Issue BriefsPublished on May 20, 2023
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भारत में लंबे समय तक चलने वाली समावेशी आर्थिक विकास के लिए “अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट” में सबूत-आधारित निवेश को फिर से जीवित करना

सार

एक बच्चे के जीवन में उसके प्रारंभिक वर्ष, विशेषत: पहले 1000 दिन बेहद अहम होते है. यह अवधि बच्चे के विकास पर ताउम्र का प्रभाव छोड़ने वाली होती हैं. सबूतों से पता चलता है कि आर्थिक विकास की सबसे प्रभावी रणनीतियों में से है एक है एट-रिस्क यंग चिल्ड्रेन अर्थात जोख़िम उन्मुख छोटे बच्चों की विकासात्मक प्रगति में निवेश करना. हालांकि, अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट अर्थात बाल्यावस्था विकास (ECD) कार्यक्रमों को Covid-19 के चलते लागू किए गए कठोर उपायों, बढ़ती वैश्विक भोजन असुरक्षा और मितव्ययिता के दौरान बजट में ECD के लिए बेहद कम आवंटन किया गया था. इन कारणों की वज़ह से कारण बाल्यावस्था के दौरान इनकी होने वाली देखभाल और शिक्षा को काफ़ी नुक़सान पहुंचा था. इसकी वज़ह से अब ECD कार्यक्रमों के समक्ष गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है.

 यह आलेख ECD में अधिक बहु-क्षेत्रीय (जैसे स्वास्थ्य शिक्षा, पोषण और बाल संरक्षण क्षेत्र) निवेश और सुसंगत नीति बनाने की आवश्यकताओं के पक्ष में पैरवी की करता है. यह आलेख, भारत का वैश्विक क्षमता के साथ अवधारणा के प्रमाण के रूप में उपयोग करता है जो (1) छह से कम वर्ष के बच्चों के बीच बहुआयामी अभावों को समझने; (2) ECD में निवेश पर नज़र रखने; और (3) पोषण और प्रारंभिक शिक्षा के अवसरों तक दीर्घकालीन पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ‘सामान्य तौर-तरीकों’ का उपयोग नहीं करता है.

चुनौती

बच्चे के जीवन में अर्ली चाइल्डहुड  या बाल्यावस्था – विशेषत: पहले 1,000 दिन (या बच्चे के जन्म से लेकर उसके दूसरे जन्मदिन तक की अवधि) – उसके विकास में एक महत्वपूर्ण अवधि होती है. इस दौरान उसका मस्तिष्क किसी अन्य समय की तुलना में तेज़ी से विकसित होते हुए उसके जीवन में - लाइफलॉन्ग लर्निंग अर्थात स्थायी विद्वत्ता, स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती की नींव रखने का काम करता है. बाल्यावस्था में, न्यूरॉन्स प्रति सेकंड 1,000 तक की आश्चर्यजनक दर से नए कनेक्शन स्थापित करते हैं. जबकि जीन मस्तिष्क के लिए ब्लूप्रिंट अर्थात ख़ाका प्रदान करता है. ऐसे में बच्चे के आसपास का माहौल उसके मस्तिष्क के विकास को आकार देने का काम करता है.

पर्याप्त सबूत और राजनीतिक इच्छाशक्ति अथवा राजनीतिक तौर पर बल दिए जाने के बावजूद, निम्न और मध्यम आय वाले देशों (LMIC) में पांच वर्ष से कम आयु के 43 प्रतिशत से अधिक बच्चों (250 मिलियन से अधिक बच्चे) पर गरीबी के कारण अपनी पूर्ण विकास क्षमता को पूरा नहीं करने के साथ ही स्टंटिंग अर्थात बौना रह जाने का ख़तरा मंडरा रहा है. स्टंटिग और वेस्टिंग अर्थात कुपोषण  बच्चों के शारीरिक और मनो-सामाजिक वेल बिइंग अर्थात कल्याण को प्रभावित करता है. इसकी वज़ह से एक राष्ट्र की समग्र उत्पादकता और आर्थिक विकास को संज्ञानात्मक विकास और नुक़सान भी पहुंचता हैं. विश्व बैंक के अनुसार, स्टंटिंग के कारण बचपन में वयस्क की ऊंचाई में एक प्रतिशत की कमी से आर्थिक उत्पादन में 1.4 प्रतिशत की कमी देखी जाती है.

