Author : Manoj Joshi

Published on Oct 08, 2022 Updated 0 Hours ago

चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की ताज़ा नीतियों ने इस देश को यूरोप के निवेशकों के लिए कम आकर्षक बना दिया है और चीन के द्वारा आगे की रणनीति में भी बदलाव करने का कोई इरादा नहीं है.

सामरिक दुनिया: यूरोप ने चीन से बढ़ाई दूरी!

21 सितंबर को चीन में यूरोपियन यूनियन (EU) के चैंबर ऑफ कॉमर्स की तरफ़ से जारी एक रिपोर्ट में भविष्य के लिए एक ख़राब स्थिति की आशंका जताई गई है. इस रिपोर्ट में ये कहा गया है कि यूरोप की कई कंपनियां अब चीन में पहले से निर्धारित और भविष्य में किये जाने वाले निवेश को ऐसे किसी दूसरे बाज़ार की तरफ़ ले जाना चाहती हैं जो “ज़्यादा विश्वसनीयता और अंदाज़ लगाने की क्षमता” मुहैया कराते हैं. 

ये महत्वपूर्ण घटनाक्रम है क्योंकि 2011 से चीन EU के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक के रूप में उभरा है और वास्तव में चीन EU के लिए आयात का सबसे बड़ा स्रोत है.

रिपोर्ट में इस बात की तरफ़ ध्यान दिया गया है कि पहले चीन का सुधारवादी एजेंडा स्थायित्व और विकास मुहैया कराता था, वहीं अब हाल के दिनों में विचारधारा अर्थव्यवस्था पर हावी हो गई है. 2020 में चीन को एक सुरक्षित ठिकाने के रूप में देखा गया था जब वो कोविड-19 की वजह से आई रुकावट से निपटने में सफल रहा था. लेकिन पिछले एक साल के दौरान उसकी ज़ीरो-कोविड नीति ने कारोबारी काम-काज में रुकावट पैदा की है. रिपोर्ट में EU चैंबर ऑफ कॉमर्स के चीन में अध्यक्ष जोर्ग वुटके का हवाला ये कहते हुए दिया गया है कि कंपनियां कारोबार के लिए उत्सुक हैं लेकिन वो चीन की नीतियों की वजह से “राजनीतिक, आर्थिक और प्रतिष्ठा से जुड़े जोख़िम में बढ़ोतरी” का अनुभव कर रही हैं. 

ये महत्वपूर्ण घटनाक्रम है क्योंकि 2011 से चीन EU के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक के रूप में उभरा है और वास्तव में चीन EU के लिए आयात का सबसे बड़ा स्रोत है. दोनों के बीच निवेश से जुड़ा संबंध भी बहुत अधिक है. लेकिन EU की रिपोर्ट निवेश की नीतियों को लेकर तनाव, शिनजियांग में मानवाधिकार, कोविड-19 महामारी और हाल के दिनों में यूक्रेन युद्ध समेत कई घटनाक्रमों को लेकर EU और चीन के बीच कड़वाहट ज़ाहिर करती है. 

इस रिपोर्ट पर टिप्पणी व्यक्त करते हुए फाइनेंशियल टाइम्स ने कहा कि यूरोप के व्यवसायों को चीन में “कमज़ोर बनाने, सीमित रखने और अलग-थलग करने” के लिए मजबूर कर दिया गया है. आश्चर्य की बात नहीं है कि ग्लोबल टाइम्स ने इस रिपोर्ट की तीखी आलोचना की. ग्लोबल टाइम्स ने कहा कि रिपोर्ट में EU की कंपनियों की नज़रों में चीन के द्वारा व्यावसायिक आकर्षण खोने का आरोप ग़लत है और ये “पूरी तरह चीन के बाज़ार के ख़िलाफ़ एक पक्षीय विवेचना और ग़लत ढंग से प्रस्तुतिकरण है.” 

यूरोप के देशों या फिर भारत जैसे कथित तटस्थ देशों को क्षेत्रीय संतुलन बरकरार रखने के लिए अमेरिका पर निर्भरता को लेकर जहां कुछ संकोच है, वहीं जब तक वो अपने हितों को रूस और चीन के अधीन नहीं करना चाहेंगे तब तक उनके पास वास्तव में कोई विकल्प भी नहीं है.

