Published on Jul 27, 2023 Updated 0 Hours ago

शहरी नियोजकों को शहरीकरण में अनइक्वल पॉवर डायनैमिक्स अर्थात असमान शक्ति गतिशीलता को समाप्त करने का आदेश देने और अपनी स्पेस को व्यक्त करने के नए तरीकों की दिशा में सोचना होगा.

Gender responsive cities: लैंगिक संतुलन को बढ़ावा देने वाले शहरों के निर्माण की कोशिश!
Gender responsive cities: लैंगिक संतुलन को बढ़ावा देने वाले शहरों के निर्माण की कोशिश!

महामारी के बाद की स्थिति में लगातार विकसित हो रही नागरिकों की ज़रूरतों को समायोजित करने के बढ़ते दबाव की वजह से शहर योजनाकार अपने दृष्टिकोण और प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करने लगे हैं. हालांकि, विकासशील देशों के शहरों के लिए इस तरह के बदलाव चुनौतीपूर्ण होते हैं. वहां जीवन की गुणवत्ता और नागरिक सुरक्षा की बढ़ाने को ध्यान में रखकर बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करना ही प्राथमिकता होता है. पितृसत्तात्मक समाजों में ऐतिहासिक रूप से पहले से बने हुए माहौल में लैंगिक संतुलन की अक्सर उपेक्षा ही की जाती है.

अक्सर पुरुषों की तुलना में सिटी प्लानिंग में शहर के भीतर महिलाओं के जटिल आवागमन की अनदेखी करते हैं. इसमें यौन उत्पीड़न और लिंग आधारित हिंसा में महिलाओं के आसानी से शिकार बनने की संभावना भी शामिल होती है.

नगर नियोजन की आम तौर पर अपनी योजनाओं में महिलाओं की आवश्यकताओं को ध्यान में नहीं रखने के लिए आलोचना ही की जाती है. इसका कारण यह है कि वे आम तौर पर पारंपरिक मानसिकता, सामाजिक मानदंडों और महिलाओं को इस नियोजन से बाहर रखने की प्रवृत्ति के कारण महिलाओं और सीमांत लिंगों की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाते हैं. अक्सर पुरुषों की तुलना में सिटी प्लानिंग में शहर के भीतर महिलाओं के जटिल आवागमन की अनदेखी करते हैं. इसमें यौन उत्पीड़न और लिंग आधारित हिंसा में महिलाओं के आसानी से शिकार बनने की संभावना भी शामिल होती है.

शहरी आबादी में आधे से ज्यादा हिस्सेदारी महिलाओं, लड़कियों और लैंगिक अल्पसंख्यक की होती है. महिलाएं शहर को पुरुषों की तुलना में अलग तरह से अनुभव करती और देखती हैं. इसके बावजूद, दीर्घकालीन विकास लक्ष्यों की निगरानी करने के लिए तय संकेतकों में से 50 प्रतिशत से भी कम लैंगिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं. निर्णय लेने में भूमिका निभाने वाली उपलब्ध जानकारी में मौजूद खामियां और तुलना करने के लिए बनाई गई विभिन्न पद्धतियों के अभाव के कारण गुणात्मक मेट्रिक्स अर्थात छंदशास्त्र का अध्ययन करना मुश्किल हो जाता है. इन मेट्रिक्स को निर्धारित करने के सार्थक प्रयास के बगैर लिंग-संतुलित नियोजन दृष्टिकोण अपनाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में महिलाओं और अल्पसंख्यक लिंग से जुड़ी आवाज़ों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और लिंग हितों को बढ़ाने के लिए शहरी नियोजन दृष्टिकोणों पर पुनर्विचार करना ज़रूरी हो जाता है.

