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भारत अपनी भू-रणनीतिक स्थिति के साथ-साथ मौजूदा उत्पादन क्षमता का फ़ायदा उठा सकता है.
कुछ समय पहले दुनिया में वैक्सीन के बंटवारे में पूरी तरह असमानता ने, जहां कोविड वैक्सीन की डोज़ की सीमित सप्लाई को अमीर देशों ने पूरी तरह अपने कब्ज़े में कर लिया वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के प्रमुख को ये चेतावनी देने के लिए मजबूर कर दिया कि दुनिया “विनाशकारी नैतिक नाकामी” के कगार पर है. कोविड-19 वैक्सीन की कमी अब पूरी दुनिया में रोज़ाना लोगों की मौत के रूप में सामने आ रही है. अपेक्षाकृत ग़रीब देशों में तो मौतें काबू से बाहर हो गई हैं. वहीं वैक्सीनेशन की वजह से अमीर देशों में मौतों के मामलों में काफ़ी कमी आई है (ग्राफ 1). उच्च मध्य आय वाले देशों में भी रोज़ाना मौत के मामले स्थिर होने के बाद कम होने लगे हैं. हालांकि इसमें थोड़ा समय लगा लेकिन ये वैश्विक टीका वितरण के आंकड़ों के मुताबिक़ है. दुनिया भर में ये एहसास होने लगा है कि बड़े पैमाने पर वैक्सीन की सप्लाई और इसकी भौतिक और वित्तीय पहुंच बढ़ाए बिना इस महामारी के चंगुल से बाहर नहीं निकला जा सकता है. लेकिन बड़ी दवां कंपनियां दूसरी तरफ़ देख रही हैं, विशाल मुनाफ़े की गुंजाइश ने उन्हें अंधा कर दिया है.
दुनिया भर में ये एहसास होने लगा है कि बड़े पैमाने पर वैक्सीन की सप्लाई और इसकी भौतिक और वित्तीय पहुंच बढ़ाए बिना इस महामारी के चंगुल से बाहर नहीं निकला जा सकता है. लेकिन बड़ी दवां कंपनियां दूसरी तरफ़ देख रही हैं, विशाल मुनाफ़े की गुंजाइश ने उन्हें अंधा कर दिया है.
2020 की आख़िरी तिमाही से ये तेज़ी से साफ़ हो रहा था कि इस महामारी से लड़ाई में दुनिया की क्षमता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि कैसे दवा कंपनियां और सरकारें नाटकीय ढंग से पूरे विश्व में वैक्सीन उत्पादन की क्षमता में बढ़ोतरी करती हैं. हाल के दिनों में वैक्सीन पर पेटेंट के दावे को छोड़ने के साझा प्रस्ताव- अक्टूबर 2020 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सामने दक्षिण अफ्रीका और भारत के द्वारा पेश- का अमेरिका के द्वारा आंशिक समर्थन का एलान कई विशेषज्ञों को हैरान कर गया. विशेषज्ञों ने अमेरिका के इस क़दम को ‘अद्भुत’ से लेकर ‘सांकेतिक’ तक सब कुछ कह डाला. मूल प्रस्ताव में पेटेंट, औद्योगिक डिज़ाइन, कॉपीराइट और वैक्सीन, दवा और डायग्नोस्टिक्स में व्यापार की गोपनीयता के संरक्षण को शामिल किया गया था लेकिन अमेरिका के द्वारा मौजूदा समर्थन वैक्सीन को लेकर बौद्धिक संपदा अधिकार के दावे को छोड़ना है. कोविड-19 को लेकर कूटनीति से ज़्यादातर ग़ैर-मौजूद रहने वाले गेट्स फाउंडेशन ने भी अमेरिका के रुख़ में बदलाव के बाद एक तरह की आश्चर्यजनक घोषणा करते हुए कहा कि वो महामारी के दौरान बौद्धिक संपदा संरक्षण पर एक ‘सीमित छूट’ का समर्थन करता है.
पिछले महीने डब्ल्यूएचओ के द्वारा एलान किया गया कि दुनिया भर में लोगों को दी गई 70 करोड़ वैक्सीन में से सिर्फ़ 0.2 प्रतिशत कम आय वाले देशों में दी गई है. ये बात ख़ास तौर पर चिंतित करने वाली है क्योंकि महामारी अब अमीर देशों से ग़रीब देशों की तरफ़ बढ़ रही है. विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर सर्वसम्मति दिखती है कि जब तक दुनिया का हर व्यक्ति सुरक्षित नहीं हो जाता तब तक कोई भी व्यक्ति सुरक्षित नहीं है. इसकी वजह ये है कि संक्रमण नये वैरिएंट को जन्म दे सकता है जो दुनिया को मौत और अनिश्चितता के स्थायी चक्र में धकेल सकता है. बौद्धिक संपदा संरक्षण की छूट के बिना भी दुनिया के देशों के बीच अनिवार्य लाइसेंस मुमकिन है लेकिन वैश्विक छूट मिलने से निर्यात भी आसान हो जाएगा और बिना किसी क़ानूनी डर के उत्पादन बढ़ाने को प्रोत्साहन मिलेगा. उदाहरण के लिए, भारत के शहरों में अभी हम जो मौत का तांडव देख रहे हैं, उसे शायद काफ़ी हद तक टाला जा सकता था अगर अक्टूबर 2020 में डब्ल्यूटीओ के सामने भारत के साझा प्रस्ताव को मंज़ूर कर लिया जाता. ऐसा होने से वैक्सीन का उत्पादन बढ़ जाता.