वैश्विक आपात स्थितियां का बाल्यावस्था पर प्रभाव

पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण से होने वाली प्रत्येक 10 मौतों में से एक मौत LMIC देशों में होती है. इसका कारण यह है कि कुपोषित बच्चों में संक्रामक रोगों से मरने की संभावना अधिक होती है. 2020 में, यह अनुमान लगाया गया था कि COVID-19 महामारी के सामाजिक आर्थिक प्रभाव के कारण पांच वर्ष से कम आयु के 6.7 मिलियन अतिरिक्त बच्चे वेस्टिंग अर्थात कुपोषण से पीड़ित होंगे; इनमें से 80 प्रतिशत बच्चे उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया के देशों से होंगे.

 एसेन्शिअल अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट अर्थात बाल्यवस्था में आवश्यक विकास (ECD) संबंधित सेवाओं में व्यवधान की वज़ह से और भी अनेक बच्चों पर यह ख़तरा मंडरा रहा है. एक अनुमान के अनुसार मार्च 2020 और फरवरी 2021 के बीच 196 देशों में लगभग 167 मिलियन प्री-प्राइमरी-आयु वाले बच्चों को बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा (ECCE) तक पहुंच से वंचित रहना पड़ा था.

 इन COVID-19-संबंधित ECCE व्यवधानों के परिणामस्वरूप 10.75 मिलियन अतिरिक्त बच्चे अपने प्रारंभिक विकास में "ऑफ़ ट्रैक अर्थात राह से भटक" गए, 14.18 मिलियन किशोर स्तरीय शिक्षा से हाथ धो बैठे, और वयस्क लोगोन को लगभग US$308.02 बिलियन की आय से वंचित रहना पड़ा. विकासात्मक और शिक्षा को हुआ अनुमानित नुक़सान निम्न और निम्न-मध्यम-आय वाले देशों में केंद्रित था. यह नुक़सान लंबे समय से चली आ रही वैश्विक असमानताओं को बढ़ाने वाले ही साबित हुए.

 सार्वजनिक बजट में ECD के लिए किए जाने वाले आवंटन पर मंडरा रहे खतरे की वज़ह से COVID-19 महामारी और वैश्विक कॉस्ट ऑफ लिविंग अर्थात जीवन-यापन संकट ने हाल के दशकों में इस क्षेत्र में हासिल किए गए लाभ को उलटने का ख़तरा पैदा कर दिया है.फलस्वरुप ECD से संबंधित सेवाओं के लिए वित्त पोषण की सुरक्षा और विस्तार को बढ़ावा देकर इस कोशिश का समर्थन करना ज़रूरी हो गया है. ऐसा करने पर ही सार्वजनिक वित्तपोषण बाधाओं को दूर करने सहित सार्वजनिक वित्तपोषण केसमान वितरण में आ रही बाधा को दूर किया जा सकेगा.

 G20 की भूमिका

इस बात के सबूतों से पता चलता है कि आर्थिक विकास की सबसे प्रभावी रणनीतियों में से है एक है एट-रिस्क यंग चिल्ड्रेन अर्थात जोख़िम उन्मुख छोटे बच्चे बच्चों की विकासात्मक प्रगति में निवेश करना. इस निवेश की अल्पकालिक लागत, तत्काल और दीर्घकालिक लाभों जैसे कि विशेष शिक्षा और सामाजिक सेवाओं की कम आवश्यकता, बेहतर स्वास्थ्य परिणाम, कम आपराधिक न्याय लागत, और परिवारों के बीच आत्मनिर्भरता और उत्पादकता में वृद्धि से अधिक होती है.

 प्रारंभिक शिक्षा में निवेश को पोषण और स्वास्थ्य में निवेश द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए. बुरुंडी में एक अध्ययन में इसके परिणामों को देखा गया है. वहां प्रत्येक एक US$ के निवेश ने सबसे पारंपरिक परिदृश्य में कम से कम 19 US$ का रिटर्न दिया है. यह परिणाम इस समझ के साथ हासिल किया गया है कि दीर्घकालिक समाज पर इसके प्रभावों को मॉनिटाइज्ड़ नहीं किया जा सकता है. अन्य अध्ययनों ने अनुमान लगाया है कि पोषण में निवेश का लागत-लाभ अनुपात 10 प्रतिशत प्रतिफल की चक्रवृद्धि वृद्धि दर पर 1:16 होगी, जो आवश्यक पोषण संबंधी हस्तक्षेपों में निवेश किए गए प्रत्येक डॉलर के लिए US$38.6 के प्रतिफल में परिवर्तित होगा.

