Author : John Swartz

Occasional PapersPublished on Dec 16, 2023
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‘वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास भारत के बुनियादी ढांचे के विकास को समझना’

  • John Swartz

    भारत द्वारा चीन की सीमा पर मौजूद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलओएसी) के साथ बुनियादी ढांचे के निर्माण की गति ऐतिहासिक रूप से धीमी रही है, जिसकी वजह वित्तीय और सैद्धांतिक बाध्यताएं रही हैं लेकिन पिछले 20 वर्षों में इसमें तेज़ी आई है. नौकरशाही में परिवर्तनों और अधिक वित्तीय संसाधनों के प्रवाह के कारण निर्माण कार्य अधिक सक्षम हुए हैं. यह शोध पत्र इन परिवर्तनों के लिए एलएसी से संबंधित चीनी कार्यों- दोनों कूटनीतिक और ज़मीनी- द्वारा लाए गए रणनीतिक दबावों को ज़िम्मेदार मानता है. कुल मिलाकर, भारत सरकार ने क्षेत्र में अपनी सड़क और हवाई बुनियादी ढांचे की तैयारी, प्रतिरोध क्षमता और सामर्थ्य में सुधार करके अपने रणनीतिक माहौल में बदलावों का अच्छी तरह से जवाब दिया है. इसके साथ ही, शोध पत्र में यह दर्ज किया गया है कि बुनियादी रेल ढांचा पिछड़ता जा रहा है.

Attribution:

जॉन स्वार्ट्ज़, "वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास भारत के बुनियादी ढांचे के विकास को समझना," ओआरएफ़ प्रासंगिक शोध पत्र संख्या 417, अक्टूबर 2023, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन.

भूमिका

भूमिका

पिछले 10 से 15 वर्षों में भारत सरकार वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की कवरेज में सुधार के लिए बुनियादी ढांचे के नेटवर्क का विस्तार करने में सफल रही है. सैद्धांतिक, प्राकृतिक, नौकरशाही से संबंधित और वित्तीय कठिनाइयों के बावजूद सड़क नेटवर्क में व्यापक सुधार हुए हैं. सुरंगों और पुलों की बढ़ी हुई संख्या भी कहीं अधिक निवेश, परिचालन क्षमता और तकनीकी क्षमता का संकेत देती है, साथ ही स्वतंत्र रूप से सड़क प्रणाली की गुणवत्ता को बढ़ाती है. हवाई क्षेत्र के संबंध में बात करें तो, भारत ने कई मायनों में और कम बजट के बावजूद,अपनी भौगोलिक स्थिति (जो भारत को पूरी क्षमता के साथ विमान उड़ाने की संभावना प्रदान करती है) का लाभ उठाते हुए रणनीतिक लाभ बनाए रखा है.[i] हालाँकि, रेल संपर्क के मामले में तस्वीर कम उज्ज्वल है, जहाँ एक बड़ी विषमता है. फिर भी, एलएसी के साथ बुनियादी ढांचे के मामले में बात करें तो कुल मिलाकर भारत आज 20 साल पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में है.[ए],[बी],[ii]

विकास के इस समय से पहले, भारतीय सरकार अपने स्वयं के सिद्धांत की वजह से विवश थी जिसने बुनियादी ढांचे के निर्माण पर प्रतिबंध लगा रखा था. सीमा पर चीनी सेना की कार्रवाइयों के कारण और कूटनीतिक रूप से विवादित क्षेत्र के संबंध में चीन के साथ वार्ताओं में लंबे गतिरोध से उत्पन्न रणनीतिक दबावों और आंतरिक परिवर्तनों के कारण यह बदल गया.[iii]

एलएसी भारत और चीन के बीच भौतिक रूप से वास्तविक सीमा है; यह उन कानूनी सीमाओं से अलग है जिन पर सहमति नहीं बनी है. बता दें कि, विशेष रूप से अतीत में, चीन द्वारा अक्सर तर्क दिया जाता था कि एलएसी अनिश्चित है और इसलिए उसकी घुसपैठ दुर्घटनापूर्ण थीं या घुसपैठ थी ही नहीं.

यह शोध पत्र विभिन्न प्रकार के बुनियादी ढांचे के रणनीतिक महत्व पर संक्षिप्त में चर्चा करता है; एलएसी के साथ भारतीय बुनियादी ढांचे के विकास में उन बड़ी बाधाओं का वर्णन करता है, जो 1950 के दशक में खड़ी हुई थीं और आज तक बनी हुई हैं; और उन व्यवस्थाओं और माहौल में परिवर्तनों की रूपरेखा तैयार करता है जिन्होंने बुनियादी ढांचे के विस्तार को गति दी है. यह हवाई और रेल के बुनियादी ढांचे के विकास पर भी प्रकाश डालता है, क्योंकि इन दोनों की अपनी अनूठी गतिशीलता है जिन पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है.

लेखक ने पृष्ठभूमि के लिए माध्यमिक स्रोतों का उपयोग किया है. बाकी डाटा के लिए, शोध पत्र प्राथमिक स्रोतों (ज़्यादातर सरकारी दस्तावेज़ो) पर निर्भर रहा है, साथ ही क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों के साथ साक्षात्कार भी किया गया है.[सी] जहां उचित लगा वहां पर समाचार और विद्वानों के लेखों का भी उपयोग किया गया है.

बुनियादी ढांचे का सामरिक महत्व

एलएसी भारत और चीन के बीच भौतिक रूप से वास्तविक सीमा है; यह उन कानूनी सीमाओं से अलग है जिन पर सहमति नहीं बनी है. बता दें कि, विशेष रूप से अतीत में, चीन द्वारा अक्सर तर्क दिया जाता था कि एलएसी अनिश्चित है और इसलिए उसकी घुसपैठ दुर्घटनापूर्ण थीं या घुसपैठ थी ही नहीं.[iv] एलएसी उस समय के आस-पास अस्तित्व में आई जब चीन और भारत द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए और जब, 1962 में, उनमें सीमा को लेकर युद्ध हुआ. इस युद्ध के बाद, दोनों पक्षों में कुछ हद तक एक रेखा पर सहमति बनी थी जिस पर वे गश्त करेंगे या, घुसपैठ के मामले में, छोड़कर आगे बढ़ जाएंगे- और इसे एलएसी के रूप में जाना जाएगा.[v] हालाँकि, परस्पर गश्त की इस सीमा की प्रकृति 2020 के बाद बदल गई, जब चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने एलएसी पर एक साथ कई घुसपैठ शुरू कर दीं, जिसमें से एक हिंसक हो गई थी, जिसमें दोनों तरफ के सैनिक मारे गए थे.[डी] इनमें से कुछ घुसपैठों को जल्द ही वापस खदेड़ दिया गया था या सुलझा लिया गया था; हालाँकि, दो बिंदुओं पर चीनी घुसपैठ अब तक भी बनी  हुई है. इन घटनाओं ने दोनों देशों द्वारा एलएसी पर गश्त करने के तरीके को बदल दिया: वे अब सीमा से बहुत दूर नहीं रहते, न ही इन क्षेत्रों में बहुत कम ही गश्त करते हैं. आज, दोनों देशों के सैनिकों का एक दूसरे के करीब रहने के साथ ही बहुत बार गश्त करना कहीं अधिक आम है.[vi]

सड़क और रेल नेटवर्क

भारत की सीमाओं के अंदरूनी क्षेत्रों की कठोर भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए, सड़क के बुनियादी ढांचे का विस्तार सैनिकों की एक स्थिर आपूर्ति श्रृंखला, सेना के पर्याप्त तेज़ी से पहुंचने, सामान को लाने-ले जाने और युद्ध के समय में विभिन्न मोर्चों पर  परस्पर तैनाती में मददगार होने के लिए महत्वपूर्ण है. एलएसी के आसपास का वातावरण कितना मुश्किल है, यह देखते हुए, आपूर्ति से कट जाने से न केवल एक गंभीर सामरिक नुकसान हो सकता है; बल्कि बिना दुश्मन के हस्तक्षेप के भी, यह घातक साबित हो सकता है. ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनसे यह साफ़ पता चला है कि सैनिक दुश्मन के नहीं बल्कि वहां के मौसम, हालातों के शिकार हुए थे.[vii] इसके अतिरिक्त, यदि भविष्य में कोई लंबा चलने वाला  गत्यात्मक संघर्ष होता है, तो सीमा के आसपास जितने अधिक सड़क संपर्क होंगे, दोनों अनुदैर्ध्य (longitudinal) और पार्श्विक (lateral), ये आपूर्ति श्रृंखलाएं दुश्मन के अवरोधों के प्रति प्रतिरोध क्षमतापूर्ण  होंगी.

इसे विस्तार से समझते हैं, इन अत्यधिक नाजुक पहाड़ों के बीच एक या दो अच्छी तरह से रखे गए गोला बारूद- जिस तरह के चीन के पास बहुत हैं- एक महत्वपूर्ण सड़क को एक महत्वपूर्ण सड़क की बाधा में बदल सकते हैं जिसके लिए काफ़ी समय लेने वाली मरम्मत की ज़रूरत पड़ती है और इससे रक्षात्मक या आक्रामक कार्रवाई में गंभीर रूप से बाधा उत्पन्न होती है. हालाँकि, यदि किसी महत्वपूर्ण रोडब्लॉक के थोड़े सी दूरी के भीतर वैकल्पिक मार्ग हैं, तो आपूर्ति को फिर से शुरू  किया जा सकता है और केवल मामूली देरी से स्थानांतरित किया जा सकता है.[viii] नई सुरंग बनाने से न केवल तेज़ रास्ते मिलते हैं, बल्कि सभी मौसमों में पहुंच भी मिलती है- जो आर्द्र वाले महीनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण- और दुश्मन के हमलों के प्रति प्रतिरोध क्षमतापूर्ण होती है.

