क्या एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा(एएजीसी)चीन के बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) का जवाब है? व क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिए इसके क्या मायने हैं?
जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे एवं भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच गुजरात में हाल की शिखर बैठक ने भारत-जापान के बीच सहयोग में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया है जो नवंबर 2016 में हुई उनकी बैठक के दौरान एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा (एएजीसी) के निर्माण के लिए जताई गई इच्छा के बिल्कुल अनुरूप है। भारत और जापान के बीच शुरु तथा बाद में आसियान और अफ्रीका तक विस्तारित एएजीसी को आम तौर पर चीन की बेल्ट एवं रोड पहल (बीआरआई) के प्रत्युत्तर के रूप में देखा जाता है। बहरहाल, इस विजन के पीछे एशिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच दशकों के सहयोग की पृष्ठभूमि है। दोनों ही देश आपसी हितों का समन्वय चाहते हैं, चाहे यह लोकतांत्रिक सुरक्षा सहयोग के दायरे में हो या ‘स्वतंत्रता एवं समृद्धि के तोरण (आर्क) ‘ की अबे की धारणा के अंतर्गत हो।
अपनी यात्रा के दौरान अबे ने एक बार फिर ऑस्ट्रेलिया एवं अमेरिका के साथ सहयोग में लोकतंत्रों की सामुद्रिक सुरक्षा रणनीति (डायमंड) के प्रति अपनी दिलचस्पी दुहराई और एक बार फिर एक मुक्त एवं खुले भारत-प्रशांत क्षेत्र पर भारत और जापान की भारी निर्भरता को रेखांकित किया। हालंाकि इसकी अवधारणा लोकतांत्रिक देशों ने बनाई है एएजीए के दायरे के भीतर ‘लोकतंत्र‘ खुद परियोजना की बहुपक्षीय प्रकृति का भी उल्लेख कर सकता है। फिर भी, आपसी संपर्क में बढोतरी और निजी-सार्वजनिक साझीदारियों के जरिये व्यवसायों में निवेश का लक्ष्य इस पूरे क्षेत्र में लोगों को समृद्ध बनाना होगा।
सरकार के स्तर पर, अहमदाबाद और मुंबई के बीच एक हाई स्पीड रेल नेटवर्क बनाने का दोनों देशों का निर्णय बड़े ढांचागत सहयोग के प्रति एक नए दृष्टिकोण के लिए प्रेरित कर सकता है क्योंकि ये देश अपने नागरिकों को रोजगार तो देना ही चाहते हैं, साथ ही अपने ऋण पर अनुकूल ब्याज दर भी चाहते हैं। हालांकि जापान और भारत दोनों के बीच कुछ संरचनागत बाधाएं हैं, जिन्हें दूर किए जाने की जरुरत है, एक बहुपक्षीय एशियाई और अफ्रीकी विकास गलियारे के उनके विजन में दोनों देशों को एक ऐसी आकर्षक नई रूपरेखा उपलब्ध कराने की क्षमता है जो क्षेत्रीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है एवं देश की संप्रभुता की रक्षा करता है।
चीनी व्यापार पर अति निर्भरता एवं भव्य ढांचागत परियोजनाओं के ऋण के डर से, दोनों ही देश चिंतित हैं कि चीन के संशोधनवाद (रिविजनिज्म) में कार्यनीतिक रियायत शामिल होगी क्योंकि यह भारत-प्रशांत क्षेत्र में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
श्रीलंका के मामले का विश्लेषण करते समय, ओआरएफ के सामुद्रिक मामलों के विशेषज्ञ अभिजीत सिंह बताते हैं कि, इस बात पर संदेह करने के पूरे कारण हैं कि चीन हैम्बनबोटा बंदरगाह पर अपने अधिकारों को विस्तारित करने की इतनी गुंजाइश अवश्य रखेगा कि अंततोगत्वा वह अपनी खुद की सैन्य सुविधाओं के लिए हिसाब दे सके। बंदरगाह परियोजनाओं एवं मलेशिया में पूर्वी तटीय रेल लिंक परियोजना, जहां बंदरगाहों और रेल का विकास और भारी वित्तपोषण चीन द्वारा किया जा रहा है, जैसे रेल निर्माण में निवेश के जरिये चीन अंततोगत्वा सिंगापुर की उपेक्षा (बाईपास) करने, मलेशिया के प्रमुख व्यापार रास्तों को काट देने एवं दोनों पड़ोसी देशों को एक दूसरे के खिलाफ कर देने के जरिये आसियान एकता को और कमजोर कर सकता है।
