Published on Jul 29, 2023 Updated 0 Hours ago

वैसे तो कश्मीर में हिंसा में एक ठहराव देखा गया है लेकिन संगठित समूहों के लिए नई सोच बनाने का मैदान अभी भी खुला हुआ है. वो ऑनलाइन माध्यम से आतंकी हमलों को सही ठहरा रहे हैं ताकि कश्मीरी नौजवानों को आकर्षित करके आतंकवाद में बढ़ोतरी को सुनिश्चित किया जा सके.

#KashmirViolence: कश्मीर में नये उग्रवादी संगठनों के ऑनलाइन दुष्प्रचार की समझ विकसित करने की चुनौती!
#KashmirViolence: कश्मीर में नये उग्रवादी संगठनों के ऑनलाइन दुष्प्रचार की समझ विकसित करने की चुनौती!

जैसे-जैसे कश्मीर अपेक्षाकृत शांति और विकास के दौर को देख रहा है, वैसे-वैसे नये उग्रवादी समूहों का ऑनलाइन प्रोपेगैंडा बिना किसी रुकावट के लगातार जारी है. जहां केंद्र सरकार का ध्यान घाटी में नये विकास की ओर है, वहीं पाकिस्तान की तरफ़ से छद्म संगठनों को आतंक का काम सौंपने में फिर से तेज़ी है. नये आतंकी संगठनों जैसे द रेज़िस्टेंस फोर्स (टीआरएफ), कश्मीर टाइगर्स, पीपुल्स एंटी फासिस्ट फोर्स (पीएएफएफ), यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ कश्मीर (यूएलएफके) के ज़रिए पाकिस्तान घाटी में आतंक बढ़ाने के काम में लगा हुआ है. अनुच्छेद 370 हटाने के बाद सरकार के द्वारा दुनिया में किसी भी जगह कुछ सबसे व्यापक संचार पाबंदियों के बावजूद उग्रवादी समूह क़ानूनी क़दमों को ठेंगा दिखाकर और ऑनलाइन मीडिया विद्रोह की रणनीति अपनाकर सीमा पार से डिजिटल संचार को फैलाने में सफल रहे. वैसे तो कश्मीर में हिंसा में एक ठहराव देखा गया है लेकिन संगठित समूहों के लिए नई सोच बनाने का मैदान अभी भी खुला हुआ है. वो ऑनलाइन माध्यम से आतंकी हमलों को सही ठहरा रहे हैं ताकि कश्मीरी नौजवानों को आकर्षित करके आतंकवाद में बढ़ोतरी को सुनिश्चित किया जा सके.

टीआरएफ जैसे संगठनों के ऑनलाइन तौर-तरीक़ों के द्वारा ये नई सक्रियता महसूस की जा सकती है. रणनीतिकारों का मानना है कि नये संगठनों को स्थानीय आंदोलन की तरह पेश करके पाकिस्तान को उम्मीद है कि वो फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे लिस्ट में आने के बाद छद्म ताक़तों को बढ़ावा देने से रोकने के अंतर्राष्ट्रीय दबाव से बच निकलेगा. धार्मिक युद्ध या जिहाद के मुक़ाबले प्रतिरोध को सबसे महत्वपूर्ण कारण बताने पर ज़ोर देने वाली ये नई सोच कश्मीर में सभी नये संगठनों के लिए प्रासंगिक है.

वैसे तो कश्मीर में हिंसा में एक ठहराव देखा गया है लेकिन संगठित समूहों के लिए नई सोच बनाने का मैदान अभी भी खुला हुआ है. वो ऑनलाइन माध्यम से आतंकी हमलों को सही ठहरा रहे हैं 

