Published on Jul 30, 2023 Updated 0 Hours ago

पश्चिमी लोकतांत्रितक देशों को सीसीपी की ‘ख़ुशामद करने वाली रणनीति’ से सावधान रहने और उससे बचने की ज़रूरत है क्योंकि ये उनके हितों के लिए ख़तरा है.

विदेशों में बसे चीन के नागरिकों को ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं राष्ट्रपति शी जिनपिंग!
विदेशों में बसे चीन के नागरिकों को ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं राष्ट्रपति शी जिनपिंग!

चीन के साम्राज्यवादी अतीत के समय से विदेश में रहने वाले चीन के लोगों का चीन के शासकों से हमेशा अनूठा संबंध रहा है.  वर्ष 1949 में चीन की सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकार के समय से पार्टी और सरकार ने यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (यूएफडब्ल्यूडी) के ज़रिए विदेश में बसे चीनी मूल के लोगों का इस्तेमाल करने की कोशिश की है. अब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग विदेश में बसे चीन के लोगों का बड़े पैमाने पर हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं और इसकी गूंज पश्चिमी देशों में भी सुनाई दे रही है.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग विदेश में बसे चीन के लोगों का बड़े पैमाने पर हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं और इसकी गूंज पश्चिमी देशों में भी सुनाई दे रही है. 

ब्रिटेन के एक वरिष्ठ राजनेता पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) से संबंध रखने वाली एक महिला से पैसे लेने के आरोप लगे हैं. क्रिस्टीन चिंग कुई ली के लॉ फर्म क्रिस्टीन ली एंड कंपनी के बारे में कहा गया कि वो लेबर पार्टी की सांसद बैरी गार्डिनर- जिन्हें भारतीय सरकार के द्वारा 2020 में पद्म श्री सम्मान दिया गया था- के दफ़्तर को पैसे पहुंचा रहा था और ली के बेटे को गार्डिनर के मेल-मुलाक़ात का हिसाब रखने के लिए वेस्टमिंस्टर- ब्रिटिश सरकार का केंद्र- में सांसद के दफ़्तर में नौकरी पर रखा गया था. ली का फर्म लंदन में चीनी दूतावास का मुख्य क़ानूनी सलाहकार था और इसके साथ-साथ ब्रिटिश सरकार के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विभाग ने यूके में निवेश की इच्छा रखने वाले विदेशी कारोबारियों को ली की क़ानूनी सलाह लेने का निर्देश दिया. यूके के सार्वजनिक जीवन में पिछले कुछ समय से ली सक्रिय रही हैं और इस दौरान उन्होंने वेस्टमिंस्टर के संभ्रांत लोगों से संबंध बढ़ाया. चीन-यूके संबंधों में अपने योगदान के लिए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री थेरेसा मे से एक पुरस्कार हासिल किया. ली की कुछ गतिविधियां उन मुद्दों से जुड़ी हैं जो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और वहां की सरकार के लिए महत्वपूर्ण हैं. इसका सबूत इस तथ्य से मिलता है कि चीनी मूल के यूके के नागरिकों को संगठित करने और उन्हें राजनीति में और सक्रिय करने में वो मददगार रही हैं.

ब्रिटेन की ख़ुफ़िया सेवा एमआई5 ने राजनीतिक वर्ग को चेतावनी दी थी कि ब्रिटेन की राजनीति में दखल देने के लिए ली सीसीपी के यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट के आदेश पर काम कर रही हैं. एमआई5 की चेतावनी के मुताबिक़ अलग-अलग क्षेत्र की सार्वजनिक हस्तियों तक ली की पहुंच का मक़सद ये सुनिश्चित करना था कि यूके का राजनीतिक परिदृश्य “सीसीपी के एजेंडा के लिए अनुकूल” हो.

