एक और उम्मीद की मौत से केवल ज़ख्म हरे होंगे और गुस्सा भड़केगा.
संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के छह हफ़्ते बाद भी कश्मीर घाटी में सामान्य हालात बहुत दूर का ख़्वाब है. सुरक्षा एजेंसियों के अनुमान के विपरीत घाटी में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन नहीं हो रहे हैं. न ही किसी बड़ी उथल-पुथल के कोई संकेत दिख रहे हैं. हक़ीक़त तो ये है कि कश्मीर में हिंसक प्रदर्शन बहुत सीमित स्तर पर ही हुए हैं, जैसा कि कई पत्रकारों ने ख़बर दी है. वो भी गिने-चुने और उन्हीं इलाक़ों में जो हिंसक प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं. यहां तक कि हिंसक प्रदर्शन और आतंकवाद के लिए बदनाम दक्षिणी कश्मीर में भी, ऊपरी तौर पर हालात सामान्य ही दिख रहे हैं. ये इलाक़ा 2017 और 2018 बेहद हिंसक प्रदर्शनों का केंद्र रहा था. लेकिन पिछले छह हफ़्तों में यहां पर भी एक डरावना सन्नाटा पसरा हुआ है.
हालांकि, बड़े पैमाने पर हिंसा न होने का ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि कश्मीर घाटी में हालात सामान्य हैं. बल्कि आप लोगों से बात करें तो साफ़ हो जाता है कि वो ग़ुस्से से भरे हुए हैं. हिरासत में लिए जाने और तफ़्तीश का डर तो है ही, लोगों के बीच नेतृत्व के न होने से ये साफ़ नहीं है कि विरोध को किस दिशा में ले जाना है. यही वजह है कि प्रदर्शनकारी अभी सड़कों पर नहीं उतर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ़, एक दुकानदार को जान-बूझकर निशाना बनाए जाने और सेब के बाग़ीचे के एक मालिक के परिजनों पर हमले की वजह से कर्फ़्यू की मियाद को बढ़ाया गया है. बाज़ार में ऐसी अफ़वाहें जोरों पर हैं कि आतंकवादी अपने छुपने के इलाक़ों में हमले की ताक में बैठे हैं. वहीं लोगों के ज़हन में ख़याली डर भी बैठा है. ऐसी अफ़वाहों ने पूरी घाटी में डर का माहौल बनाया हुआ है. संचार सेवा पूरी तरह से ठप है. इंटरनेट और मोबाइल उपलब्ध नहीं हैं. इससे ग़लत ख़बरों के फैलने के लिए पूरा माहौल बना हुआ है. ऐसे में लोगों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि वो इन अफ़वाहों की हक़ीक़त को कैसे जांचें-परखें. जो वो देख रहे हैं या सुन रहे हैं, उस में कितना सच है और कितना झूठ, ये पता लगाने का कोई तरीक़ा आम लोगों के पास नहीं है. घाटी में ख़बरों और बाहरी दुनिया से जुड़ने का एकमात्र ज़रिया टीवी चैनल हैं. लेकिन, उन्होंने अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह से खो दी है. आज मीडिया को सरकार का भोंपू माना जाता है. आम लोग हर ख़बर को सिरे से प्रोपेगैंडा क़रार देकर ख़ारिज कर देते हैं. किसी से भी बात कीजिए, उसकी शुरुआत भारतीय मीडिया पर गालियों की बौछार से होती है. ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज कश्मीर घाटी में भारत विरोधी माहौल कम है और मीडिया विरोधी माहौल ज़्यादा शिद्दत से बन गया है.
ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज कश्मीर घाटी में भारत विरोधी माहौल कम है और मीडिया विरोधी माहौल ज़्यादा शिद्दत से बन गया है.