बड़े पैमाने पर पॉलिसी रिस्पॉन्सेस अर्थात नीतिगत प्रतिक्रियाओं को गति देने के लिए साक्ष्य-आधारित प्रयासों को दोगुना किए जाने की आवश्यकता है. इसका मतलब यह है:

  • अर्ली चाइल्डहुड अर्थात प्रारंभिक बचपन के दौरान बच्चों, जिनमें से कई घरेलू अभाव और गरीबी का सामना कर रहे हों, के लिए प्रासंगिक बहुआयामी विकास को मापना और उसकी निगरानी करना;
  • प्रारंभिक बाल पोषण, भूख और भोजन सुरक्षा कार्यक्रमों और नीतियों की स्थिति और प्रभाव का विश्लेषण करना; और
  • ECD की मांग की तुलना में ECD में निवेश के रुझान और पैटर्न का विश्लेषण करना.
  • ECD निवेश में ख़ामी अथवा कमी किस वज़ह से आती है, और निवेश में कमी को कैसे पूरा किया जा सकता है.

निम्नलिखित सिफारिशों में केस स्टडी के रूप में भारत के लिए एक विस्तृत स्थिति का विश्लेषण शामिल है और ये सिफारिशें G20 देशों के दृष्टिकोण से एक कार्यान्वयन योग्य कार्य योजना निर्धारित करती हैं.

G20 के लिए सिफारिशें

सिफ़ारिश 1: ECD पर अभिसरण और व्यापक कार्रवाई करने के लिए चाइल्ड डेवलपमेंट इंडेक्स अर्थात बाल विकास सूचकांक को विकसित किया जाए

 लेखकों ने एक के बाद एक हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) अर्थात राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का उपयोग करके भारत के लिए एक बाल विकास सूचकांक (CDI) विकसित किया है. NFHS में व्यक्तिगत स्तर के डेटा अर्थात जानकारी का विश्लेषण किया जा सकता है. उदाहरण के लिए जानकारी का यह विश्लेषण उम्र और लिंग या निवास स्थान और सामाजिक आर्थिक उपसमूहों में अलग-अलग करके भी किया जा सकता है. इसके अलावा, वेरीअबल्ज का मेजरमेंट अर्थात परिवर्ती कारक का माप एक के बाद एक हुए सर्वे के क्रमिक दौरों, स्थान और आयाम के साथ पूरे समय के अनुरूप रहता है.

 विधि में तीन चरण शामिल हैं. पहले में प्रत्येक बच्चे (0-5 वर्ष की आयु) के लिए डेवलपमेंट अर्थात विकास स्कोर प्राप्त करना शामिल है. दूसरे चरण में प्रत्येक इंडिकेटर अर्थात संकेतक के स्कोर को उसके संबंधित डाइमेंशन अर्थात आयाम के तहत एकत्र किया गया है. जिनमें से छह आयाम (यानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और डिसेबिलिटी, पोषण, सेफ्टी अर्थात कुशलक्षेम एंड सिक्यूरिटी अर्थात सुरक्षा, केयरगिविंग अर्थात देखभाल और घरेलू माहौल ; टेबल 1 देखें) हैं. इसके बाद अंत में सभी आयामों का एकत्रीकरण किया जाता है. इससे फिर बच्चे के विकास की स्थिति की पहचान करने के लिए कट-ऑफ को परिभाषित किया जाता है. प्रत्येक आयाम के लिए अंकों के इस एकत्रीकरण में दो पार्शल इंडाइसेस अर्थात आंशिक सूचकांक शामिल हैं- विकास की तीव्रता और विकसित बच्चों की संख्या.

