 2013 के पहले वाले दशक में अधिक था. कोयले के उत्पादन और इसके आयात में गिरावट की एक वजह आर्थिक गतिविधियों में आई कमी को भी माना जा सकता है क्योंकि कोयले की मांग और आपूर्ति इसी पर निर्भर करती है. 2013 के बाद वाले दशक में आर्थिक वृद्धि दर धीमी रही. 2016 में नोटबंदी और 2019 से 2022 के बीच कोरोना महामारी के दौरान भी कोयला उत्पादन की वृद्धि दर नकारात्मक रही. कोयला उत्पादन में कमी की एक वजह ये भी हो सकती है कि कंपनियां अब कोयले की बजाए रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल करने लगी हैं. इससे कोयले की मांग में कमी आई है. अगर ये सही है तो फिर कहा जा सकता है कि ऊर्जा में बदलाव के क्षेत्र में भारत धीरे-धीरे ही सही लेकिन आगे बढ़ रहा है और भारत 2030 के दशक में कोयले के उच्चतम उत्पादन के अपने लक्ष्य को भी हासिल कर सकता है.
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Ms Powell has been with the ORF Centre for Resources Management for over eight years working on policy issues in Energy and Climate Change. Her ...
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Akhilesh Sati is a Programme Manager working under ORFs Energy Initiative for more than fifteen years. With Statistics as academic background his core area of ...
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Vinod Kumar, Assistant Manager, Energy and Climate Change Content Development of the Energy News Monitor Energy and Climate Change. Member of the Energy News Monitor production ...
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