Author : Rumi Aijaz

Published on Mar 22, 2022 Updated 0 Hours ago

इस मसौदा योजना के अवलोकन और अंतिम रूप देने के संबंध में उसके विकास, कई चिंताओं को प्रकट करता हैं 

दिल्ली शहर को ज़रूरत है एक बेहतर मास्टर प्लान की!

वैश्विक तौर पर कुछ शहरी प्रशासन अपने नागरिकों को बेहतर जीवन शैली देने की भरसक कोशिश कर रहे हैं. उन्हें इस बात का एहसास है कि समुदाय की भलाई न केवल उनका मौलिक अधिकार है, अपितु एक सशक्त राष्ट्र बनाने के लिए ज़रूरी एक महत्वपूर्ण ज़रूरत भी है. समाज के उत्थान के लिए और ये सुनिश्चित करने के लिए की सभी को इन प्रयासों का लाभ प्राप्त हो सके, इसके लिए बनायी जा रही नीतियों में उनके प्रयास प्रतिबिंबित हो रहे हैं. 

शहरों में रहने को लेकर लोगों की धारणा का अवलोकन करने के उद्देश्य से किए गए शोध के नतीजे, स्पष्टतः इस बात की ओर इशारा करती है कि किस तरह से शहरी प्रशासन नागरिकों की चिंताओं का निवारण कर रही हैं. वे शहर जो नागरिक संतुष्टि का उच्चतम स्तर रिकॉर्ड कर रहे हैं, वे ख़ुशहाली और जीवनयापन के प्रमाणक पर भी ऊंचे स्तर पर हैं. लेकिन लोगों की जीवन शैली को और बेहतर करने के उद्देश्य से तैयार किये गये ऐसे people-centric या आम लोगं पर केंद्रित दृष्टिकोण काफी सीमित हैं. दुर्भाग्यवश, भारत में शहरी प्रशासन इस दिशा में काफी पिछड़ी हुई है. यहाँ, तैयारियों में ख़ामियाँ और कार्यों के निष्पादन का तौर-तरीका सामाजिक और आर्थिक असमानता के स्थायी बने रहने की एक प्रमुख वजह है. यहाँ तक की देश की राजधानी दिल्ली, भी जीवन की गुणवत्ता इंडिकेटर के प्रमाणक पर बेहतर नहीं कर रहा है. 

जिस तरह से शहरी प्रशासन कार्य करती है, वैसी स्थिति में, भारतीय शहरों में मौजूद विरोधाभासी स्थितियां कुछ ज़रूरी सुधार का आह्वान करती हैं. ऐसा करने की दिशा में दिल्ली द्वारा एक अग्रणी और प्रेरणादायक भूमिका अदा की जा सकती हैं.

लेकिन जिस तरह से शहरी प्रशासन कार्य करती है, वैसी स्थिति में, भारतीय शहरों में मौजूद विरोधाभासी स्थितियां कुछ ज़रूरी सुधार का आह्वान करती हैं. ऐसा करने की दिशा में दिल्ली द्वारा एक अग्रणी और प्रेरणादायक भूमिका अदा की जा सकती हैं. इस शहर के पास ज्ञान, रचनात्मकता, संसाधन, जैसी कई मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं, जहां इन नैसर्गिक संपत्तियों का समय की मांग के अनुसार, न्यायसंगत इस्तेमाल किया जा सकता है. विशेष तौर पर, शहरीकरण के समसामयिक चुनौतियों और भविष्य के विकास को संबोधित करने के लिए, 2021-2041 के चतुर्थ मास्टर प्लान (एमपीडी) के रूप में – दिल्ली के पास इसे हासिल करने का एक बेहतरीन अवसर है. दिल्ली विकास प्राधिकरण (दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी – डीडीए) द्वारा तैयार किया गया ये ड्राफ्ट प्लान, जून 2021 से ही आम जनता के सुझाव और आपत्तियों को साझा करने के निमंत्रण हेतु पब्लिक डोमेन में मौजूद है. इसे अंतिम रूप दिए जाने के उपरांत, विभिन्न शहरी क्षेत्रों और नए विकास कार्यों के सुधार कार्यों हेतु अमलीकरण में लाया जाएगा.  