श्रीनगर का अनचार (सौरा) इलाक़ा विरोध प्रदर्शन के सबसे प्रमुख केंद्र के तौर पर चर्चित हो रहा है. आज भी यहां का माहौल बहुत संवेदनशील बना हुआ है. यही वजह है कि शायद इस जगह को कुछ ज़्यादा ही मीडिया में जगह मिल रही है. ख़ास तौर से अंतरराष्ट्रीय मीडिया तो सौरा को कुछ ज़्यादा ही तवज्जो दे रहा है. सौरा में हालात असामान्य बने हए हैं और यहां पहुंचना सुरक्षा बलों के लिए भी बड़ी चुनौती बन गा है. क्योंकि, स्थानीय लोगों ने सड़कें खोद डाली हैं और रास्तों में बैरियर लगा दिए हैं, ताकि पुलिस उनके मुहल्लों में न घुस सके. पूरी कश्मीर घाटी में यही एक जगह है जहां टीवी कैमरों का सामना प्रदर्शनकारियों से होता है. इस जगह की अहमियत इसी वजह से है. ये जगह एक वर्ग किलोमीटर से भी कम इलाक़े वाली है और यहां 200 से ज़्यादा परिवार नहीं रहते हैं. लेकिन, इन बातों की कोई अहमियत नहीं है.
हालांकि, सौरा कश्मीर घाटी के दूसरे इलाक़ों में विरोध-प्रदर्शनों का मॉडल बन सकता है. लोग यहां से सीख कर अपने-अपने इलाक़ों में भी सड़कें खोद कर और बैरीकेड लगाकर, सुरक्षा बलों को अपने इलाक़ों ‘आज़ाद’ रख सकते हैं. कश्मीर में इस तरह का विरोध-प्रदर्शन बिल्कुल नया है. और हिंसक प्रदर्शनों के इन इलाक़ों में आतंकवादियों की मौजूदगी सुरक्षा बलों के लिए हालात और मुश्किल बना सकती है, ख़ास तौर से दक्षिणी कश्मीर में.
सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों से बातचीत करने पर पता चलता है कि सरकार को अनुच्छेद हटाए जाने के ख़िलाफ़ बेहद तीव्र हिंसक प्रदर्शनों की आशंका थी. उनका अनुमान था कि जिस तरह 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी जल उठी थी, हालात कुछ वैसे ही होंगे. लेकिन, 5 अगस्त के बाद सुरक्षा के हालात जिस तरह बने हैं, उनसे ख़ुद सुरक्षा एजेंसियां हैरान हैं. इससे, उनके बनाए समीकरण भी ध्वस्त हो गए हैं. फिर भी, सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े अधिकारी कोई जोख़िम नहीं ले रहे हैं. न ही वो किसी तरह की रियायत बरतने के मूड में हैं. वो ये मानते हैं कि घाटी के लोगों में ग़ुस्सा भरा हुआ है, जो कभी भी भड़क सकता है.
इसीलिए किसी भी तरह की हिंसा की वजह मुहैया कराने से बचने के लिए सुरक्षा बल बहुत फूंक-फूंक कर क़दम उठा रहे हैं. सरकार के पास मौजूदा हालात से बाहर निकलने की कोई रणनीति नहीं है. इसीलिए, प्रशासन ये स्थिति बने रहने देने के पक्ष में है, जिस में ऊपरी तौर पर अमन क़ायम है. थोड़ी-बहुत हिंसा हो और इस वजह से नागरिकों के लिए कर्फ्यू जारी रहे. यही वजह है कि ज़मीनी स्तर पर मौजूद अधिकारियों की सिफ़ारिशों के बावजूद संचार और संवाद माध्यमों पर लगी पाबंदी हटाई नहीं गई है.
सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात ये है कि तनाव या झड़प की एक भी घटना से पूरे कश्मीर में हिंसक विरोध-प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं. सुरक्षा बल पहले ही ये अनुमान लगा रहे हैं. बल्कि वो आने वाले कई महीनों और बरसों में हिंसक प्रदर्शन की वजह का अनुमान भी लगा रहे हैं. पहले हुए हर विरोध प्रदर्शन पिछले वाले से ज़्यादा तेज़ रहे हैं. 2010 में भड़की हिंसा 2008 के विरोध प्रदर्शनों के बिना नामुमकिन थी. इसी तरह बुरहान वानी से प्रेरित आतंकवाद की जड़ें 2010 के विरोध प्रदर्शनों में थीं. इसीलिए आज ज़मीनी स्तर पर पसरे सन्नाटे और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन न होने को आने वाले वक़्त के लिए चिंताजनक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. सुरक्षा बलों का अनुमान है कि भविष्य में अगर लोगों का ग़ुस्सा फूटा, तो उसका अंदाज़ा लगाना तो मुश्किल होगा ही, वो पिछले प्रदर्शनों से ज़्यादा तेज़ भी होगा.