यूक्रेन युद्ध के बड़े राजनीतिक परिणामों में से एक है पश्चिमी गठबंधन और अमेरिका के नेतृत्व का पुनरुद्धार और मज़बूती. यूरोप के देशों या फिर भारत जैसे कथित तटस्थ देशों को क्षेत्रीय संतुलन बरकरार रखने के लिए अमेरिका पर निर्भरता को लेकर जहां कुछ संकोच है, वहीं जब तक वो अपने हितों को रूस और चीन के अधीन नहीं करना चाहेंगे तब तक उनके पास वास्तव में कोई विकल्प भी नहीं है. अंतत: यूरोप के देश अपनी रक्षा को गंभीरता से ले रहे हैं. जर्मनी के द्वारा आने वाले वर्षों में अपने रक्षा खर्च में बहुत ज़्यादा बढ़ोतरी के फ़ैसले से इसका प्रमाण मिलता है. यूक्रेन युद्ध का एक और परिणाम चीन और यूरोप के अलग-अलग होने के रुझान में आई तेज़ी है. 

संयुक्त राष्ट्र के एक सदस्य देश की संप्रभुता के खुलेआम उल्लंघन के बावजूद रूस के साथ खड़े होने के चीन के फ़ैसले का मध्य और पूर्वी यूरोपीय क्षेत्र पर काफ़ी नकारात्मक असर पड़ा है. मध्य और पूर्वी यूरोपीय क्षेत्र के साथ चीन ने अपने संबंधों को 17+1 (मध्य और पूर्वी यूरोपीय क्षेत्र के देश और चीन) समूह के ज़रिए काफ़ी मेहनत से आगे बढ़ाया था. 

रूस ने जुआ खेला और यूरोप में आख़िरी बाज़ी हार गया. यूक्रेन में रूस का अचानक हमला नाकाम हो गया और इस हमले ने वास्तव में यूक्रेन के राष्ट्रवाद में बहुत बड़ा योगदान दिया है. इस युद्ध ने न सिर्फ़ नेटो का पुनरुद्धार किया है बल्कि वास्तव में दो प्रमुख देशों- फिनलैंड और स्वीडन- को इस सैन्य गठबंधन में जोड़कर इसकी ताक़त बढ़ाई है. 

चीन के लिए विकल्प

वैसे तो चीन के पास ये विकल्प था कि वो एक अलग रुख़ अपनाए लेकिन लगता है कि उसने ग़लत आकलन किया. उसे उम्मीद थी कि जल्दबाज़ी में रूस की जीत इस “असीमित” साझेदारी को मज़बूत करेगी लेकिन इसके बदले वो एक ऐसे पड़ोसी के साथ फंसा हुआ है जिसका अस्थिर बर्ताव वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए एक बड़ा ख़तरा है जबकि इस वैश्विक शांति और स्थिरता में चीन एक बड़ा भागीदार और फ़ायदा उठाने वाला देश है. 

व्यापार के मामले में यूरोप की चीन पर निर्भरता के मुक़ाबले चीन यूरोप पर ज़्यादा निर्भर है. जोर्ग वुटके ने इस बात की तरफ़ ध्यान दिलाया कि, “यूरोप हर रोज़ चीन को 600 मिलियन यूरो की क़ीमत का सामान निर्यात करता है जबकि चीन 1.3 अरब यूरो की क़ीमत का सामान यूरोप को निर्यात करता है”.

व्यापार के मामले में यूरोप की चीन पर निर्भरता के मुक़ाबले चीन यूरोप पर ज़्यादा निर्भर है. जोर्ग वुटके ने इस बात की तरफ़ ध्यान दिलाया कि, “यूरोप हर रोज़ चीन को 600 मिलियन यूरो की क़ीमत का सामान निर्यात करता है जबकि चीन 1.3 अरब यूरो की क़ीमत का सामान यूरोप को निर्यात करता है”. दोनों के लिए दांव पर बहुत कुछ लगा हुआ है और न सिर्फ़ उनकी कंपनियों बल्कि उनके नागरिकों की भलाई भी बराबरी पर आधारित स्थिर संबंधों पर निर्भर है. शुरुआत में यूरोप की कंपनियों को चीन में अपना काम-काज बेहद लाभदायक लगा था लेकिन अब वो बदले हालात का सामना कर रही हैं. 

