Published on Jul 08, 2022 Updated 3 Days ago
भारत के विनिर्माण निर्यातों से जुड़े समीकरणों की पड़ताल

वैश्विक बाज़ार में भारत लगातार अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहा है (चित्र 1, 2). हालांकि निर्यात की बढ़ोतरी को रफ़्तार देने वाले घटकों को लेकर बहस की गुंजाइश बरक़रार है. इस विस्तार के एक सिरे पर शोधकर्ता भारत को औद्योगिक व्यवस्था को अपरिपक्व रूप से पीछे धकेलने वाली अर्थव्यवस्था की मिसाल के तौर पर पेश करते हैं. उनके मुताबिक भारत की विकास यात्रा मोटे तौर पर सेवा क्षेत्र (निर्यात समेत) से आगे बढ़ी है. वहीं दूसरे सिरे पर शोधकर्ताओं की दलील है कि भारत विनिर्माण क्षेत्र से निर्यात की अगुवाई में संचालित होने वाले विकास का प्रतीक है. चीन और वियतनाम के बाद इस क़वायद में भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है. बहरहाल एक मसले पर हर ओर आम सहमति है- कम कौशल वाले विनिर्माण में भारत का प्रदर्शन अब भी खस्ता है. लिहाज़ा भारत निर्यात की अगुवाई वाले ठोस और समावेशी विकास के अहम अवसर का फ़ायदा उठाने से चूक रहा है. 

चित्र 1. भारत के व्यापारिक माल निर्यात में बढ़ोतरी, 1961-2020

स्रोत: यूएन कॉमट्रेड

चित्र 2. वैश्विक निर्यातों में भारत के व्यापारिक माल निर्यातों का बढ़ता हिस्सा, 2000-2020 

स्रोत: यूएन कॉमट्रेड

1990 के दशक के बाद से विनिर्माण निर्यातों की संरचना में आमूलचूल बदलाव हुए हैं. उच्च कौशल वाले विनिर्माण निर्यात बढ़ रहे हैं. दूसरी ओर निम्न कौशल वाले विनिर्माण निर्यातों में गिरावट आ रही है. 

चित्र 3.

स्रोत: यूएन कॉमट्रेड का इस्तेमाल कर लेखक का आकलन 

चित्र 4.

स्रोत: यूएन कॉमट्रेड का इस्तेमाल कर लेखक का आकलन

चित्र 5.

स्रोत: यूएन कॉमट्रेड का इस्तेमाल कर लेखक का आकलन

चित्र 3 में कौशल आधारित संरचना तैयार की गई है. इसके लिए कौशल की गहनता से जुड़ी चटर्जी और सुब्रमण्यन रूपरेखा प्रयोग में लाई गई है.

चटर्जी और सुब्रमण्यन (2020) की पड़ताल से ये बात ज़ाहिर हुई है कि देश में श्रम की बंदोबस्ती के हिसाब से कम कुशलता वाली विनिर्माण गतिविधियों की ग़ैर-मौजूदगी से भारत को सालाना 140 अरब अमेरिकी डॉलर का नुक़सान झेलना पड़ रहा है. 

चित्र 4 में टेक्नोलॉजी पर आधारित विनिर्माण निर्यात से जुड़े OECD के वर्गीकरण के तहत टेक्नोलॉजी आधारित संरचना तैयार की गई है. दरअसल श्रेणी में बांटने की ये क़वायद लाल के वर्गीकरण पर आधारित है. दोनों ही चित्रों से निम्न कौशल वाले उद्योगों के अनुपात में गिरावट का पता चलता है. चित्र 5 में प्रमुख क्षेत्रों में निर्यात की संरचना में आया बदलाव रेखांकित होता है. निम्न तकनीकी वाले निर्यातों जैसे टेक्सटाइल, लेदर, फ़ुटवियर में गिरावट हुई है. 1999 में आंकड़ा 37.9 प्रतिशत था जो 2019 में गिरकर 14.2 प्रतिशत रह गया. विनिर्माण निर्यात भी 1999 के 25.7 प्रतिशत से गिरकर 2019 में महज़ 13.3 फ़ीसदी रह गया. निम्न कौशल वाले विनिर्माण निर्यात में भी विश्व बाज़ार में भारत का प्रदर्शन फीका पड़ता जा रहा है. टेक्सटाइल, फ़ुटवियर और लेदरवर्क के निर्यात इस सिलसिले में मिसाल बनकर हमारे सामने खड़े हैं. चित्र 6 से साफ़ है कि टेक्सटाइल, फ़ुटवियर और लेदर के निर्यातों में 2015 तक भारत और वियतनाम क़रीबी प्रतिस्पर्धी थे. इसके बाद भारत का निर्यात गिरने लगा. बहरहाल वियतनाम के निर्यातों में बढ़ोतरी जारी रही और वो इन वस्तुओं के निर्यात में भारत से आगे निकल गया. इस पूरे कालखंड में चीन का निर्यात भारत और वियतनाम के मुक़ाबले कई गुणा ज़्यादा रहा. 