उत्तरी भारत में देश के अंदरूनी क्षेत्र में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की वास्तविक शुरुआत कुछ अलग-अलग टुकड़ों में हुई है. 1965 में लद्दाख में सड़क बनाने के प्रयास किए गए, 1962 में तवांग को अपना पहला रास्ता मिला और वालोंग को तो 1990 के दशक में ही जोड़ा गया.

रेल के बुनियादी ढांचे की विशिष्ट रणनीतिक ताकत यह है कि बड़ी मात्रा में सामग्री और लोगों को तेज़ी से ले जाया जा सकता है. रेल सड़क और हवाई मार्ग की पूरक भी है. यद्यपि सड़क और बुनियादी हवाई ढांचा गति और लचीलेपन में उत्कृष्ट हैं, रेल अपनी दक्षता के कारण महत्वपूर्ण है. रेल की कमज़ोरी यह है कि यह हमलों, तोड़फोड़ और धरती की प्राकृतिक गति के प्रति अधिक संवेदनशील है और इस तरह यह बड़े संघर्षों के लिए अविश्वसनीय हो जाती है. इसके अतिरिक्त, इस पहाड़ी इलाके में इसके लिए उच्च स्तर की सुरंग बनाने और पुल बनाने की आवश्यकता होती है- जम्मू-बारामुला लाइन इसका प्रमाण है- जो इसे अत्यधिक लागत वाला और जटिल बनाते हैं. भारत के लिए, भारतीय सेनाओं की वर्तमान स्थिति और निर्माण और वित्तपोषण में आने वाली कठिनाइयों को देखते हुए इसके महत्व पर बहस रही है.[ix]

हाल के वर्षों में, चीन अपने सैन्य बलों को सीमा के करीब ले आया है और इसलिए उसके सैन्य बल के मौके पर पहुंचने में बहुत कम समय लगने की संभावना है. हालाँकि भारतीय सेनाएँ, बड़े पैमाने पर, सीमा से ही दूर रहती हैं और क्योंकि, अधिकांश भाग के लिए, रेल परिवहन की कमी है, उनके मौके पर पहुंचने का समय बहुत अधिक होगा.[x] यह रेल परिवहन को वास्तव में महत्वपूर्ण बनाता है लेकिन भारत को यह आकलन करना चाहिए कि क्या इस पर लगने वाली लागत जायज़ होगी?

हवाई शक्ति से संबंधित बुनियादी ढांचा

आधुनिक सैन्य युग में, प्रमुख क्षेत्रों में रक्षा को सुनिश्चित करने या शक्ति संतुलन बनाए रखने में वायु शक्ति से संबंधित बुनियादी ढांचा महत्वपूर्ण है. सीमा पर अपनी ओर की प्राकृतिक भौगोलिक स्थिति के कारण  भारतीय सेना पहले से ही कुछ लाभ की स्थिति में हैं.[xi] इस लाभ की स्थिति के बावजूद, भारत को अपनी वायु शक्ति का विस्तार करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि चीन सीमा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर और बहुआयामी रूप से अपना विस्तार कर रहा है.[xii] इसके अतिरिक्त, बुनियादी सड़क ढांचे की नाज़ुक स्थिति को देखते हुए भारी सामान उठाने वाले और रसद केंद्रित हैलिकॉप्टरों की उपलब्धता बढ़ाना समझदारी हो सकती है, क्योंकि वे उन सैन्य प्रतिष्ठानों की आपूर्ति में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं जो भारी क्षतिग्रस्त हो गए हैं या जिनसे संपर्क कट गया है.

ऐतिहासिक व्यवधान और बाधाएं

घटनाक्रम

उत्तरी भारत में देश के अंदरूनी क्षेत्र में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की वास्तविक शुरुआत कुछ अलग-अलग टुकड़ों में हुई है. 1965 में लद्दाख में सड़क बनाने के प्रयास किए गए, 1962 में तवांग को अपना पहला रास्ता मिला और वालोंग को तो 1990 के दशक में ही जोड़ा गया.[xiii] 1960 में, सीमा पर सड़कों के रखरखाव, प्रबंधन और निर्माण के लिए सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) का गठन किया गया था. हालांकि, बुनियादी ढांचा निर्माण के लिए सबसे ज़्यादा प्रोत्साहन 2000 के दशक की शुरुआत में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार द्वारा देना शुरू किया गया, जो काफ़ी हद तक चीन की आक्रामकता और सीमा के अतिक्रमण से प्रेरित था. इस शत्रुता ने 2014 के आसपास से शीर्ष से नीचे की ओर आने वाले एक प्रभावी प्रयास को जन्म दिया, हालांकि इसकी तीव्रता और प्रभावशीलता में उतार-चढ़ाव आता रहा है.

सवाल यह है कि चीन के साथ लगातार आमना-सामना होते रहने और एक युद्ध के बावजूद भारत शुरुआत में ही उल्लेखनीय बुनियादी ढांचा क्यों नहीं बना सका? इसका संक्षिप्त उत्तर है सिद्धांत और भूभाग. दूसरे प्रश्न कि भारत के निर्माण की गति इतनी धीमी क्यों थी, का उत्तर है नौकरशाही और वित्त.[xiv]

चित्र 1. वास्तविक नियंत्रण रेखा का मानचित्र[xv]

सिद्धांत

इस शोध पत्र के लिए जिन विशेषज्ञों का साक्षात्कार किया गया वह इस बात से सहमत हैं कि 2000 के दशक की शुरुआत तक, भारत के रणनीतिक सिद्धांत के तहत एलएसी के आस-पास बहुत ही सीमित सड़कों का निर्धारण किया गया था और वस्तुतः कोई भी सड़क नहीं थी जो सीधे उस तक जाती थी, यह उस समय के बुनियादी ढांचा निर्माण की गति को परिभाषित भी करता है जिससे दीर्घकालिक जटिलताएं पैदा हुईं.[xvi] इस बिंदु पर एलएसी तक वास्तविक आपूर्ति अक्सर विशेष रूप से पाले गए खच्चर/याक ट्रेनों या विमान द्वारा की जाती थी. इस रक्षात्मक सिद्धांत की जड़ें संभवतः 1962 के एक महीने के युद्ध में भारतीय सेना की विफलता से उपजी हैं. उस युद्ध में बहादुरी भरे प्रयासों के बावजूद, भारतीय सेना एलएसी की प्रभावी ढंग से रक्षा करने में विफल रही. चीन की सेना ने केवल तभी आगे बढ़ना बंद किया जब चीन ने एकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा कर दी और इसके बाद जल्द ही वह अतिक्रमित क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों से वापस चला गया लेकिन अक्साई चिन में लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखा. इस बिंदु के बाद, सैन्य नेतृत्व ने तर्क दिया कि यदि रक्षा की पहली पंक्ति विफल हो जाती है, तो चीनी सेना को भारतीय क्षेत्र से पैर घसीटते हुए गुज़़रने के लिए मजबूर करके उसका काम अधिक कठिन बनाना समझदारी होगी, उन्हें अपने इरादे ज़़ाहिर करने दें (वे कहाँ हमला करना चाहते थे) और भारतीय सेना को पलटवार करने की अनुमति दें.[xvii] हालांकि यह उस समय का प्रचलित दृष्टिकोण था, जो बाद में इससे कड़वाहट ही पैदा करता और चीन के बुनियादी ढांचे का निर्माण कर चुकने के काफ़ी बाद भारत को इसे शुरू करने के लिए मजबूर करता.[ई],[एफ],[xviii]

पर्यावरण

सिद्धांत संबंधी कारणों के अलावा, यह भौगोलिक स्थिति और जलवायु थी जिसने एलएसी के साथ भारतीय बुनियादी ढांचे की स्थिति को बहुत प्रभावित किया. यह भूभाग समकालीन और ऐतिहासिक रूप से संघर्ष की प्रकृति के बारे में एक निश्चित कारक रहा है.[जी],[xix] हिमालय और उनकी तलहटी का भूगोल कई कारणों से निर्माण के लिए विशेष रूप से ख़तरनाक है: पहाड़ की ऊंचाई में भारी अंतर और युवा पर्वत की नज़ाक़त, और जलवायु.[xx]

पहले, हिमालय में ऊंचाई में बहुत भिन्नता है- घाटी के कुंड से लेकर पहाड़ के शिखर तक. इसका मतलब है कि बनाई गई किसी भी सड़क को कटक रेखाओं (रिज लाइनों) के साथ चलना चाहिए और यदि सड़कों को पर्वत श्रेणियों  को पार करने की आवश्यकता होती है, तो तकनीकी रूप से जटिल और महंगे पुलों या सुरंगों का निर्माण करना चाहिए. इसके अतिरिक्त, इन उपकरणों के बिना आवागमन- पुलों और सुरंगों की अनुपस्थिति में- हिमनदीय होगा. जब सड़कें सिर्फ़ पर्वत श्रेणियों  के साथ चल रही होती हैं तो सड़क को होने वाला कोई भी नुकसान से सीधे पहाड़ की तलहटी पर वापस जाने के लिए मजबूर कर देता है और फिर नए सिरे से आगे बढ़ना शुरू करना पड़ता है.[xxi]

बीआरओ सूत्रों के अनुसार, इस प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण और समस्या का एक बड़ा हिस्सा विशेष रूप से वन विभाग की मंज़ूरी और भूमि अधिग्रहण की इजाज़त प्राप्त करना था.[xxix] अक्सर अकेले इन्हीं में कम से कम तीन साल लगते थे.[xxx] इस धीमी और कठिन प्रक्रिया के कारण, 2006 में शीर्ष से नीचे तक आने वाले प्रयास विफल रहे..