इस घटना ने एक बार फिर सीसीपी के असर डालने वाले अभियान को सामने ला दिया है. इस संबंध में फ्रांस के सशस्त्र बल मंत्रालय के अधीन काम करने वाले इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रैटजिक रिसर्च के पॉल चैरॉन और जीन-बापतिस्त जीनजीन विल्मर की एक ताज़ा रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि किस तरह सीसीपी विदेशों में रहने वाले चीन के लोगों का फ़ायदा उठा रही है. पूरे इतिहास के दौरान चीन के शासकों का विदेश में रहने वाले अपने लोगों, जो 20वीं शताब्दी की शुरुआत में बदलाव के लिए एक महत्वपूर्ण वाहक रहे हैं, से एक अनूठा संबंध रहा है. चीन के क्रांतिकारी नेता सुन यात-सेन क्रांतिकारियों के एक अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा थे जिसने चीन पर राज करने वाले किंग वंश को सत्ता से बाहर करने और 1912 में आधुनिक चीन की स्थापना में एक भूमिका अदा की.

वर्ष 1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद विदेश में बसे अपने लोगों के असर से वाकिफ माओत्से तुंग ने यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट की स्थापना की ताकि अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए एक आज्ञाकारी माहौल तैयार किया जा सके. 

वर्ष 1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद विदेश में बसे अपने लोगों के असर से वाकिफ माओत्से तुंग ने यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट की स्थापना की ताकि अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए एक आज्ञाकारी माहौल तैयार किया जा सके. उसने इस विभाग को सीसीपी का ‘जादुई हथियार’ बताया.[i] 1989 में छात्रों के प्रदर्शन की वजह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ने के बाद डेंग शियाओपिंग ने विदेश में रहने वाले चीन के लोगों पर दबाव डाला कि वो चीन को इस संकट से उबारने में मदद करें.

हाल के समय तक विदेश में बसे अपने लोगों को लेकर चीन की संकल्पना के तीन भाग थे. पहला हुआचाऊ (विदेश में रहने वाले चीन के सभी नागरिक), दूसरा हुआरेन (वो लोग जिनके पास विदेशी पासपोर्ट है) और तीसरा हुआई (चीन के लोगों के विदेश में जन्मे बच्चे). लेकिन ये भेद अब अस्पष्ट हो गया है क्योंकि सीसीपी के महासचिव शी जिनपिंग ने राष्ट्रीय कायाकल्प की अपनी पसंदीदा परियोजना की व्याख्या की है जिसका मतलब चीन के प्राचीन गौरव को बहाल करना है. देश के कायाकल्प को तेज़ करने की कोशिश के तहत जिनपिंग ने राष्ट्रीयता का विचार किए बिना ‘चीन एक परिवार की तरह’ की धारणा को आगे बढ़ाया है. इस दृष्टिकोण का परिणाम संस्थागत परिवर्तन के रूप में निकला है जैसे विदेश में चीनी मामलों के दफ़्तर का यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट के साथ विलय और जिसे अलग-अलग तरह के असर बढ़ाने वाले अभियानों के समन्वय की ज़िम्मेदारी दी गई है.

चीनी एजेंटों की नकद पैसे की पेशकश

लोकतांत्रिक देशों तक पहुंच बनाने और वहां की राजनीतिक प्रणाली में हेरफेर करने के लिए सीसीपी ने एक और तौर-तरीक़े का इस्तेमाल किया है. चीन मूल के लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वो सार्वजनिक जीवन में अपनी भागीदारी बढ़ाएं ऑस्ट्रेलिया में लिबरल पार्टी के सदस्य बो झाऊ ने दावा किया कि संघीय संसद का चुनाव लड़ने के लिए चीन के एजेंटों ने उन्हें नकद पैसे देने की पेशकश की. मार्च 2019 में झाऊ मेलबर्न के एक होटल के कमरे में मृत अवस्था में पाए गए. शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी एनी-मारी ब्रैडी ने न्यूज़ीलैंड में चीनी नेताओं पर सीसीपी के साथ गुप्त संपर्क का आरोप लगाया. साथ ही सीसीपी और चीन की सरकार से जुड़े संगठनों पर उनके लिए फंड जुटाने और दूसरे चीनी मूल के लोगों को एकजुट होकर वोट डालने का आरोप भी लगाया. उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि चीनी मूल के सांसद न्यूज़ीलैंड में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) जैसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं. इस पर्दाफ़ाश के बाद दो पूर्व सांसदों ने सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लिया है.