टेबल 1: अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट इंडेक्स अर्थात बाल्यावस्था विकास सूचकांक में प्रयुक्त इंडिकेटर्स अर्थात संकेतक और डाइमेंशन्स अर्थात आयाम

 

डाइमेंशन  इंडिकेटर
  • शिक्षा 
  • वर्तमान में किसी भी प्री-स्कूल में दाखिला लिया हुआ
  • स्वास्थ्य और दिव्यांगता  
  • पूर्ण टीकाकरण हुआ है (उपयुक्त आयु वर्ग का टीका लगाया गया है) कोई दिव्यांगता जन्म / पोषण के समय कोई कुशल परिचारक उपलब्ध था                                                 
  • पोषण
  • एक्सक्लूसिव स्तनपान की अवधि पोषण की स्थिति (अंडरवेट/वजन में कमी) एनिमिया अर्थात खून की कमी
  • कुशलक्षेम और  सुरक्षा
  • सुरक्षा/सामाजिक कल्याण (हिंसक वातावरण के संपर्क में) सामाजिक कल्याण (जोख़िम भरे व्यवहार के संपर्क में)
  • केयरगिविंग अर्थात देखभाल 
  • पर्याप्त आहार का प्रावधान, बच्चे के रहने की व्यवस्था, तक़नीकी सहायता (मां की शिक्षा)
  • घरेलू माहौल   
  • पीने के पानी और उसके स्त्रोतों तक पहुंच, स्वच्छता सुविधा, खाना पकाने के ईंधन का प्रकार, आवास की स्थिति, क्राउडिंग अर्थात घर में ज़्यादा सदस्यों की मौजूदगी.

                                   

लेखकों ने प्रत्येक और सभी आयामों में संकेतकों को समान भार दिया है. दूसरे शब्दों में, प्रत्येक आयाम में सभी संकेतकों के वजन का योग, इसके आयाम को निर्दिष्ट समग्र वजन के बराबर होता है. घरेलू माहौल के साथ कोलिनीऐरिटी अर्थात बहुसंरेखता की चुनौती को देखते हुए लेखकों ने आर्थिक डोमेन को एक आयाम के रूप में शामिल नहीं किया.

CDI इंडिया के नतीजे

0-5 वर्ष आयु वर्ग के लिए संभावित नतीजे बताते हैं कि पुरुषों और महिलाओं तथा और ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में दोनों के लिए CDI में सुधार हुआ है. पुरुषों के लिए स्कोर पर इंक्रीमेंटल ग्रोथ अर्थात वृद्धिशील वृद्धि 10.3 प्रतिशत और महिलाओं के लिए 10.7 प्रतिशत देखी गई. हालांकि, लेखक ने शहरी समकक्षों (4.5 प्रतिशत) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (13.1 प्रतिशत) के लिए CDI स्कोर में काफ़ी उछाल देखा.

 चित्र1. पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए चाइल्ड डेवलपमेंट स्कोर अर्थात बाल विकास स्कोर (लिंग और निवास स्थान के आधार पर)

 

स्त्रोत : NFHS-4 और NFHS-5 पर आधारित लेखकों की गणना

 2015-16 और 2019-21 के लिए डेप्रिवेशन स्कोर अर्थात अभाव या वंचित स्कोर के हेडकाउंट रेश्यो अर्थात अनुपात के रुझान 11.2 प्रतिशत के सुधार का संकेत देते हैं. लिंग और निवास स्थान के अनुमान बताते हैं कि 2019-21 में 27.5 प्रतिशत पुरुष और 26.6 प्रतिशत महिलाएं डिप्राइव्ड अर्थात अभावग्रस्त अवस्था में हैं. पुरुष-महिला अंतर 2015-16 में 1.5 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 0.9 प्रतिशत हो गया है. इसी प्रकार, शहरी क्षेत्रों में डेप्रिवेशन का हेडकाउंट रेश्यो अर्थात अनुपात 10.4 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 31.7 प्रतिशत है. हालांकि ग्रामीण-शहरी अंतर 25.8 प्रतिशत से घटकर 21.3 प्रतिशत हो गया है, लेकिन यह अब भी उच्च ही बना हुआ है. (चित्र 2 देखें)

 चित्र 2: पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के बीच डेप्रिवेशन का हेडकाउंट रेश्यो अर्थात उनकी संख्या का अनुपात (लिंग और निवास स्थान के आधार पर)

 

स्रोत: NFHS-4 और NFHS-5 पर आधारित लेखकों की गणना

 भारतीय संदर्भ में ऊपर उल्लेखित मॉडल को उपयुक्तता और व्यवहार्यता के आधार पर विकसित किया गया है. इसे लेकर व्यापक विचार-विमर्श अभी लंबित है. ECD निगरानी के लिए विभिन्न देशों के बीच एक व्यापक और उपयुक्त ढांचा मौजूद होना बेहद महत्वपूर्ण है. ऐसा होने पर ही सरकारों के लिए समय-समय पर इनको लेकर बनी योजनाओं का आकलन करने और संबंधित कार्यक्रमों और नीतियों को समायोजित करने की दृष्टि देने के लिए तुलनीय लेकिन, प्रासंगिक माइलस्टोन्स अर्थात मील के पत्थर और बेंचमार्क अर्थात मानदंड बनाने में आसानी होगी.