दूसरा, पर्वत श्रृंखला की उम्र भौगोलिक रूप से कम होने के कारण, भूस्खलन और पृथ्वी की हलचल के अन्य रूप बहुत आम हैं.[xxii] यह, और जलवायु का तीसरा कारक- रखरखाव की लागत को बढ़ा देता है. जैसा कि व्यापक रूप से दर्ज हो चुका है, अक्सर बारिश, बर्फबारी और भूस्खलन के दौरान सड़क के पूरे हिस्से बह जाते हैं, जिसके लिए वार्षिक मरम्मत और बड़े रखरखाव बजट की आवश्यकता होती है.[xxiii] ये समस्याएं रेल के बुनियादी ढांचे के निर्माण को प्रभावित करती हैं. रेल के बुनियादी ढांचे के पहले से ही भारी निर्माण लागत वाला होने के कारण, कुछ क्षेत्रों में रेल पटरियों का निर्माण करने के लिए यह वित्तीय रूप से वहनीय नहीं हो सकता है, जो अपरिहार्य रूप से कांपेंगे या बह जाएंगे.[xxiv]

अंत में, जलवायु निर्माण को कई तरह से और अधिक कठिन बना देती है. हिमालय में मानसून के दौरान मूसलाधार बारिश होती है और सर्दियों में समान अनुपात में बर्फ़बारी होती है. इसका मतलब यह है कि सड़कों के ढह जाने के अलावा, किसी भी सड़क निर्माण को रोकना होगा, क्योंकि इन परिस्थितियों में न तो कंक्रीट और न ही डामर कठोर हो सकता है. इसलिए, काम आधे, सूखे वर्ष तक ही सीमित रहता है. इसके अलावा, कई क्षेत्र नियमित रूप से सर्दियों और आर्द्र महीनों के दौरान कट जाते हैं, क्योंकि संकरे रास्ते बर्फ से भर जाते हैं, जिससे वे अगम्य हो जाते हैं. मौसम और ऊंचाई के कारण श्रमिकों के लिए स्थितियां क्रूर होती हैं. और तो और मशीनें भी मौसम से जूझती हैं इसलिए अत्याधुनिक उपकरणों के बजााय केवल मध्यम और स्थानीय प्रकार के उपकरणों का उपयोग किया जाता है.[xxv]

वित्त और नौकरशाही संबंधी

एलएसी के पास बुनियादी ढांचे का विकास करने में इतना समय क्यों लगा, इसके अंतिम बड़े कारण का संबंध सरकार से है, मुख्य रूप से नौकरशाही और वित्त के संबंध में. 2006 के आसपास, तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले यूपीए के तहत भारत सरकार 73 नियोजित सड़कों सहित एलएसी बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए व्यापक योजनाओं को लेकर आई थी.[एच],[आई],[xxvi] हालाँकि, 2006 से 2014 तक बहुत कम काम पूरा हुआ था.[xxvii] इस चूक का कारण बनने वाली नौकरशाही और वित्तीय समस्याएं क्या थीं?

विश्लेषक जयदेव रानाडे इसके लिए लोकतंत्र की लंबी प्रक्रियाओं क ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो चीन की सरकारी प्रणाली से अलग हैं. "वहां वे सिर्फ एक रेखा खींचते हैं और पीएलए इसे पूरा कर देता है."[xxviii] भारत में निर्णय लेने की प्रक्रिया बोझिल है: सेना इंजीनियरों को बताती है कि उन्हें क्या चाहिए; इंजीनियर वित्तपोषकों से बात करते हैं; वित्तपोषक उस ज़मीन और धन का इंतज़ाम करते हैं जो उसके मालिकों को मुआवज़ा देने के लिए आवश्यक है और इसके लिए भुगतान करते हैं; फिर यह सुनिश्चित करने में कि बुनियादी ढांचे से पर्यावरण में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा, पर्यावरण एजेंसियों, राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों की बात सुनी जाती है- और उसके बाद ही निर्माण शुरू हो सकता है. बीआरओ सूत्रों के अनुसार, इस प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण और समस्या का एक बड़ा हिस्सा विशेष रूप से वन विभाग की मंज़ूरी और भूमि अधिग्रहण की इजाज़त प्राप्त करना था.[xxix] अक्सर अकेले इन्हीं में कम से कम तीन साल लगते थे.[xxx] इस धीमी और कठिन प्रक्रिया के कारण, 2006 में शीर्ष से नीचे तक आने वाले प्रयास विफल रहे.

उदाहरण के लिए, चीन में भारत के पूर्व राजदूत अशोक कांथा का कहना है कि उनके कार्यकाल के दौरान, उन्होंने जो सड़कों की योजना बनाई थी, उनमें से एक में गंभीर देरी हुई क्योंकि यह एक संरक्षित हाथी गलियारे से गुज़र रहा था.[xxxi] भारत में इन गलियारों को कानूनी रूप से सुरक्षित किया गया है, जिससे उन्हें पार करने की मंज़ूरी मिलना मुश्किल हो जाता है.[xxxii] इस विशिष्ट संघर्ष का समाधान केवल तभी हो सका जब उच्च अधिकारियों ने परियोजना को नौकरशाही के दलदल से बाहर निकाल दिया.[xxxiii]

हालाँकि वित्तीय मामलों को सार्वजनिक रूप से बताया कम ही गया था, यह स्पष्ट है कि, बीआरओ के आंतरिक दस्तावेजों के अनुसार, 2017 के पहले और आसपास धन की कमी एक महत्वपूर्ण कारक थी.[xxxiv] निर्माण दर्शन में परिवर्तन के लिए नीति दिशानिर्देशों के अनुसार, बीआरओ की ऐतिहासिक क्षमता बाधाओं को रेखांकित करने के लिए, 2016 के दौरान- और बड़े पैमाने पर आउटसोर्सिंग और अधिक धन के आगमन से पहले- 35.2 बिलियन रुपये (429.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर) के बजट से लगभग 5 बिलियन रुपये (60.9 मिलियन अमेरिकी डॉलर) रखरखाव पर खर्च किए गए थे- एक आंकड़ा जो बाद के वर्षों में बढ़ा.[xxxv] रखरखाव के बाद, भूमि प्रतिष्ठान के वेतन और कार्य-प्रभारित प्रतिष्ठान (वर्क चार्ज्ड स्टैब्लिशमेंट- वे कर्मचारी होते हैं जो किसी विशिष्ट कार्य के वास्तविक निष्पादन के लिए या विभागीय श्रम, स्टोर मशीनरी आदि के पर्यवेक्षण के लिए काम पर सीधे रखे जाते हैं) का भुगतान किया गया, कुल बजट का केवल लगभग 15 बिलियन रुपये (182.8 मिलियन अमेरिकी डॉलर) या 42.5 प्रतिशत वास्तविक निर्माण के लिए बचा था.[xxxvi] इन बजटीय बाधाओं को देखते हुए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि बीआरओ तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा था. परिणाम यह हुआ कि बुनियादी ढांचे के निर्माण में बहुत समय लगा और बीआरओ की हालत पतली हो गई. इस समय, बीआरओ जितनी परियोजनाओं को, आर्थिक और प्रशासनिक- दोनों तरह से कुशलता से संभाल सकता था, उसके पास उस से कहीं अधिक परियोजनाएँ थीं.[37][xxxvii]

सैद्धांतिक परिवर्तन के पहले स्पष्ट संकेतों में से एक भारतीय सरकार का चीन अध्ययन समूह (सीएसजी) था, जिसने 1999 में एलएसी के साथ रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़कों की पहचान की थी. जैसा कि द स्टेट्समैन द्वारा दर्शाया गया है, "सीएसजी ने सीमा के साथ 73 रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़कों की पहचान भारत-चीन सीमा सड़कों (आईसीआरबी) के रूप में की है.

अलग-अलग हिस्सों का जुड़ना

इन मामलों को बड़े स्तर पर कब हल किया गया था, इस पर अलग-अलग राय हैं, हालांकि माना जाता है कि यह आमतौर पर 2014 से 2017 के आसपास हुआ.[xxxviii] इस बिंदु पर ऐसा क्या बदला जिससे निर्माण की गति में वृद्धि हो गई? इसका उत्तर तीन प्रमुख कारकों में निहित है- वित्तीय, सैद्धांतिक और रणनीतिक. भौतिक परिवर्तनों का कारण बनने वाले कारक वित्तीय और सैद्धांतिक हैं, जबकि इन परिवर्तनों का प्रोत्साहन रणनीतिक था.[जे]

वित्त (फाइनेंस)

2014 के बाद, भारतीय बुनियादी ढांचे के विकास की गति को बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में से एक देश की आर्थिक वृद्धि थी, जिससे बीआरओ को अधिक धन आवंटित किया गया था. भारत की जीडीपी 1995 में 360.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2005 में 820.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर, 2015 में 2.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर और अंत में 2023 में 3.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई है (चित्र 2 देखें).[xxxix] पिछले 5 से 10 वर्षों में यह उल्लेखनीय आर्थिक विकास एलएसी के साथ बुनियादी ढांचे के लिए अधिक विवेकाधीन पूंजी में बदल गया है.