मसौदे से जुड़ी चिंताएं

शहरों में रहने वाले लोगों की जीवन शैली को एक बेहतर शक्ल देने के उद्देश्य से बनाए गए मास्टर प्लान की महत्ता को ध्यान में रखते हुए, ये एक आदर्श समय है, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए की ये आगामी प्लान विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, और पर्यावरणीय समस्याओं से जूझती इस राष्ट्रीय राजधानी को एक सफल और व्यवहारिक प्रतिक्रिया दे पाने में सफल हो. इस मसौदा योजना के अवलोकन और अंतिम रूप देने के संबंध में उसकी प्रगति, कई चिंताओं को प्रकट करती है.  

प्लान की अनुपलब्धता के कारण, योजनाओं को लागू करने में देरी करने का काम करती है, जिसके शिकार इनके अमलीकरण के लिये नियुक्त एजेंसियां होती हैं.

इसमें पहला मुद्दा इस प्लान के समयानुसार क्रियान्वयन संबंधी है. आदर्श के तौर पर, इस प्लान को 2021 में ही सुनिश्चित कर इसे आम लोगों के लिये नोटिफाई कर दिया जाना चाहिए था. लेकिन, उसमें देरी हो गई. प्लान की अनुपलब्धता के कारण, योजनाओं को लागू करने में देरी करने का काम करती है, जिसके शिकार इनके अमलीकरण के लिये नियुक्त एजेंसियां होती हैं. इसके अलावा और शहरी विकास में अप्रबंधन की वजह भी इन प्रोजेक्ट्स के लागू करने में देरी की वजह बन रही है. पूर्व में भी इन विलंबों की वजह से मलिन बस्तियों और अनाधिकृत कॉलोनियों का विस्तार हुआ है और साथ ही पर्यावरणीय ह्रास भी हुआ है. इन योजनाओं को अंतिम रूप देने में मौजूद बाधायें, जैसे विभिन्न विभागों से मिलने वाली स्वीकृति, समय-समय पर प्राप्त फीडबैक के आधार पर ड्राफ्ट प्लान मे आमूल-चूल परिवर्तन, डाटा को एकत्रित करना, भूकर मानचित्र तैयार करना आदि को तत्काल संबोधित किया जाना चाहिए. 

दूसरी बात, इस ड्राफ्ट प्लान के तैयारी में लोगों की सहभागिता काफी कम रही है. हालांकि, विविध हितधारकों से इस संबंध में सलाह भी ली गई है, लेकिन वे समुदाय जो अलग-अलग अनौपचारिक और शहर के परीधिय सीमा पर रहते हैं, वे लोग इन योजनाओं से अवगत नहीं हैं. इसका यह अर्थ है कि इन योजनाओं का जो मसौदा बना है वो समावेशी नहीं हैं. अगर समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा परेशानियों से जूझने के कारण को बेहतर तरीके से नहीं समझा गया या विचाराधीन रखा गया, तो उनकी ज़रूरतें कभी पूरी नहीं हो पायेंगी. आदर्श रूप में, सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया की पहुँच और भी विस्तृत होनी चाहिए थी. 

पूर्व की योजनाओं के मसौदे में, वित्तीय डिटेल को शामिल नहीं किया जाना, इस मसौदे के अधूरे अमलीकरण की महत्वपूर्ण वजह है.