2015 से विदेशों में पढ़ाई करने वाले चीन के युवा यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (यूएफडब्ल्यूडी) का केंद्र बन गए हैं. 2015 में यूएफडब्ल्यूडी के एक सम्मेलन में शी जिनपिंग ने कहा कि विदेशों में रह रहे चीन के छात्र कई और तरीक़ों से पार्टी की सेवा कर सकते हैं.

फ्रांसिस फुकुयामा ने अपनी किताब दी एंड ऑफ हिस्ट्री में माना कि चीन लौटने वाले छात्र राजनीतिक परिवर्तन के लिए एक उत्प्रेरक होंगे और अंतत: निरंकुशता से लोकतंत्र की तरफ़ बदलाव के संदेशवाहक होंगे. लेकिन इन उम्मीदों को झुठलाते हुए चीन के छात्र, विशेष रूप से विदेशों में पढ़ने वाले छात्र, सीसीपी के एजेंडे को आगे बढ़ाने का औज़ार बन गए हैं. इसकी एक वजह ये है कि 90 के दशक से चीन ने देशभक्ति की शिक्षा के अभियान- जिसका उद्देश्य अगली पीढ़ी को वैचारिक रूप से मज़बूत करना है- के ज़रिए युवाओं को सामाजिक बनाने की कोशिश की है. इस अभियान को इस ढंग से अंजाम दिया जा रहा है कि युवा शासन व्यवस्था के एजेंडे के समर्थक बन जाएं. इसका प्रमाण कैंपस में चीन के छात्रों और स्कॉलर्स एसोसिएशन की गतिविधियों से मिलता है जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया में फालुन गोंग (चीन में प्रतिबंधित एक संगठन) पर साहित्यिक रचना के प्रचार के लिए व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को धमकी दी है, मानवाधिकार पर अपने साथी छात्रों के विचार के बारे में स्थानीय दूतावास को जानकारी दी है.[ii] यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो के चीनी छात्रों ने तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को संस्थान की तरफ़ से दिए गए आमंत्रण को वापस लेने के लिए अभियान चलाया.

हाल के वर्षों में सीसीपी चीन और उसकी सीमा को लेकर अपने विचारों को आगे बढ़ाने में आक्रामक हो गई है. आंतरिक रूप से सीसीपी और सरकार ने तिब्बत, शिनजियांग और हॉन्ग कॉन्ग जैसे अशांत क्षेत्रों में अपनी पकड़ मज़बूत कर ली है. अपने देश की प्रादेशिक अखंडता पर मानचित्रों के ज़रिए चोट पहुंचाने से रक्षा का ज़िम्मा चीन के छात्रों ने अपने ऊपर ले लिया है. इस वजह से मशहूर कलाकार मार्क वॉलिंगर के द्वारा लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में बनाई गई एक मूर्ति में ताइवान को संप्रभु राष्ट्र के तौर पर दिखाना चीन के छात्रों के ग़ुस्से का कारण बना. छात्रों ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि इसी संस्थान से ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन करने वाली राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने भी पढ़ाई की है. कैंपस के प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने वाले कुछ छात्रों ने लेखक को बताया कि अपने देश के हित की रक्षा करना उनका पवित्र कर्तव्य है. इसी तरह चीन के छात्रों के द्वारा लगातार चलाए गए एक अभियान ने यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के एक लेक्चरर को ‘ग़लत’ ढंग से दर्शाए गए भारत-चीन सीमा के मानचित्र का इस्तेमाल करने के लिए माफ़ी मांगने को मजबूर कर दिया.

चीन छोड़कर विदेश भागने वाले लोगों पर पकड़ बनाने के लिए उन्होंने ‘फॉक्स हंट’ के नाम से एक अभियान शुरू किया है जिसमें विदेश में रहने वाले चीन के लोग महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं.