चित्र 2. समय के साथ भारतीय जीडीपी, बिलियन अमेरिकी डॉलर में[xl]

 स्रोत: "भारत जीडीपी 1960-2023," मैक्रोट्रेंड्स;[xli] "चयनित देशों और विषयों के लिए रिपोर्ट," आईएमएफ़[xlii]

यह कैसे लगता है कि ये फंड सीमावर्ती बुनियादी ढांचे की दिशा में डाले गए थे?

पहली बात, विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि बीआरओ की दक्षता और क्षमता में वृद्धि से स्पष्ट रूप से अधिक वित्तीय संसाधनों का संकेत मिलता है.[xliii] दूसरा, रक्षा मंत्रालय के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में, अकेले भारत-चीन सीमा में सड़कों पर 154.7 बिलियन रुपये (लगभग 1.877 बिलियन अमेरिकी डॉलर) खर्च किए गए हैं, जिसमें से इस धन का उपयोग करके लगभग 2,088.57 किमी नई सड़कें बनाई गई हैं.[xliv] यह 2011 से 2016 तक के आंकड़ों की तुलना करता है: उस अवधि में, बीआरओ के अनुसार, केवल 144 बिलियन रुपये (लगभग 1.73 बिलियन अमेरिकी डॉलर) 'सामान्य रणनीतिक' सड़कों पर खर्च किए गए थे, जिसमें वे सभी सड़कें शामिल हैं जिन्हें मुख्य रूप से सैन्य उपयोग के लिए माना जाता है, इनमें वह सड़कें भी शामिल हैं जो अन्य सीमाओं पर हैं.[xlv] इस प्रकार, वर्तमान भारत-चीन सीमा सड़क खर्च 2011 और 2016 के बीच सभी सीमा सड़क खर्च से अधिक है.[xlvi] इसके अतिरिक्त, बीआरओ के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल राजीव चौधरी के अनुसार, बीआरओ के बजट में पिछले दो वर्षों में 100 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.[xlvii] बीआरओ का पूंजीगत बजट भी 2022-23 वित्तीय वर्ष में लगभग 40 प्रतिशत बढ़ गया.[xlviii]

तीसरी बात, सुरंग और पुल निर्माण में वृद्धि इंगित करती है कि एक बड़ा बजट और ध्यान का केंद्र, वास्तव में एलएसी पर बुनियादी ढांचे की ओर लगाया गया है. लेफ्टिनेंट जनरल चौधरी के अनुसार, गलवान घटना (2021) के बाद के वर्ष में, 87 पुलों का निर्माण किया गया था और अगले वर्ष (2022) में 67 और पुलों का निर्माण किया गया था- जो पिछले वर्षों की तुलना में काफ़ी बड़ी वृद्धि है.[xlix] सुरंग निर्माण में भी वृद्धि देखी गई है, जिनमें कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएँ चल रही हैं.[l] विशेष रूप से, ज़ोजी-ला टनल अपनी समय सीमा के तीन साल करीब होने के बाद लगभग पूरी हो चुकी है, शिंकु ला टनल का निर्माण शुरू होने वाला है और से ला टनल का निर्माण चल रहा है.[li]

कुल मिलाकर, बीआरओ के बजट में इस बड़ी वृद्धि ने संभावनाओं को खोल दिया है और बीआरओ की क्षमता में वृद्धि की है. 2014-2017 की अवधि से पहले, बीआरओ की वित्तीय क्षमता उसके विस्तृत मिशन के लिए बहुत छोटी थी. प्रतीत होता है कि हाल के वर्षों में वित्तपोषण में वृद्धि के साथ क्षमता की बाधाएं कुछ कम हुई हैं.[lii]

नौकरशाही

सैद्धांतिक परिवर्तन के पहले स्पष्ट संकेतों में से एक भारतीय सरकार का चीन अध्ययन समूह (सीएसजी) था, जिसने 1999 में एलएसी के साथ रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़कों की पहचान की थी. जैसा कि द स्टेट्समैन द्वारा दर्शाया गया है, "सीएसजी ने सीमा के साथ 73 रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़कों की पहचान भारत-चीन सीमा सड़कों (आईसीआरबी) के रूप में की है. कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) ने 1999 में इन सड़कों के निर्माण को मंजूरी दे दी थी … और काम का एक अस्थायी लक्ष्य, 2003 से 2006 के बीच, निर्धारित किया था. बाद में लक्ष्य को 2006 से बढ़ाकर 2012 कर दिया गया था लेकिन अब [2017] तक काम खत्म होने से कोसों दूर है."[liii] हालांकि 2000 के दशक की शुरुआत में सरकार ने इस मामले में ज़ोर डाला था लेकिन इनसे निर्माण में तेज़ी नहीं आई. यह संभव है कि 2010 के दशक के दौरान इस तरह के महत्वपूर्ण लेखों और निश्चित रूप से, चीनी घुसपैठों जैसे डोकलाम (2017) या गलवान घटना (2020) ने अंततः बयानबाजी को कार्रवाई में बदल दिया.[liv]

बीआरओ की रिपोर्ट है कि पूर्वी लद्दाख में हंले और थानकुंग दोनों जगहों में 2022 में दो नए हेलीपैड बनाए गए थे. चंडीगढ़ में एयर डिस्पैच सब यूनिट ने "ज़मीन पर कामों के निष्पादन के लिए आवश्यक स्टोर और उपकरणों की कुशल और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने" के लिए उन्नयन शुरू कर दिया है.

इन परिवर्तनों का प्रभाव बीआरओ द्वारा सड़क निर्माण के किलोमीटर में और निर्मित पुलों की संख्या में तेज़ वृद्धि में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, विशेष रूप से 2020 के बाद से.[lv] द ट्रिब्यून के अनुसार, 2017 से 2022 तक बीआरओ ने 3,595 किमी नई सड़कें बनाईं.[lvi] इससे पहले, एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2006-2007 में शुरुआत करने के बाद से बीआरओ ने 2015 तक केवल 626 किमी सड़कें ही बनाई थीं.[lvii]

नौकरशाही के लिहाज से, इस दक्षता में वृद्धि का कारण स्पष्ट है. वित्तपोषण के अलावा, 2014 से 2017 तक कई ऐसी व्यवस्थाएं लागू की गई थीं जिन्होंने नौकरशाही की प्रक्रिया को तेज़ कया और निर्माण दक्षता में वृद्धि की. इन व्यवस्थाओं में निम्नलिखित शामिल थे लेकिन सिर्फ़ इन तक सीमित नहीं थे:

·       पर्यावरण और वन मंत्रालय ने "बीआरओ को सड़कों को जल्दी बनाने की अनुमति देने के लिए आवश्यक वन भूमि के परिवर्तन के लिए सामान्य अनुमोदन" दिया.[lviii] इसने बड़ी संख्या में पर्यावरणीय बाधाओं को कम कर दिया जो निर्माण प्रक्रिया में बाधा डालती थीं.[lix]

·       ऐसे राज्य, जहां परियोजनाएं अक्सर नौकरशाही की वजह से अटकी हुई थीं, केंद्र सरकार द्वारा बीआरओ को "सशक्त समितियों" का दर्जा देने के लिए प्रेरित किया गया ताकि वे "भूमि अधिग्रहण, वन्यजीवन संबंधी मंज़ूरी, खदानों के आवंटन आदि से संबंधित मुद्दों" को तेज़ी से हल कर सकें.[lx] व्यवस्था में विशिष्ट परिवर्तन यह था कि अब विवादों को सुलझाने के लिए ज़िम्मेदार समितियों में उच्च स्तरीय नेता  शामिल थे, न कि निम्न स्तर के नेता जिनके पास अधिकार कम थे. इसने परियोजनाओं को नौकरशाही की कई भूल भुलैयों के बीच से भी तेज़ी से आगे बढ़ने की सहूलियत दी.[lxi]

·       परियोजनाओं को पूरी तरह से आउटसोर्स करने की अनुमति दी गई, जिससे बीआरओ की क्षमता में काफ़ी वृद्धि हुई. 2017 से पहले, आउटसोर्सिंग को केवल विशिष्ट छोटे क्षेत्रों में अनुमति दी जाती थी और इसका उपयोग किया जाता था, जैसे कि परिष्करण सामग्री की आपूर्ति. इसका मतलब यह था कि बड़े, उच्च-क्षमता वाले, निर्माण व्यवसायी इसकी ओर आकर्षित नहीं होते थे और केवल छोटे, स्थानीय ठेकेदार प्रोजेक्ट लेते थे.[lxii] हालांकि, 2017 के बाद, एक  बिलियन रुपये (12.1 मिलियन अमेरिकी डॉलर) से अधिक मूल्य की सभी परियोजनाओं को नए 'अभियांत्रिकी अनुबंध खरीद मॉडल' (इंजीनियरिंग कॉन्ट्रैक्ट प्रोक्योरमेंट मॉडल) के तहत आउटसोर्स किया जाना था.[lxiii] साथ ही, छोटे प्रोजेक्टों को एक पैकेज के रूप में अनुबंधित किया जा सकता था, जिससे बड़ी कंपनियों से बोलियां आकर्षित की जा सकती थीं.[lxiv] इसका मतलब यह था कि बड़े व्यवसाइयों के इन परियोजनाओं को हाथ में लेने के साथ ही बीआरओ प्रबंधकीय भूमिका अधिक निबाहने के लिए मुक्त हो गया और वह पहले से ही निर्मित सड़कों को खुला रखने के कभी ख़त्म न होने वाले काम पर ध्यान केंद्रित कर सकता था.

