Published on Jul 30, 2023 Updated 0 Hours ago

सौर ऊर्जा में आत्मनिर्भरता हासिल करने की भारत की इच्छा को पूरा करने के लिए वो ज़रूरी तकनीक होनी चाहिए जो इसके लिए आवश्यक हैं.

सौर उर्जा: सोलर तक़नीक में भारत की आत्मनिर्भरता के लिए सबसे अनिवार्य है सिलिकॉन की उपलब्धता
सौर उर्जा: सोलर तक़नीक में भारत की आत्मनिर्भरता के लिए सबसे अनिवार्य है सिलिकॉन की उपलब्धता

ये लेख व्यापक ऊर्जा निगरानी: भारत और विश्व श्रृंखला का हिस्सा है. 


स्वच्छ ऊर्जा के लिए सामग्री की ज़रूरत 

जिस कम कार्बन वाले भविष्य की तरफ़ दुनिया बढ़ रही है वो काफ़ी ज़्यादा सामग्री की ज़रूरत  वाली होगी यानी जिसमें कम श्रम की आवश्यकता होगी. इसकी वजह ये है कि स्वच्छ ऊर्जा की तकनीकों के लिए ऊर्जा सघन जीवाश्म ईंधन को निकालने और स्थानांतरित करने में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों के मुक़ाबले कम गुणवत्ता (बेहद छितरी हुई) वाली नवीकरणीय ऊर्जा को जमा करने के लिए ज़्यादा वस्तुओं की आवश्यकता होती है. इसके परिणामस्वरूप कार्बन मुक्त विश्व की कोशिशों और अर्थव्यवस्था के विद्युतीकरण के लिए कच्चे माल (धातु और खनिज) की उपलब्धता सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होने की उम्मीद है. एक अनुमान के अनुसार 2015 और 2060 के बीच इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी के लिए सामग्रियों की मांग में बढ़ोतरी 87,000 प्रतिशत होने की उम्मीद है जबकि पवन ऊर्जा के लिए मांग में बढ़ोतरी 1,000 प्रतिशत और सोलर बैटरी और फोटोवोल्टिक (पीवी) बैटरी के लिए मांग में 3,000 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है. प्राकृतिक गैस या कोयले से बिजली उत्पन्न करने के मुक़ाबले सौर ऊर्जा से एक टेरावॉट बैटरी का उत्पादन करने के लिए 300-400 प्रतिशत ज़्यादा सामग्रियों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है. 

एक अनुमान के अनुसार 2015 और 2060 के बीच इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी के लिए सामग्रियों की मांग में बढ़ोतरी 87,000 प्रतिशत होने की उम्मीद है जबकि पवन ऊर्जा के लिए मांग में बढ़ोतरी 1,000 प्रतिशत और सोलर बैटरी और फोटोवोल्टिक (पीवी) बैटरी के लिए मांग में 3,000 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है.

सोलर बैटरियों में सिलिकॉन 

इलेक्ट्रॉनिक ग्रेड सिलिकॉन (शुद्धता के मामले में उच्च स्तरीय) और सोलर ग्रेड सिलिकॉन (शुद्धता के मामले में थोड़ा निम्न स्तरीय) दोनों के लिए मुख्य सामग्री धातु ग्रेड का सिलिकॉन है. कच्चे SiO2 यानी सिलिकॉन डाइऑक्साइड या सिलिका या क्वॉर्ट्ज़ को Si या सिलिकॉन में बदलने की बुनियादी प्रक्रिया के तहत आम तौर पर इलेक्ट्रॉन के द्वारा ऑक्सीकरण (ऑक्सीडेशन) में कमी की जाती है. इसके बाद निष्क्रिय ठोस को शुद्ध किया जाता है और अंत में इसे ऐसे रूप में पिघलाया जाता है जिसे आगे और तैयार किया जा सकता है. सिलिकॉन डाइऑक्साइड की कार्बोथर्मल छंटनी, जिसकी खोज 19वीं सदी में की गई थी, ज़बरदस्त ढंग से आज सिलिकॉन उद्योग में पहले चरण के लिए सबसे ज़्यादा इस्तेमाल की जाने वाली प्रक्रिया है. बिजली से जलने वाली भट्टियों के भीतर मोटे सिलिकॉन डाइऑक्साइड को निष्क्रिय सिलिकॉन में बदलने के लिए ग्रेफाइट के रूप में मौजूद कार्बन के साथ रसायनिक क्रिया की जाती है. धातु ग्रेड सिलिकॉन के लिए भट्टी चलाने में लगभग 12 kWh/kg (किलोवॉट घंटा प्रति किलोग्राम) बिजली की ज़रूरत होती है. महत्वपूर्ण बात ये है कि इस सिलिकॉन को सोलर ग्रेड सिलिकॉन यानी पॉलीसिलिकॉन के शुद्ध रूप में बदलने के लिए ज़्यादा ऊर्जा की ज़रूरत होती है. 

