रूस विश्व के सबसे अधिक प्रतिबंधों को झेलने वाला देश है, इसके बावज़ूद रूसी अर्थव्यवस्था ने लचीलापन दिखाया है.
यूक्रेन युद्ध को एक साल बीत चुका है और इस दौरान वैश्विक स्तर पर लगाए गए तमाम आर्थिक प्रतिबंधों के बावज़ूद रूसी अर्थव्यवस्था ना सिर्फ़ लचीली बनी हुई है, बल्कि वर्ष 2022 में बाइडेन प्रशासन और अन्य पश्चिमी अर्थशास्त्रियों द्वारा 15 प्रतिशत या उससे अधिक के संकुचन के अनुमानों के विपरीत मामूली तौर पर यानी केवल 2.2 प्रतिशत ही सिकुड़ी है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़ वर्ष 2023 में रूस की अर्थव्यवस्था के यूनाइटेड किंगडम (यूके) की इकोनॉमी से बेहतर प्रदर्शन करने का अनुमान है. ज़ाहिर है कि रूस की अर्थव्यवस्था 0.3 प्रतिशत बढ़ रही है, जबकि ब्रिटेन की इकोनॉमी को 0.6 प्रतिशत संकुचन का सामना करना पड़ रहा है.
अमेरिका के अधिकारियों के मुताबिक़ रूस अब दुनिया का ऐसा देश बन चुका है, जिस पर सबसे अधिक प्रतिबंध लगाए गए हैं और यह प्रतिबंध अधिकतर देशों की सरकारों द्वारा कार्यकारी आदेशों के माध्यम से लगाए गए हैं.
परिस्थितियों पर अगर बारीक़ी से नज़र डालें, तो अमेरिका के अधिकारियों के मुताबिक़ रूस अब दुनिया का ऐसा देश बन चुका है, जिस पर सबसे अधिक प्रतिबंध लगाए गए हैं और यह प्रतिबंध अधिकतर देशों की सरकारों द्वारा कार्यकारी आदेशों के माध्यम से लगाए गए हैं. आर्थिक प्रतिबंधों जैसे इन उपायों का मकसद रूस को सबक सिखाना और उसकी युद्ध की ज़रूरतों को वित्तपोषित करने के लिए ज़रूरी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली और बैंक खातों तक उसकी पहुंच पर लगाम लगाना है. रूस को होने वाले निर्यात पर नियंत्रण करने का उद्देश्य भी उसकी कंप्यूटर चिप्स और ऐसे सभी दूसरे उत्पादों को हासिल करने की क्षमता को कम करना है, जो आज के दौर में एक सेना को संचालित करने के लिए बेहद ज़रूरी हैं. अमेरिका, यूरोपीयन यूनियन, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान समेत 30 से ज़्यादा देश इन असाधारण कोशिशों में भागीदार हैं. इस कोशिशों में रूसी ऊर्जा निर्यात पर प्राइस कैप, रूसी सेंट्रल बैंक की संपत्तियों को फ्रीज़ करना और SWIFT यानी विश्व में वित्तीय हस्तांतरण के लिए इस अग्रणी प्रणाली तक रूस की पहुंच को प्रतिबंधित करना शामिल है.
यह लेख इस तरह के व्यापक और असाधारण प्रतिबंधों के बावज़ूद रूसी अर्थव्यवस्था के लचीलेपन का विस्तार से वर्णन करने की कोशिश करता है.
