भारतीय कंपनियों को जीडीपीआर के बारे में जानकारी देने और उनका पालन करने को प्रेरित करने में सरकार को मदद करनी चाहिए.
यूरोपियन यूनियन के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए भारत उसके साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत कर रहा है. लेकिन यूरोप के डेटा प्रोटेक्शन कानून, खासकर जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) इसकी राह में रुकावट पैदा कर सकता है. जीडीपीआर की वजह से कारोबार की लागत बहुत बढ़ जाती है. ऐसे में मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जीडीपीआर के मुद्दे को कैसे सुलझाया जाता है.
जीडीपीआर के नियमों का पालन नहीं करने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है. ये रकम कंपनी के सालाना राजस्व के 4 प्रतिशत या फिर 20 मिलियन यूरो तक हो सकती है. यूरोपियन यूनियन की नियामक संस्थाएं इस कानून को सख्ती से लागू करती हैं. यही वजह है कि 2021 में इसके उल्लंघन के 434 मामलों में जुर्माने से 1.27 बिलियन यूरो की राशि वसूली गई. यानी कानून के उल्लंघन के हर मामले में औसतन 2.94 मिलियन यूरो का जुर्माना लगाया गया. ऐसे में भले ही यूरोपियन यूनियन के साथ बहुत कम व्यापार होता हो, फिर भी इन कानूनों का उल्लंघन करना व्यावहारिक विकल्प नहीं है. जो कंपनियों यूरोपियन यूनियन में अपने लिए बाज़ार तलाश रही हैं उन्हें भी इन नियमों का पालन करना चाहिए क्योंकि पर्सनल डेटा को लेकर यूरोपियन लोग बहुत संवेदनशील होते हैं. अगर कोई कंपनी डेटा प्राइवेसी का सम्मान नहीं करती तो यूरोप के लोगों में उसकी नकारात्मक छवि बनेगी. ये कंपनी की साख और भविष्य में उसकी कारोबारी संभावनाओं के लिए ठीक नहीं होगा.
भले ही यूरोपियन यूनियन के साथ बहुत कम व्यापार होता हो, फिर भी इन कानूनों का उल्लंघन करना व्यावहारिक विकल्प नहीं है. जो कंपनियों यूरोपियन यूनियन में अपने लिए बाज़ार तलाश रही हैं उन्हें भी इन नियमों का पालन करना चाहिए
2023 में भारतीय संसद में ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट’ को पास करवाया गया लेकिन इसके नियम और कानून अभी तक अधिसूचित नहीं किए गए हैं. यही वजह है कि ज्यादातर भारतीय कंपनियां प्राइवेसी कानूनों के सख्त प्रावधानों से अंजान हैं. यूरोपियन यूनियन के कानूनों की तो उन्हें जानकारी नहीं है. यही वजह है कि जीडीपीआर ने व्यापारियों और निर्यातकों पर नियम-कानूनों का अतिरिक्त बोझ डाल दिया है. इससे उनका कारोबार प्रभावित हो रहा है. यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेन्टेटिव (USTR) ने 2019 में जारी अपनी ट्रेड बैरियर रिपोर्ट में कहा था कि जीडीपीआर कानून और इसे लागू करने के तरीके ने यूरोपीय यूनियन से बाहर के देशों के लिए यूरोप के साथ व्यापार करने की राह में बहुत बड़ी बाधाएं पैदा कर दी हैं.
जीडीपीआर की वजह से कंपनियों पर कई तरह के आर्थिक प्रभाव पड़ते हैं. इन्हें समझने के बाद ही हमें ये पता लगेगा कि इन कानूनों का पालन करने से भारतीय निर्यातकों की कारोबारी संभावनाओं पर क्या असर पड़ेगा.
इन नियमों का पालन करने के लिए व्यापारियों को एक निश्चित रकम आवंटित करनी होगी. ऐसे में कई ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से लागत में बढ़ोतरी होगी
1- यूरोपियन यूनियन में व्यापार करने के लिए कारोबार के तरीके को बदलना : डेटा प्रोटेक्शन नियमों के पालन के लिए ज्यादा संसाधनों की ज़रूरत होगी. काम का तरीका बदलना होगा. ऑडिट का नया सिस्टम अपनाना होगा.
2- जीडीपीआर का पालन करने वाली तकनीक अपनानी होगी : कंपनियों को जीडीपीआर का पालन करने वाली तकनीक बनाने पर पैसा खर्च करना होगा या फिर ऐसी तकनीक खरीदनी होगी.