अनुच्छेद 370 हटने से पहले और बाद में ऑनलाइन विद्रोह का विरोधाभास

370 हटने से पहले

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटने से पहले कश्मीर के संगठन ‘बुरहान वानी मॉडल’ के ज़रिए भीड़ से ऑनलाइन आतंक का काम करवाते थे. हिज़्बुल मुजाहिदीन के 22 साल के टॉप कमांडर बुरहान वानी के द्वारा लोकप्रिय ऑनलाइन कंटेंट का प्रचार किया जाता था. इसकी वजह से वो स्थानीय नौजवानों के बीच सोशल मीडिया पर कामयाबी का प्रतीक बन गया था. कश्मीरियों के बीच वानी की बहुत ज़्यादा लोकप्रियता की एक वजह ये थी कि वो बड़ी कार्यकुशलता के साथ सोशल मीडिया जिहाद चलाता था. वो विद्रोहियों के जीवन को ‘पाक’ और ‘सुंदर’ बताता था, विद्रोह को जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुल व्यापक धार्मिक पहचान से जोड़ता था, नौजवानों को कट्टर बनाने के लिए बड़े पैमाने पर भारत विरोधी सोच का प्रचार करता था, वास्तविक समय में जानकारी पहुंचाने के लिए ऑनलाइन मीडिया का इस्तेमाल करता था एवं अपने समर्थकों को प्रदर्शन के समन्वय के लिए कहता था, और आतंक विरोधी अभियान में रुकावट डालता था. ये वानी के मॉडल की कुछ लोकप्रिय रणनीतियां हैं.

2016 में वानी की मौत ने उग्रवादी समूहों को इस मॉडल में खोट निकालने और बग़ावत को मशहूर हस्ती बनने के एक रास्ते के रूप में गुणगान करने में मदद की. सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले कश्मीरियों की बढ़ती संख्या ने उग्रवादियों को पढ़े-लिखे वर्ग और सिविल सोसायटी के बीच भी आतंकवाद को जायज़ ठहराने को बढ़ावा देने में मदद की. इसके लिए उन्होंने उग्रवादियों को अच्छा इंसान बताया और विद्रोह के हिंसक पहलुओं को सामान्य बनाया. 2015 में कश्मीर पुलिस द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार अलग-अलग आतंकवादी समूहों में शामिल किए गए 111 स्थानीय युवकों में से 50 प्रतिशत से ज़्यादा इंटरनेट पर दुष्प्रचार के ज़रिए कट्टर बनाए गए हैं. इससे पता चलता है कि संशोधित मॉडल ने कश्मीर में डिजिटल उग्रवाद की एक नई लहर की शुरुआत की जिसने स्थानीय भर्तियों और स्थानीय आंदोलन को बढ़ावा दिया.

370 हटने के बाद

इसके बावजूद अनुच्छेद 370 हटने की वजह से पाकिस्तान की सेना को अपनी रणनीति में बदलाव के लिए मजबूर होना पड़ा. नये उग्रवादी समूहों ने अपनी ब्रांडिंग, दुष्प्रचार फैलाने और ऑनलाइन नेटवर्किंग में सुनियोजित बदलाव दिखाया है. वो बाहरी मदद से चल रहे आतंकवाद को स्थानीय बताते हैं और उन्होंने प्रतिरोध के नाम पर अपने आंदोलन को धर्मनिरपेक्ष बताने की कोशिशें तेज़ कर दी हैं. इन उग्रवादी समूहों का नाम और उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले प्रतीक भी ग़ैर-अरब, अधार्मिक और किसी संप्रदाय की शब्दावली से अलग हैं. उग्रवादियों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’, भारत सरकार और भारतीय सुरक्षा बलों को ‘कब्ज़ा करने वाला बल’ और उनके ख़िलाफ़ आंदोलन को ‘स्थानीय प्रतिरोध’ कहा जाता है. इस बात को ‘जीत तक प्रतिरोध’ और ‘अस्तित्व के लिए प्रतिरोध’ जैसे नारों से दोहराया जाता है. ये नारे अक्सर उन एलानों में इस्तेमाल होते हैं जिनका प्रचार ऑनलाइन किया जाता है. कई नये संगठन ख़ुद को बीजेपी सरकार और आरएसएस के हिंदुत्व के सीधे विरोध में दिखाते हैं. अक्सर उग्रवादी समूह अपने हमलों को ‘कश्मीरी राष्ट्र को किए गए वादों’ के अनुसार ‘हिंदुत्व के तंत्र पर बिजली गिरना’ बताते हैं. ये उग्रवादी समूह सरकार की नई नीतियों को ‘कब्ज़ा करने वालों की कुटिल साज़िश’ बताते हैं. ऐसा करके वो कश्मीरी समाज में सांप्रदायिक बंटवारा करना चाहते हैं. 7 अक्टूबर 2021 को टीआरएफ के हमले के बाद ये उस वक़्त साफ़ हो गया जब हमलावरों ने अल्पसंख्यकों को मुसलमानों से अलग करने के लिए उनकी पहचान पूछी, फिर दो लोगों को गोली मारी जो हिंदू और सिख थे.