·       ज़मीनी स्तर पर, सीमेंट-रेत के मिश्रण जैसी निर्माण सामग्री के एक उन्नत भंडार का निर्माण कर लिया गया था, जिससे इनकी कमी से होने वाले धीमेपन को रोका जा सके.[lxv]

·       शीर्ष स्तर पर, बीआरओ के नेतृत्व की "वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों में वृद्धि" की गई थी.[lxvi] इसका मतलब यह था कि बीआरओ के नेतृत्व (मुख्य इंजीनियर, सहायक महानिदेशक सीमा सड़क, महानिदेशक सीमा सड़क) को कहीं अधिक बड़ी परियोजनाओं के अनुबंधों को मंजूरी देने और अधिक महंगे उपकरणों की ख़रीद करने की एकतरफ़ा अनुमति दी गई थी. इस नीति से पहले, इस बीआरओ नेतृत्व को अनुमोदन के लिए रक्षा मंत्रालय के पास जाना होता था.[lxvii]

रणनीतिक माहौल

सीमा के साथ रणनीतिक माहौल में बदलाव, जो पहले धीरे-धीरे हुआ था, 2000 से शुरू होने वाली प्रमुख घटनाओं, कूटनीतिक और गतिज दोनों से तेज़ हो गया था. इन घटनाओं से भारत की सीमा की स्थिति को देखने के तरीके में नाटकीय बदलाव आया और क्षेत्र में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास को शुरू किया.

सरकार के भीतर परिवर्तन का संभावित प्रारंभिक बिंदु 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में सीमा वार्ता की विफलता थी. विशेषज्ञों का मानना ​​है कि चीनी अधिकारियों के साथ कई सत्रों की वार्ता के बाद, भारतीय वार्ताकारों को लगा कि वे एक गतिरोध पर पहुँच गए हैं.[lxviii] चीन सीमा समस्या को पूरी तरह से सुलझाने में अनिच्छुक था, क्योंकि वे इस बात पर अड़े थे कि अरुणाचल प्रदेश में स्थित एक बड़ा और महत्वपूर्ण शहर तवांग चीन का है. यह वह बिंदु था, और है, जिसे भारत स्वीकार नहीं करेगा और चीन इसे जानता था, इस प्रकार यह सुनिश्चित हो गया कि वार्ता अनिश्चित काल तक रुक जाए.[lxix]

यह अहसास समय के साथ और मजबूत हुआ और बातचीत ठप हो गई है. यह घटनाक्रम भारतीय बुनियादी ढांचे के विकास की ओर पहले कुछ बड़े प्रयासों से मेल खाता है. पहला, और जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, 1999 में चीन अध्ययन  समूह (चाइना स्टडी ग्रुप) का गठन किया गया था और उन्होंने कई महत्वपूर्ण रणनीतिक सड़कों की पहचान की थी. बाद में, 2006 में, यूपीए सरकार ने एलएसी के साथ 73 सड़कों के निर्माण की घोषणा की.

इस बढ़ते अहसास के बाद कि चीन अपनी स्थिति को खंदक की तरह मज़बूत कर रहा है, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत ने 2005 के आसपास संयुक्त राज्य अमेरिका से करीबी बढ़ाना शुरू कर दिया. दोनों देशों के संबंधों में गर्मजोशी आई, भारत ने 2005 और 2006 में दो बार अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) में अमेरिका के साथ मतदान किया; उन्होंने 2005 में संयुक्त सैन्य अभ्यास किए और सबसे महत्वपूर्ण, 2008 में दोनों देशों ने एक नागरिक परमाणु समझौते पर सहमति व्यक्त की. विशेषज्ञों के अनुसार, इन कदमों, विशेष रूप से परमाणु समझौते ने, चीन के भारत के प्रति दृष्टिकोण को बदल दिया.[lxx] राजदूत कांथा इस बदलाव को सबसे सही तरीके से व्यक्त करते हैं, जब वह कहते हैं कि 2008 में, चीन ने अमेरिका के साथ अपनी प्रतिस्पर्धा के चश्मे से भारत को देखना शुरू कर दिया और यह धारणा 2012 में शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद और मज़बूत हुई.[lxxi]

भारतीय सरकार द्वारा पिछले 15 वर्षों में एलएसी के पास बुनियादी ढांचे में अधिक तेज़ी से सुधार करना समझदारीपूर्ण रहा है. शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वे विश्लेषण करें कि क्या भारतीय बुनियादी ढांचे के निर्माण का चीनी आक्रमण पर निवारक प्रभाव पड़ेगा या नहीं.

1999 से 2012 तक की इस अवधि को काफ़ी हद तक धारणागत बदलावों के समय के रूप में देखा जा सकता है, कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि 2008 के बाद सीमा पार उल्लंघनों की संख्या में वृद्धि हुई है (चित्र 3). हालांकि, 2013 से अब तक सीमा पर शारीरिक रूप से आमना-सामना, सीमा पार से उल्लंघन और बढ़ी हुई पारस्परिक नकारात्मक धारणाएं अधिक रही हैं.[lxxii]

चित्र 3. चीनी घुसपैठों की संख्या, वर्ष के अनुसार[lxxiii]

नोट: स्वतंत्र डाटा को बाईं ओर के पैमाने का उपयोग करके नारंगी रंग में सूचीबद्ध किया गया है, भारतीय सरकार का डाटा दाईं ओर के पैमाने का उपयोग करके नीले रंग में है

इस अवधि को संक्षेप में देखते हैं- बड़े पैमाने पर छोटी घटनाओं को छोड़कर- शुरुआत 2013 में डेपसांग में हुई थी जहां भारतीय और चीनी सैनिकों का तीन सप्ताह तक गतिरोध रहा था. अगले वर्ष, चुमार में 16 दिनों का गतिरोध रहा था.[lxxiv] बर्टसे में 2015 में एक सप्ताह का गतिरोध हुआ.[lxxv] 2017 में, भूटान में 73 दिनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण डोकलाम घटनाक्रम हुआ था और पैंगोंग त्सो के पास तुलनात्मक रूप से एक छोटी सी घटना हुई थी.[lxxvi] इसके अतिरिक्त, विशेषज्ञों के अनुसार यह वह वर्ष था जिसमें कहीं अधिक चीनी बुनियादी ढांचा निवेश को दर्ज किया गया.[lxxvii] 2019 में पैंगोंग त्सो में एक और गतिरोध हुआ था.[lxxviii] हालांकि, इस पेपर के लिए जिन विशेषज्ञों का साक्षात्कार किया गया उनके अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण घटना, जिसने चीन के बारे में भारतीय धारणा को प्रतिमानात्मक रूप से बदल दिया, वह 2020 की गलवान घटना थी. संभावित रूप से अनजाने में बढ़ गए इस मामले के साथ कई अन्य, संभावित रूप से जान-बूझकर की गई, घुसपैठों के साथ हुई, जिसने पहले से ही खराब भारत-चीन संबंधों को तार-तार कर दिया. जयदेव रानाडे के अनुसार, यह देखते हुए कि चीन ने सभी मानदंडों और 1993 और 1996 में आचरण पर हुए समझौते का उल्लंघन किया है, इस बिंदु के बाद "विश्वास शून्य" हो गया था.[lxxix] इन घटनाओं, साथ ही निरंतर राजनयिक ठहराव ने, भारतीय नेतृत्व को सरकार और सेना में सीमा पर अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया और सीमावर्ती बुनियादी ढांचे पर अधिक ज़ोर दिया जाने लगा, दोनों मौद्रिक और संगठनात्मक रूप से.

रेल और हवा पर ध्यान केंद्रित करना 

बुनियादी हवाई ढांचा

यह खंड बुनियादी ढांचे के अन्य दो प्रमुख क्षेत्रों- वायु और रेल में विशिष्ट गतिशीलता पर चर्चा करता है.

वायु बुनियादी ढांचे ने काफ़ी हद तक सड़क के बुनियादी ढांचे की गति का अनुसरण किया है और यह काफ़ी हद तक चीनी इरादों और ज़मीनी रणनीतिक माहौल की बदलती धारणाओं के कारण हुआ था.

यह साल 2008 था जब हवाई बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए गए थे. यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) एयरफ़ील्ड को फिर से खोलने के साथ शुरू हुआ,[के] जो केंद्र सरकार द्वारा अनुमति नहीं देने के बावजूद वायु सेना द्वारा किया गया था.[lxxx] एयरफ़ील्ड के खुलने के संबंध में, जून 2020 की शुरुआत में टाइम्स नाउ द्वारा वाइस चीफ एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) प्रणब कुमार बरबोरा को यह कहते हुए उद्धृत किया गया था कि "43 साल बीत चुके थे और वहां से फिर से काम करने के लिए कोई मंज़ूरी नहीं थी क्योंकि कई कारण थे और हर बार नहीं ही मिलता था, नहीं नहीं … ." भारतीय वायुसेना ने पूछताछ के जवाब में कहा कि "यह वायुसेना की ज़िम्मेदारी है कि वह सैनिकों का संचालन तंत्र बनाए रखे."[lxxxi] 2008 में इस कार्रवाई का महत्व यह है कि यह भारतीय वायुसेना द्वारा अपनी परिचालन तत्परता बढ़ाने के लिए एक स्पष्ट एकतरफ़ा कदम दिखता है, जो 43 वर्षों की निष्क्रियता के बिल्कुल विपरीत है. यह संभावना है कि ऐसा चीन की ओर से सीमा पर घुसपैठों में वृद्धि के कारण हुआ था.