दक्षिणपूर्वी एशियाई देश अपनी घरेलू राजनीति में डेंग शियाओपिंग से पहले दशकों तक चीनी वामपंथी दलों के हस्तक्षेप को याद करते हैं, और भले ही, पांचवें स्तंभकार वामपंथियों का साया और समय गुजर चुका हो, म्यांमार के मुख्य व्यापारिक साझीदार अभी भी उस खतरे को लेकर चिंतित हैं जो चीन उत्तर पूर्व में स्थानिक चीनी और अन्य प्रतिनिधियों को अपने मौन समर्थन के साथ पैदा कर सकता है। क्षेत्र की अर्थव्यवस्था एवं राजनीति में चीन की विस्तारित होती भूमिका का खौफ पूरे क्षेत्र में राष्ट्रीय संप्रभुता को लेकर सवाल खड़े करता है।
चीन को लंबे समय से एक ‘मलक्का दुविधा‘ का डर सता रहा है, जो एक ऐसी स्थिति या संकट है जिसमें किसी देश की ऊर्जा तक मुख्य पहुंच को किसी दुश्मन देश द्वारा प्रायद्वीपीय मलेशिया एवं सुमात्रा के संकीर्ण जलडमरूमध्य के बरास्ते काट दिया जाता है। चीन के हाइड्रोकर्बन का 82 प्रतिशत हिस्सा इसी संकीर्ण क्षेत्र से गुजरता है और केवल अमेरिका ही नहीं, इस क्षेत्र में लगातार तेज होती जा रही प्रतिस्पर्धा को देखते हुए चीन का अपने प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहना बिल्कुल जायज है। तेल एवं गैस प्रतिबंध के बाद अमेरिका के पर्ल हार्बर पर हमले के 76 वर्षों के बाद, जापान भी भयभीत है कि उसका बड़ी सैन्य क्षमता वाला पड़ोसी देश व्यापार एवं संसाधनों तक उसकी पहुंच को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है। फिर भी केवल चीन और जापान ही आशंकित नहीं हैं; पूरे भारत-प्रशांत क्षेत्र के देश आर्थिक स्थिरता का सुख भोगने के लिए एक खुले एवं सुरक्षित व्यापार रास्ते पर निर्भर हैं। भारत के लिए भी, विवादित कश्मीर के रास्ते के जरिये पाकिस्तान के साथ एक आर्थिक गलियारे के निर्माण का फैसला एक बहुत बड़े चीनी संशोधनवाद का सूचक है और वर्तमान नियम आधारित प्रणाली से अलग है।
एएजीसी बीआरआई का एक सद्भावपूर्ण विकल्प उपलब्ध कराता है जिसमें दोनों देशों के स्तर पर क्षेत्रीय संपर्क के लिए उल्लेखनीय क्षमता मौजूद है। दिल्ली को हनोई से जोड़ने की व्यापक रेल सड़क परियोजनाओं से दक्षिण पूर्व एशिया के भीतर व्यापार एवं रिश्तों में विविधता पैदा करने की पुरानी दिलचस्पी का संकेत मिलता है। व्यापक परियोजनाओं में जापान के अनुभव और शिंकान्सेन जैसी अत्याधुनिक रेल नेटवर्क विकसित करने में उसकी विशेषज्ञता को देखते हुए जापान के साथ सहयोग करने की पूरी गुंजाइश है।
रेल विकास के लिए कम खर्चीली चीनी निविदाओं को प्राथमिकता देने के बावजूद, लागत में कमी किए जाने का लाभ जापान को हासिल होगा क्योंकि क्षेत्र के भीतर उसकी साख कहीं ज्यादा है। बंदरगाहों, रेलों एवं दूरसंचारों जैसे रणनीतिक ढांचागत परियोजनाओं में निवेश किए जाने से उन देशों के ग्रहणशील ग्राहक प्राप्त होंगे जो किसी एकल व्यापारिक साझीदार पर अपनी निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
ढांचागत परियोजनाओं से स्थानीय रोजगार उपलब्ध होने के कारण, विदेशी अर्थव्यवस्थाओं में भारत एवं जापान के निवेश को उनके विजन के लिए अधिक क्षेत्रीय समर्थन प्राप्त हो सकता है। अस्पतालों की स्थापना करने का जापान का अपना अनुभव प्रदर्शित करता है कि किस प्रकार सहयोग का यह रूप बिना विदेशी नियंत्रण की स्थानीय धारणा को बढ़ावा देने के बगैर एक अधिक स्थायी जापानी उपस्थिति सुनिश्चित कर सकता है। जापान के उच्च कौशल एवं पूंजी के समतुल्य, आर्थिक विकास के साथ भारत के अपने आकार एवं अनुभव ने उसे चुनौती दी है कि वह मुख्य प्रौद्योगिकियों की खोज करे-चाहे वह फार्माकोलोजी से संबंधित हो या फिर बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा से। आसियान में अपने घनिष्ठ संपर्कों के साथ, भारत को व्यापक रूप से एक परोपकारी ताकत के बतौर देखा जाता है और प्रवासी भारतीयों के साथ अपने सांस्कृतिक एवं धार्मिक संबंधों के माध्यम से भारत के पास व्यापार को बढ़ावा देने में एक मजबूत बढ़त हासिल है। बुनियादी ढांचे एवं प्रौद्योगिकी आदान प्रदानों को लेकर भारत और जापान से एक मजबूत प्रतिबद्धता पूरे क्षेत्र में आर्थिक एवं भू रणनीति की विस्तृत खाईयों को पाटने में ठोस और दीर्घकालिक भूमिका निभा सकती है।