चित्र 6.

स्रोत: यूएन कॉमट्रेड

ऐसे में ये समझना ज़रूरी है कि ये घटनाक्रम भारत के लिए चिंताजनक क्यों है. इसके बाद घटते निर्यातों की वजहों की पड़ताल करनी होगी. कम-कौशल वाला विनिर्माण क्षेत्र श्रम की गहनता वाला है. ज़ाहिर है इसमें रोज़गार निर्माण के बेशुमार मौक़े मौजूद हैं. भारत में हर साल औसतन 1 करोड़ 20 लाख लोग श्रम बाज़ार में प्रवेश करते हैं. ऐसे में कम कौशल वाले विनिर्माण रोज़गारों के विस्तार से बेरोज़गारी की समस्या में काफ़ी हद तक बेहतरी लाने में मदद मिलेगी. मिसाल के तौर पर 9.5 करोड़ से भी कम आबादी वाले देश वियतनाम ने 2014 से 2016 के बीच सिर्फ़ विनिर्माण क्षेत्र में 15 लाख से ज़्यादा नौकरियां पैदा की. श्रम की गहनता वाले विनिर्माण निर्यातों में दोहरे अंकों की बढ़ोतरी के बूते वियतनाम ने ये कारनामा कर दिखाया. 2021 के आर्थिक सर्वेक्षण में ये बात रेखांकित की गई है कि भारत के पास श्रम की सघनता और कम कुशलता वाले क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी लाभ है. इन क्षेत्रों में सिले-सिलाए कपड़े, टेक्सटाइल से जुड़े सामान, फ़ुटवियर आदि शामिल हैं. हालांकि पिछले दशक में भारत के निर्यात रुझानों से ज़ाहिर होता है कि भारत ने पूंजीगत सघनता वाले उत्पादों का ही ज़्यादा निर्यात किया है. दूसरी ओर बांग्लादेश ने श्रम की गहनता वाले उद्योगों में अपने प्रतिस्पर्धी लाभ का पूरा फ़ायदा उठाया है. इसी क़वायद के बूते उसने पिछले दशक में निर्यात की बढ़ोतरी के मामले में भारत पर 7.7 प्रतिशत अंकों की बढ़त बना ली. भारत में श्रम की बंदोबस्ती पर्याप्त रूप से कारगर नहीं है. हालांकि श्रम बाज़ार के 52 प्रतिशत हिस्से के पास दूसरे दर्जे (level 2) का कौशल मौजूद है. ये कृषि और कम कौशल वाले विनिर्माण के लिए मुफ़ीद है. चूंकि कृषि क्षेत्र पहले से ही श्रम के भारी बोझ तले दबा है, लिहाज़ा इन श्रमिकों को कम कुशलता वाले विनिर्माण में रोज़गार पर लगाना श्रम कौशल के हिसाब से बेहतरीन विकल्प मालूम होता है. चटर्जी और सुब्रमण्यन (2020) की पड़ताल से ये बात ज़ाहिर हुई है कि देश में श्रम की बंदोबस्ती के हिसाब से कम कुशलता वाली विनिर्माण गतिविधियों की ग़ैर-मौजूदगी से भारत को सालाना 140 अरब अमेरिकी डॉलर का नुक़सान झेलना पड़ रहा है. 

इसके साथ ही अनेक अध्ययनों में श्रम की गहनता वाले उद्योगों में रोज़गार के सामाजिक मुनाफ़ों की तस्दीक़ की गई है. 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया था कि श्रम की गहनता वाले उद्योगों में महिला श्रम की सघनता (प्रति इकाई निवेश को नौकरियों के पैमाने से मापने पर) सबसे ज़्यादा थी. इनमें कपड़े, लेदर और फ़ुटवियर शामिल हैं. एक और अध्ययन से पता चला है कि बांग्लादेश में वस्त्र से जुड़े क्षेत्र के विस्तार से महिला शिक्षा, सकल प्रजनन दर और महिला श्रम की भागीदारी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा. ये बात भारत के लिए ख़ासतौर से अहम है. दरअसल भारत में महिला श्रम की भागीदारी विकासशील देशों में सबसे निचले स्तरों में है और पिछले तीन दशकों से इसमें गिरावट आती जा रही है. 

