Author : Harsh V. Pant

Published on Jul 31, 2023 Updated 0 Hours ago

आज अमेरिका और भारत वास्तविक अर्थों में रणनीतिक साझेदार हैं. यह भी सच है कि परिपक्व शक्तियों के बीच साझेदारी कभी पूर्ण एकरूपता में नहीं परिवर्तित हो पाती. निरंतर संवाद से मतभेदों को दूर कर नए अवसर तलाशने होते हैं. टू प्लस टू वार्ता का सार यही कहता है.

क्या सही दिशा की तरफ़ बढ़ रहे हैं भारत-अमेरिका संबंध?
क्या सही दिशा की तरफ़ बढ़ रहे हैं भारत-अमेरिका संबंध?

भारत और अमेरिका के रक्षा एवं विदेश मंत्रियों के बीच गत सप्ताह हुआ टू प्लस टू संवाद इसका उदाहरण है कि यूक्रेन पर रूसी हमले के कारण द्विपक्षीय संबंधों के पटरी से उतरने की आशंका निर्मूल सिद्ध हुई. इसी मंच पर भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर का एक बयान भी बहुत चर्चित हुआ. जयशंकर ने अमेरिका को आईना दिखाते हुए भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अपनी मंशा स्पष्ट की थी. उन्होंने कहा था कि भारत महीने भर में जितना तेल रूस से आयात कर रहा है, उससे अधिक तेल तो यूरोपीय देश एक दुपहरी में खरीद लेते हैं. तमाम भारतीयों ने इसे उस अमेरिकी दबाव का करारा जवाब माना, जो यूक्रेन को लेकर वाशिंगटन लगातार नई दिल्ली पर डालता दिखाई दे रहा था. वहीं अमेरिका में तमाम लोग इसे यूरोप में लगातार बदतर हो रहे हालात के बावजूद रूस के मामले में भारत द्वारा अपनी अलग नीति अपनाने के तौर पर देखेंगे. वस्तुत: जयशंकर का बयान यही जाहिर करने वाला था कि यूरोप के इस संकट को भारत और अमेरिका अपने-अपने नजरिये से देख रहे हैं.

जयशंकर ने अमेरिका को आईना दिखाते हुए भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अपनी मंशा स्पष्ट की थी. उन्होंने कहा था कि भारत महीने भर में जितना तेल रूस से आयात कर रहा है, उससे अधिक तेल तो यूरोपीय देश एक दुपहरी में खरीद लेते हैं.

टू प्लस टू वार्ता का संदेश

इस वार्ता को टू प्लस टू के बजाय थ्री प्लस थ्री कहना कहीं ज़्यादा उपयुक्त होगा, क्योंकि इसमें नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन भी वर्चुअली शामिल हुए. इस वार्ता से यही संदेश निकला कि कुछ मुद्दों पर असहमति के बावजूद दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र किसी परस्पर स्वीकार्य समाधान की दिशा में मिलकर काम करने को तैयार हैं. रूस-यूक्रेन टकराव को लेकर हाल के दिनों में भारत-अमेरिका में मतभेद से जुड़ी जो सुर्खियां छाई रहीं, उसके उलट भारत और अमेरिका ने हाल के वर्षों में परवान चढ़ी मित्रता को और प्रगाढ़ बनाने की प्रतिबद्धता जताई. स्पष्ट है कि दोनों देश व्यापक रणनीतिक परिदृश्य को अनदेखा नहीं कर रहे.

इस वार्ता से यही संदेश निकला कि कुछ मुद्दों पर असहमति के बावजूद दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र किसी परस्पर स्वीकार्य समाधान की दिशा में मिलकर काम करने को तैयार हैं.

नि:संदेह यूक्रेन पर रूसी हमले के वैश्विक निहितार्थ होंगे और उसके दुष्प्रभावों से बचना मुश्किल है और यही कारण है कि भारत-अमेरिका वार्ता के एजेंडे में इस पर व्यापक चर्चा हुई. हालांकि, वास्तविकता यही है कि आज दोनों देशों की साझेदारी का दायरा अत्यंत विस्तृत हो गया है. इनमें कोविड-19 महामारी से निपटना, महामारी के बाद आर्थिक रिकवरी, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, महत्वपूर्ण एवं अभिनव तकनीक, आपूर्ति शृंखला, शिक्षा, भारतवंशियों से जुड़े और सामरिक विषय शामिल हैं. इस साझेदारी का दायरा व्यापक होने के साथ ही उसमें खासी गहराई भी है. सहयोग में बढ़ोतरी की रफ्तार भी बहुत तेज है. यह साझेदारी अपने आप में इस कारण और अनूठी है कि जहां इसमें रणनीतिक-राज्य स्तरीय सहयोग जारी है, तो वहीं लोगों के स्तर पर भी सक्रियता बढ़ रही है.