3- कर्मचारियों पर बढ़ेगी लागत : जीडीपीआर नियमों के मुताबिक डेटा प्रोटेक्शन अफसर की नियुक्ति अनिवार्य है. कंपनियां कानूनी सलाह देने वाली फर्म की मदद भी ले सकती हैं. इससे कंपनियों की लागत काफी बढ़ जाती है. कुछ कंपनियां तो जीडीपीआर नियमों का पालन करने के लिए सालाना 10 मिलियन यूरो से ज्यादा रकम खर्च करती हैं. यूरोपियन यूनियन में व्यापार करने की इच्छा रखने वाली भारतीय कंपनियों को भी निर्यात शुरू होने से पहले ही भारी रकम खर्च करनी पड़ सकती है.
जीडीपीआर की वजह से कंपनियों के लिए पर्सनल डेटा इकट्ठा करना और उससे अपने काम के आंकड़े निकालना मुश्किल हो जाएगा. पैसे और दूसरे संसाधन भी ज्यादा खर्च करने होंगे. इससे कंपनियों की उत्पादकता कम होगी.
जीडीपीआर से सामान की लागत बढ़ने से बिक्री में कमी आ जाती है. ये पाया गया है कि इसकी वजह से बिक्री में 2.2 प्रतिशत जबकि मुनाफे में 4 फीसदी की कमी आती है. मुनाफे में कमी आएगी तो भारतीय निर्यातक यूरोपियन यूनियन के बाज़ार में जाने को लेकर हतोत्साहित होंगे.
यूरोपियन यूनियन में भारतीय कारोबारियों का सामान कम बिकता है, जबकि जीडीपीआर का पालन करने की लागत बहुत महंगी पड़ती है. इसकी तुलना अगर उन कंपनियों से करें जिनकी बिक्री में यूरोपियन यूनियन की हिस्सेदारी ज्यादा है तो ये सामने आता है कि इस नियम की वजह से उन देशों की कंपनियों को प्रतियोगिता के स्तर पर बढ़त मिलती है, जो ईयू से जुड़े हुए हैं. इस मामले में स्विट्जरलैंड का उदाहरण लिया जा सकता है.
जीडीपीआर की वजह से बड़ी कंपनियों कम प्रभावित होती है जबकि छोटी कंपनियां जिसमें 500 या उससे कम कर्मचारी होते हैं, उन पर इसका ज्यादा असर दिखता है. तकनीक के क्षेत्र में छोटी कंपनियों का नुकसान होता है. बड़ी कंपनियों की बाज़ार हिस्सेदारी बढ़ती है. भारतीय कंपनियां आम तौर पर यूरोपियन कंपनियों से छोटी होती हैं, इसलिए उनका ज्यादा नुकसान होता है. भारत की 92 फीसदी कंपनियां ऐसी हैं जिनमें कर्मचारियों की संख्या 100 या उससे कम है. इसलिए इन्हें ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
अगस्त 2020 में अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के बीच जीडीपीआर के मुद्दे पर बात हुई. फिर दोनों में समझौता हुआ. अमेरिका-ईयू डेटा प्राइवेसी फ्रेमवर्क बनाया गया. साल 2023 में यूरोपियन कमीशन ने ये फैसला दिया कि अमेरिका का डेटा प्राइवेसी कानून भी जीडीपीआर की ही तरह हैं. इसके बाद जीडीपीआर की वजह से अमेरिकी कंपनियों की राह में जो रुकावटें आ रही थी, वो खत्म हो गईं.
कुछ कंपनियां तो जीडीपीआर नियमों का पालन करने के लिए सालाना 10 मिलियन यूरो से ज्यादा रकम खर्च करती हैं. यूरोपियन यूनियन में व्यापार करने की इच्छा रखने वाली भारतीय कंपनियों को भी निर्यात शुरू होने से पहले ही भारी रकम खर्च करनी पड़ सकती है.
यूरोपियन यूनियन के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बात कर रहे भारतीय वार्ताकारों को भी इस मुद्दे को बातचीत में शामिल करना चाहिए. जीडीपीआर को लेकर यूरोपियन यूनियन की जो भी चिंताएं हैं, उन्हें डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट में शामिल करना चाहिए.