सिलिकॉन डाइऑक्साइड की कार्बोथर्मल छंटनी, जिसकी खोज 19वीं सदी में की गई थी, ज़बरदस्त ढंग से आज सिलिकॉन उद्योग में पहले चरण के लिए सबसे ज़्यादा इस्तेमाल की जाने वाली प्रक्रिया है.

एक बार सोलर ग्रेड सिलिकॉन का उत्पादन होने के बाद आगे की प्रक्रिया में वेफर उत्पादन, सोलर बैटरी उत्पादन और सोलर मॉड्यूल उत्पादन शामिल हैं. एक सोलर फोटोवोल्टिक श्रेणी में एक या उससे ज़्यादा बिजली से जुड़े फोटोवोल्टिक मॉड्यूल शामिल होते हैं. हर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल में कई सोलर बैटरियां होती है जिन्हें सिस्टम के दूसरे हार्डवेयर जैसे कंबाइनर बॉक्स, इन्वर्टर, ट्रांसफॉर्मर, रैकिंग, वायरिंग, डिसकनेक्ट और एनक्लोज़र से जोड़ा जाता है. एक सामान्य सिलिकॉन फोटोवोल्टिक मॉड्यूल में मशीनी समर्थन और सुरक्षा के लिए एक ग्लास शीट, अल्ट्रावायलेट (यूवी) किरणों और नमी से रक्षा के लिए एथिलीन विनाइल एसीटेट (ईवीए) की लैमिनेट की हुई परत; 60 से 96 सोलर बैटरियां, ज़्यादा पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए एक फ्लूरोपॉलीमर बैक शीट; और ढांचा खड़ा करने के लिए एल्युमिनियम की एक फ्रेम होती है. फोटोवोल्टिक बैटरी या तो वेफर आधारित या पतली कैमरे की रील होती है. वेफर आधारित बैटरियों को सेमीकंडक्टिंग वेफर पर बनाया जाता है और इन्हें अतिरिक्त परत के बिना संचालित किया जा सकता है. वैसे मॉड्यूल को आम तौर पर मशीनी स्थायित्व और सुरक्षा के लिए शीशे से ढका जाता है. व्यावसायिक फोटोवोल्टिक मॉड्यूल का उत्पादन काफ़ी हद तक सिलिकॉन आधारित रहा है और इसकी वजह तकनीकी होने के साथ-साथ ऐतिहासिक भी है. 

