घनी आबादी वाले शहरी इलाक़ों में सामाजिक दूरी के नियमों को लागू करने के लिए विकेंद्रीरण की अवधारणा पर आधारित स्थानीय स्तरीय योजनाएं बनानी होंगी.
दुनिया के अलग-अलग देशों की तर्ज़ पर भारत में भी कोरोनावायरस की रोकथाम के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई. इसके बाद जून 2020 से भारत ने धीरे-धीरे लॉकडाउन हटाए जाने यानी ‘अनलॉक’ के कई चरणों की ओर कदम बढ़ाया. अगस्त 2020 के बाद, केंद्र और राज्य सरकारों ने सार्वजनिक जगहों पर मास्क पहनने, दो मीटर की सामाजिक दूरी बनाए रखने जैसे सामाजिक मानदंडों के साथ लॉकडाउन के अधिकांश प्रतिबंधों में ढील दे दी है. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 23 मार्च 2020 को पूरे देश में लगाए गए लॉकडाउन की घोषणा को पांच महीने से अधिक समय हो गया है, लेकिन फिर भी हम मुंबई, दिल्ली, कोलकाता सहित अन्य महानगरों में कोरोना वायरस के मामलों को लगातार बढ़ते हुए देख रहे हैं.
नई दिल्ली के लाल कुआँ बाज़ार इलाक़े या अगस्त के महीने में मुंबई स्थित दादर फूल बाज़ार में जाने वाला कोई भी व्यक्ति यह बता सकता है, कि लोगों ने अब कोविड19 की महामारी को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा मान लिया है, और सामाजिक दूरी की अवधारणा लोगों के मन से हटती जा रही है. जो लोग दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस पर पतंग उड़ाने की अपनी परंपरा को निभाना चाहते थे या जो मुंबई में गणपति उत्सव मनाना चाहते थे, वो भी इस सोच से कुछ ज़्यादा दूर नहीं हैं.
नई दिल्ली के लाल कुआँ बाज़ार इलाक़े या अगस्त के महीने में मुंबई स्थित दादर फूल बाज़ार में जाने वाला कोई भी व्यक्ति यह बता सकता है, कि लोगों ने अब कोविड19 की महामारी को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा मान लिया है, और सामाजिक दूरी की अवधारणा लोगों के मन से हटती जा रही है.
ये उदाहरण हमें यह सोचने पर मज़बूर करते हैं कि क्या भारत जैसे सघन आबादी वाले देश में, जहां ख़ासतौर पर शहरों में लोग घनी आबादी के बीच रहने को मज़बूर हैं, कभी भी कोविड19 की जंग को जीतने के लिए वैश्विक स्तर पर अपनाए जाने वाले नियमों का पालन किया जा सकता है. साथ ही अगर हम सार्वभौमिक रूप से निर्धारित इन नियमों का पालन करने में सक्षम नहीं हैं, या घनी आबादी होने के चलते, हमारे लिए ऐसा करना नामुमकिन है, तो क्या हम कोविड19 के वक्र को कभी भी समतल कर पाएंगे? यह सवाल हमें सार्वजनिक स्थानों पर सामाजिक दूरी संबंधी नियमों को एक नए नज़रिए से देखने, और अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाने के लिए प्रेरित करता है.
अब वह समय आ गया है जब भारत को नए सिरे से खुद को कोरोनावायरस से लड़ने के लिए तैयार करना होगा, और उसे अपने लिए नए लक्ष्य और सीमाएं तय करनी होंगी. भारत की शहरी परिस्थितियों में होने वाली भीड़ में बाज़ार, पार्क और अन्य खुले स्थान, खेल के मैदान, रेल व मेट्रो स्टेशन और बस स्टैंड व बस डिपो सहित वो सभी सार्वजनिक स्थान शामिल हैं, जहां लोग अब पुराने नियमों और उपायों की तर्ज पर जबरन अंदर रहने को तैयार नहीं हैं. इन परिस्थितियों को देखते हुए इन सभी जगहों पर अब नए सिरे से ऐसे तरीकों को लागू करना होगा, जो लोगों के लिए यथार्थवादी और अधिक स्वीकार्य हों.