उग्रवादियों और अलगाववादियों के समर्थक लोग, मुख्य धारा के राजनेताओं को हिरासत में लिए जाने को वरदान की तरह देखते हैं. उनकी राय में मुख्य धारा के नेता असल में भारत सरकार के और उसकी नीतियों के दलाल थे.
शुरुआती महीनों में लगाई गई पाबंदियों की वजह से ही लोग बड़े पैमाने पर इकट्ठे होकर अपना विरोध नहीं जता सके. लेकिन, घाटी में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन नहीं हुए, तो इसकी एक वजह ये भी है कि छोटे-बड़े सियासी लीडरों और कार्यकर्ताओं को सरकार ने पहले ही हिरासत में ले लिया था. पिछले छह हफ़्तों में पुलिस ने उन प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया है, जिन्हें सुरक्षा एजेंसियों की भाषा में ‘ट्रबलमेकर’ या परेशानियों की जड़ कहा जाता है. ये प्रदर्शनकारी हर उस इलाक़े से पकड़े गए हैं, जहां पर हिंसक प्रदर्शनों की आशंका थी. बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लिए जाने से लोगों के दिलों में डर बैठ गया है. इसकी एक वजह ये भी है कि हिरासत में लिए गए बहुत से लोग राज्य से बाहर की जेलों में क़ैद किए गए हैं. आज कोई भी पुलिस अधिकारी ये बताने को तैयार नहीं है कि हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या कितनी है. ये बात हैरान करने वाली है. क्योंकि पहले सुरक्षा एजेंसियां हिरासत में लिए जाने वाले लोगों के आंकड़े छुपाती नहीं थीं. स्थानीय लोगों से बात करने पर पता चलता है कि हिरासत में लिए गए बहुत से लोगों को परिवार और दोस्तों की तरफ़ से विरोध-प्रदर्शन न करने की गारंटी दिए जाने के बाद छोड़ दिया गया.
मुख्य धारा के राजनेताओं की गिरफ़्तारी पर अलगाववादी और सरकार दोनों ही एकमत हैं. ये अजीब बात है. क्योंकि, दोनों का ये मानना है कि मुख्य धारा के इन नेताओं की धर-पकड़ से कश्मीर की सियासी ज़मीन साफ़ हुई है. उग्रवादियों और अलगाववादियों के समर्थक लोग, मुख्य धारा के राजनेताओं को हिरासत में लिए जाने को वरदान की तरह देखते हैं. उनकी राय में मुख्य धारा के नेता असल में भारत सरकार के और उसकी नीतियों के दलाल थे. सियासी मैदान से उनके बाहर होने की वजह से अब बीच-बचाव की गुंजाईश ख़त्म हो गई है. ऐसे लोगों के मुताबिक़, अब नरमपंथी राजनीति का वक़्त ख़त्म हो गया है. सरकार की तरह ही, अलगाववादी और ख़ास तौर से इस्लामिक विचारधारा वाले अलगाववादी नेता चाहते थे कि जनता किसी एक पक्ष को चुन ले. आज कश्मीर में बहुत से लोग हुर्रियत कांफ्रेंस के कट्टरपंथियों की उस बात से इत्तेफ़ाक़ रखने लगे हैं, जो मुख्य धारा के सभी नेताओं और सूबे के मुख्यमंत्रियों को ‘कठपुतली’ कहा करते थे.