जीडीपीआर का पालन करने से लागत में जो बढ़ोतरी होती हैं, उनमें से कई ऐसी हैं जिनका अंदाज़ा पहले ही लगाया जा सकता है. सरकार इस लागत को कम करने में मदद कर सकती है. तकनीकी क्षेत्र की भारतीय कंपनियों को ऐसे टूल्स विकसित करने चाहिए जो जीडीपीआर का पालन करते हों. सरकार को इसके लिए सब्सिडी देनी चाहिए. जीडीपीआर का पालन करने वाले टूल्स को विकसित करने का एक फायदा ये भी होगा कि इन्हें एक विशाल बाज़ार मिलेगा. मध्यम और लघु उद्योग में लगी भारतीय कंपनियों और पहली बार निर्यात कर रहे व्यापारियों को भी सब्सिडी दी जानी चाहिए जिससे वो अपने उत्पादों की जीडीपीआर के हिसाब से बनाएं. टैक्स में छूट और भुगतान सुविधा देने वाली भारतीय मशीनों के साथ-साथ अगर इन कंपनियों को जीडीपीआर का पालन करने की सुविधा भी फ्री में दे दी जाए तो इसके दूरगामी नतीजे बहुत बेहतर आएंगे.
अलग-अलग भारतीय भाषाओं में ऐसे टूल्स बनाने चाहिए जिनकी मदद से ये कंपनियां खुद ही अपने उत्पादों को ईयू के स्टैंडर्ड के मुताबिक प्रमाणित कर सकें.
इसके साथ ही उन व्यापारियों को जीडीपीआर के बारे में जानकारी देनी चाहिए जो यूरोपियन यूनियन के साथ कारोबार करना चाहते थे. इस काम में उद्योग संगठनों की मदद ली जा सकती है. इससे ये कंपनियां खुद ही जीडीपीआर का पालन करने को प्रेरित होंगी. अलग-अलग भारतीय भाषाओं में ऐसे टूल्स बनाने चाहिए जिनकी मदद से ये कंपनियां खुद ही अपने उत्पादों को ईयू के स्टैंडर्ड के मुताबिक प्रमाणित कर सकें. जिस क्षेत्र की कंपनियों की यूरोपियन यूनियन के साथ व्यापार की सबसे ज्यादा संभावना है, उन्हें जीडीपीआर का पालन किए जाने वाले कार्यक्रमों से जोड़ना चाहिए. इससे इन कंपनियों की राह में आने वाली बाधाएं कम होंगी.
जीडीपीआर ने भारत के सामने एक अवसर भी पैदा किया है. भारत इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकता है. जीडीपीआर का पालन करवाने के लिए भारतीय कंपनियों में यूरोपियन विशेषज्ञों को शामिल करना महंगा पड़ता है. ऐसे में उन स्थानीय प्रतिभाओं को बढ़ावा देना चाहिए जो जीडीपीआर की चुनौती से निपटने में सक्षम हैं. इसके लिए मैनेजमेंट, लॉ और तकनीकी से जुड़े कॉलेजों के कोर्स में जीडीपीआर से जुड़े सब्जेक्ट को शामिल किया जाना चाहिए. तकनीकी क्षेत्र की ज्यादातर भारतीय कंपनियों के ऑफिस बेंगलुरु, दिल्ली और पुणे जैसे शहरों में हैं. इन कंपनियों को अकादमिक संस्थानों के साथ मिलकर ऐसी सलाहकार फर्म खोलनी चाहिए जो जीडीपीआर के क्षेत्र में काम करके यूरोपीय ग्राहकों के हिसाब से रणनीति तैयार करें. इसका एक फायदा ये भी होगा कि भारत मानव संसाधन का भी निर्यात कर पाएगा. यूरोपीयन यूनियन में डेटा प्रोटेक्शन अफसरों की मांग बढ़ रही है. ऐसे में जीडीआरपी के क्षेत्र में प्रशिक्षित भारतीय युवाओं को यूरोप में काम मिल सकेगा.
जीडीपीआर नियमों का पालन करना भारतीय कारोबारियों के लिए बड़ी चुनौती है. इससे लागत बढ़ती है और उत्पाद महंगे होते हैं. जीडीपीआर के नियमों में चूक होने पर लगने वाला भारी जुर्माना भारतीय कंपनियों को यूरोपीय बाज़ार में प्रवेश करने से हतोत्साहित करता है. ऐसे में अगर जीडीपीआर का पालन करवाने में सरकार इन कंपनियों की मदद करे तो भारतीय निर्यात में काफी बढ़ोतरी होगी.
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Omkar Sathe is a partner at CPC Analytics a data-driven consulting firm with offices in Pune and Berlin.
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Non-resident fellow at ORF. Sahil Deo is also the co-founder of CPC Analytics, a policy consultancy firm in Pune and Berlin. His key areas of interest ...
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