लगभग उसी समय जब डीबीओ एयरफ़ील्ड को फिर से खोला गया था, लद्दाख में फुक्चे और न्योमा एयरफ़ील्ड भी 2008 और 2009 में फिर से खुल गए थे. दोनों या तो बंद थे या 1962 के युद्ध के बाद अनावश्यक हो गए थे, इसलिए उनके फिर से खुलने ने रणनीतिक मानदंडों को लगातार तोड़ने का संकेत दिया. 2017 के डोकलाम संकट के बाद न्योमा एयरफ़ील्ड का लैंडिंग ग्राउंड उन्नत किया जाना तय किया गया और अब इसका उन्नयन किया जा रहा है. इन नए रनवे का इस्तेमाल लड़ाकू विमान कर सकेंगे और लेफ्टिनेंट जनरल चौधरी के अनुसार, इनसे क्षेत्र में और अधिक सैन्य प्रतिरोध क्षमता हासिल होगी.[lxxxii] इसके अतिरिक्त, बीआरओ का दावा है कि नए रनवे अगस्त 2023 से दो कार्यशील मौसमों के भीतर पूरे होने की संभावना है. यदि यह लक्ष्य हासिल कर लिया जाता है, तो यह आधुनिक बीआरओ की बेहतर दक्षता को रेखांकित करेगा. हालांकि, ओआरएफ़ के विश्लेषक डॉक्टर मनोज जोशी के अनुसार, सीमा के निकट होने के कारण, संघर्ष के दौरान इन लैंडिंग ग्राउंडों को दुश्मन के हमलों में तेज़ी से बेकार किया जा सकता है.[83][lxxxiii]

जैसे कि 2017 में डोकलाम के बाद न्योमा का उन्नयन किया गया, भारत ने अरुणाचल प्रदेश में भी सात अन्य उन्नत लैंडिंग ग्राउंड का उन्नयन करने का फैसला किया.[lxxxiv] इन लैंडिंग ग्राउंड से पूर्वी क्षेत्र में अधिक गतिशीलता और प्रतिरोध क्षमता हासिल होनी चाहिए, आम तौर पर जिस ओर कम ही ध्यान दिया गया है.[lxxxv]

बीआरओ की रिपोर्ट है कि पूर्वी लद्दाख में हंले और थानकुंग दोनों जगहों में 2022 में दो नए हेलीपैड बनाए गए थे. चंडीगढ़ में एयर डिस्पैच सब यूनिट ने "ज़मीन पर कामों के निष्पादन के लिए आवश्यक स्टोर और उपकरणों की कुशल और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने" के लिए उन्नयन शुरू कर दिया है.[lxxxvi] जैसा कि 2021 में बताया गया था, सरकार ने अकेले लद्दाख के लिए चार नए हवाई अड्डों और 37 नए हेलीपैड की योजना बनाई थी.[lxxxvii] 2022 में यह व्यापक रूप से बताया गया था कि भारतीय सेना अपने रॉकेट बल को मज़बूत और विस्तारित करते हुए उल्लेखनीय उन्नयन कर रही थी.[lxxxviii] यह कार्रवाई चीन के अपने रॉकेट बल का विस्तार करने और एक आक्रामक प्रतिवारक बनाने की पहल के जवाब में है.[lxxxix] इन उद्घाटनों, उन्नयनों और पुनर्रारंभों के अलावा, सेना ने भी गलवान के बाद नवीनता का परिचय दिया और 'पोर्टेबल हेलीपैड' के विकास का अनुरोध किया. जब पूरा हो जाएगा और पर्याप्त मात्रा में इनका  निर्माण हो जाएगा, तो ये संघर्ष वाले क्षेत्रों में आपूर्ति श्रृंखलाओं की विश्वसनीयता को और बढ़ाएंगे और वर्तमान में तैनात बलों की आक्रामक और रक्षात्मक क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं.[xc]

हिमालय में भारतीय हवाई बुनियादी ढांचा इस तरह से तैयार किया गया है कि सड़कों के विपरीत, इस भूभाग से चीन पर एक सामरिक लाभ हासिल होता है. इसका कारण यह है कि यह विशाल है और यहां ऊंचाई में तेज़ अंतर आता है, जबकि चीनी वायु सेना को अपने संबंधित ठिकानों को विशाल तिब्बती पठार पर उच्च ऊंचाई पर रखने पर मजबूर होना पड़ता है. भारत को पास की घाटियों और पहाड़ियों पर अपने रनवे और हैलिपैड रखने का फ़ायदा मिलता है. क्षेत्रीय विषमता का मुख्य प्रभाव यह है कि भारत का निम्न बुनियादी ढांचा विमानों को सघन हवा में उड़ान भरने की सहूलियत देता है, जिससे वह अपनी पूरी भार क्षमता के साथ उड़ान भर सकते हैं. दूसरी ओर, चीनी वायु सेना को काफ़ी कम (अक्सर 50 प्रतिशत कम बताया जाता है) ईंधन और सामग्री भार के साथ उड़ान भरनी पड़ती है.[xci] स्थलाकृति में यह अंतर हवा में भारत को बहुत लाभ पहुँचाता है.

रेल का बुनियादी ढांचा

भारतीय सरकार ने देश के अन्य क्षेत्रों में भारी रेल विकास के बावजूद, ऐतिहासिक रूप से एलएसी के पास रेल के बुनियादी ढांचे की उपेक्षा की है. गलवान के बाद, रेल बुनियादी ढांचे को नाटकीय रूप से बढ़ाने के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं. अब तक इस उपेक्षा का कारण इन रेल लाइनों को बिछाने और रखरखाव में शामिल खर्च और एलएसी के साथ सीमित बुनियादी ढांचे का सिद्धांत रहा है. वर्तमान में, एलएसी के पास कोई रणनीतिक रूप से प्रासंगिक रेल नहीं है.[xcii]

एलएसी के पास सबसे बड़ी रेल परियोजना 338 किलोमीटर लंबी जम्मू-बारामूला लाइन है (जिसे ऊधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक भी कहा जाता है). इस परियोजना की घोषणा 1994 में की गई थी, लेकिन आतंकवाद, धन की कमी, दुर्गम इलाके जैसी बाधाओं के कारण इसे अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है. इस परियोजना पर लगभग 350 बिलियन रुपये (4.26 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का खर्च आने की उम्मीद है. हालांकि महंगी और लंबे समय से प्रतीक्षित, यह परियोजना टनलिंग और पुल निर्माण में भारत की नई क्षमताओं को प्रदर्शित करती है, क्योंकि इसके लिए दोनों की अभूतपूर्व मात्रा की आवश्यकता है.[xciii]

दूसरी उल्लेखनीय रेल लाइन एलएसी के पूर्वी क्षेत्र में स्थित है, जो 2014 में बनी थी. यह 22 किलोमीटर लंबी हर्मुटी-नहारलागुन लाइन है जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण अरुणाचल प्रदेश को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाली पहली रेल लाइन थी. इस लाइन से पहले, वहाँ केवल "इसकी (अरुणाचल प्रदेश की) सीमा के अंदर 1.26 किलोमीटर रेल लाइन" थी.[xciv]

गलवान के परिणामस्वरूप, रेल लाइनों की योजनाओं की संख्या में वृद्धि हुई है. हालाँकि, सीमित संख्या में सीमा रेल परियोजनाओं और निर्माण में देरी (जम्मू-बारामूला लाइन) को देखते हुए इन योजनाओं की अनुमानित गति पर संदेह पैदा होता है. जम्मू-बारामूला लाइन के अलावा, जिसे 2024 तक पूरा हो जाना चाहिए, नई रेल योजनाओं का बड़ा हिस्सा पूर्वी क्षेत्र में है, जहां कई रणनीतिक रेल लाइनें चल रही हैं. द प्रिंट के स्नेहेश एलेक्स फ़िलिप के अनुसार, "भालुकपोंग से तवांग (अरुणाचल प्रदेश) के बीच 200 किमी ब्रॉड गेज लाइन, सिलापाथर (असम) से बैमे (अरुणाचल प्रदेश) होते हुए अलोंग के बीच 87 किमी लाइन और रूपई (असम) से पासीघाट (अरुणाचल प्रदेश),जिसमें भारतीय वायु सेना का एक उन्नत लैंडिंग ग्राउंड भी है, के बीच 217 किमी लंबी रेल", के साथ नाथू ला से रंगपो तक एक लाइन की योजना बनाई गई है."[xcv] इन लाइनों के पूरा होने से भारतीय सेना की भारी माल और सैनिकों को कम लागत में सामरिक क्षेत्रों में ले जाने की क्षमता में भारी वृद्धि होगी.