लिंग संबंधी चुनौतियां

सिस्जेंडर दृष्टिकोण

शहरी नियोजन के लिए पहले से तय पारंपरिक ढांचे, नियोजन स्पेक्ट्रम अर्थात विस्तार के सभी पहलुओं में भेदभाव करने वाले होते हैं. ऐसे में शहर अपनी अभिव्यक्ति और सामाजिक परिवेष और सांस्कृतिक या भाषाई अभिव्यक्तियों के आधार पर जेंडर बेस्ड बायस अर्थात लिंग पूर्वाग्रहों के सुदृढ़ीकरण के संदर्भ में भेदभावपूर्ण हो जाते हैं. पहले से तय हो चुके मानदंडों का उल्लंघन करना अक्सर प्रतिकारक अथवा प्रतिरोधी माना जाता है. इसमें सामाजिक-कानूनी निहितार्थ तक शामिल होते हैं. उदाहरण के लिए, एक सिस्जेंडर अर्थात ऐसे लोग, जिन्हें जन्म से ही उस लिंग से पहचाना जाता है जो उनके लिए तय किया गया हो, अपनी सोच और समझ के कारण सार्वजनिक स्थानों पर पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग बैठने जगह का मतलब और इस नियम का उल्लंघन करने वालों पर लगाए जाने वाले जुर्माने और सामाजिक फटकार को बेहतर ढंग से समझते हैं. इस तरह का सिस्जेंडर दृष्टिकोण शहर के सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के प्रतिनिधित्व और भागीदारी को बाधित कर उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर ख़तरे का अहसास करवाते हैं. ऐसे में यह दृष्टिकोण लैंगिक-तटस्थ स्थानों को लेकर अपनी प्राथमिकता भी साफ़ कर देता है.

कई सर्वे में महिलाओं को यह महसूस करते हुए दिखाया है कि वे शहर को असुरक्षित और खतरनाक मानती हैं. शहरों की बुनियादी सुविधाएं महिलाओं की ज़रूरतों का ध्यान नहीं रखती. इस वजह से शहर में उनकी मौजूदगी दिखाई ही नहीं देती. ऐसे में शहर को समान पहुंच अर्थात सभी लिंगों के लिए बनाने की योजना में उनकी हिस्सेदारी की तो कल्पना भी करना बेकार है.

इस खांचे से देखा जाए तो ट्रेनों में पूरे डिब्बे को आरिक्षत करना, बसों में बैठने के लिए महिलाओं के लिए समर्पित स्थान, महिलाओं द्वारा संचालित टैक्सियां अथवा केवल महिलाओं के शौचालय इस समस्या का समाधान नहीं, बल्कि इन्हें पितृसत्तात्मक मानसिकता से उपजी समस्याएं ही कहा जा सकती है. ऐसे में इसे लेकर सोच और व्यवहार में एक मौलिक बदलाव आवश्यक हो जाता है. यह बदलाव संपूर्ण सामाजिक दृष्टिकोण में आने की जरूरत है, ताकि सार्वजनिक जीवन और साफ़ दिखाई देने वाली लैंगिक संवेदनशीलता को इसका अभिन्न अंग बनाया जा सके.

असमान प्रतिनिधित्व

आर्किटेक्ट और शहरी नियोजक महिलाओं की संख्या 10 प्रतिशत से भी कम होने की वजह से भी लिंग आधारित ज़रूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता है और इस कारण ही पक्षपाती रवैया अपनाया जाता रहा है. इसी कारण से शहरी सुविधाओं को लेकर लिंग आधारित विशेषाधिकारों के प्रति एकतरफा दृष्टिकोण और रवैया अपनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है. उदाहरण के लिए, कम रोशनी वाले सार्वजनिक पार्क और सार्वजनिक शौचालय सिस्जेंडर दृष्टिकोण की उपज हैं. यह दृष्टिकोण महिलाओं और अल्पसंख्यक लिंग की आवश्यकताओं को लेकर समझ की कमी को उजागर करता है. ऐसे में ट्रांस अर्थात जिन लोगों का लिंग अथवा बर्ताव जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाता, उनकी ज़रूरतों को आमतौर पर नज़रअंदाज़ ही किया जाता है.

कई सर्वे में महिलाओं को यह महसूस करते हुए दिखाया है कि वे शहर को असुरक्षित और खतरनाक मानती हैं. शहरों की बुनियादी सुविधाएं महिलाओं की ज़रूरतों का ध्यान नहीं रखती. इस वजह से शहर में उनकी मौजूदगी दिखाई ही नहीं देती. ऐसे में शहर को समान पहुंच अर्थात सभी लिंगों के लिए बनाने की योजना में उनकी हिस्सेदारी की तो कल्पना भी करना बेकार है. उदाहरण के लिए, 2021 के एक अध्ययन से पता चला है कि बेंगलुरु  में सार्वजनिक शौचालयों की कमी के कारण 50 प्रतिशत महिलाओं को मानसिक तनाव झेलना पड़ा. इस तरह के आंकड़ों से यह साफ़ हो जाता है कि कैसे सार्वजनिक सुविधाओं तक असमान पहुंच, लैंगिक क्षेत्रीकरण और  ख़राब रोशनी लैंगिक अल्पसंख्यकों की शहर नियोजन में भागीदारी को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है.