विकास में सुस्ती के पीछे की वजहें

अकुशल श्रम एक ऐसा संसाधन है जो भारत के पास प्रचुर मात्रा में है. लिहाज़ा इसे विडंबना ही कहेंगे कि सरकारें व्यवस्थित रूप से ऐसे क़ानून और नियमन लागू करती चली गईं जिनसे ये संसाधन औद्योगिक इकाइयों की पहुंच से बाहर हो गया या उनके लिए पूरी तरह से फीका साबित होने लगा.   

भारत उच्च कौशल वाले सूचना प्रौद्योगिकी सेक्टर को गले लगाते हुए श्रम की गहनता वाले उद्योगों से दूर जा रहा है. मुख्य रूप से इसके कारकों में सरकार का निरंकुश रवैया शामिल है. उच्च कौशल वाले क्षेत्र को बख़्शते हुए श्रम की गहनता वाले क्षेत्रों पर तमाम तरह से आर्थिक बोझ डालने की नीति भी इसी कड़ी का हिस्सा है.

भारत उच्च कौशल वाले सूचना प्रौद्योगिकी सेक्टर को गले लगाते हुए श्रम की गहनता वाले उद्योगों से दूर जा रहा है. मुख्य रूप से इसके कारकों में सरकार का निरंकुश रवैया शामिल है. उच्च कौशल वाले क्षेत्र को बख़्शते हुए श्रम की गहनता वाले क्षेत्रों पर तमाम तरह से आर्थिक बोझ डालने की नीति भी इसी कड़ी का हिस्सा है. मेहरोत्रा (2019) की दलील है कि सेवाओं और सूचना प्रौद्योगिकी सेक्टर के विस्तार में योगदान देने वाला एक अहम कारक है- दुकान और प्रतिष्ठान अधिनियम के तहत काम कर पाने की इस क्षेत्र की क़ाबिलियत. इस क़ानून के मातहत काम करने के चलते इस सेक्टर में 45 श्रम क़ानून (जो उद्योगों पर लागू होते हैं) लागू ही नहीं होते. इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि भारत अपने लोगों को उद्योगों में सबसे सुरक्षित रोज़गार की गारंटी देता है. बस मुश्किल ये है कि इस क्षेत्र में लोगों के लिए रोज़गार उपलब्ध ही नहीं हैं. श्रम की सघनता वाले निर्यातों के ज़रिए विकास को आगे बढ़ाने वाले चुनिंदा देशों में बांग्लादेश, वियतनाम और चीन शामिल हैं. इन सभी देशों में एक बात साझा है. उनकी व्यवस्थाएं श्रम को नौकरी पर रखने को लेकर नियमनों और प्रतिबंधों के मकड़जाल में क़ैद नहीं हैं. OECD आर्थिक सर्वेक्षण 2019 में ये बात रेखांकित की गई है कि भारत में औद्योगिक इकाई का आकार बढ़ने के साथ-साथ श्रम से जुड़े नियामक क़ानून और कठोर होते चले जाते हैं. यही वजह है कि उद्यमी इकाइयों को अपना आकार छोटा रखकर सरकार की नज़रों से दूर बने रहने में ही अपना भला नज़र आता है. ये क़वायद उन्हें अपना आकार या पैमाना बढ़ाकर आर्थिक लाभ (economies of scale) हासिल करने से रोकती है. प्रतिस्पर्धिता और ऊंची उत्पादकता हासिल करने के मक़सद से श्रम की गहनता वाले विनिर्माण उद्योगों के लिए अपना आकार बढ़ाना बेहद ज़रूरी होता है. मिसाल के तौर पर बांग्लादेश में एक औसत कपड़ा फ़ैक्ट्री में तक़रीबन 797 कर्मचारी हैं जबकि भारतीय कपड़ा इकाइयों में प्रति उद्यम क़रीब 240 कामगार ही मौजूद हैं.    