रूसी सरकार के मुताबिक वर्ष 2022 में अर्थव्यवस्था के संकुचन के बावज़ूद मॉस्को का राजकोषीय राजस्व बढ़ा है, यानी सरकार की आय में वृद्धि दर्ज़ की गई है. मुख्य रूप से इसकी वजह उच्च स्तर पर वैश्विक ऊर्जा की क़ीमतें और मॉस्को द्वारा चीन व भारत जैसे इच्छुक वैकल्पिक ख़रीदारों की तरफ़ निर्यात को मोड़ने के विशेष प्रयास हैं. मार्च से दिसंबर 2022 तक अकेले चीन ने रूस से 50.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का क्रूड ऑयल ख़रीदा है, जो कि पिछले वर्ष में इसी अवधि के दौरान ख़रीदे गए कच्चे तेल की तुलना में 45 प्रतिशत अधिक है. इसके अलावा चीन का रूस से कोयले का आयात 54 प्रतिशत बढ़कर 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है, जबकि पाइप्ड गैस और LNG समेत प्राकृतिक गैस का आयात 155 प्रतिशत बढ़कर 9.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है.
एक अहम बात यह है कि SWIFT से अलग होने के बाद से रूसी कंपनियां चीन के साथ अपने बढ़ते व्यापार को संचालित करने के लिए युआन का अधिक से अधिक उपयोग कर रही हैं. यहां तक कि रूसी बैंकों ने भी पश्चिमी प्रतिबंधों से स्वयं को बचाने के लिए युआन में अधिक लेनदेन किए हैं.
यूएस कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस की मई 2022 की रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि मॉस्को चीन से अरबों डॉलर मूल्य की मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, बेस मेटल, वाहन, जहाज और विमान भी खरीद रहा है. चीनी कार ब्रांडों, जैसे कि हावेल, चेरी और जीली ने पश्चिमी ब्रांडों के रूस से जाने के बाद एक साल के भीतर वहां अपनी बाज़ार हिस्सेदारी में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी हासिल की है और यह 10 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत तक हो गई है. इतना ही नहीं रूसी रिसर्च फर्म ऑटोस्टैट के मुताबिक़ वर्ष 2023 में इन चीनी कार ब्रांड्स की रूस में हिस्सेदारी का और अधिक विस्तार होने की संभावना है. जहां तक कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की बात है, तो वर्ष 2021 के अंत में रूसी स्मार्टफोन मार्केट में चीनी ब्रांड की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत थी, जबकि मार्केट रिसर्च फर्म काउंटरप्वाइंट के मुताबिक़ अब चीनी ब्रांड्स ने 95 प्रतिशत बाज़ार हिस्सेदारी के साथ स्मार्टफोन उद्योग पर कब्जा कर लिया है.
आख़िर में, एक अहम बात यह है कि SWIFT से अलग होने के बाद से रूसी कंपनियां चीन के साथ अपने बढ़ते व्यापार को संचालित करने के लिए युआन का अधिक से अधिक उपयोग कर रही हैं. यहां तक कि रूसी बैंकों ने भी पश्चिमी प्रतिबंधों से स्वयं को बचाने के लिए युआन में अधिक लेनदेन किए हैं.
जब यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ था और पश्चिमी देशों की तरफ़ से रूस पर ताबड़तोड़ प्रतिबंध लगाए गए थे, तब इसका डर था कि रूस में वित्तीय अस्थिरिता आ जाएगी, रूबल धराशायी हो जाएगा और देश में नगदी की कमी हो जाएगी. लेकिन वर्ष 1998 में हुई ऋण चूक के दौरान जिस प्रकार से रूस में आर्थिक बर्बादी दिखाई दी थी और सिर्फ़ एक ही बैंक कार्यरत था, ऐसी विकराल स्थिति इस बार नहीं दिखाई दी. इससे पीछे एक वजह यह भी थी कि रूस के सेंट्रल बैंक ने तत्काल मार्केट्स को बंद कर दिया, मुद्रा विनिमय को कम कर दिया और ब्याज दरों को 20 प्रतिशत तक बढ़ा दिया. इसके अतिरिक्त, वर्ष 2014 में क्रीमिया के विलय के बाद इस तरह के प्रतिबंधों की तैयारी के लिए रूस के पास भी पर्याप्त समय था, यानी वो अच्छी तरह से इस परिस्थिति के लिए तैयार था.