प्रशासनिक उदासीनता

भारत में अब ऐसे सराहनीय आइडिया अर्थात विचारों की ज़रूरत है, जो नियोजन चरण से भी आगे जाकर इसमें मौजूद प्रशासनिक उदासीनता और जटिल नौकरशाही की समस्या से निपट सके. उदाहरण के लिए, मुंबई के ड्राफ्ट डीपी2034 जो जेंडर, स्पेशल ग्रुप्स एंड सोशल इक्विटी और जेंडर एडवाइज़री कमेटी पर काम करने के लिए बना हैं, उस पर अभी भी उल्लेखनीय काम नहीं हो सका है. इन प्रस्तावों का उद्देश्य कार्यबल, आवास, परिवहन और शिक्षा में लैंगिक समानता हासिल कर महिलाओं और सीमांत लिंगों के लिए स्वास्थ्य देखभाल और सुरक्षा में सुधार के उपायों की सिफारिश करना था. इसी प्रकार, दिल्ली में महिला सुरक्षा के लिए 2011 में बनाया गया मसौदा रणनीतिक ढांचा केवल कागज तक ही सीमित रह गया है. यह एक पैटर्न अर्थात उदाहरण है जो पूरे देश में शहरी नियोजन प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा हैं.

वैश्विक मॉडल

महिलाओं पर चौथे संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन ने दीर्घकालीन मानव विकास के लिए लिंग को मुख्यधारा में लाए जाने को आवश्यक बताया था. इसके बावजूद लैंगिक समावेशन के लिए कोई वैश्विक समझौता मुश्किल से ही मौजूद हैं. हालांकि, हैंडबुक फॉर जेंडर-इनक्लूसिव अर्बन प्लानिंग एंड डिज़ाइन, ने इस संदर्भ को रेखांकित करते हुए कि कैसे सरल डिज़ाइन उपायों के माध्यम से सभी के लिए शहरों की योजना बनाई जा सकती है, एक अच्छी शुरूआत की है. इसके साथ ही यूएन हैबिटेट की जेंडर इश्यू गाइड, जो शहरी नियोजन में लैंगिक मुख्यधारा की रणनीति बनाने की पेशकश करती है को भी इस दिशा में बेहतर पहल माना जा सकता है. फिर भी, यदि वे वर्तमान हकीकत और आकांक्षाओं को ध्यान में नहीं रखेंगे तो यह इस दिशा में किया गया काफी कम काम ही कहा जाएगा. शहर की वर्तमान हकीकत को देखकर भागीदारी डिजाइन प्रक्रिया को लागू करने के लिए व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है, ताकि शहरी नियोजन और डिजाइन के विनियमों और नीतियों को कमजोर समूहों के परिप्रेक्ष्य के हिसाब से तैयार किया जा सके.

भारत के कुछ शहर भी लिंग-संतुलित नियोजन की कोशिश कर रहे हैं. तिरुवनंतपुरम नगर पालिका, महिला नागरिकों और योजनाकारों के साथ मिलकर अपने सांस्कृतिक जिले में कई महिला-अनुकूल क्षेत्रों का विकास कर रही है. इनमें अन्य बातों के अलावा, 24/7 पिंक पुलिस, स्तनपान कियोस्क अर्थात छतरी, शी अर्थात महिला शौचालय और शी ऑटो शामिल किए जाएंगे.

अपनी शहरी नियोजन प्रक्रिया में लिंग भेद को विशेष रूप से शामिल करने वाले सफल वैश्विक मॉडल मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाले हैं. 2019 पीआईसीएसए इंडेक्स में शीर्ष स्थान हासिल करने वाले ज़्यूरिख ने एक स्वतंत्र लैंगिक समानता कार्यालय की स्थापना की है. यह कार्यालय लैंगिक चश्मे के माध्यम से नियोजन निर्णयों की छंटाई करता है और शहर को सभी लिंगों के लिए स्वागत योग्य बनाने और इसके शहरी कार्यों के लिए लैंगिक जवाबदेही को महत्वपूर्ण बनाने की दिशा में अहम भूमिका अदा कर रहा है. शहर एलजीबीटीक्यू प्लस लोगों के लिए रेगेनबोगेनहौस अर्थात रेनबो हाऊस जैसा सुरक्षित स्थान मुहैया करवाता है, जहां ज़्यूरिख के लेस्बियन, गे, बाई, ट्रान्स और क्वीर नागरिक अपने से संबंधित मुद्दों पर चर्चा कर सकते है. ये लोग इस हाऊस में शहर नियोजन से जुड़े मसले पर समाज को एक रूप में चर्चा करने के लिए भी आमंत्रित करते हैं.