श्रम की सघनता वाले उद्योगों के अंतिम उत्पाद (सेवाओं के विपरीत) बुनियादी ढांचे और परिवहन पर ज़बरदस्त रूप से निर्भर होते हैं. वर्ल्ड लॉजिस्टिक्स परफ़ॉर्मेंस इंडेक्स में भारत 44वें पायदान पर है. इस सूचकांक में चीन और वियतनाम हमसे कहीं आगे हैं. 2017 के आर्थिक सर्वेक्षण का आकलन था कि भारत में रसद की लागत (7 अमेरिकी डॉलर) बांग्लादेश (3 अमेरिकी डॉलर) या श्रीलंका (3.9 अमेरिकी डॉलर) से ज़्यादा है. इस तरह फ़ैक्ट्रियों तक कच्चे माल की आपूर्ति करना और कारखानों से तैयार सामान को उनकी मंज़िल तक पहुंचाना भारत में ख़र्चीली क़वायद है. भारत में समुद्री बंदरगाहों से जुड़ा बुनियादी ढांचा भी बेहद लचर है. ज़्यादातर बंदरगाहों में बड़े कंटेनर जहाज़ों की आवाजाही की क्षमता मौजूद ही नहीं है. यही वजह है कि कंटनेरों की एक बड़ी तादाद कोलंबो और दुबई जैसे बंदरगाहों से दूसरे जहाज़ों में भरकर मंगाए जाते हैं. इससे लागत में अतिरिक्त बढ़ोतरी के साथ-साथ आवाजाही में देर होती है. बेकार के नियमन बुनियादी ढांचे से जुड़ी ख़ामियों को और गंभीर बना देते हैं. मिसाल के तौर पर सड़क के रास्ते अंतरराज्यीय माल ढुलाई के लिए न सिर्फ़ राष्ट्रीय परमिट की दरकार होती है बल्कि इसके लिए हरेक राज्य के क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकार से मंज़ूरी भी लेनी होती है. इससे वस्तुओं की परिवहन लागत बढ़ जाती है और आवाजाही में बिना वजह लेटलतीफ़ी होती है.  

भारत में समुद्री बंदरगाहों से जुड़ा बुनियादी ढांचा भी बेहद लचर है. ज़्यादातर बंदरगाहों में बड़े कंटेनर जहाज़ों की आवाजाही की क्षमता मौजूद ही नहीं है. यही वजह है कि कंटनेरों की एक बड़ी तादाद कोलंबो और दुबई जैसे बंदरगाहों से दूसरे जहाज़ों में भरकर मंगाए जाते हैं.

बहरहाल निर्यात में तेज़ रफ़्तार बढ़ोतरी के रास्ते में कई और कारक रुकावट बनकर खड़े हैं. इनमें कर और शुल्क नीति, मुक्त व्यापार समझौतों का अभाव आदि शामिल हैं. ऊपर ख़ासतौर से निम्न कौशल वाले विनिर्माण उत्पादों से जुड़े कारकों की चर्चा की गई है. 

PLIs: सफल या विफल

निम्न कौशल वाले विनिर्माण निर्यातों से जुड़ी तमाम चिंताओं और अक्षमताओं के बीच नीतिगत मोर्चे पर अबतक के सबसे नए उपकरण “उत्पादकता आधारित प्रोत्साहन” योजनाओं (PLI) की पड़ताल ज़रूरी हो जाती है. भारत सरकार ने मार्च 2020 में विनिर्माण को प्रोत्साहित करने और रोज़गार निर्माण के दोहरे मक़सद से ये योजना सामने रखी थी.