अब कश्मीर में बीच का कोई रास्ता नहीं बचा है. या तो आप भारत के साथ हैं या फिर कश्मीरियों के साथ. अगर आप भारत की हुकूमत के साथ हैं, तो आप को आरएसएस का समर्थक होने का ठप्पा झेलना होगा. इस के बरक्स, आज आप तभी कश्मीर के साथ माने जाएंगे, जब आप इस्लामिक अलगाववादियों का पूरी तरह से समर्थन करेंगे. अगर कोई भी ज़मीनी स्तर पर लोगों के विचारों से असहमत होता है, तो उसे तुरंत ‘आरएसएस का समर्थक’ या ‘बीजेपी का एजेंट’ करार दे दिया जाता है. ये हालात हमें उस दौर की याद दिलाते हैं, जब कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को ‘देशद्रोही’ क़रार दे दिया जाता था.
इस में कोई दो राय नहीं कि मौजूदा हालात में सबसे ज़्यादा वो कश्मीरी लोग प्रभावित हुए हैं, जो भारत के पक्ष में खड़े थे. घाटी में इनकी तादाद बहुत कम है. आज ऐसे लोगों के सारे तर्क अलगाववादियों और इस्लामिक उग्रवादियों के सामने बेकार हो गए हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि उनके पास जो बनावटी पैर था, वो भी उनसे छीन लिया गया है और उन्हें अब आतंकवादियों से भी ख़तरा बढ़ गया है.
उम्मीदों की बात करते हैं, तो हर कश्मीरी ने 27 सितंबर को कश्मीर के लिए सब से अहम तारीख़ के तौर पर नोट कर के रखा है. क्योंकि 27 सितंबर को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया.
सुरक्षा बलों के बीच ये राय आम है कि कश्मीर में अब आतंकवाद बढ़ेगा. आतंकवाद की वजह से उन कश्मीरियों के लिए मुश्किल होगी, जो घाटी में सामान्य हालात और तरक़्क़ी होते देखना चाहते हैं. इन लोगों का जोख़िम बढ़ेगा तो वो और भी खामोशी अख़्तियार कर लेंगे. श्रीनगर में एक दुकानदार पर हमला और सोपोर में एक बागान मालिक के परिवार को निशाना बनाया जाना इस बात के संकेत हैं कि जो नागरिक हालात सामान्य होते देखना चाहते हैं, उनके लिए मुश्किल होनी तय है.
मोबाइल टेलीफ़ोन पर लगी पाबंदी की वजह से सुरक्षा एजेंसियों को भी ख़ुफ़िया जानकारी मिलने में दिक़्क़त हो रही है. पुलिस के ख़बरी, आतंकवादियों की आवाजाही की जानकारी सुरक्षा एजेंसियों को नहीं दे पा रहे हैं. इससे आतंकवाद विरोधी अभियान कम-ओ-बेश रुक ही गए हैं. पिछले साल रमज़ान में एक महीने तक आतंकवादियों के ख़िलाफ़ अभियान रुके रहे थे. लेकिन, इस बार ये अभियान क़रीब डेढ़ महीने से बंद हैं. रमज़ान के युद्ध विराम के दौरान मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं चालू होने से सुरक्षा एजेंसियों को जानकारी मिलने के बेहतर माध्यम उपलब्ध थे. लेकिन, इंटरनेट पर पाबंदी की वजह से तकनीकी ख़ुफ़िया जानकारी का भी अभाव हो गया है. इससे आतंकवादियों को फिर से एकजुट होने और पूरी आज़ादी से घूमने का मौक़ा मिल गया है.
मुख्यधारा के राजनेताओं और अलगाववादियों की ग़ैरमौजूदगी में आतंकवादियों और उनके आतंक के डर ने लोगों को ज़हनी और शारीरिक तौर पर डरा कर रखा हुआ है. वहीं दूसरी तरफ़, अलगाववादियों के समर्थक अब हिंसा और आतंकवाद को ही आबादी में होने वाले बदलाव से सुरक्षा का इकलौता माध्यम मानने लगे हैं. इंटरनेट पर पाबंदी की वजह से संदेशों की आवाजाही सीमित है. आज चिट्ठियों और दीवारों पर पोस्टर चिपका कर ही संदेशों का लेन-देन किया जा रहा है. जब इंटरनेट सेवा बहाल होगी, तो आतंकवादियों की तरफ़ से जारी किए जाने वाले वीडियो और ऑडियो संदेश लोगों तक पहुंचेंगे. इससे ज़मीनी स्तर पर हालात और भी बिगड़ेंगे.