संसाधन और उत्पादन 

उस स्थिति में भी जब विश्व 100 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करने लगती है, तब भी सिलिकॉन की कमी का अनुमान नहीं है. प्रकृति में आम तौर पर स्फटिक (चमकीले पत्थर) के रूप में रेत में पाया जाने वाला सिलिका ऑक्सीज़न के बाद पृथ्वी की बाहरी पटल पर प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला दूसरा तत्व है. लेकिन फोटोवोल्टिक बैटरी के लिए ज़रूरी पारदर्शी सिलिका को जमा करना और उसका उत्पादन बेहद चुनौतीपूर्ण है. प्राकृतिक तौर पर सिलिका केवल दूसरे पदार्थ में मिश्रित, ऑक्सीडाइज़्ड रेत या सिलिकेट के रूप में मिलता है. इसको शुद्ध करने या स्फटिक रूप में बनाने के लिए जिस रसायनिक प्रक्रिया की आवश्यकता होती है, वो जटिल है. ये प्रक्रिया औद्योगिक रूप से मुश्किल, महंगी और प्रदूषण पैदा करने वाली है जिसकी वजह से पारदर्शी, सोलर ग्रेड सिलिका फोटोवोल्टिक के लिए अधिक ऊर्जा की ज़रूरत होती है और इसकी पर्यावरणीय लागत ज़्यादा होती है.  

सिलिका के उत्पादन में जटिलता को देखते हुए सोलर वैल्यू चेन में सिलिकॉन के उत्पादन की क्षमता को एक रणनीतिक संपदा समझा जाता है. ये जीवाश्म ईंधन के क्षेत्र के विपरीत है जहां उत्पादन क्षमता से ज़्यादा संसाधन की मौजूदगी को सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संपदा समझा जाता है.

सिलिका के उत्पादन में जटिलता को देखते हुए सोलर वैल्यू चेन में सिलिकॉन के उत्पादन की क्षमता को एक रणनीतिक संपदा समझा जाता है. ये जीवाश्म ईंधन के क्षेत्र के विपरीत है जहां उत्पादन क्षमता से ज़्यादा संसाधन की मौजूदगी को सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संपदा समझा जाता है. सिलिकॉन के मामले में कच्चे माल की मात्रा से जुड़ा अनुमान नहीं लगाया जाता है क्योंकि ज़्यादातर देशों में उत्पादन के मुक़ाबले भंडार अधिक मात्रा में है. 2019 में चीन 4.5 मिलियन टन (एमटी) के उत्पादन के साथ सिलिकॉन धातु और फेरोसिलिकॉन (लोहे और सिलिकॉन का मिश्र धातु) का सबसे बड़ा उत्पादक था. इस तरह विश्व के कुल 7 मिलियन टन उत्पादन में चीन का हिस्सा 64 प्रतिशत था. वैसे तो भारत भी सिलिकॉन धातु और फेरोसिलिकॉन के 15 बड़े उत्पादक देशों में शामिल है लेकिन 2019 में भारत की 60,000 टन (फेरोसिलिकॉन में केवल सिलिकॉन कंटेंट की गिनती) की उत्पादन क्षमता कुल वैश्विक उत्पादन के 1 प्रतिशत से भी कम थी. 2018 में भारत के सिलिकॉन डाइऑक्साइड आयात में भूटान भारत का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत था. 

स्रोत: अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण

आत्मनिर्भरता के लिए भारत की तलाश 

महामारी के बाद भारत की औद्योगिक नीति की मुख्य विषय वस्तु ‘आत्मनिर्भर भारत’ है. इस संदर्भ में सामान्य तौर पर नवीकरणीय ऊर्जा की तकनीक में और विशेष तौर पर सौर ऊर्जा की तकनीक में आत्मनिर्भर बनना एक महत्वपूर्ण नीतिगत लक्ष्य है. वर्तमान में 80 प्रतिशत से ज़्यादा सोलर पैनल और मॉड्यूल मुख्य रूप से चीन से आयात किए जाते हैं. सस्ते आयातित सोलर पैनल की वजह से पूरे विश्व में भारत में सौर ऊर्जा की दरें सबसे कम हैं. इतना ही नहीं, इसके कारण ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक सरोकार भी बढ़ गया है. वैसे तो भारत में प्रति वर्ष 3 गीगावॉट सोलर फोटोवोल्टिक बैटरी और 10 गीगावॉट फोटोवोल्टिक मॉड्यूल के उत्पादन की क्षमता है लेकिन भारत में पॉलीसिलिकॉन, वेफर या धातु खंड के उत्पादन की क्षमता नहीं है. आयात को कम करने और स्थानीय स्तर पर सोलर पैनल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई तरह के प्रोत्साहन की पेशकश की है. 