सिफ़ारिश 2: अर्ली चाइल्डहुड अर्थात बाल्यावस्था में पोषण, भूख और भोजन सुरक्षा की स्थिति और प्रवृत्ति विश्लेषण

विश्व स्तर पर कई क्षेत्रों में भूख के लगातार प्रसार के कारण विश्व भोजन कार्यक्रम ने 2022 को 'अभूतपूर्व भूख का वर्ष' घोषित किया है. एक अनुमान के अनुसार 2021 में 702 से 828 मिलियन लोग भुखमरी से प्रभावित हुए थे; COVID-19 महामारी के प्रकोप के बाद इस संख्या में लगभग 150 मिलियन की वृद्धि होने का अनुमान है. अनेक G20 देश बाल कुपोषण से प्रभावित हैं. 2030 तक, इस वैश्विक कुपोषित आबादी मे भारत की हिस्सेदारी एक तिहाई से अधिक होगी. वर्तमान में भारत के कुल रोग बोझ में बाल कुपोषण की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत है. भारत को इस पर सालाना लगभग 46 बिलियन US$ का ख़र्च करना पड़ता है.

इसी तरह, UNICEF के अनुसार, 2018 में, इंडोनेशिया में पांच साल से कम उम्र के 10 में से लगभग तीन बच्चे स्टंटेड अर्थात बौने थे, जबकि 10 में से एक बच्चा वेस्टेड अर्थात कुपोषित था. साउथ अफ्रीकन चाइल्ड गेज़ (2020) का अनुमान है कि दक्षिण अफ्रीका में लगभग 27 प्रतिशत छोटे बच्चे पौष्टिक भोजन की कमी के कारण अल्पपोषित और अपेक्षा से कम छोटे हैं. दक्षिण अफ्रीका की आबादी में अधिक वजन वाले बच्चों की हिस्सेदारी लगभग 13 प्रतिशत हैं. 

G20 देशों को माताओं और बच्चों में भूख और कुपोषण के अंतर्निहित कारणों को दूर करने के प्रयासों को गति प्रदान करनी चाहिए. मातृ एवं शिशु कुपोषण से निपटने के लिए वैज्ञानिक रणनीतियों और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने के लिए एक सहयोगी ढांचा स्थापित करना महत्वपूर्ण है.

सिफ़ारिश 3: ब्रेस्टफीडिंग अर्थात स्तनपान, वीनिंग अर्थात दूध छुड़ाना और काम्प्लमेन्टरी अर्थात पूरक आहार की स्थिति पर रिपोर्ट और गैप अर्थात अंतर का विश्लेषण

 भारत के NFHS-5 से पता चलता है कि पहले छह महीनों के लिए केवल एक्सक्लूजिव ब्रेस्टफीडिंग अर्थात विशेष और अखंडित स्तनपान की दर 55.6 प्रतिशत थी. यह दर पिछले सर्वेक्षण (2015-16) से बेहतर देखी गई है. हालांकि, जल्दी स्तनपान कराने की दर (जन्म के एक घंटे के भीतर) केवल 41.9 प्रतिशत थी, जिसका अर्थ यह है कि शिशुओं के एक महत्वपूर्ण अनुपात को कोलोस्ट्रम (फर्स्ट मिल्क अर्थात पहला दूध, जो पोषक तत्वों और एंटीबॉडी से भरपूर होता है) का लाभ नहीं मिल पा रहा है.

भारत सरकार ने स्तनपान को बढ़ावा देने और इसको समर्थन देने के लिह अनेक कार्यक्रम और पहलें शुरू की हैं. इसमें 2016 में शुरू किया गया मदर्स एब्सोल्यूट अफेक्शन प्रोग्राम, 2008 में शुरू किया गया शिशु और युवा बाल आहार कार्यक्रम, और 2005 में शुरू किया गया राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन शामिल हैं. लेकिन अभी भी इन कार्यक्रमों को लेकर जागरूकता की कमी, स्तनपान को लेकर कथित कलंक से जुड़ी भ्रांतियां और स्तनपान को बढ़ावा देने  की कमी देखी जाती है.