  • निम्न कौशल वाले विनिर्माण क्षेत्र में PLIs स्कीम के दायरों में सिर्फ़ एक सेक्टर आता है- कपड़ा और वस्त्र. कृत्रिम फ़ाइबर से बने कपड़ों के 40 उत्पाद, कृत्रिम फ़ाइबर फ़ैब्रिक्स के 14 उत्पाद और 10 टेक्निकल टेक्सटाइल खंडों/उत्पादों का PLIs के दायरे में आना तय हुआ है.  
  • दरअसल प्रतिरोधी ताक़तों में सुधार लाने के मक़सद से इस क़वायद को अंजाम दिया गया है. वैश्विक मांग कपास आधारित निर्यातों से हटकर पूरी मज़बूती से कृत्रिम फ़ाइबर की ओर बढ़ रही है. भारत का टेक्सटाइल क्षेत्र कृत्रिम फ़ाइबर वस्त्रों की बजाए कपास आधारित उद्योगों के इर्द-गिर्द बढ़ता रहा गया है. 
  • हालांकि ऐसा लगता है कि ये योजना ऐसे रुझानों के आधारभूत कारणों का निपटारा नहीं करती. कृत्रिम फ़ाइबर (कृत्रिम फ़ाइबर से बने कपड़ों का प्रमुख कच्चा माल) मोटे तौर पर आयात किए जाते हैं और इनपर कॉटन फ़ाइबर्स के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा आयात शुल्क लगता है. घरेलू उत्पादन करों की क़वायद भी कपास आधारित उत्पादों का ही पक्ष लेती दिखाई देती हैं. कपास आधारित उत्पादों पर जहां 5 फ़ीसदी टैक्स लगता है वहीं कृत्रिम फ़ाइबर पर आधारित उत्पादों पर 12 फ़ीसदी कर वसूला जा रहा है.
  • लिहाज़ा कृत्रिम फ़ाइबर्स के संदर्भ में कर और शुल्क नीति की समीक्षा किए जाने की दरकार है. ऐसी क़वायद ही इसे भारतीय कपड़ा उद्योगों के लिए स्वाभाविक रूप से आकर्षक बनाएगी. बाहर से प्रोत्साहनों के ज़रिए बनावटी तौर पर रकम मुहैया कराने की बजाए ये तरीक़ा कहीं ज़्यादा कारगर होगा.
  • पहले चरण में निवेश ख़र्च पर न्यूनतम सीमा 300 करोड़ रु तय की गई है. जबकि दूसरे चरण में ये सीमा 100 करोड़ रु है. दरअसल अबतक इकाइयों को अपना आकार छोटा रखने में ही अपना भला नज़र आता था. ताज़ा क़वायद का मक़सद इसी रुझान को पलटना है. इस नई प्रक्रिया से इकाइयों के लिए आकार से जुड़ा आर्थिक लाभ (economies of scale) हासिल करने के लिए ख़ुद का विस्तार करना एक आकर्षक क़वायद बन जाएगी.
  • MSME सेक्टर की नीची उत्पादकता इस क्षेत्र के विकास के लिए नुक़सानदेह है. PLI स्कीम में इससे जुड़ी बुनियादी समझ जायज़ है. हालांकि इस समस्या के निपटारे के लिए निवेश की सीमा तय करने का तरीक़ा मुनासिब नहीं है. इकाइयों को अपना आकार बढ़ाने से हतोत्साहित करने वाले कई बुनियादी कारण सामने हैं. इनमें श्रम क़ानूनों के रूप में मौजूद तमाम रुकावटें और MSME से जुड़े नियमन शामिल हैं. निवेश की हद तय करने की क़वायद टुकड़ों में बंटे उद्योग की ज्वलंत समस्याओं के अस्थायी निपटारे की कोशिश जैसी है. दरअसल इस उद्योग को सुधारों का कड़वा घूंट पीते हुए हतोत्साहित करने वाले तमाम कारकों को दूर करना होगा. साफ़ है कि किसी इकाई द्वारा विस्तार के फ़ैसले बाज़ार से जुड़ी ताक़तों और मुनाफ़े की संभावनाओं के आधार पर लिए जाएंगे. इस तरह सरकार द्वारा आयद की गई विकृतियों और बेड़ियों से आज़ादी मिल सकेगी. 
  • बहरहाल, मौजूदा सियासी माहौल के मद्देनज़र ज़रूरी क्रांतिकारी सुधार लागू करना दूर की कौड़ी मालूम होती है. ऐसी योजनाओं से फ़ायदा उठा रहे चंद लोगों ने ताक़तवर जमावड़ों (जैसे ट्रेड यूनियन) के ज़रिए खुद को संगठित कर लिया है. दूसरी ओर घाटा झेल रहा बहुसंख्यक समुदाय बिखरा हुआ है. उसके पास नीतिगत ढांचे पर चोट करने के लिए ज़रूरी संसाधनों का अभाव है.
  • लिहाज़ा उद्योग टुकड़ों में ही बंटा रहेगा, जिसमें उत्पादन के तमाम चरणों को अलग-अलग किरदार अंजाम देते हैं. इससे MSMEs का ही दबदबा बना रहेगा. ऐसे में यथास्थिति को देखते हुए निवेश की सीमा को घटाना ही समझदारी भरा सबब साबित होगा. इससे मौजूदा वक़्त में टुकड़ों में बंटी इकाइयों तक इस स्कीम का फ़ायदा पहुंच सकेगा. 
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