सोलर मॉड्यूल के उत्पादन के लिए पीएलआई योजना को लेकर ज़बरदस्त उत्साह को देखते हुए योजना की लागत पहले की 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर 3.2 अरब अमेरिकी डॉलर कर दी गई है. उम्मीद की जाती है कि इससे बैटरी और मॉड्यूल उत्पादन की क्षमता 10 गीगावॉट से बढ़कर 40 गीगावॉट हो जाएगी. 

2018 में विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईज़ेड) में पूंजीगत व्यय के लिए संभावित उत्पादकों को 20 प्रतिशत सब्सिडी की पेशकश की गई. 2021 में सोलर उपकरणों की सरकारी ख़रीद सिर्फ़ पहली श्रेणी के आपूर्तिकर्ताओं से करने को ज़रूरी बनाया गया. ऐसे आपूर्तिकर्ताओं के पास 50 प्रतिशत या उससे ज़्यादा स्थानीय सामग्री होनी चाहिए. सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे पीएम कुसुम (प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान), जिसमें बिजली से चलने वाले कृषि पंप को सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप में बदला जाता है, और सब्सिडी प्राप्त रूफटॉप (छत) सोलर परियोजनाओं के लिए सोलर फोटोवोल्टिक बैटरी और मॉड्यूल की ख़रीद निश्चित रूप से घरेलू उत्पादकों से होनी चाहिए. इसके अलावा सरकार ने अप्रैल 2022 से सोलर फोटोवोल्टिक बैटरी और मॉड्यूल के आयात पर बुनियादी कस्टम ड्यूटी (बीसीडी) भी लगा दी है. 2021 में भारतीय नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी (आईआरईडीए) ने सिलिकॉन सोलर बैटरी के पूरी तरह एकीकृत उत्पादन के लिए अपनी प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिंव (पीएलआई) योजना के तहत बोली लगाने वाली 18 कंपनियों की सूची जारी की. आवेदन करने वाली चार कंपनियों ने 4-4 गीगावॉट उत्पादन क्षमता की फैक्ट्री का प्रस्ताव दिया है जो कि वेफर, सोलर बैटरी और मॉड्यूल उत्पादन के ज़रिए पॉलीसिलिकॉन (पारदर्शी सिलिकॉन का बेहद शुद्ध रूप) उत्पादन से पूरी तरह जुड़ी होंगी. उम्मीद की जाती है कि पीएलआई योजना लगभग 2.33 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश आकर्षित करेगी. सोलर मॉड्यूल के उत्पादन के लिए पीएलआई योजना को लेकर ज़बरदस्त उत्साह को देखते हुए योजना की लागत पहले की 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर 3.2 अरब अमेरिकी डॉलर कर दी गई है. उम्मीद की जाती है कि इससे बैटरी और मॉड्यूल उत्पादन की क्षमता 10 गीगावॉट से बढ़कर 40 गीगावॉट हो जाएगी. 

ये पहली बार नहीं है जब भारत सेमीकंडक्टर और सोलर उद्योग के लिए पॉलीसिलिकॉन उत्पादन की क्षमता को स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. 2008 में कुछ बड़ी कंपनियों ने पॉलीसिलिकॉन के उत्पादन की योजनाओं का एलान किया था. लेकिन सरकार की तरफ़ से ज़मीन की पेशकश और दूसरे प्रोत्साहनों के बावजूद इन योजनाओं को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका क्योंकि बिजली की लागत बहुत ज़्यादा थी और सप्लाई में काफ़ी दिक़्क़त थी. लेकिन इस बार का मौक़ा सिर्फ़ इस मायने में अलग नहीं है कि बिजली की सप्लाई ठीक हो गई है बल्कि इसलिए भी कि सोलर पैनल के लिए बाज़ार का आकार 10 गुना बढ़ गया है. लेकिन वेफर, बैटरी और मॉड्यूल के उत्पादन में आत्मनिर्भरता सोलर वैल्यू चेन के ऊपर तक शायद नहीं जाए. 2018 में भारत ने 72 मिलियन टन से ज़्यादा सिलिकॉन डाइऑक्साइड का आयात किया और इसका 28 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया. वैसे तो सिलिकॉन डाइऑक्साइड के आयात के स्रोत कई अलग-अलग देश थे लेकिन तब भी इसको सुरक्षित या आत्मनिर्भर नहीं गिना जाएगा. 