शी के सत्ता में आने के समय से उन्होंने भ्रष्ट अधिकारियों और सीसीपी के कैडर को बाहर करने के लिए एक अभियान भी शुरू किया है. चीन छोड़कर विदेश भागने वाले लोगों पर पकड़ बनाने के लिए उन्होंने ‘फॉक्स हंट’ के नाम से एक अभियान शुरू किया है जिसमें विदेश में रहने वाले चीन के लोग महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं. इसका एक उदाहरण अमेरिका में दिखा जब वहां रहने वाले चीन के नागरिकों ने चीन के एक पूर्व सरकारी अधिकारी को वापस अपने देश लौटने के लिए मजबूर करने की कोशिश की. अमेरिका के न्याय विभाग ने अक्टूबर 2020 में आठ लोगों, जिनमें से कुछ अमेरिका में लंबे समय से रह रहे थे, के ख़िलाफ़ पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के अवैध एजेंट की तरह काम करने का आरोप लगाया. लेकिन चीन की आधिकारिक सोच फॉक्स हंट को एक ऐसी कोशिश की तरह दिखाती है जिसमें क़ानून लागू करने वाले विभाग सक्रिय रूप से विदेशी सरकार के साथ संपर्क के ज़रिए देश को नुक़सान पहुंचाने वाले भगोड़ों को वापस लाते हैं. इसका प्रमाण एक टीवी सीरीज़ से मिलता है जिसका नाम संयोग से ‘फॉक्स हंटिंग’ रखा गया है और जिसका निर्माण चीन के सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय ने किया है.

एक तरफ़ राष्ट्रपति शी जिनपिंग जहां देश की अच्छी तस्वीर दिखाने की ज़रूरत के बारे में बात करते हैं, वहीं चीन के द्वारा विदेशों में बसे नागरिकों का इस्तेमाल अच्छी छवि बनाने के बदले चीन को नुक़सान पहुंचा रहा है. क्रिस्टीन ली के मामले से हैरान यूके सरकार विदेशी हस्तक्षेप विरोधी क़ानून को इस साल संसद में लाने के बारे में सोच रही है. इस पर लोगों से सलाह की प्रक्रिया 2021 में शुरू हो चुकी है. इसका उद्देश्य ‘किसी विदेशी सरकार की तरफ़ से घोषित गतिविधियों’ का एक रजिस्टर बनाना है. चीन को चिढ़ाते हुए ऑस्ट्रेलिया ने अपने विदेशी हस्तक्षेप क़ानून को 2018 में मंज़ूरी दी. 2021 में इस क़ानून का दायरा कैंपस तक बढ़ा दिया गया. विदेशी हस्तक्षेप पर नये नियम में ये तय किया गया है कि छात्रों को विदेशी शक्तियों के द्वारा हस्तक्षेप को पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाए और छात्र किसी भी तरह के विदेशी हस्तक्षेप की जानकारी दें. चीन के साथ विरोध को बढ़ाते हुए ऑस्ट्रेलिया की इंटेलिजेंस कमेटी के प्रमुख ने यूरोपीय संसद में एक भाषण के दौरान साफ़ तौर पर चीन से ख़तरे को अपने देश में हस्तक्षेप विरोधी क़ानून लाने का सबसे महत्वपूर्ण कारण बताया. अब यूरोपीय आयोग ने भी कहा है कि वो यूरोप के विश्वविद्यालयों में विदेशी हस्तक्षेप को लेकर नियम विकसित कर रहा है.

इस तरह सीसीपी के एजेंडे को लागू करने के लिए अपने नागरिकों और छात्रों का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल चीनी ‘सॉफ्ट पावर’ को नुक़सान पहुंचा रहा है और लंबे समय के हिसाब से देखें तो इससे विदेश में बसे चीनी मूल के नागरिकों के हितों को नुक़सान हो सकता है.


[i] Samir Saran & Akhil Deo, Pax Sinica: Implications for the Indian Dawn (Rupa Publication, 2019), pp. chap. 7.

[ii] Clive Hamilton, Silent Invasion: China’s influence in Australia (Hardie Grant, 2018), pp. chap. 10.

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Author

Kalpit A Mankikar

Kalpit A Mankikar

Kalpit A Mankikar is a Fellow with Strategic Studies programme and is based out of ORFs Delhi centre. His research focusses on China specifically looking ...

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