विएना ने लैंगिक मुख्यधारा को लेकर 60 से अधिक शहरव्यापी पहल और शहरी नियोजन निदेशालय के भीतर एक महिला इकाई के साथ समान प्रतिनिधित्व का एक महत्वपूर्ण खाका दुनिया के सामने रखा है. पर्याप्त स्ट्रीट लाइटिंग, बग्गीज़ के लिए चौड़े फुटपाथ, बैठने की अतिरिक्त व्यवस्था, शॉर्टकट और गलियों में सुरक्षा के लिए दर्पण, और सार्वजनिक पार्को के लिंग-संवेदनशील डिज़ाइन के लिए विनियम ही महिलाओं और सीमांत लिंगों के लिए पर्यावरण को सुरक्षित और आकर्षक बनाने और उनके लिए चिंता पैदा करने वाले स्थानों को कम कर सकेंगे. विएना का फ्राऊवें-वर्क-स्टैड्ट अर्थात वूमेन-वर्क-सिटी महिलाओं के लिए और महिलाओं के द्वारा डिज़ाइन अर्थात नियोजित की गई रियायती आवास सुविधाओं को बढ़ावा देता है. स्वीडन में उमेआ जैसे कुछ शहर विशिष्ट उप-समूहों की आवश्यकताओं पर और अधिक ध्यान देकर उन्हें शामिल करते हैं. उदाहरण के लिए, अरस्टीडेरनास पार्क को किशोर लड़कियों, जिनकी ज़रूरतों को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है, को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया था ताकि वे सहज और सुरिक्षत महसूस कर सकें.

भारत के कुछ शहर भी लिंग-संतुलित नियोजन की कोशिश कर रहे हैं. तिरुवनंतपुरम नगर पालिका, महिला नागरिकों और योजनाकारों के साथ मिलकर अपने सांस्कृतिक जिले में कई महिला-अनुकूल क्षेत्रों का विकास कर रही है. इनमें अन्य बातों के अलावा, 24/7 पिंक पुलिस, स्तनपान कियोस्क अर्थात छतरी, शी अर्थात महिला शौचालय और शी ऑटो शामिल किए जाएंगे. इसी तरह, हैदराबाद ने 10 साल से कम उम्र की महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष रूप से अपना पहला थीम पार्क शुरू किया है. कुछ शहरों ने अब एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) प्लस नागरिकों के लिए उनके वार्षिक सम्मेलन का आयोजन करना शुरू कर दिया है. नई दिल्ली में तो पहली गे-ओनली होटल भी खुल गई है. एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय के लिए नई दिल्ली महानगरपालिका अब 500 शौचालयों का निर्माण करने की भी योजना बना रही है.

ये पहल कितनी भी त्रुटिपूर्ण या सीमित क्यों न हो, लेकिन प्रशंसनीय हैं. क्योंकि वे बड़े पैमाने पर लिंग-बधिर पारिस्थितिकी तंत्र के सामने अपने मजबूत इरादे को प्रदर्शित करती हैं और यह भविष्य में लिंग-संवेदनशील और लिंग-संतुलित शहरों के निर्माण की दिशा में लिए स्प्रिंगबोर्ड की तरह काम कर सकती हैं.

बदलाव ज़रूरी है

शहरी नियोजकों को शहरीकरण में अनइक्वल पॉवर डायनैमिक्स अर्थात असमान शक्ति गतिशीलता को समाप्त करने का आदेश देने और अपनी स्पेस को व्यक्त करने के नए तरीकों की दिशा में सोचना होगा. जो शहर लैंगिक संवेदनशीलता को बर्दाश्त नहीं करते हैं, वे अपनी महिलाओं और कमजोर लिंगों के लोगों को ठग रहे है. ऐसे में उन शहरों को इन कमजोर लिंगों और महिलाओं की विस्फोटक प्रतिक्रिया का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा.