भारत में कोरोनावायरस फैलने के शुरुआती दौर में केंद्रीकृत नियमों और क़ानूनों ने राष्ट्र स्तर पर इससे निपटने की रणनीति बनाने और उसे अमल में लाने में प्रशासन की मदद की. अब जब यह बीमारी शहरों और छोटे गांवों-कस्बों में फैल रही है, तो घनी आबादी वाले क्षेत्रों में भीड़भाड़ को कम करने और सार्वजनिक जगहों पर सामाजिक दूरी बनाए रखने, जैसे जटिल मुद्दों को हल करने के लिए सबके लिए ‘एक-समान-नीति’ की पद्धति पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसके लिए हमें एक विकेन्द्रीकृत, स्थानीय और क्षेत्रीय दृष्टिकोण को अपनाने वाली रणनीति की ज़रूरत है, जिसके तहत स्थानीय समूहों के ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जा सकें और उन्हें अमल में लाने पर विचार हो.
हर शहर में स्थित वार्ड प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक क्लस्टर यानी समूह में वहां की आबादी के हिसाब से सार्वजनिक जगहों या खाली स्थानों को परिभाषित और इस्तेमाल किया जाए. यह मौजूदा सार्वजनिक जगहों को जनसंख्या में बांटने और बारी-बारी इस्तेमाल किए जाने से संबंधित है.
शहरों को ज़िलों, प्रभागों, उनके अंतर्गत आने वाली अलग-अलग ज़ोन और वार्ड के ज़रिए प्रशासित किया जाता है. इन्हें अलग-अलग इलाकों में रहने वाली एक निश्चित जनसंख्या के हिसाब से और भी विकेंद्रीकृत किया जा सकता है. हर शहर में स्थित वार्ड प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक क्लस्टर यानी समूह में वहां की आबादी के हिसाब से सार्वजनिक जगहों या खाली स्थानों को परिभाषित और इस्तेमाल किया जाए. यह मौजूदा सार्वजनिक जगहों को जनसंख्या में बांटने और बारी-बारी इस्तेमाल किए जाने से संबंधित है. वार्ड प्रशासन इस क्लस्टर के लिए सामुदायिक स्वयंसेवकों की मदद से चैंपियन भी निर्धारित कर सकते हैं, जो इस पहल का नेतृत्व करें और लोगों को इसके बारे में जागरुक बनाएं. आम नागरिकों द्वारा प्रशासन की मदद लिए आगे आने से जुड़ी इस तरह की कोशिशें, मुंबई में एरिया लोकैलिटी मैनेजमेंट (एएलएम) और नई दिल्ली में भागदारी समूहों के रुप में की जा रही है. इस तरह के नागरिक स्वयंसेवी संगठनों के मौजूदा ढांचों को इस प्रणाली के अंतर्गत सक्रिय किया जा सकता है.
आइए एक नज़र डालते हैं कि यह कैसे किया जा सकता है और इससे क्या हासिल होगा:
इस तरह का क्लस्टर यानी समूह जनित दृष्टिकोण आबादी को छोटे टुकड़ों में बांट कर उन्हें पड़ोस के स्तर पर देखेगा. इस पद्धति को अपनाने का उद्देश्य है, नगरपालिका, राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा किए जा रहे प्रयासों को ज़मीनी स्तर पर और प्रभावी बनना और इन स्थानीय कोशिशों को उन व्यापक प्रयासों का पूरक बनाना. यह एक एकीकृत प्रतिक्रिया है, जिसकी आवश्यकता हमें कोविड19 की महामारी से बाहर निकलने और अपने आसपास के इलाक़ों को सुरक्षित बनाने के लिए पड़ेगी. इसके लिए हमें एक नया दृष्टिकोण अपनाना होगा जिसके ज़रिए हम महामारी से निपटने के प्रयासों को तेज़ कर सकते हैं, और इसे रोकने में बहुत हद तक क़ामयाब हो सकते हैं.
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