तीसरी बात, वित्तीय मुद्दों पर, ये मसौदा योजना बिल्कुल ही शांत हैं, उदाहरणार्थ इन प्रपोज़ल के अमलीकरण के लिए कितने फंड की ज़रुरत पड़ेगी और पहले से ही अतिरिक्त भारग्रसित कार्य करने वाली एजेंसियां किस तरह से लामबंद होंगी, उसके बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है. पूर्व की योजनाओं के मसौदे में, वित्तीय डिटेल को शामिल नहीं किया जाना, इस मसौदे के अधूरे अमलीकरण की महत्वपूर्ण वजह है. आवास के निर्माण, बुनियादी संसाधन और सेवाओं जैसे जल और सैनिटेशन आदि के निर्माण के लिए, किए गए निर्धारित लक्ष्य पूरे नहीं किये जा सके. 100 छोटे शहरों के लिए बनायी गई योजनाओं के ज़रिए भी कुछ जानकारी ली जा सकती है. इसके साथ ही ये वित्तीय प्लान क्षेत्रीय सिफ़ारिशें भी प्रदान करते हैं. इसके साथ ही ये ध्यान योग्य बात है कि मानचित्र में ड्राफ्ट की गई योजनाओं में ऐसी किसी भी योजना को दर्शाया नहीं गया है. किर्यान्वयन एजेंसियों के लिए ये त्रुटि परेशानी का सबब बन सकती है. इन प्रस्तावित गतिविधियों को किसी स्थान पर लागू किया जायेगा, जिसमें शहरी फार्मिंग, ग्रीन (हरा) बफ़र, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील ज़ोन, बाढ़ग्रस्त इलाका, साथ ही प्लानिंग स्ट्रैटजी, का सटीक मानचित्रण किसी भी मास्टर प्लान का महत्वपूर्ण तत्व है. 

पेरी-अर्बन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ेगा 

इसके अलावा, दिल्ली के पेरी-अर्बन क्षेत्रों में विपरीत परिस्थितियों और अनौपचारिक आबादी की बढ़त के साथ-साथ सेनसस शहरों को नजरंदाज़ किया गया है. ये क्षेत्र एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुज़र रहे हैं और इसलिए काफी दबाव में हैं. इसे बढ़ती हुई जनसंख्या घनत्व, ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव और व्यवसायिक पैटर्न, कम हुए कृषि ज़मीन और बेतरतीब रूप से बढ़ते के द्वारा देखा जा सकता है. ये बदलाव नकारात्मक रूप से लोगों के जीवन पर और इन इलाकों के मूल बाशिंदों के जीवनयापन पर असर कर रही है. दिल्ली के ज्य़ादातर जगहों पर ज़मीन की कमी की वजह से पेरी-अर्बन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ेगा. ऐसे क्षेत्रों के लिए उप योजनाओं का बनाया जाना विशेषतः ज़रूरी है. 

दिल्ली के ज्य़ादातर जगहों पर ज़मीन की कमी की वजह से पेरी-अर्बन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ेगा. ऐसे क्षेत्रों के लिए उप योजनाओं का बनाया जाना विशेषतः ज़रूरी है.

दिल्ली वासियों के लिए एक दूसरी चिंता का विषय है वायु प्रदूषण, जो उनके स्वास्थ्य को हानि पहुंचा रहा हैं. शहरी वायु प्रदूषण को कम करने के शहरी प्रशासन के सारे प्रयास काफ़ी निराशाजनक है. ये आश्चर्यजनक है कि इस प्रदूषण की वजह बहुत बेहतर तरीके से सभी को पता है और वैसे ही ये सच्चाई भी कि इस मुद्दे के निपटारण की ज़िम्मेवारी विभिन्न शहरी प्रशासन व सरकारी विभाग के पास है. फिर भी, इस ड्राफ्ट योजना में किसी बहुक्षेत्रीय या सहयोगी, योजना रणनीति का कोई प्रावधान नहीं है जिससे कि इस परेशानी से उबरा जा सके. 

2041तक, दिल्ली की आबादी 28-30 मिलियन के रेंज में होगी. आगामी मास्टर प्लान, उनकी ज़रूरत और चिंताओं के व्यवस्थित तरीके से निपटारण के लिए एक बेहतर अवसर मुहैया कराएगी. इन लक्ष्यों की प्राप्ति तभी हो पायेगी जब एक बेहतर योजना का प्रभावशाली क्रियान्वयन किया जाए.  

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.