जिस तरह नये उग्रवादी समूह लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए डिजिटल उग्रवाद का इस्तेमाल कर रहे हैंवैसे में भारत सरकार को झूठे दुष्प्रचार को नियंत्रित करने के लिए प्रभावकारी विरोधी सोच को लागू करना चाहिए.

नये संगठनों की एक और अलग करने वाली बात ये है कि वो अपने हमलों को सही ठहराने के लिए उन्हें अपने व्यापक मक़सद से जोड़ देते हैं. 7 अक्टूबर को हमले के बाद टीआरएफ ने एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया कि जिन शिक्षकों की हत्या की गई है उन्होंने स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होने के लिए बच्चों को परेशान किया. बयान में ये भी कहा गया कि ये हमला ‘शिक्षा प्रणाली के राजनीतिकरण’ और ‘शिक्षा को गंदे एजेंडे में डालने’ की वजह से किया गया है. नये उग्रवादी समूह अपने हर हमले के लिए कारण बताकर ज़िम्मेदारी लेते हैं. वो दावा करते हैं कि पीड़ित ‘औपनिवेशिक योजना के मददगार’ थे. साथ ही आक्रमण के ख़िलाफ़ प्रतिरोध और फासिज़्म के ख़िलाफ़ जिहाद पर भी ज़ोर देते हैं. ये इन संगठनों के द्वारा ख़ुद को कश्मीरी जनता, उनके अधिकारों और उनकी नागरिक स्वतंत्रता के सच्चे नुमाइंदे के तौर पर पेश करने की भी कोशिश है. नये उग्रवादी समूह भारतीय समाज की मुख्यधारा में कश्मीर के मिलने में रुकावट के सीमित उद्देश्य से काम करते हैं. ये अक्टूबर 2020 में टीआरएफ के द्वारा जारी ‘रणनीतिक टिप्पणी’ के ज़रिए भी स्पष्ट होता है जिसमें उसने एलान किया कि वो ग़ैर-स्थानीय लोगों को निशाना बनाएगा; ग़ैर-स्थानीय कारोबारियों को रोकेगा, अधिवासियों को ज़मीन का आवंटन नहीं होने देगा, ग़ैर-स्थानीय लोगों को नौकरी और दाखिला नहीं लेने देगा;  और किसी बाहरी उद्योग को बढ़ावा देने में मदद करने वालों को आतंकित करेगा.

कश्मीर में डिजिटल उग्रवाद की एक नई लहर की शुरुआत की जिसने स्थानीय भर्तियों और स्थानीय आंदोलन को बढ़ावा दिया. 

इस नये ऑनलाइन दुष्प्रचार में ये दावा भी किया गया है कि सुरक्षा बल ग़लत ढंग से निर्दोष नागरिकों को फंसा रहे हैं और गिरफ़्तारियों एवं आतंक विरोधी अभियानों के ज़रिए सुरक्षा हालात को सुधारने में अपनी नाकामी को छिपा रहे हैं. इन उग्रवादी समूहों के ऑनलाइन कंटेंट का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षा एजेंसियों को बदनाम करने, उनको नुक़सान पहुंचाने और उन्हें कलंकित करने के लिए होता है. इसके लिए सुरक्षा एजेंसियों के आतंकवाद विरोधी क़दमों को यातना, अत्याचार और अधिकारों का उल्लंघन बताया जाता है. इसका मक़सद सुरक्षा के लिए उठाए गए क़दमों को कश्मीरी नागरिकों की नज़र में अवैध ठहराना होता है. उदाहरण के लिए, टीआरएफ दावे से कहता है कि प्रतिरोध को दबाने के लिए सुरक्षा एजेंसियां, ख़ास तौर पर स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप, कश्मीरी समाज को नशे की लत के लिए प्रेरित कर रही हैं. आतंक विरोधी अभियान की पृष्ठभूमि का ज़िक्र करते हुए सुरक्षा एजेंसियों के द्वारा किसी भी घोषणा का जवाब उग्रवादी समूह ‘राजनीतिक इच्छा पूरी करने के लिए झूठी कहानी बेचने’ की कोशिश के रूप में देते हैं. इस तरह के रुझान दिखाते हैं कि नये उग्रवादी समूह घाटी में आतंक के सुरक्षा से जुड़े मतलब को कम महत्व दे रहे हैं और मौजूदा परिस्थिति को सुरक्षा एजेंसियों और सरकार के द्वारा हासिल की गई राजनीतिक अशांति के तौर पर दिखाते हैं.