चीन और यूरोप में दूरी

चीन अब पश्चिमी देशों के साथ बेहद फ़ायदेमंद रिश्तों में धीरे-धीरे आ रही कमज़ोरी का सामना कर रहा है. कई मायनों में ये पिछले कुछ समय से चल रहा था. 2016 में इसकी शुरुआत हुई थी जब चीन को लेकर यूरोप का नज़रिया बदलने लगा. नज़रिया बदलने की शुरुआत चीन की तकनीकी अधिग्रहण नीति को लेकर चिंता से हुई जब जर्मनी की एक प्रमुख कंपनी कुका का अधिग्रहण चीन ने किया था. 

2018 में चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध ने यूरोप पर इस बात के लिए दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया कि वो चीन की तकनीक को नामंज़ूर करे. हुआवे के द्वारा मुहैया कराए गए 5G नेटवर्क के मामले में ये दिखा. उसके बाद कोविड-19 महामारी ने सप्लाई चेन के सामरिक परिणाम के महत्व को लेकर पुनर्मूल्यांकन तेज़ कर दिया. अमेरिका के द्वारा अपनी नीति को बदलने, जिसके तहत चीन के साथ भागीदारी की जगह उसे सामरिक प्रतिस्पर्धी माना गया, का असर 2019 में यूरोप के दृष्टिकोण दस्तावेज़ में भी दिखा. इस दस्तावेज़ में चीन को सहयोगी साझेदार, बातचीत के साझेदार, आर्थिक प्रतिद्वंदी और “व्यवस्थात्मक प्रतिद्वंदी” के रूप में बताया गया.

मई 2021 में EU ने एक औद्योगिक रणनीति जारी की ताकि छह सामरिक क्षेत्रों जैसे कि कच्चे माल, दवाई की सामग्रियों और सेमीकंडक्टर में चीन पर निर्भरता को कम किया जा सके. ये रणनीति कोविड के बाद अपने सप्लाई चेन और कच्चे माल के स्रोत की समीक्षा के लिए व्यापक कार्रवाई का एक हिस्सा थी. इसके बावजूद EU और चीन ने दिसंबर 2020 में निवेश को लेकर एक बेहद व्यापक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके ज़रिए अमेरिका में नवनिर्वाचित बाइडेन प्रशासन की चिंताओं को दूर किया गया. हालांकि 2021 की शुरुआत होते ही परिस्थितियां प्रतिकूल होती गईं और निवेश को लेकर व्यापक समझौते को EU की मंज़ूरी की उम्मीदें अब कम हैं. 

दिक्कतों की शुरुआत

समस्या की शुरुआत उस वक़्त हुई जब 2020 में एक न्यूज़ रिपोर्ट में कहा गया कि स्वीडन की रिटेल कंपनी H&M ने शिनजियांग क्षेत्र से सूती कपड़े का इस्तेमाल नहीं करने का फ़ैसला किया है. H&M के इस फ़ैसले पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी जिसकी वजह से चीन के ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर H&M क़रीब-क़रीब ख़त्म हो गई. इस बात की ज़्यादा संभावना है कि ये क़दम EU के द्वारा मार्च 2022 में अपनी नई वैश्विक मानवाधिकार आर्थिक प्रतिबंध व्यवस्था के तहत जारी की गई आर्थिक पाबंदी का एक नतीजा था. जिन पर आर्थिक पाबंदी लगाई गई उनमें चीन के चार अधिकारी शामिल थे जिन्होंने शिनजियांग में बड़े पैमाने पर वीगरों को हिरासत में लिया था. चीन ने भी जवाब देते हुए EU के कई अधिकारियों पर आर्थिक पाबंदी लगाई जिनमें EU संसद के सदस्य भी शामिल हैं. 