कई ठोस मुद्दों पर सहयोग के आसार

टू प्लस टू वार्ता में कई ठोस मुद्दों पर बात आगे बढ़ी. दोनों देशों ने अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई. इसमें आउटर स्पेस, साइबर स्पेस और इस मोर्चे पर सामरिक क्षमताओं के विकास को लेकर चर्चा हुई. रक्षा साझेदारी पर अमेरिकी रक्षा मंत्री लायड आस्टिन ने कहा कि दोनों देशों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सेनाओं की परिचालन पहुंच एवं सहयोग बढ़ाने के नए अवसर तलाशे हैं. उन्होंने सीमा पर चीन द्वारा बुनियादी ढांचे के दोहरे इस्तेमाल का उल्लेख किया. साथ ही भारत के संप्रभु हितों की सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की. इस वार्ता के दौरान दो साथियों में किसी मतभेद के नहीं, बल्कि उनके सहमति बनाने के ही स्वर सुनाई पड़े.

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने अभी तक भारत पर किसी संभावित प्रतिबंध या संभावित रियायत को लेकर स्पष्टता नहीं दर्शाई. यह वाशिंगटन में इस बात के स्पष्ट संकेत का प्रतीक है कि भारत पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध रिश्तों को दशकों पीछे ले जाएगा.

यूक्रेन संकट को लेकर भारत और अमेरिका के बीच मतभेद काफी समय से स्पष्ट हैं. आखिरकार दोनों देशों के रिश्तों में रूस कोई नया पहलू नहीं है. भारत-रूस रक्षा साझेदारी का पहलू लंबे समय से प्रभावी रहा है. रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली की ख़रीद का पेच दोनों देशों के बीच लंबे समय से फंसा रहा. उसे काटसा कानून की कसौटी से गुजरना पड़ा. हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने अभी तक भारत पर किसी संभावित प्रतिबंध या संभावित रियायत को लेकर स्पष्टता नहीं दर्शाई. यह वाशिंगटन में इस बात के स्पष्ट संकेत का प्रतीक है कि भारत पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध रिश्तों को दशकों पीछे ले जाएगा. साथ ही इससे भारत में वह बहस फिर जोर पकड़ेगी कि एक साझेदार के रूप में अमेरिका पर कितना भरोसा किया जा सकता है.

भारत-अमेरिका साझेदारी के लिए नए द्वार

एक प्रकार से यूक्रेन संकट ने भारत-अमेरिका साझेदारी के लिए नए द्वार खोले हैं. अमेरिकी उप-विदेश मंत्री विक्टोरिया न्यूलैंड ने भारत यात्रा के दौरान स्वीकार किया कि रक्षा आपूर्ति के लिए रूस पर भारत की निर्भरता भी तार्किक है, जो उस विरासत का परिणाम है, जब सोवियत संघ और रूस ने भारत को रक्षा सहयोग उपलब्ध कराया, जिस दौर में अमेरिका भारत के प्रति उतना उदार नहीं था. वहीं अब इस द्विपक्षीय सक्रियता से जुड़ी नई वास्तविकताओं को देखते हुए समय की मांग है कि अमेरिका तकनीकी हस्तांतरण के साथ भारत को रक्षा उत्पादन आधार विकसित करने में सहायता के अलावा सह-उत्पादन एवं सह-विकास की दिशा में आगे बढ़े. आत्मनिर्भर भारत ही सही मायनों में रणनीतिक रूप से स्वायत्त होगा. वर्तमान संकट दोनों देशों के लिए नई संभावनाओं को समझने का पड़ाव बने.

अब इस द्विपक्षीय सक्रियता से जुड़ी नई वास्तविकताओं को देखते हुए समय की मांग है कि अमेरिका तकनीकी हस्तांतरण के साथ भारत को रक्षा उत्पादन आधार विकसित करने में सहायता के अलावा सह-उत्पादन एवं सह-विकास की दिशा में आगे बढ़े. 

यूक्रेन पर भारत के रुख़ को तटस्थ या गुटनिरपेक्ष बताया जा रहा है. हालांकि यह पुराने जमाने वाली गुटनिरपेक्षता नहीं है. साथ ही भारत इस अवसर का उपयोग अपने हितों की पूर्ति में भी कर रहा है. फिर चाहे अमेरिका को रक्षा साझेदारी पर नए सिरे से विचार करने के लिए उन्मुख करना हो या फिर अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए रूस से सस्ता तेल खरीदना. दूसरी ओर भारत का यह रुख एकदम स्पष्ट है कि वह यूक्रेन की क्षेत्रीय संप्रभुता, यूएन चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को सम्मान देने की बात कर रहा है. यह अमेरिका की ख़ुशामद के लिए नहीं, बल्कि अप्रत्याशित बदलाव से गुजर रही अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में भारत के उभार का प्रतीक है.

आज अमेरिका और भारत वास्तविक अर्थों में रणनीतिक साझेदार हैं. यह भी सच है कि परिपक्व शक्तियों के बीच साझेदारी कभी पूर्ण एकरूपता में नहीं परिवर्तित हो पाती. इसका सरोकार निरंतर संवाद के माध्यम से मतभेदों को दूर कर नए अवसर तलाशने से होता है. टू प्लस टू वार्ता के सार में यही प्रतिध्वनित होता है.

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यह लेख जागरण में प्रकाशित हो चुका है.

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