  • लिंग-उत्तरदायी दृष्टिकोण रखकर शहरों के निर्माण के लिए डिजाइन, कार्यान्वयन और शासन स्तर पर शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं और लैंगिक अल्पसंख्यकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. उदाहरण के तौर पर 2022 तक, 100 स्मार्ट शहरों के बोर्ड में 96 में एक तिहाई से भी कम महिला सदस्य हैं.
  • योजनाकारों को मौजूदा नगरपालिका कानूनों के ऑडिट और संशोधन के लिए जेंडर लेंस अर्थात लैंगिक चश्मे का उपयोग करते हुए चर्चाओं को नियमित रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए.
  • योजना बनाने में महिलाओं के समूहों और गैर-सरकारी संगठनों के मिश्रित गठजोड़ के माध्यम से भागीदारी सुनिश्चित करते हुए लैंगिक प्राथमिकताओं को रेखांकित किया जा सकता है.
  • महिलाओं और लैंगिक अल्पसंख्यकों को शहर के नीति निर्माण योजना में विभिन्न स्तरों पर शामिल किया जाना चाहिए. ऐसा होने पर ही उनकी लैंगिक-संवेदनशील शहरी सुविधाओं, परिवहन, पट्टे और संपत्ति के अधिकारों और सुरक्षा तक पहुंच होगी, जो प्रशासन को और भी बेहतर बनाएगी. उदाहरण के लिए, स्कूली छात्राओं का एक सर्वेक्षण यह बता सकता है कि शहर में कैसा वातावरण उन्हें सुरिक्षत और स्वतंत्र महसूस कराएगा.
  • सामूहिक प्रयास, निरंतर कार्रवाई और नियमित प्रभाव निगरानी के माध्यम से ही लैंगिक जवाबदेही को सफलता मिल सकती है. नीति में होने वाले सुधार को प्रशिक्षण हस्तक्षेपों, जागरूकता कार्यक्रमों, शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के पुनर्मूल्यांकन का साथ मिलना चाहिए. इसके साथ ही सभी हितधारकों के बीच एक व्यवहारिक परिवर्तन और सामाजिक पुनर्रचना को प्रभावित करने के लिए अन्य सकारात्मक उपायों को भी इसके पूरक होना चाहिए.
  • किसी भी प्रभावी मॉडल को स्थानीय और प्रासंगिक सूक्ष्म संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखना चाहिए. अन्यथा, सबसे अच्छी योजनाएं भी सांकेतिक और बेकार साबित होंगी. जैसा कि चुनिंदा शहरी सार्वजनिक शौचालयों में मुफ्त सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनों के मामले में होता है. यह ज्यादातर अप्रयुक्त पड़े रहते हैं, जिससे इसके लिए बुनियादी ढांचे पर किया गया खर्च व्यर्थ हो जाता है.

    एक शहर की राह निर्धारित और प्रवृत्तियों को प्रकट करने के लिए राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तरों पर लिंग विश्लेषण और डेटा की तुलना करना अनिवार्य है. सटीक लिंग-संवेदनशील सबूत प्रासंगिक और आवश्यकता-आधारित सेवाओं और बुनियादी ढांचे को उपयुक्त और सुविधाजनक बनाने में मदद कर सकते हैं. 

  • एक शहर की राह निर्धारित और प्रवृत्तियों को प्रकट करने के लिए राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तरों पर लिंग विश्लेषण और डेटा की तुलना करना अनिवार्य है. सटीक लिंग-संवेदनशील सबूत प्रासंगिक और आवश्यकता-आधारित सेवाओं और बुनियादी ढांचे को उपयुक्त और सुविधाजनक बनाने में मदद कर सकते हैं. अलग-अलग लैंगिक तथ्य और आंकड़े इस बात पर नजर रखने में सहायता कर सकते हैं कि कौन सा ढांचा और नगरपालिका का बजट, किस हद तक लैंगिक समावेशन में सफल हुए हैं. पुराने कानूनों को सावधानीपूर्वक निरस्त करने और प्रासंगिक कानूनों को पेश करने के लिए भी कोलेशन अर्थात तुलना महत्वपूर्ण है.
  • 50 प्रतिशत शहरी आबादी के रूप में महिलाएं और लैंगिक अल्पसंख्यक शहर नियोजन और प्रशासन में एक मौलिक भूमिका निभाते हैं. यह अत्यावश्यक और उचित भी है. निर्मित पर्यावरण को सह-निर्माण और पुनर्परिभाषित करना ही भविष्य के स्थायी शहरों के निर्माण के लिए एकमात्र रास्ता है.

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Author

Anusha Kesarkar Gavankar

Anusha Kesarkar Gavankar

Anusha is Senior Fellow at ORF’s Centre for Economy and Growth. Her research interests span areas of Urban Transformation, Spaces and Habitats. Her work is centred ...

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