ऐसा कोई भी क़दम जिससे मुनाफ़े को थोड़ा भी ख़तरा हो, उसको रोकना बड़ी दवा कंपनियों के तरकश में लंबी दूरी का हथियार है. महामारी की शुरुआत से ये कंपनियां उत्पादन प्रक्रिया की जटिलता और विकासशील देशों में क्षमता में कथित कमी का मुद्दा उठा रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में जहां वैक्सीन की डोज़ पाने के लिए जूझ रहे ग़रीब देशों के साथ उत्पादन की क्षमता का विस्तार करने पर बातचीत नहीं हो सकती है, वहां उत्पादन बढ़ोतरी को रोकने के लिए अजीब तरह की गुणवत्ता या क्षमता की चिंताओं का हवाला देना कपट वाला तरीक़ा है. विनाशकारी दूसरी लहर की वजह से विकासशील देशों को वैक्सीन के बड़े सप्लायर के तौर पर भारत की भूमिका में रुकावट के बावजूद ऐसा लगता है कि भारत ज़्यादा शोरगुल के बिना दुनिया में वैक्सीन की समानता की ओर सोचा-समझा क़दम उठा रहा है, कोवैक्स जैसी कोशिशों में मदद कर रहा है.
कोविड-19 की वैक्सीन में कमी का एक रूप ये भी है कि इस बात की बहुत ज़्यादा संभावना है कि दस्तावेज़ों में जीत ज़मीन पर तेज़ी से समाधान में तब्दील नहीं होगी, वो भी उस वक़्त जब दुनिया को इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.
कोविड-19 की वैक्सीन में कमी का एक रूप ये भी है कि इस बात की बहुत ज़्यादा संभावना है कि दस्तावेज़ों में जीत ज़मीन पर तेज़ी से समाधान में तब्दील नहीं होगी, वो भी उस वक़्त जब दुनिया को इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. समय सबसे महत्वपूर्ण है और इसलिए कोविड-19 के ख़िलाफ़ सभी समाधान पर बौद्धिक संपदा संरक्षण के दावे में छूट के ज़रिए सांकेतिक नैतिक जीत के बदले स्वैच्छिक लाइसेंस, तकनीक का ट्रांसफर और विकासशील देशों में उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी और विस्तार पर बनी साझेदारी ज्यादा उचित और समानांतर लक्ष्य होगा. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जैसी कुछ मिसालों को छोड़कर ऐसी साझेदारी अतीत में सामने नहीं आई है.
समय पर वैक्सीन के उत्पादन में तकनीक का ट्रांसफर एक प्रमुख हिस्सा है. इससे विकासशील देशों को कई वर्ष नहीं तो कुछ महीने बचाने में ज़रूर मदद मिलेगी. महामारी के प्रचंड प्रकोप के बीच वास्तविक छूट और अनिवार्य लाइसेंस के बदले छूट और अनिवार्य लाइसेंस की धमकी ज़्यादा असरदार होगी. इस धमकी के इस्तेमाल से अगर तकनीक के ट्रांसफर, स्वैच्छिक लाइसेंस और विकासशील देशों में उत्पादन क्षमता के विस्तार जैसी कड़ी सौदेबाज़ी में कामयाबी मिलती है तो ये सही मायनों में असली बातचीत होगी जिसकी विश्व को ज़रूरत है. अमेरिका और गेट्स फाउंडेशन जैसे बड़े खिलाड़ियों के नाटकीय अंदाज़ में अपनी स्थिति बदलने के साथ यूरोपियन यूनियन (ईयू), ब्रिटेन और जापान जैसे खिलाड़ियों पर भी राजनीतिक और नैतिक दबाव बनेगा कि वो अपना रवैया बदलें.
क्वॉड के इकलौते विकासशील सदस्य देश के रूप में भारत पर्दे के पीछे से जॉनसन एंड जॉनसन और बायोलॉजिकल ई के बीच साझेदारी को आसान बनाने और कोवैक्स जैसी बहुपक्षीय पहल को मज़बूत बनाने के लिए 1 अरब वैक्सीन डोज़ का उत्पादन करने में अमेरिका का समर्थन हासिल करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है.