वर्ष 2022 में लगे भारी प्रतिबंधों के प्रभाव से बाहर निकलने में रूस की अर्थव्यवस्था की संरचना ने भी देश को सहारा दिया. सोवियत युग के समय से ही काफ़ी हद तक बिना किसी बड़े बदलाव के चल रहीं सरकारी और सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों का देश की जीडीपी में लगभग दो-तिहाई हिस्सा है, इसमें छोटे और मध्यम आकार के उद्यम (SME) भी शामिल हैं, जिनका जीडीपी में पांचवां हिस्सा है.
वर्ष 2022 में लगे भारी प्रतिबंधों के प्रभाव से बाहर निकलने में रूस की अर्थव्यवस्था की संरचना ने भी देश को सहारा दिया. सोवियत युग के समय से ही काफ़ी हद तक बिना किसी बड़े बदलाव के चल रहीं सरकारी और सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों का देश की जीडीपी में लगभग दो-तिहाई हिस्सा है, इसमें छोटे और मध्यम आकार के उद्यम (SME) भी शामिल हैं, जिनका जीडीपी में पांचवां हिस्सा है. हालांकि अर्थव्यवस्था की यह संरचना विकास के अनुकूल नहीं है, लेकिन यह विपरीत वक़्त के दौरान एक स्थिरता प्रदान करने के माध्यम के रूप में कार्य कर सकती है, जैसा कि कोविड की वजह से लगाए गए लॉकडाउन के दौरान भी दिखाई दिया था.
देखा जाए तो पश्चिमी देशों ने बड़े पैमाने पर रूस को दंडित करने के मुद्दे पर एकजुटता दिखाई है, लेकिन इसको लेकर मतभेद भी दिखाई देते हैं, क्योंकि अलग-अलग राष्ट्र अपने लाभ के लिए रूस के साथ गलबहियां करने को भी तैयार हैं. इसकी बड़ी वजह यह है कि यूरोपीय और एशियाई राष्ट्र अमेरिका की तुलना में रूसी ऊर्जा पर अधिक निर्भर हैं. जो परिस्थितियां थी, उनमें एक निर्यात प्रतिबंध के कारण गठबंधन के भीतर रूस से बातचीत करना मुश्किल था और रूस के साथ ज़रूरी समझौता करने के लिए महीनों का समय लग सकता था. आख़िर में, कई देश पिछले वर्ष दिसंबर महीने में क्रूड ऑयल को लेकर 60 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल मूल्य सीमा पर सहमत हुए, जो ना केवल बहुत कम है, बल्कि लगता है कि इसके लिए बहुत देर भी हो चुकी है.
हालांकि, देखा जाए तो अब तक रूस की अर्थव्यवस्था व्यापक स्तर पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों के सामने आश्चर्यजनक तौर पर लचीली साबित हुई है. रूस की अर्थव्यवस्था आज इतनी मज़बूत है, कि यूक्रेन के साथ युद्ध में बेतहाशा सरकारी व्यय के बावज़ूद, सालभर बाद भी पहले की स्थिति पर दिखाई दे रही है. इसके अतिरिक्त एक सच्चाई यह भी है कि इस सप्ताह अमेरिका ने अपने सहयोगियों के साथ रूस के विरुद्ध और अधिक प्रतिबंधों की घोषणा की है और इसके साथ ही स्पष्ट है कि अमेरिका ने अभी तक यूक्रेन को अपना समर्थन देना बंद नहीं किया है.
हालांकि, रूस की सेंट्रल बैंक ने अपनी तरफ़ से स्पष्ट तौर पर बढ़ते बजट घाटे से पैदा होने वाले संभावित मुद्रास्फ़ीति ज़ोख़िम को लेकर चेतावनी दी है. इसके साथ ही सेंट्रल बैंक ने यह भी कहा है कि इस साल 7.5 प्रतिशत की ब्याज दर में कमी की संभावना बहुत कम है, बल्कि बढ़ोतरी की संभावना अधिक है. इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यूक्रेन में चल रहे युद्ध के कारण रूस को बड़े स्तर पर और स्थाई तौर पर क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.
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