निष्कर्ष 

भारतीय बुनियादी ढांचे की तस्वीर आज 10 या 15 साल पहले की तुलना में कहीं बेहतर है. यद्यपि भारतीय बुनियादी ढांचे की समग्र गति और स्तर निश्चित रूप से चीन के बराबर नहीं है लेकिन यह हाल के वर्षों में बढ़ा है और सुरंगों और पुलों में तीव्र वृद्धि स्वतंत्र रूप से क्षमता में समग्र वृद्धि का संकेत देते हैं.[xcvi]

अतीत में, बुनियादी ढांचे के निर्माण में एक रक्षात्मक सैन्य सिद्धांत  से बाधा उत्पन्न हुई थी और बाद में यह धन की कमी के साथ नौकरशाही में फंस गया था.[xcvii][xcviii] तब और अब, भारत उच्च हिमालय के कठोर भूभाग से जूझ रहा है, जो ठिकाने बनाने और बनाए रखने के प्रयासों को धीमा कर देता है.[xcix] बजट में वृद्धि और नौकरशाही  में बड़े पैमाने पर किए गए परिवर्तन एलएसी के पास बुनियादी ढांचे में सुधार लाने वाले प्रमुख कारक हैं.[c] बदले में, इन बदलावों को एलएसी के साथ रणनीतिक माहौल में बदलावों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिन्हें 2000 के दशक की शुरुआत में राजनयिक अवरोध के बाद पहचाना जाने लगा था और 2010 के दशक के मध्य से लेकर उत्तरार्ध तक कहीं अधिक प्रमुख हो गए थे. जैसा कि राजदूत कांथा ने इस लेखक को बताया, लगभग 2008 में चीन ने अमेरिका के साथ अपनी प्रतिस्पर्धा के चश्मे से भारत को देखना शुरू कर दिया था और इस परिवर्तन के बाद उनकी हरकतें सिर्फ़ और सिर्फ़ अधिक भड़काऊ ही होती गईं.[ci]

हवाई बुनियादी ढांचे का विकास सड़कों के समान ही हुआ है, जिसमें अधिकांश उन्नयन 2000 के दशक के उत्तरार्ध में, डोकलाम और गलवान के बाद हुए हैं. रेल बुनियादी ढांचे के संबंध में, एक बड़ी असमानता है और जो कुछ बनाया भी गया है वह बहुत लंबा समय ले चुका है. उम्मीद की किरण इस रूप में है कि काफ़ी योजनाओं पर काम चल रहा है, जिससे कुल मिलाकर एक उज्ज्वल तस्वीर सामने आनी चाहिए.[cii] रणनीतिक रूप से, बुनियादी ढांचे के सभी तत्वों- सड़क, हवाई और रेल- आपूर्ति श्रृंखला के लचीलेपन, आपूर्ति श्रृंखला की क्षमता, सैन्य बल आगमन समय और सामान्य तैयारी में सुधार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इसे ध्यान में रखते हुए, भारतीय सरकार द्वारा पिछले 15 वर्षों में एलएसी के पास बुनियादी ढांचे में अधिक तेज़ी से सुधार करना समझदारीपूर्ण रहा है. शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वे विश्लेषण करें कि क्या भारतीय बुनियादी ढांचे के निर्माण का चीनी आक्रमण पर निवारक प्रभाव पड़ेगा या नहीं.


(जॉन 'जैक' स्वार्ट्ज़ ओआरएफ़ के सुरक्षा, रणनीति और तकनीक केंद्र के एक पूर्व शोध प्रशिक्षु हैं.)

ऊपर व्यक्त विचार लेखक (लेखकों) के हैं.

Endnote

[a] This paper will not make much mention of specific road quality around the LAC as there has been virtually no credible scholarship on the subject.

[b] Both the Ministry of Defence and BRO were reached out to for inquiry, however, neither organisation responded to the request.

[c] These include Dr Manoj Joshi, Ambassador Ashok Kantha, Jayadeva Ranade, Dinakar Peri, Snehesh Alex Phillip, Rezaul Hasan Laskar, Kalpit Mankikar, Trisha Ray, and others who wished to remain anonymous.

[d]  The ramifications of this incident will be a recurring theme in this paper.

[e] This thinking would later change later after the Indian military gained more technological capabilities, stemming largely from its increased rocket, and artillery capabilities.

[f] More recently, another change that occurred in the military establishment had to do with perceptions of Pakistan. A number of experts (Hasan Rezaul Laskar, interview with author, New Delhi, June 15, 2023; Snehesh Alex Phillip, interview with author, New Delhi, June 16, 2023) noted that strategic thinking used to be centered on Pakistan, but with that country currently in hot water, India has been allowed to focus its energies towards China.

[g] Specifically, the Himalayas creates a tactical environment where it is very difficult for either side to advance rapidly without stretching their supply lines and/or facing serious attrition.

[h] Some scholars note that Vajapayee did also sanction 13 border roads to be constructed in 1999, however, most are unaware of this because it was not acted upon and is not mentioned in most public records.

[i] It would also be prudent to note that, while much of the Indian infrastructure development along the LAC is strategic, some part of the effort is ‘innocent’ in nature. These efforts towards increasing connectivity with its hinterlands generally, and increasing their level of development, are done in a very similar fashion to China’s own efforts in their hinterlands.

[j] It should be noted that India, as Dr. Manoj Joshi described it, due to its asymmetric terrain will always be at an infrastructural disadvantage to China on the Tibetan plateau. Due to the myriad and multidimensional factors previously mentioned, including climate, elevation change, and earth movement, India will always have slower and more expensive infrastructure projects as compared to China. China also has a remarkably easier infrastructure challenge as it relates to the environment. The Tibetan plateau is a distinctly flat and dry piece of land that, if properly resourced (as has been accomplished) is fairly simple to build upon. As Dr. Joshi put it, if a road is destroyed in Tibet, China can find another road nearby, cross it and keep moving towards the front. However, in India, if a longitudinal road is destroyed then India either needs to move from the ridge back to flat ground and take another road there, or have already built a bridge or tunnel traversing adjacent mountains (Manoj Joshi, New Delhi, June 2023).

[k] This airfield is critical because it is exceedingly close (around 10 km) to the Chinese side and therefore is in a very high-threat area. It is also one of India's only pieces of controlled territory that lies in the flat Tibetan plateau, making it a uniquely suited piece of land to mount offensive action. See: https://theprint.in/opinion/new-road-to-dbo-not-enough-to-stop-pla-tunnel-under-saser-la-pass-is-the-solution/1626931/.

[1] Dinakar Peri, interview with author, New Delhi, June 16, 2023; Snehesh Alex Phillip, interview with author, New Delhi, June 16, 2023.

 

[2] Ashok Kantha, interview with author, New Delhi, June 14, 2023; Phillip, interview with author; Press Information Bureau, “Construction of All Weather Roads in Border Areas,” 2022, https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1844615; Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China,” YouTube video, 2023, https://www.youtube.com/watch?v=osl5kzzdpBw&ab_channel=HindustanTimes.

 

[3] Peri, interview with author; Manoj Joshi, interview with author, New Delhi, June 20, 2023; Brigadier Deepak Sinha, email to the author, August 21, 2023.

 

[4] Phillip, interview with author; Joshi, interview with author

 

[5] Manoj Joshi, “Essay,” in Understanding the India China Border: The Enduring Threat of War in the High Himalayas (Gurugram, Haryana: HarperCollins Publishers India, 2022).

 

[6] Peri, interview with author; Phillip, interview with author

 

[7] Joshi, “Essay”

 

[8] Joshi, interview with author; Frank O’Donnell and Alex Bollfrass, “Project on Managing the Atom the Strategic Postures of China and India,” Belfer Center, 2020, https://www.belfercenter.org/sites/default/files/2020-03/india-china-postures/China%20India%20Postures.pdf; Joshi, interview with author

 

[ix] [9] Manoj Joshi, comment during ORF internal meeting, August 21, 2023.

 

[10] Rajeswari Pillai Rajagopalan, “Meeting China’s Military Challenge,” NBR, https://www.nbr.org/wp-content/uploads/pdfs/publications/sr96_meeting_chinas_military_challenge_jan2022.pdf; Harish Kunwar, “Train-Link for J & K Prosperity,” The India Post, October 16, 2008. https://www.theindiapost.com/nation/jammu/train-link-for-j-k-prosperity/.

 

[11] T. Wetzel, “Ukraine Air War examined: A Glimpse at the Future of Air Warfare,” Atlantic Council, August 31, 2022.; Joshi, interview with author

 

[12] “How is China Expanding its Infrastructure to Project Power Along its Western Borders?” China Power Project, March 23, 2022, https://chinapower.csis.org/china-tibet-xinjiang-border-india-military-airport-heliport/.

 

[13] Joshi, “Essay”

 

[14] Joshi, “Essay”; Joshi, interview with author; Phillip, interview with author

 

[15] Map provided by Sameer Patil, email to author, September 19, 2023.

 

[16] Jayadeva Ranade, interview with author, New Delhi, June 13, 2023; Joshi, interview with author

 

[17] Sinha, email to author

 

[18] Joshi, “Essay”; Sinha, email to author

 

[19] Kantha, interview with author; Joshi, interview with author; Hasan Rezaul Laskar, interview with author, New Delhi, June 15, 2023.

 

[20] Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China”

 

[21] Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China”; Joshi, interview with author

 

[22] Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China”

 

[23] Joshi, interview with author; Dibakar Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy of BRO,” 2017.

