Published on Jun 26, 2023 Updated 0 Hours ago
भारत में एयर कंडीशनर का उपयोग: गर्म होती दुनिया में यह एक समाधान है या एक समस्या?

सर्दियों में गर्माहट और गर्मियों में ठंड को बरक़रार रखना  केवल आराम से जुड़ी चीज़ है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी ज़रूरी हैभारत में सालाना कम से कम 2000 लोगों की गर्मी की वजह से मौत होती हैदेश में जनसंख्या वृद्धिबढ़ते शहरीकरणबढ़ती आयऔसत तापमान में बढ़ोतरी और इसके अलावा सस्ते दामों में एसी की बिक्री वे कारक हैंजिनके कारण भारत में एयर कंडीशनर (एसीका उपयोग बढ़ता जा रहा हैनिश्चित रूप से इसके कारण गर्मी होने से वाली मौतों में भी कमी आई हैहालांकिएसी से बड़ी मात्रा में बिजली की खपत होती हैऔर यह हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) का उपयोग करती है जिनसे ग्रीन हाउस गैसों (GHGs) का उत्सर्जन होता हैजो जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण हैंइस विरोधाभास से जलवायु परिवर्तन से जुड़ी सबसे बड़ी और मुश्किल चुनौती उजागर होती हैक्या गरीब जनता में स्पेस कूलिंग एवं अन्य ऊर्जा सेवाओं की खपत बढ़ने से उन्हें दिन प्रतिदिन गर्म होती दुनिया के साथ सामंजस्य बैठाने में मदद मिलेगी या फिर इससे दुनिया और गर्म होती जा रही हैजलवायु पर उपलब्ध घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध अध्ययनों से पता चलता है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ावा दिए बगैर एयर कंडीशनर के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है बशर्ते वे बेहतर कूलिंग तकनीक पर आधारित हों.

जलवायु पर उपलब्ध घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध अध्ययनों से पता चलता है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ावा दिए बगैर एयर कंडीशनर के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है बशर्ते वे बेहतर कूलिंग तकनीक पर आधारित हों.

महत्वपूर्ण तथ्य


2021 में दुनिया भर में घरों में उपयोग होने वाले एसी उपकरणों की अनुमानित संख्या 2.2 अरब यूनिट थीदुनिया भर मेंजहां 2010 में एसी वाले घरों की संख्या 25 प्रतिशत थीवहीं 2021 में यह संख्या बढ़कर 35 प्रतिशत हो गई हैवैश्विक स्तर पर एसी उपकरणों के उपयोग में घरों की हिस्सेदारी 68 प्रतिशत है. 2020-21 में स्पेस कूलिंग में होने वाली ऊर्जा खपत (एसीपंखेकूलर के इस्तेमाल में होने वाली ऊर्जा खपत सहितमें प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुईजो इमारतों में अन्य कारणों से होने वाली ऊर्जा खपत से कहीं अधिक हैइमारतों को ठंडा रखने में होने वाली ऊर्जा की खपत 1990 के बाद से तीन गुना और 2000 के बाद से दोगुनी हो गई है.

दुनिया भर मेंसिर्फ़ एसी के इस्तेमाल में 2000 TWh (टेरावॉटआवर्सबिजली की सालाना खपत होती हैजो 2021 में भारत के कुल बिजली उत्पादन से अधिक है और वैश्विक बिजली उत्पादन का लगभग प्रतिशत हैस्पेस कूलिंग से होने वाला कार्बनडाइऑक्साइड उत्सर्जन 1990 के बाद से तीन गुना बढ़कर 1 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन  (1 GtCO2) के हो गया हैजो जापान के कुल CO2 उत्सर्जन के बराबर हैअनुमान के मुताबिकभविष्य में वैश्विक औसत तापमान में 1° C की वृद्धि होने पर स्पेस कूलिंग के लिए बिजली की खपत में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी.

दुनिया भर में लगभग 70 प्रतिशत रूम एसी का उत्पादन चीन ने किया हैऔर दुनिया की कुल स्थापित कूलिंग क्षमता में चीन की हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत हैसन् 2000 के बाद से एसी की बिक्री पांच गुना बढ़ गई हैजो वैश्विक बिक्री का लगभग 40 प्रतिशत हैपिछले दो दशकों में पूरी दुनिया में स्पेस कूलिंग के लिए ऊर्जा की सबसे ज्यादा मांग चीन में देखी गई हैजहां 2000 के बाद से ऊर्जा की खपत में प्रतिवर्ष 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई और कोरोना महामारी से पहले चीन में बिजली की खपत लगभग 400 TWh के स्तर तक पहुंच गई थीहालांकि चीन में पिछले एक दशक में 50 करोड़ से ज्यादा एयर कंडीशनर की बिक्री हुईलेकिन तुलनात्मक रूप से भारत और इंडोनेशिया में एसी की मांग में कहीं अधिक वृद्धि हुई हैजहां भारत और इंडोनेशिया में एसी की बिक्री दर में हर साल क्रमशः 15 प्रतिशत और 13 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ोतरी हो रही है. 2050 तक स्पेस कूलिंग के लिए ऊर्जा की मांग में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी भारतचीन और इंडोनेशिया में होगीहालांकिगर्मी के दुष्प्रभावों से लोगों को बचाने के मामले में भारत अभी भी चीन से बहुत पीछे हैपॉपुलेशनवेटेड हीट स्ट्रेस एक्सपोजर भारत के लिए 100 प्रतिशत हैवहीं चीन के लिए यह 20 प्रतिशत से कम है.