सिलिकॉन धातु के उत्पादन की लागत दूसरी चीज़ों जैसे कि कोयला, स्फटिक, तेल, प्राकृतिक गैस और इलेक्ट्रोड्स की क़ीमत से नियंत्रित होती है. स्फटिक का खनन कुछ ही देशों में केंद्रित है जिसका ये मतलब है कि भारत के सिलिकॉन उत्पादन और निर्यात करने वाले देशों का सदस्य बनने की उम्मीद नहीं है.

सिलिकॉन धातु के उत्पादन की ज़्यादा लागत से नई कंपनियों के सीमित संख्या में इस क्षेत्र में आने की उम्मीद है. भट्टियों के इस्तेमाल से सिलिकॉन धातु के उत्पादन में ऊर्जा का ज़्यादा इस्तेमाल होता है जिसकी वजह से सिलिकॉन की लागत बढ़ जाती है. ज़रूरी नहीं कि भारत में औद्योगिक बिजली सस्ती हो और बिजली की लागत मायने रखती है क्योंकि कुल उत्पादन लागत का एक बड़ा हिस्सा बिजली की खपत से जुड़ा हुआ है. इसके अलावा, सिलिकॉन धातु के उत्पादन की लागत दूसरी चीज़ों जैसे कि कोयला, स्फटिक, तेल, प्राकृतिक गैस और इलेक्ट्रोड्स की क़ीमत से नियंत्रित होती है. स्फटिक का खनन कुछ ही देशों में केंद्रित है जिसका ये मतलब है कि भारत के सिलिकॉन उत्पादन और निर्यात करने वाले देशों का सदस्य बनने की उम्मीद नहीं है. पूरी तरह खनिज सुरक्षा को सुनिश्चित करने और बराबर मात्रा में संपदा हासिल करने के लिए भारत ने खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड (केएबीआईएल) के नाम से एक संयुक्त उपक्रम (ज्वाइंट वेंचर) शुरू करने की योजना बनाई है. इस संयुक्त उपक्रम में सार्वजनिक क्षेत्र की तीन कंपनियों- नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (नेल्को), हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (एचसीएल) और मिनरल एक्सप्लोरेशन कंपनी लिमिटेड (एमईसीएल)- की हिस्सेदारी होगी. उम्मीद की जाती है कि खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड व्यावसायिक इस्तेमाल और देश की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए विदेशों में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खनिजों की पहचान, उनका अधिग्रहण, खोज, विकास, खनन और संसाधित करने का काम करेगी. ऊर्जा सुरक्षा के लिए तेल और गैस की संपदा के अधिग्रहण में भारत का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा है लेकिन ये तजुर्बा खनिज सुरक्षा के लिए भारत की खोज में जानकारी बढ़ाएगा. 

स्रोत: विश्व बैंक

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Authors

Vinod Kumar Tomar

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Vinod Kumar, Assistant Manager, Energy and Climate Change Content Development of the Energy News Monitor Energy and Climate Change. Member of the Energy News Monitor production ...

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Lydia Powell

Lydia Powell

Ms Powell has been with the ORF Centre for Resources Management for over eight years working on policy issues in Energy and Climate Change. Her ...

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Akhilesh Sati

Akhilesh Sati

Akhilesh Sati is a Programme Manager working under ORFs Energy Initiative for more than fifteen years. With Statistics as academic background his core area of ...

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