एक बार जब कोवैक्सीन के तीसरे चरण के बहुप्रतीक्षित ट्रायल का आख़िरी नतीजा प्रकाशित होगा तो ये उम्मीद की जाती है कि “वसुधैव कुटुंबकम” (पूरा विश्व एक परिवार है) की सही भावना में भारत कोवैक्सीन को दुनिया में सही मायनों में पहली वैश्विक “लोगों की वैक्सीन” के रूप में पेश कर सकेगा.
अगर बदले हुए रेगुलेटरी माहौल और भारत और दक्षिण अफ्रीका के नेतृत्व में अलग-अलग देशों द्वारा डाले गए दबाव की वजह से पूरी दुनिया में रणनीतिक स्वैच्छिक लाइसेंस की स्थिति बनती है और इसका नतीजा कोविड-19 टेक्नोलॉजी एक्सेस पूल (सी-टीएपी)- तकनीक के ट्रांसफर को आसान बनाने के लिए डब्ल्यूएचओ की एक पहल जो अभी तक दवा उद्योग में लोकप्रिय नहीं है- की मज़बूती के रूप में सामने आता है तो ये वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक जीत होगी. कई मोर्चों पर दबाव बन रहा है: भारतीय कंपनी नैटको द्वारा एली लिली की प्रति मरीज़ 42,000 रुपये की कोविड-19 दवाई ओलुमियांट (बैरिसिटीनिब) के अनिवार्य लाइसेंस के लिए दस्तावेज़ दायर करना और दुनिया भर में इसी तरह की चर्चा के साथ ये उम्मीद की जाती है कि बड़ी दवा कंपनियों को अपनी साख बरकरार रखने और वैक्सीन और दवा तक पहुंच बढ़ाने के लिए तेज़ी से काम करना होगा.
पेटेंट पर दावे में छूट के प्रस्ताव का समर्थन ऐसे देशों से भी मिल रहा है जिसकी उम्मीद नहीं थी और जिसकी एक वजह भारत की ख़ामोश, पर्दे के पीछे की कूटनीति है. लेकिन डब्ल्यूटीओ के सामने साझा प्रस्ताव रखने के बावजूद लगता है कि भारत को ये एहसास हो गया है कि वैश्विक महामारी को जल्दबाज़ी में सिर्फ़ बौद्धिक संपदा अधिकार के इकोसिस्टम में बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. भारत ने दुनिया के बड़े वैक्सीन उत्पादक के तौर पर अपनी स्थिति का भी इस्तेमाल किया है. देसी कोवैक्सीन टीके पर भारत बायोटेक के साथ भारत सरकार का संयुक्त अधिकार है और फिलहाल सार्वजनिक क्षेत्र की तीन कंपनियों- इंडियन इम्युनोलॉजिकल्स लिमिटेड (आईआईएल), भारत इम्युनोलॉजिकल्स एंड बायोलॉजिकल्स कॉरपोरेशन (बिबकॉल) और हाफकिन बायोफार्मास्युटिकल कॉरपोरेशन के साथ मिलकर वैक्सीन का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है. हर महीने लाखों डोज़ के उत्पादन की योजना बनाई जा रही है. ख़बरों के मुताबिक़ भारत बायोटेक वैक्सीन का उत्पादन बढ़ाने के लिए वैश्विक कंपनियों के साथ भी बातचीत में जुटी है.
भारत अलग-अलग दृष्टिकोण का इस्तेमाल करके धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से आगे बढ़ रहा है. भारत का पहला क़दम डब्ल्यूटीओ के सामने साझा प्रस्ताव के साथ स्थापित देशों पर दबाव बनाना था क्योंकि इस प्रस्ताव को तेज़ी से समर्थन मिल रहा है. इसके बाद भारत ने घरेलू राजनीतिक दबाव के बावजूद वैक्सीन के एक बड़े हिस्से का निर्यात करके दुनिया भर में प्रतिष्ठा हासिल की. इसके साथ-साथ अपनी सामरिक स्थिति का फ़ायदा उठाते हुए क्वॉड द्वारा समर्थित जॉनसन एंड जॉनसन वैक्सीन के उत्पादन को भारत में संभव बनाया. इसके बाद अमेरिकी सरकार, गेट्स फाउंडेशन और गावी (ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्युनाइज़ेशन) को अपने मूल प्रस्ताव के एक हिस्से के समर्थन के लिए तैयार किया. ऐसे दृष्टिकोण का छोटा और मध्यकालिक नतीजा शायद थोड़ा कम क्रांतिकारी हो लेकिन ये निश्चित रूप से ज़्यादा व्यावहारिक होगा और इसका महामारी पर ज़्यादा असर होगा. एक बार जब कोवैक्सीन के तीसरे चरण के बहुप्रतीक्षित ट्रायल का आख़िरी नतीजा प्रकाशित होगा तो ये उम्मीद की जाती है कि “वसुधैव कुटुंबकम” (पूरा विश्व एक परिवार है) की सही भावना में भारत कोवैक्सीन को दुनिया में सही मायनों में पहली वैश्विक “लोगों की वैक्सीन” के रूप में पेश कर सकेगा. ये ऐसा काम है जिसका काफ़ी ऐतिहासिक और सांकेतिक महत्व होगा.