पूरक भोजन पदार्थों की जल्दी से की गई शुरूआत, दूध छुड़ाने वाले भोजन पदार्थों की ख़राब गुणवत्ता, और स्तनपान के लाभ को लेकर ज्ञान की कमी को दूध छुड़ाने की दर को इष्टतम बनाने और पूरक आहार सुनिश्चित करने की राह में आम बाधाएं माना जाता हैं. इन कमियों को दूर करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाए जाने की ज़रूरत है. इसमें जागरूकता बढ़ाने वाले अभियान, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं का प्रशिक्षण, मज़बूत निगरानी और सहायक माताओं और परिवारों को शामिल किया जाना चाहिए.

सिफ़ारिश 4: नेशनल न्यूट्रिशन प्रोग्राम्स अर्थात राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रम और ECD स्टेटस रिपोर्ट और अंतर विश्लेषण के समर्थन में उनकी प्रभावशीलता

भारत ने पिछले 45 वर्षों में कुपोषण से निपटने के लिए अनेक पोषण हस्तक्षेपों पर अमल किया है, जिसमें एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS), मिड-डे मील (MDM) योजना और राष्ट्रीय भोजन सुरक्षा अधिनियम (2013) शामिल हैं. भारत सरकार ने महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए ICDS के तहत पोषण अभियान (कुपोषण से निपटने के लिए प्रमुख कार्यक्रम), आंगनवाड़ी सेवा योजना और प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना जैसी कई योजनाएं भी शुरू की हैं. हालांकि, इन कार्यक्रमों को लागू करने और उनके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उनका उपयोग करने में अभी भी काफ़ी ख़ामियां हैं.

केंद्र सरकार के बजट के अनुसार, 2014-15 और 2019-20 के बीच ICDS ख़र्च में मामूली वृद्धि हुई है. अकाउन्टबिलिटी इनिशिएटिव के अनुसार 2019-20 में, विशेष पोषण कार्यक्रम के लिए स्वीकृत बजट इन कार्यक्रमों के लिए ज़रूरी कुल राशियों का केवल 44 प्रतिशत था. अंब्रेला ICDS और MDM जैसे अन्य कार्यक्रमों के लिए कोर एलोकेशन अर्थात मुख्य आवंटन और केंद्रीय बजट में कमी देखी गई है. ICDS में 30 प्रतिशत से अधिक पर्यवेक्षी पद खाली पड़े हैं. पोषण अभियान के कुल व्यय का 36 प्रतिशत सूचना और संचार तकनीकों और रियल टाइम मॉनिटरिंग पर होता है. अत: अधिकांश संरचनात्मक मुद्दे अनसुलझे ही रह जाते हैं.

कार्यक्रमों और ECD पर उनके प्रभाव को पूरी तरह से मैप किए जाने की ज़रूरत है. सबसे कमज़ोर महिलाएं और बच्चों के लिए अधिक पोषण के बीच अंतराल को पाटने के लिए विभिन्न देशों में अच्छी तरह से डिजाइन किए गए, अच्छी तरह से वित्त पोषित और अच्छी तरह से लागू कार्यक्रमों को विकसित करने के लिए इन कार्यक्रमों की ख़ामी, बाधाओं और अवसरों पर प्रकाश डाला जाना बेहद आवश्यक है.

सिफ़ारिश 5: ECD के लिए स्थायी पोषण के हिस्से के रूप में मिलट अर्थात मोटे अनाज, अन्य क्लाइमेट-स्मार्ट अर्थात जलवायु-स्मार्ट फ़सलों और समग्र पोषण की भूमिका

