Published on Jan 16, 2019 Updated 0 Hours ago

एशिया में वॉशिंगटन के सहयोगी अपने रणनीतिक विकल्पों को मौलिक रूप से बदलेंगे, इसकी संभावना कम ही है, भले ही वे इससे चिंतित दिख सकते हैं।

एशिया में संतुलन के लिए अमेरिका बेहद ज़रूरी

अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस हैरी एस. ट्रुमन। स्रोत: Matt Cardy/Getty Images

अमेरिकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस का अचानक इस्तीफ़ा और राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का सीरिया से सभी अमेरिकी फ़ोर्सेज़ को हटाने और अफ़ग़ानिस्तान से कुछ सुरक्षाबलों को वापस बुलाने के फ़ैसले ने अमेरिका की वैश्विक प्रतिबद्धताओं को लेकर अतिरिक्त सवाल खड़े कर दिए हैं। ये ऐसी चिंताएं थीं जो पिछले एक दशक से हवा में तैर रही थीं, लेकिन ट्रंप के नेतृत्व में ज़्यादा साफ़ तौर पर दिखने लगीं। एशिया में (और यहां तक ​​कि यूरोप) वॉशिंगटन के सहयोगी अपने रणनीतिक विकल्पों को मौलिक रूप से बदलेंगे, इसकी संभावना कम ही है, भले ही वे इससे चिंतित दिख सकते हैं। ख़तरों और धमकियों का सामना करते हुए वे अपने दम पर सब कुछ मैनेज नहीं कर सकते हैं, ऐसे में उनके पास मदद के लिए वॉशिंगटन (अमेरिका) की ओर देखने के अलावा बहुत कम विकल्प हैं।


ये पहली बार नहीं है जब अमेरिका अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से पीछे हट रहा है जब उन प्रतिबद्धताओं से उसका हित सधना बंद हो गया हो। सबसे बेहतर उदाहरण है ताइवान, जिसे अमेरिका ने 1979 में चीन के साथ राजनयिक संबंधों की स्थापना के समय छोड़ दिया था।


आज यह स्पष्ट नहीं है कि अगर मेनलैंड (चीन) जबरन ताइवान को अपने आप में समाहित करने/एकीकृत करने की कोशिश करता है तो क्या अमेरिका ताइवान की मदद को आगे आएगा। निश्चित रूप से, अमेरिका भागीदारों और सहयोगियों को छोड़ने वाला अकेला देश नहीं है: लगभग एक दशक तक ख़ूनी संघर्ष के बाद रूस ने अफ़ग़ानिस्तान में अपने क्लाइंट्स को उनकी क़िस्मत के भरोसे छोड़ने का फ़ैसला किया और पूर्वानुमानित नतीजों के आधार पर 1989 में रूस ने अपनी सेना को अफ़ग़ानिस्तान से वापस बुला लिया। बड़ी ताक़तों के इस तरह का खेल खेलने की संभावना ज़्यादा रहती है, क्योंकि उनके पास ज़्यादा भागीदार और सहयोगी होते हैं और वे ज़्यादा देशों और दुनिया के कई हिस्सों में भागीदार होते हैं। लेकिन कमज़ोर ताक़तें के इस तरह के व्यवहार में शामिल होने की वैसी संभावना कम ही होती है। मिस्र एक मात्र उदाहरण है, जिसने 1970 के दशक की शुरुआत में रूसियों को भगा दिया और अमेरिका के पाले में चला गया, तब जबकि ये साफ़ हो गया कि इज़रायल के साथ शांति बनाने में रूस बहुत मददगार नहीं होगा।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन और साझेदारी हमेशा सहूलियत और पारस्परिक ज़रूरतों के मामले होते हैं, कुछ ऐसा जिसकी अक्सर नई दिल्ली में विदेश नीति की बहस में बहुत अनदेखी की जाती है। आपसी दायित्वों को लेकर हमेशा तनाव होता है, यहां तक कि मज़बूत से मज़बूत गठजोड़ में भी, जिससे गठबंधन और साझेदारी हमेशा अस्थायी और नाज़ुक होते हैं। जबकि विशेष प्रतिबद्धताओं के महत्व और उन प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने पर हमेशा बहस की जा सकती है, ऐसी प्रतिबद्धताओं की नाज़ुकता को भी हमेशा दिमाग़ में रखने की ज़रूरत है। आदर्श रूप में, ज़्यादातर देश दूसरे देशों के साथ एकजुट नहीं होंगे क्योंकि जाहिर तौर सहयोगी कभी भी पूरी तरह से भरोसेमंद नहीं होते हैं, एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ये एक संभावित ख़तरनाक स्थिति है जिसमें हर देश को अपनी सुरक्षा के बारे में सोचना होता है। एक और ख़तरा यह है कि सहयोगी आपको अपने संघर्षों में खींच सकते हैं, भले ही ये आपके हित में न हों। इस तरह के ख़तरों के बावजूद, देश फिर भी एकजुट रहते हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ताक़त असमान रूप से बंटी हुई है, ख़ास कर भू-भागों में। इस प्रकार, अपेक्षाकृत कमज़ोर देशों को अपने अकेले के द्वारा मज़बूत शक्तियों का सामना करने में निहित बड़े सुरक्षा जोखिमों के ख़िलाफ़ एकजुट होने के जोखिमों को संतुलित करना पड़ता है।

अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं में गठबंधन के दबाव भी अलग होते हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विचारक ग्लेन स्नाइडर ने दशकों पहले बताया था कि हालांकि कई बड़ी ताक़तों की बहुध्रुवीय प्रणाली में गठबंधन भागीदारों के अधिक विकल्प हैं, लेकिन अधिक असुरक्षा और सहयोगियों द्वारा अलग-थलग करने या छोड़े जाने का डर मज़बूत गठबंधन को जन्म देता है। दूसरी ओर, द्विध्रुवीय दुनिया में, सहयोगियों द्वारा छोड़े जाने का डर कम है क्योंकि गठबंधन के विकल्प सिर्फ़ दो बड़ी ताक़तें हैं, जो एकजुटता को उल्लेखनीय रूप से स्थिर बनाते हैं। ये विश्वास कि सहयोगी दल वफ़ादार रहेंगे, ज़्यादा स्वतंत्रता से नीतियां बनाने की आज़ादी देता है। राज्य स्वतंत्र नीतियां अपनाते हैं जो कई बार बिलकुल मेल नहीं खातीं लेकिन उन्हें ये भरोसा होता है कि सिर्फ़ इसके बल पर सहयोगी दल साथ नहीं छोड़ेंगे। लेकिन इस तरह का दोहरा नज़रिया कुछ जटिल, समस्याओं से भरा होता है।


जबकि प्रथम विश्व युद्ध से पहले की बहुधुव्रीय व्यवस्था ने मज़बूत गठबंधन को जन्म दिया, वहीं दूसरे विश्व युद्ध से पहले की बहुध्रुवीय व्यवस्था ने कमज़ोर गठबंधन ‘बक-पासिंग’ गठबंधन को, जिसमें सहयोगियों ने एक-दूसरे की मदद के बजाय फ़ायदा उठाने की कोशिश की।


गठबंधन के तर्क के इस तरह के संरचनात्मक नज़रिए के साथ एक आम समस्या यह है कि यह कमज़ोर शक्तियों के बजाय महान शक्तियों के विकल्पों पर केंद्रित है। कमज़ोर शक्तियों के लिए विकल्प कुछ हद तक सरल हैं: अगर किसी बड़ी ताक़त द्वारा उन पर दबाव डाला जाता है, ख़ास कर उसके द्वारा जो पड़ोसी है तो ऐसी स्थिति में वो या तो समपर्ण करने का रास्ता चुन सकते हैं या फिर वैकल्पिक रूप से एक ऐसे सक्षम साथी की तलाश कर सकते हैं जो मदद के लिए तैयार हो। समर्पण अलग-अलग रूप में हो सकता है, लेकिन मूल रूप से यह ‘फ़िनलैंडाइज़ेशन’ के नाम से जाना जाता है, तटस्थता की एक ऐसी अवस्था जो बड़ी असमानता, भय और निकटता की वजह से उपजती है। लेकिन जहां सहयोगी उपलब्ध हैं, वहां कमज़ोर देश उन ख़तरों का विरोध करने का विकल्प चुनेंगे जिसका वो सामना कर रहे हों, क्योंकि कई तरह की समस्याओं के बाद भी गठबंधन समर्पण की तुलना में काफ़ी बेहतर विकल्प है। सबसे महत्वपूर्ण बात, कमज़ोर देशों के पास ज़्यादा विकल्प नहीं होते, इसलिए वो अपने बड़े सहयोगी देशों की नादानियां और उनके अवगुणों के प्रति बहुत ज़्यादा क्षमाशील होते हैं, विशेष रूप से द्विध्रुवीय प्रणाली में। यही वजह है कि ट्रम्प प्रशासन की आलोचना की एशिया में बहुत कम नीतिगत गूंज है: ऐसा नहीं है कि एशिया में अमेरिका के साझेदार ट्रम्प की स्पष्ट अस्थिरता के बारे में चिंतित नहीं हैं, लेकिन वे मानते हैं कि अमेरिका के विकल्प कहीं अधिक ख़राब हैं।


एशियाई शक्तियों द्वारा चीन के साथ अपने संबंधों को स्थिर करने की कोशिश हो रही है, लिहाजा इसमें अमेरिका के वास्तविक विकल्प की झलक नहीं दिखती है। वुहान में पीएम मोदी और शी-जिनपिंग की मुलाक़ात के बाद का भारत एक उदाहरण हैजो होशियारी से अपनी तलवार तेज़ करने की कोशिश कर रहा हैबावजूद इसके कि वह चीन के साथ अपने संबंधों को स्थिर करना चाहता है।


जापान में प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे इसी रणनीति पर चलने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं, और कुछ हद तक वियतनाम भी। लेकिन यह अल्पकालिक होगा क्योंकि चीन से ख़तरे से उत्पन्न मांग और इसे शांत करने के लिए इन शक्तियों की ओर से सुरक्षा और राजनीतिक रियायतों के बीच वास्तविक रूप से बीच का रास्ता बहुत ही कम होता है। इनमें से कोई भी चीनी आधिपत्य के सामने समर्पण नहीं करेगा, कम से कम जब तक अमेरिकी काउंटरबैलेंस मौजूद है। लिहाजा, एशियाई शक्तियों को ट्रम्प की अस्थिरता के बारे में जो भी चिंताएं हैं, वो निजी रहेंगी क्योंकि वे अमेरिकी की बड़ी भूमिका चाहते हैं, कम नहीं।

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