जापान और भारत के बीच बढ़े हुए सैन्य एवं प्रौद्योगिकीय सहयोग के बावजूद, दोनों देश पूरे एशिया एवं अफ्रीका में बिजली अनुमान को लेकर नुकसान की स्थिति में भी हैं। हालांकि, यह एएजीसी के कार्यक्रम में शामिल नहीं होता लेकिन सुरक्षा पूरे भारत-प्रशांत क्षेत्र में विदेश नीति प्रतिष्ठानों में एक प्रमुख भूमिका निभाती है। चीन के विपरीत जो वैश्विक रूप से तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है, भारत और जापान को उल्लेखनीय बाधाओं का सामना करना पड़ता है। जहां जापानी संविधान की धारा 9 जापान की सेना के आकार एवं संलिप्तताओं को सीमित करती है, हथियारों का सबसे बड़ा आयातक भारत इस मामले में अपने सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी देश से काफी पीछे बना हुआ है। आर्थिक रूप से भी, भारत अपने उत्तरी पड़ोसी से वर्षों पीछे है। दुनिया भर में पीएचडी धारकों की संख्या के लिहाज से भारत तीसरे स्थान पर है, लेकिन एक बड़ी आबादी में शिक्षा के निम्न स्तर के कारण इसकी विशाल युवा शक्ति को इसका अधिक लाभ हासिल नहीं हो पाता। ऐसी चुनौतियां दोनों ही देशों को कमजोर कर देती हैं क्योंकि वे अपने पड़ोसी देशों के बीच अपनी ताकत को प्रदर्शित करना चाहते हैं।
पूरे विकास गलियारे में मध्य आकार के व्यवसायों को प्रोत्साहन देने के लिए भारत और जापान उम्मीद करते हैं कि उनके साझीदार के बाजारों में आर्थिक विकास को बढ़ावा मिले, और उन्हें बेहतर क्षेत्रीय रिश्तों के जरिये रणनीतिक लाभ हासिल हो।
हालांकि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए विदेशों में फिल्म बनाने से सांस्कृतिक आदान प्रदानों में अवश्य बढोतरी हो सकती है लेकिन इसके पहले कि ये दोनों देश लोगों के बीच स्थायी आदान प्रदान को बढ़ावा दें, यह आवश्यक है कि भारत और जापान के भीतर संरचनात्मक बदलाव अवश्य आ जाएं। मोदी का ‘मेक इन इंडिया‘ अभियान एक सकारात्मक कदम है लेकिन निर्गुट की विरासत और निम्न टैरिफ व्यवस्था ( जैसे, जो टीपीपी के तहत आते हैं) के प्रति विरोध, देश में नौकरशाही माहौल के कारण और बदतर हो जाता है और इन्हीं सब का परिणाम है कि भारत व्यवसाय करने की सुगमता के मामले में काफी नीचे 130 स्थान पर है। व्यवसाय करने के लिहाज से जापान का समग्र घरेलू माहौल अधिक सकारात्मक है, लेकिन वहां के विनियमनों की भूलभुलैया या चक्रव्यूह भी कई प्रकार से विदेशी व्यवसायों के लिए रास्ते बंद कर देती है। इसके अतिरिक्त, अप्रवासन बढ़ाने की अबे सरकार की कोशिशों, जोकि जापान की निम्न जन्म दर और वृद्ध होती जा रही आबादी के कारण आवश्यक हो गई है-का भी घरेलू स्तर पर लगातार विरोध होता रहता है। संरक्षणवाद एवं बड़ी घरेलू बाधाओं को दूर किए बगैर, दोनों नेताओं के लिए यह कल्पना करना मुश्किल है कि वे प्रभावी तरीके से लोगों के स्तर पर सार्थक क्षेत्रीय एकीकरण को प्रोत्साहित कर सकेंगे।
एशिया से अमेरिका की कथित वापसी को देखते हुए, क्षेत्रीय सुरक्षा संरचनाओं को पुनर्परिभाषित किया जाना अवश्यम्भावी है। व्यापार की वर्तमान स्थिति और ऊर्जा सुरक्षा के प्रचलन को बनाये रखने के लिए रणनीतिक ढांचागत निवेशों तथा प्रभावी क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से एक शक्ति संतुलन स्थापित किया जा सकता है और अनिवार्य रूप से ऐसा किया जाना चाहिए। एएजीसी में हर जगह, देशों को अधिक एजेंसी उपलब्ध कराए जाने के साथ किसी एक व्यापार रास्ते या किसी एक ताकत पर अति निर्भरता के डर को कम किया जा सकता है। लेकिन असली सवाल तो यही है कि क्या भारत और जापान इस परियोजना को अपने देशों में बेच पाने में अर्थात अपने देशवासियों को इस परियोजना के लाभों के बारे में भरोसा दिला पाने में सक्षम हो सकेंगे।
लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक रिसर्च इन्टर्न हैं
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