 

[24] Joshi, interview with author; Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy of BRO”; Joshi, comment during ORF internal meeting

 

[25] Ministry of Defence, Provision of All-Weather Road Connectivity Under Border Roads Organisation (BRO), New Delhi, Lok Sabha Secretariat, 2019, https://eparlib.nic.in/bitstream/123456789/783598/1/16_Defence_50.pdf; Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China”

 

[26] Prabir De, “Infrastructure Development in India,” in International Infrastructure Development in East Asia – Towards Balanced Regional Development and Integration, ed. N. Kumar (Chiba: ERIA, 2008), https://www.eria.org/uploads/media/Research-Project-Report/RPR_FY2007_2_Chapter_4.pdf; Joshi, interview with author; Sudhi Ranjan Sen, “Only 20 Per Cent of India-China Strategic Border Roads Ready Till Now,” NDTV, February 27, 2015, https://www.ndtv.com/india-news/only-one-fifth-of-india-china-strategic-border-roads-ready-till-now-743051.

 

[27] Sen, “Only 20 Per Cent of India-China Strategic Border Roads Ready Till Now”

 

[28] Ranade, interview with author

 

[xxix]

[30] Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China”

 

[31] Kantha, interview with author

 

[32] “Right of Passage: National Elephant Corridors Project,” Wildlife Trust of India, July 5, 2023, https://www.wti.org.in/projects/right-of-passage-national-elephant-corridors-project/.

 

[33] Kantha, interview with author

 

[34] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy of BRO”

 

[35] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy of BRO”; Ministry of Defence, Annual Report 2018-19, Ministry of Defence, 2019, https://mod.gov.in/dod/sites/default/files/MoDAR2018.pdf.

 

[36] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy of BRO”; “Annual Report 2018-19”

 

[37] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy of BRO”

 

[38] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy of BRO”

 

[39] Trading Economics, “India Government Revenues,” https://tradingeconomics.com/india/government-revenues.

 

[40] MacroTrends, “India GDP 1960-2023".; IMF, “World Economic Outlook Database,” April 7, 2023.

 

[41] MacroTrends, “India GDP 1960-2023”

 

[42] IMF, “World Economic Outlook Database”

 

[43] Joshi, interview with author; Kantha, interview with author

 

[44] Ministry of Defence, Government of India, https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1844615.

 

[45] Ministry of Defence, Government of India, https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1844615.

 

[46] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy of BRO”

 

[47] Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China”

 

[48] Ministry of Defence, Government of India, https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1794833; “Capital Budget of Border Roads Organisation Increased by 43 Per Cent to Rs 5,000 Crore; Allocation Doubled in Two Years,Swarajya, February 1, 2023.

 

[49] Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China”

 

[50] Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China”

 

[51] Joshi, interview with author; “Shinku La Tunnel Construction to Begin by July, Says Bro DG,The Tribune, April 9, 2023.; “Zojila Tunnel Project Will Be Completed by December 2023, Earlier Deadline 2026: Nitin Gadkari,Moneycontrol, September 28, 2021.; Joshi, comment during ORF internal meeting

 

[52] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy of BRO”

 

[53] “China Border Roads Still a Distant Dream,” The Statesman, March 25, 2017, https://www.thestatesman.com/world/china-border-roads-still-a-distant-dream-1490478802.html; Joshi, interview with author

 

[54] Manoj Joshi, “Chapter 19,” in The Oxford Handbook of Indian Foreign Policy (Oxford University Press, 2015), 580–81.

 

[55] “5 Yrs, 3,595 Km New Border Roads,” The Tribune, August 10, 2022, https://www.tribuneindia.com/news/nation/5-yrs-3-595-km-new-border-roads-420500; Hindustan Times, “Galwan Changed India’s Border Infra Blitz Vs China”

 

[56] “5 Yrs, 3,595 Km New Border Roads”

 

[57] Sen, “Only 20 Per Cent of India-China Strategic Border Roads Ready Till Now”

 

[58] Sen, “Only 20 Per Cent of India-China Strategic Border Roads Ready Till Now”

 

[59] Sen, “Only 20 Per Cent of India-China Strategic Border Roads Ready Till Now”

 

[60] Government of India, “Lok Sabha Question No. 4490: Construction of Border Roads,” 2014, https://www.eparlib.nic.in/bitstream/123456789/710639/1/8769.pdf.

 

[61] “Provision of All Weather Road Connectivity Under Border Roads Organisation (BRO)”

 

[62] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy in BRO”

 

[63] “Annual Report 2018-19”

 

[64] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy in BRO”

 

[65] “Provision of All Weather Road Connectivity Under Border Roads Organisation (BRO)”

 

[66] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy in BRO”

 

[67] “Provision of All Weather Road Connectivity Under Border Roads Organisation (BRO)”

 

[68] Peri, interview with author; Joshi, interview with author

 

[69] Peri, interview with author; Joshi, interview with author

 

[70] Kalpit Mankikar, interview with author, New Delhi, June 12, 2023; Kantha, interview with author; Joshi, “Chapter 19”

 

[71] Kantha, interview with author

 

[72] Joshi, “Chapter 19”; Jan-Tino Brethouwer et al., “Rising Tension in the Himalayas: A Geospatial Analysis of Chinese Border Incursions into India,” PLoS ONE 17, no. 11 (2022): e0274999, https://doi.org/10.1371/journal.pone.0274999.

 

[73] Brethouwer et al., “Rising Tension in the Himalayas”

 

[74] Joshi, “Essay”

 

[75] Srijan Shukla, “How India and China Resolved Three Major Stand-Offs in the Modi Era,” The Print, 2020, https://theprint.in/defence/how-india-and-china-resolved-three-major-stand-offs-in-the-modi-era/430594/.

 

[76] Shukla, “How India and China Resolved Three Major Stand-Offs in the Modi Era”

 

[78] Dinakar Peri, “Indian, Chinese Troops Face off in Eastern Ladakh, Sikkim,The Hindu, May 10, 2020.

 

[78] Dinakar Peri, “Indian, Chinese Troops Face off in Eastern Ladakh, Sikkim,The Hindu, May 10, 2020.

 

[79] Ranade, interview with author; Joshi, comment during ORF internal meeting

 

[80] Ambuj Pandey, “IAF Reactivated DBO Airstrip Without Centre’s Permission, Says Air Marshal (Retd) Pranab Kumar Barbora,ANI News, June 7, 2020.

 

[81] Pandey, “IAF Reactivated DBO Airstrip Without Centre’s Permission”

 

[lxxxii]

[lxxxiii]

[84]After Doklam Crisis, India Plans to Develop More Airfields along China Border in Ladakh,India Today, November 4, 2017.

 

[85] Peri, interview with author; Ministry of Defence, Government of India, https://www.pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1871518.

 

[86] Ministry of Defence, Government of India, https://www.pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1871518.

 

[87] Manu Pubby, “India Plans 4 Airports, 37 Helipads for Boosting Ladakh Connectivity,Economic Times, 2021.

 

[88] Gabriel Honrada, “India’s Rocket Force Takes off with China in its Sights,” Asia Times, December 31, 2022, https://asiatimes.com/2022/12/indias-rocket-force-takes-off-with-china-in-its-sights/.

 

[89] Pubby, “India Plans 4 Airports, 37 Helipads for Boosting Ladakh Connectivity”; Honrada, “India’s Rocket Force Takes off with China in its Sights”; Frank O’Donnell and Alex Bollfrass, “Project on Managing the Atom the Strategic Postures of China and India,” Belfer Center, 2020, https://www.belfercenter.org/sites/default/files/2020-03/india-china-postures/China%20India%20Postures.pdf.

 

[90] Ayush Jain, “Indian Army Requests for ‘portable Helipads’ as Border Row with Chinese PLA Drags On,” The EurAsian Times, May 9, 2021. https://www.eurasiantimes.com/indian-army-requests-for-portable-helipads-as-border-row-with-chinese-pla-drags-on/.

 

[91] Phillip, interview with author; Peri, interview with author

 

[92] Phillip, interview with author; Joshi, interview with author; Snehesh Alex Phillip and Moushumi Das Gupta, “India’s NE Strategic Rail Link to LAC with China Gathers Pace, Plans to Connect 8 Capitals Too,” The Print, 2022, https://theprint.in/defence/indias-ne-strategic-rail-link-to-lac-with-china-gathers-pace-plans-to-connect-8-capitals-too/1281791/.

 

[93] Kunwar, “Train-Link for J&K Prosperity”; “Explained: All About Jammu to Kashmir Rail Link, Set to Open by 2024,” The Federal, March 26, 2023, https://thefederal.com/explainers-2/explained-all-about-jammu-to-kashmir-rail-link-set-to-open-by-2024/; South Asia Terrorism Portal, “Terrorist Attacks on Railways in India,” https://www.satp.org/satporgtp/countries/india/database/railwayattack.htm.

 

[94]Connecting the Land of the Rising Sun – Arunachal Pradesh,” PIB.

 

[95] Phillip and Das Gupta, “India’s NE Strategic Rail Link to LAC with China Gathers Pace”

 

[96] Joshi, interview with author; Phillip, interview with author; Kantha, interview with author; Suhasini Haidar, “Explained: How is the Government Ramping Up Border Infrastructure?The Hindu, February 15, 2023.; Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy for BRO”

 

 

[97] Joshi, interview with author; Mishra, Dibakar, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy for BRO”

 

[98] Haidar, “Explained: How is the Government Ramping up Border Infrastructure?”

 

[99] Mishra, “Policy Guidelines for Change in Construction Philosophy for BRO”

 

[100] Joshi, interview with author; Kantha, interview with author; Mankikar, interview with author

 

[101] Phillip and Das Gupta, “India’s NE Strategic Rail Link to LAC with China Gathers Pace”

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