भारत और इंडोनेशिया में एसी की बिक्री दर में हर साल क्रमशः 15 प्रतिशत और 13 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ोतरी हो रही है. 2050 तक स्पेस कूलिंग के लिए ऊर्जा की मांग में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी भारत, चीन और इंडोनेशिया में होगी. 

शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि अब से लेकर 2050 तक केवल रूम एसी ही 130 गीगाटन से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार होंगेयह दुनिया के पास बचे हुए “कार्बन बजट” (वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को पूर्वऔद्योगिक स्तर से 2°C नीचे बनाए रखते हुए हम कितना CO2 उत्सर्जन कर सकते हैंका 20-40 प्रतिशत होगापिछले कुछ सालों मेंदुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया गयाऔर 2020 में CDD (CDD यानी कूलिंग डिग्री डेजइसका मतलब है कि एक दिन का औसत तापमान 18°C से अधिक होने पर डिग्री संख्याकी औसत संख्या 2000 की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक थी.



स्रोतपर्यावरणवन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, 2018. इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (मसौदा)

स्पेस कूलिंग में असमानताएं


दुनिया भर में स्पेस कूलिंग सुविधाओं के वितरण में भारी असमानताएं हैंजहां उष्णकटिबंधीय भागों में स्थित सबसे गरीब देशों में स्पेस कूलिंग तकनीकों का उपयोग सबसे कम हैदुनिया की 35 प्रतिशत आबादी उन देशों में रहती है जहां औसत दैनिक तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से अधिक है लेकिन उनमें से केवल 10 प्रतिशत आबादी के पास एसी सुविधाएं हैंभारतजिसके CDD का मान 3000 से ज्यादा हैवह स्पेस कूलिंग के लिए महज़ 70 kWh ( किलोवाटआवरबिजली का उपभोग करता हैवहीं दक्षिण कोरिया स्पेस कूलिंग के लिए 800 kWh बिजली की खपत करता है जबकि उसके CDD का मान भारत की तुलना में बेहद कम (750हैइस असमानता की मुख्य वजह ये है कि भारत में एसी उपयोग की लागत ज्यादातर लोगों की पहुंच से बाहर हैवर्तमान में10 प्रतिशत से भी कम भारतीय घरों में एसी लगे हुए हैं लेकिन इसकी मांग तेजी से बढ़ती जा रही हैअध्ययनों से पता चलता है कि जलवायु की तुलना में आर्थिक सामर्थ्य और एसी उपयोग के बीच का संबंध कहीं अधिक मज़बूत है.


स्रोत फ्यूचर ऑफ एयरकंडीशनिंगएक्जीक्यूटिव ब्रीफिंग, Enerdata, 2019

दक्षता



जैसेजैसे वैश्विक औसत तापमान बढ़ रहा हैभारत और अन्य देशों में एसी के विलासिता की बजाय ज़रूरत की वस्तु बन जाने की संभावना अधिक हैस्पेस कूलिंग ज़रूरतों को लेकर विस्तृत अध्ययन करने पर ज्यादातर का निष्कर्ष यही है कि एसी उपयोग में बिजली की खपत और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए इन उपकरणों की दक्षता में सुधार करना होगाजो सिर्फ़ तकनीकी सुधार के जरिए संभव हैभारत में एसी की औसत दक्षता अपेक्षाकृत कम है क्योंकि भारतीय बाजार लागत के लिहाज़ से काफ़ी संवेदनशील हैं यानी उपकरणों की बिक्री उसकी दक्षता की बजाय उसकी लागत पर निर्भर हैविशेषज्ञ संस्थानों के ज्यादातर सुझावों के मुताबिक एसी के लिए कड़े दक्षता मानकों को तय किया जाना चाहिए और ऐसे उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों की खरीद पर छूट देनी चाहिएइमारतों की डिजाइन को बेहतर करनाज्यादा से ज्यादा इमारतों को नवीकरणीय ऊर्जा से लैस करना और स्मार्ट कंट्रोल कुछ ऐसे अन्य उपाय हैंजिनकी मदद से स्पेस कूलिंग में होने वाली ऊर्जा की खपत और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाने के अलावा बिजली की मांग चरम पर पहुंचने पर अतिरिक्त ऊर्जा दक्षता की आवश्यकता में कमी लाई जा सकती है.