विश्लेषकों के मुताबिक़ अगर सब कुछ ठीक रहा तो पेटेंट को लेकर एक सीमित डब्ल्यूटीओ छूट लंबी बातचीत के बाद कुछ दिनों में मिल सकती है.
वैक्सीन की उत्पादन क्षमता में भारत समेत पूरी दुनिया में पहले से तेज़ी आ रही है. मर्क ने जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन के उत्पादन को चुना है, भारत में कई कंपनियां कोवैक्सीन का उत्पादन कर रही हैं और लाइसेंस लेकर उत्पादन के भी कई उदाहरण हैं. विकासशील देशों में तकनीक के ट्रांसफर के समर्थन से उत्पादन की क्षमता बढ़ाने की ये कोशिशें चुनौती हैं. प्रमुख देशों के रुख़ में बदलाव और सामाजिक ज़िम्मेदारी दिखाने के लिए बड़ी कंपनियों पर दबाव को देखते हुए कोवैक्सीन के बौद्धिक संपदा अधिकार को छोड़ना कोविड-19 टेक्नोलॉजी एक्सेस पूल (सी-टीएपी) के समर्थन के साथ बड़ी चीज़ों के लिए प्रेरक हो सकता है.
फ़ाइज़र के द्वारा 26 अरब अमेरिकी डॉलर की बिक्री के पूर्वानुमान के बाद इस महीने की शुरुआत में मॉडर्ना ने 2021 के लिए अपनी वैक्सीन बिक्री के पूर्वानुमान को संशोधित करके 19.2 अरब अमेरिकी डॉलर किया. वैश्विक वैक्सीन समानता की राह में लालच बड़ी बाधा हो सकता है. लेकिन वैश्विक ताक़तों के फिर से संगठिन होने से उस तरह का समाधान निकल सकता है जो भारत चाह रहा है. भारत अपनी भू-रणनीतिक स्थिति के साथ-साथ मौजूदा उत्पादन क्षमता का फ़ायदा उठा सकता है. इसमें भारत को एक तरफ़ जापान जैसे रणनीतिक साझेदार का समर्थन मिल रहा है और दूसरी तरफ़ बड़ी दवा कंपनियों की योजना खटाई में पड़ती दिख रही है. ये महामारी एक ऐतिहासिक घटना है जिसमें जानकारी और संसाधनों को सभी लोगों के बीच सक्रिय रूप से बांटने की ज़रूरत है न कि आधे-अधूरे मन से बड़ी दवा कंपनियों द्वारा दिए गए उन बयानों की ज़रूरत है कि ‘प्रतिस्पर्धियों’ पर पेटेंट को थोपा नहीं जाएगा.
विश्लेषकों के मुताबिक़ अगर सब कुछ ठीक रहा तो पेटेंट को लेकर एक सीमित डब्ल्यूटीओ छूट लंबी बातचीत के बाद कुछ दिनों में मिल सकती है. ये क़दम एक बोनस के रूप में काम करेगा जिससे “उत्पादकों को एक निश्चितता मिलेगी और सरकारें नई सुविधाओं और कोल्ड स्टोरेज चेन विकसित करने मे निवेश करना शुरू करेंगी”. तब तक के लिए कई और स्वैच्छिक लाइसेंस देने होंगे जिसके साथ तकनीक का ट्रांसफर और उत्पादन क्षमता का विस्तार भी करना होगा. ऐसा करने से कोविड-19 वैक्सीन का वैश्विक उत्पादन कई गुना बढ़ जाएगा. वास्तव में महामारी की विनाशकारी रफ़्तार की वजह से बेबस होने के बावजूद भारत कठिन हालात में भी वैश्विक वैक्सीन समानता की तरफ़ सावधानी से बढ़ते हुए जीत हासिल कर रहा है. जब सेहत तक दुनिया की पहुंच के रास्ते में बड़ी दवा कंपनियों का हित है, वैसी स्थिति में दुनिया में को न सिर्फ़ वैक्सीन में वाजिब हिस्से बल्कि वैक्सीन के उत्पादन के अधिकार में पर्याप्त हिस्से की भी ज़रूरत है.
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Oommen C. Kurian is Senior Fellow and Head of the Health Initiative at the Inclusive Growth and SDGs Programme, Observer Research Foundation. Trained in economics and ...
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