हालांकि कश्मीरियों के बीच ग़ुस्सा एकदम साफ़ दिखता है. लेकिन, जो लोग अलगाववाद के समर्थक हैं, वो अभी खामोशी से इंतज़ार करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. यही वजह है कि सुरक्षा बलों को इस साल बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की आशंका नहीं दिख रही. बल्कि, सच तो ये है कि हर व्यक्ति या समूह ये उम्मीद लगाए बैठा है कि दूसरा उसकी तरफ़ से लड़ाई लड़ेगा. सरकार पुलिस कर्मचारियों के इस्तीफ़े की उम्मीद लगा रही है, तो पुलिसकर्मी ख़ुद के बर्ख़ास्त किए जाने का इंतज़ार कर रहे हैं. इसी तरह, सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करने वाले, आतंकवादियों से हमलों की उम्मीद लगाए बैठे हैं. वहीं, आतंकवादियों को ये आशा है कि अफ़ग़ानी आतंकी कश्मीर में घुसपैठ करेंगे और उनके लिए भारत से लड़ेंगे. ज़्यादातर कश्मीरियों को पाकिस्तान से उम्मीद है कि वो कोई नाटकीय क़दम उठाएगा. कुछ लोगों को चीन से भी अपेक्षाएं हैं. अब ऐसा होता है या नहीं, लेकिन अकल्पनीय अफ़वाहों के बीच हर दिन एक नई उम्मीद के साथ गुज़ार रहे हैं. (जैसे कि बहुत से लोग ये दावा कर रहे थे कि गुलमर्ग पर पाकिस्तानी फ़ौज की बॉर्डर एक्शन टीम ने क़ब्ज़ा कर लिया है.) ऐसे माहौल में किसी को भी भारत सरकार से राहत (विकास या रोज़गार वग़ैरह की) की कोई उम्मीद नहीं है. एक वरिष्ठ पत्रकार ने इस माहौल को ‘उम्मीदों की मौत’ का नाम दिया है.
उम्मीदों की बात करते हैं, तो हर कश्मीरी ने 27 सितंबर को कश्मीर के लिए सब से अहम तारीख़ के तौर पर नोट कर के रखा है. क्योंकि 27 सितंबर को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया. हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने तो कश्मीर का ज़िक्र भी नहीं किया. लेकिन, इमरान ख़ान ने कश्मीर के अवाम की तकलीफ़ों का हवाला देकर एटमी जंग तक की धमकी दे डाली. हालांकि, आम कश्मीरियों से बात करते हुए घाटी में हिंसा और आतंकवाद के नफ़ा और नुक़सान के बारे में तर्क-वितर्क करना मुश्किल है. लेकिन, उन में से एक का बयान सबस अलग मालूम होता है. और वो ये है कि, ‘जाइए और दिल्ली में बैठे लोगों को बता दीजिए कि आप ये जंग हार गए हैं. बिना हिंसा के आज दुनिया कश्मीर के बारे में बात कर रही है. ज़रा सोचिए अगर घाटी में, या फिर सरहद पर जंग के हालात पैदा हुए, तो फिर क्या होगा?’
संयुक्त राष्ट्र महसभा की बैठक से कश्मीरियों ने जितनी उम्मीदें लगा रखी हैं, उससे शायद वो निराश ही हों. लेकिन एक और उम्मीद की मौत से लोगों को यक़ीनन तकलीफ़ होगी. उनका ग़ुस्सा भड़केगा. वो हारा हुआ महसूस करेंगे. इससे उनके अंदर हिंसा की ख़्वाहिश पैदा होगी और वो उग्रवादियों का समर्थन करेंगे. ऐसे बंटे हुए माहौल में, कश्मीरियों का वो छोटा सा तबक़ा, जो भारत के साथ खड़ा था और हमेशा शांति और तरक़्क़ी का हिमायती रहा था, वो अब सारे समीकरणों से बाहर हो जाएगा.
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Khalid Shah was an Associate Fellow at ORF. His research focuses on Kashmir conflict Pakistan and terrorism. ...
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