नेटवर्क की राह

बुरहान वानी के मॉडल से अलग नये समूह अपने द्वारा भर्ती किए गए नौजवानों की पहचान गुप्त रखते हैं क्योंकि अब उग्रवाद को ‘ओवर ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू)’ और ‘हाइब्रिड उग्रवादियों’ के द्वारा अंजाम दिया जाता है. अक्सर भर्ती का एलान ऑडियो क्लिप के द्वारा किया जाता है जिसमें भर्ती किए गए युवक की आवाज़ होती है. पहले भर्ती किए गए उग्रवादियों की सोशल मीडिया पर लोकप्रियता से उग्रवादी संगठनों को स्थानीय लोगों के साथ ज़मीन पर संबंध बनाने में मदद मिलती थी. इसके बावजूद नये तरह का उग्रवाद नेटवर्क के रास्ते में बदलाव देख रहा है और कई संगठनों का अस्तित्व सिर्फ़ सोशल मीडिया पर है. ये एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने वाले नये समूहों की ऑनलाइन और ऑफलाइन रणनीति के बीच अंतर के बारे में बताता है. अतीत में उग्रवादी नेटवर्किंग के ‘समन्वित रास्ते’ पर भरोसा करते थे जिसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन- दोनों क्षेत्रों में समान विचारधाराओं के साथ काफ़ी हिस्सेदारी थी. अब नये समूह ‘प्रोत्साहित रास्ते’ पर चले गए हैं जिसमें नेटवर्किंग के लिए ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर काफ़ी विश्वास किया जाता है और ऑफलाइन संपर्क न्यूनतम होता है. इसके बावजूद नये तरह के उग्रवाद का उद्देश्य नेटवर्किंग का एक ‘अलग-थलग रास्ता’ बनाना है जिसमें कोई व्यक्ति अपने साथ जुड़े मक़सद के नाम पर सीधे हमले को अंजाम देता है और उसका संगठन के साथ ऑनलाइन या ऑफलाइन माध्यम से बेहद कम या बिल्कुल भी संपर्क नहीं होता है. ये ऑनलाइन जारी होने वाले बयानों के ज़रिए लोकप्रिय शब्दावली ‘लोन वुल्फ’ और ‘लोन मुजाहिद’ के अक्सर इस्तेमाल से दिखता है. वास्तव में एक संगठन ने तो ‘लोन मुजाहिद पॉकेटबुक’ भी अपलोड कर दिया जिसे अरब प्रायद्वीप में अल-क़ायदा (एक्यूएपी) से जुड़े अल-मलाहेम मीडिया ने 2015 में जारी किया था. इसके ज़रिए स्थानीय युवाओं को सरकार के ख़िलाफ़ अकेले युद्ध लड़ने के लिए उकसाया गया. रास्तों के इस बदलाव ने सीधे उग्रवादी समूहों के काम करने की रणनीति पर प्रभाव डाला जिसे अप्रैल-मई 2020 में देखा गया जब टीआरएफ सरकार के ख़िलाफ़ कई सशस्त्र मुठभेड़ों में शामिल था. उस वक़्त टीआरएफ के फेसबुक पेज (अब डिलीट कर दिया गया है) पर सबसे ज़्यादा बातचीत देखी गई. उस समय स्टेटस अपडेट और एलान ने सबसे ज़्यादा खिंचाव हासिल किया जो घाटी में डिजिटल और शारीरिक हिंसा के सहजीवी स्वभाव को दोहराता है.