अन्य जिन समाधानों का अक्सर सुझाव दिया जाता हैउनमें एक समाधान ये है कि न्यूनतम ऊर्जा प्रदर्शन मानक को सबसे अच्छी गुणवत्ता वाले एयरकंडीशनर के क़रीब रखा जाएजो आम तौर पर बाज़ार मानकों की तुलना में दोगुना कुशल होते हैंएक व्यावहारिक समाधान यह है कि सरकारी एजेंसियां और बड़े निजी क्षेत्र के खरीदार (जैसे रियल एस्टेट डेवलपरउच्चदक्षता वाले एसी को थोक में खरीद कर और बाज़ार समझौतों के ज़रिए अपनी खरीद क्षमता का लाभ उठाएंआसान वित्तीय समाधान लोगों को उच्चदक्षता वाले एसी की खरीद के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं.  वितरण कंपनियां (डिस्कॉमदूरदर्शिता का परिचय देते हुए ऑन बिल‘ फाइनेंसिंग यानी चालू बिल पर भुगतान की सुविधा दे सकती हैंजहां उपभोक्ता बिजली के बिल के माध्यम से ऊर्जाकुशल उपकरणों के लिए किस्तों पर भुगतान कर सकते हैंजो उन्हें शुरू से ही प्रभावी ढंग से नकदी बचत की सुविधा देता है.

यह जलवायु परिवर्तन जैसी व्यापक समस्या की ज़मीनी परिणाम है: अमीर ऊर्जा की ज्यादा खपत और अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं और गरीब असुविधा में रहते हैं और नकारात्मक परिणाम झेलते हैं.


तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि कंप्रेसर तकनीक पर आधारित ज्यादातर एसी उपकरण बमुश्किल अपनी सैद्धांतिक दक्षता के 14 प्रतिशत तक पहुंच पाए हैं (जहां ज्यादातर एसी यूनिट की दक्षता 6-8 प्रतिशत के बीच है). यह उन सोलर पैनलों और LED (लाइट एमिटिंग डायोडउपकरणों की तुलना में बेहद कम है जो अपनी सैद्धांतिक क्षमता के क्रमशः 40 प्रतिशत और 70 प्रतिशत स्तर तक पहुंच गए हैंक्योंकि उपभोक्ता किसी भी अन्य चीज़ की तुलना में एसी की क़ीमतउसके ब्रांड और उसके बाहरी रूप की कहीं ज्यादा परवाह करते हैंऔर नियामक एजेंसियां दक्षता मानकों को बनाए रखने का दबाव डालने में असफल रहती हैंऐसे में आमतौर पर एसी निर्माता अनुसंधान और विकास की बजाय विज्ञान और बाहरी रूप सज्जा पर ज्यादा खर्च करते हैं.

समस्याएं


अगर सैद्धांतिक दक्षता को हासिल कर लिया जाएतो भी एसी का उपयोग विशेष रूप से उच्च एवं मध्य वर्ग तक ही सीमित रहेगाभारत मेंआबादी के सबसे निचले 50 फीसदी वर्ग के लिए प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन  0.9 टन CO2 उत्सर्जन के बराबर (tCO2eq) है और मध्य वर्ग में आने वाले 40 फीसदी लोगों के लिए यह 1.2 tCO2eq हैजबकि शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी 9.6 टन tCO2eq का उत्सर्जन करती हैभारत में उच्च वर्ग के किसी आम परिवार में अन्य विद्युत उपकरणों की तुलना में एयर कंडीशनर के उपयोग में अधिक बिजली खर्च होती हैजो आबादी के शीर्ष 10 प्रतिशत द्वारा किए जाने वाले कार्बन उत्सर्जन के एक बड़े हिस्से के लिए ज़िम्मेदार हैइसका मतलब यह है कि गरीब और मध्यम वर्ग के लोग जो कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन (एसी और अत्यधिक ऊर्जा की खपत वाले अन्य उपकरणों के माध्यम सेमें नगण्य योगदान देते हैंउन्हें बढ़ते तापमान का सबसे ज्यादा ख़तरा उठाना पड़ता हैयह जलवायु परिवर्तन जैसी व्यापक समस्या की ज़मीनी परिणाम हैअमीर ऊर्जा की ज्यादा खपत और अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं और गरीब असुविधा में रहते हैं और नकारात्मक परिणाम झेलते हैं.

जैसा कि होमर सिम्पसन ने अल्कोहल की खपत के संदर्भ (जीवन की कठिनाईयों के कारण और समाधान दोनों के रूप मेंमें कहते हैं कि एसी का उपयोग गर्म होती दुनिया का कारण भी है और समाधान भीलेकिन अमीर समस्या को बढ़ाते रहेंगे और इसका समाधान भी ढूंढ़ेंगेऔर उसका उपयोग भी करेंगे.

स्रोत फ्यूचर ऑफ एयरकंडीशनिंगएक्जीक्यूटिव ब्रीफिंग, Enerdata, 2019

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Authors

Vinod Kumar Tomar

Vinod Kumar Tomar

Vinod Kumar, Assistant Manager, Energy and Climate Change Content Development of the Energy News Monitor Energy and Climate Change. Member of the Energy News Monitor production ...

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Lydia Powell

Lydia Powell

Ms Powell has been with the ORF Centre for Resources Management for over eight years working on policy issues in Energy and Climate Change. Her ...

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Akhilesh Sati

Akhilesh Sati

Akhilesh Sati is a Programme Manager working under ORFs Energy Initiative for more than fifteen years. With Statistics as academic background his core area of ...

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