इस समय तक यूरोप के भीतर चीन को लेकर एक स्पष्ट विभाजन दिखने लगा था. फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने ख़ुद के लिए सामरिक स्वायत्तता का रुख़ अपनाने की कोशिश की. दूसरी तरफ़ चीन ने कूटनीतिक तरीक़े से EU के भीतर महत्वपूर्ण ढंग से सेंध लगा ली थी. चीन ने मध्य एवं पूर्वी यूरोप के देशों के समूह, जिसे 17+1 समूह के नाम से भी जाना जाता है जिसमें मध्य एवं पूर्वी यूरोप के 17 देश और चीन शामिल हैं, के ज़रिए यूरोप में ये घुसपैठ की. हालांकि अब हालात बदल गए हैं.  यूक्रेन युद्ध की वजह से यूरोप के ज़्यादातर देशों, संभवत: हंगरी और बुल्गारिया को छोड़कर, ने रूस के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाया है. ताइवान से जुड़े मुद्दों और युद्ध को लेकर चीन के रवैये एवं 17+1 समूह से मोहभंग ने भी चीन के साथ मनमुटाव को बढ़ाया है. 2021 और 2022 के बीच बाल्टिक के तीन देशों ने वास्तव में 17+1 समूह को छोड़ दिया है और चेक गणराज्य की संसद ने भी इससे बाहर निकलने को कहा है. 

यूरोप को लेकर चीन के आकलन पर पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम का भी असर पड़ा है. फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम (UK) और जर्मनी जैसे देशों ने इंडो-पैसिफिक पर ज़्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया है. EU ने भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक भूमिका निभाने में संस्थागत हित होने के संकेत दिए हैं जो कि वास्तव में सौम्य ढंग से चीन पर नियंत्रण का एक तरीक़ा है. जहां तक बात UK की है तो उसने इस क्षेत्र में ऑकस के नाम से एक नया सैन्य गठबंधन बनाने के लिए ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ हाथ मिलाया है. ताइवान को लेकर ताज़ा तनाव ने चीन के ख़िलाफ़ मनोदशा को और मज़बूत ही किया है.  

चीन की कोविड नीति ने अलग-अलग शहरों में लोगों के जीवन और आर्थिक गतिविधियों में रुकावट पैदा करने के अलावा कंपनियों में काम करने के लिए विदेशों की प्रतिभा को आकर्षित करना मुश्किल बना दिया है. वर्तमान में स्पष्ट रूप से धीमी अर्थव्यवस्था के बावजूद इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि चीन आगे अपने रवैये में किसी बदलाव पर विचार कर रहा है.

सितंबर में EU संसद के सदस्यों ने ताइवान को लेकर चीन की उकसावे वाली कार्रवाई की निंदा करते हुए ज़बरदस्त ढंग से एक प्रस्ताव पारित किया है और कहा है कि इसका परिणाम यूरोपीय संघ के साथ संबंधों पर पड़ेगा. प्रस्ताव में “स्वतंत्रता, लोकतंत्र, मानवाधिकार और क़ानून के शासन” जैसे मूल्यों का पालन करने वाले “समान विचार वाले साझेदारों” को शाबाशी दी गई है. 

इस बात को लेकर कोई शक नहीं होना चाहिए कि यूरोप की सोच में बदलाव के पीछे एक बड़ा कारण चीन में व्यापार और आर्थिक नीतियों में परिवर्तन है. तकनीकी सेक्टर के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई, ज़ीरो-कोविड नीति को लागू करना और निजी क्षेत्र की कंपनियों में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बढ़ती भूमिका जैसे नीतिगत फ़ैसलों ने चीन को यूरोप के निवेशकों के लिए कम आकर्षक बना दिया है. चीन की कोविड नीति ने अलग-अलग शहरों में लोगों के जीवन और आर्थिक गतिविधियों में रुकावट पैदा करने के अलावा कंपनियों में काम करने के लिए विदेशों की प्रतिभा को आकर्षित करना मुश्किल बना दिया है. 

वर्तमान में स्पष्ट रूप से धीमी अर्थव्यवस्था के बावजूद इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि चीन आगे अपने रवैये में किसी बदलाव पर विचार कर रहा है. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के आगामी सम्मेलन के बाद क्या होता है ये तो सिर्फ़ भविष्य ही बताएगा. 

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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...

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