नये संगठन नये समूहों को शुरू करने का बहाना बनाकर प्लैटफॉर्म से अलग करने को धोखा देने में सफल होते हैं. ये संगठन टेलीग्राम जैसे ऐप से अलग होकर छोटे प्लैटफॉर्म जैसे टैमटैम और नैंड बॉक्स पर चले जाते हैं ताकि प्लैटफॉर्म से अलग होने से बचा जा सके. एक चुने हुए कंटेंट को अपलोड करना, हमले का वीडियो बनाने के लिए बॉडी कैमरे का इस्तेमाल करना और ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर झूठे ढंग से हमले का दावा करना- ये नये उग्रवादी संगठनों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली अन्य रणनीतियों में से कुछ हैं. इसके अलावा वानी के मॉडल से हटकर ऑनलाइन सामग्री गुमनाम एडमिनिस्ट्रेटर के द्वारा प्रकाशित की जाती है. शायद ही कभी व्यक्तिगत स्रोतों से ऑनलाइन कंटेंट का प्रकाशन होता है. इसकी वजह से कंटेंट उत्पन्न करने का काम काफ़ी केंद्रीकृत हो गया है ताकि मुख्य एजेंडे से भटकने से परहेज किया जा सके.

बुरहान वानी के मॉडल से अलग नये समूह अपने द्वारा भर्ती किए गए नौजवानों की पहचान गुप्त रखते हैं क्योंकि अब उग्रवाद को ‘ओवर ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू)’ और ‘हाइब्रिड उग्रवादियों’ के द्वारा अंजाम दिया जाता है. 

जिस वक़्त नये संगठन दूसरों के द्वारा फैलाए जाने वाले आतंकवाद को नया रूप देने में लगे हैं, उसी वक़्त दमदार सबूत बताते हैं कि नये तरह के उग्रवाद को सीमा पार से दिशानिर्देश मिल रहा है. नये तरह के उग्रवाद का उद्देश्य भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की सोच से मेल खाता है. उदाहरण के लिए, सितंबर 2021 में पाकिस्तान की सरकार ने ‘भारत के अवैध कब्ज़े वाले जम्मू और कश्मीर (आईआईओजेके) में मानवाधिकार उल्लंघन’ शीर्षक से 131 पन्नों का एक डॉज़ियर जारी किया. पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने इसे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने रखा. इस डॉज़ियर में कई झूठे दावे और ग़लतियां थीं जो नये उग्रवादी समूहों के ऑनलाइन मीडिया जिहाद के दुष्प्रचार की तरह थीं. इनमें आंदोलन को स्थानीय बताना, गिरफ़्तारी को यातना बताना, और आतंकवाद विरोधी अभियानों को झूठा अभियान बताना शामिल है. इसके अलावा विशेषज्ञों के द्वारा पता लगाए गए डिजिटल फॉरेंसिक भी उजागर करते हैं कि नये संगठनों के ऑनलाइन कंटेंट का सीमा पार से संचालन हो रहा है और ये नये उग्रवादी संगठन अक्सर पाकिस्तान सरकार के ट्विटर अकाउंट के द्वारा साझा किए गए कंटेंट को पोस्ट करते हैं जिसमें ग़लत आरोप और झूठे दावे होते हैं.

निष्कर्ष

वैसे तो ये दलील दी जा सकती है कि नये तरह का उग्रवाद धर्मनिरपेक्ष या स्थानीय सोच को बनाने में असफल रहा लेकिन सोशल मीडिया पर नये सिरे से विद्रोह संसाधनों और भर्तियों को आकर्षित कर सकता है. इसकी वजह ये है कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद कई कश्मीरी नागरिक ख़ुद को देश के बाक़ी हिस्सों से ज़्यादा अलग-थलग महसूस करते हैं. चूंकि पाकिस्तान की सेना अभी भी सूचना युद्ध चला रही है, ऐसे में भारत को हर हाल में विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र टीम के साथ एक प्रभावशाली ‘संचार रणनीति’ विकसित करना चाहिए. इस रणनीति के साथ जब-जब कोई झूठी सोच विकसित करने की कोशिश की जाए तब-तब टीम को अनुभव पर आधारित तथ्य मुहैया कराना चाहिए. ऑनलाइन स्पेस में हिस्सेदारी के ज़रिए सहभागी और समावेशी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बेहतर करना और छोटे कंटेंट द्वारा समर्थित सोच बनाना कट्टरता से निपटने के लिए एक असरदार रणनीति है. जैसा कि कुछ विश्लेषक बताते हैं, जब तक भारत सरकार आतंकवाद के ख़िलाफ़ असरदार विरोधी सोच को लागू नहीं करती है, तब तक वो उस ‘दिमाग़ी विस्तार’ को पकड़ नहीं सकती है जो इस चरमपंथ को बढ़ावा देता है.

लेखक ओआरएफ में रिसर्च इंटर्न हैं.

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