बाल्यावस्था में इष्टतम वृद्धि और विकास को बढ़ावा देने के लिए दीर्घकालीन अथवा सतत पोषण ज़रूरी है. इसमें पारंपरिक और स्थानीय रूप से उपलब्ध भोजन पदार्थों और वैश्विक जलवायु-स्मार्ट फ़सलों (जैसे बाजरा, टेफ (इथियोपिया में पाया जाने वाला अनाज) और मक्का) सहित पोषक तत्वों से भरपूर भोजन पदार्थों की एक विविध श्रेणी का उपभोग करना शामिल है. यह भोजन पदार्थ ऐसे होते है जो अधिक लचीले होते हैं और प्रतिकूल परिस्थितियों में पनप सकते हैं, जिससे वे कमज़ोर समुदायों के लिए भोजन सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन जाते हैं. यह लंबी अवधि में पौष्टिक भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए स्थायी कृषि पद्धतियों को अपनाने पर भी जोर देकर भोजन सुरक्षा सुनिश्चित करता है और बच्चों के समग्र स्वास्थ्य और कल्याण में सुधार करने में सहायक साबित होते हैं.

बाजरा जैसी मोटे अनाज की फ़सलें दुनिया भर में उपलब्ध हैं. ये फ़सलें उन पोषक तत्वों (प्रोटीन और फाइबर सहित) और सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे लोहा, जस्ता और कैल्शियम) से भरपूर होती हैं, जो इष्टतम शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास के लिए ज़रूरी होते हैं. ये छोटे किसानों के लिए, विशेषत: उन क्षेत्रों में जहां जलवायु संबंधी चुनौतियों के कारण पारंपरिक फ़सलें नहीं पनप सकती हैं, आय का एक स्थायी स्रोत भी प्रदान कर सकती हैं.

दूसरी ओर, विशेषत: हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए प्रमुख पोषक तत्वों तक पहुंच में सुधार के लिए भोजन फोर्टिफिकेशन अर्थात सुदृढ़ीकरण को कॉस्ट-इफेक्टिव अर्थात लागत प्रभावी और टिकाऊ दृष्टिकोण भी कहा जा सकता है. व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले सुदृढ़ीकरण माध्यमों में नमक, गेहूं का आटा और भोजन तेल शामिल हैं, जिन्होंने सफ़लतापूर्वक एनीमिया को कम करते हुए समग्र स्वास्थ्य परिणामों में सुधार किया है.

G20 अच्छी पोषण प्रथाओं का संचालक हो सकता है. G20 पहले छह महीनों के लिए विशेष स्तनपान, पूरक भोजन पदार्थों की  शुरुआत, जलवायु-स्मार्ट फ़सलों को बढ़ावा देने और विविध आहारों को बढ़ावा दे सकता है. पर्याप्त स्वच्छता और साफ़-सफाई के तरीके, जैसे कि हाथ धोना और सुरक्षित जल भंडारण, भी उन बीमारियों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो बच्चे की समग्र संवृद्धि और विकास को प्रभावित कर सकते हैं.

 

सिफ़ारिश 6: ECD, विशेष रूप से पोषण और प्रारंभिक शिक्षा क्षेत्रों के लिए निवेश आवश्यकताओं के आकलन की आवश्यकता का उपक्रम करना

 

भारत के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) के तहत सभी कार्यक्रमों के आउटकम बजट स्टेटमेंट्‌स अर्थात बजट परिणाम विवरणों में दर्ज़ परिणामों के आधार ECD की चुनौतियों की व्यापकता को देखते हुए इसमें यथार्थवादी निवेश आवश्यकताओं पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है. इसके बाद निजी वित्तपोषण (सिफ़ारिश 7) सहित नवीन स्रोतों से संसाधन जुटाने के लिए एक व्यापक रणनीति को अपनाया जाना चाहिए. 2019 तक नीतिगत दस्तावेज़ों में समावेशी ECD और ECD के लिए पहचानी गई रणनीतिक प्रतिबद्धताओं के लिए परिलक्षित होने वाला ओवरसीज डेवलपमेंट असिस्टंस अर्थात विदेशी विकास सहायता (ODA) के रुझानों का विश्लेषण... यह दर्शाता है कि ECD को समर्पित ODA महज 6% है. यह संख्या उस वक़्त और भी कम अर्थात केवल 3% हो जाती है जब ODA से UNICEF (जिसका मूल जनादेश बच्चे हैं) को बाहर रखा जाता है.

ECD के लिए बजटीय आवंटन पर नज़र डाली जाए तो भारत में प्रति बच्चे ख़र्च की वार्षिक औसत वृद्धि 2015-16 और 2023-24 के बीच लगभग 9 प्रतिशत थी (चित्र 3 देखें). हालांकि इसे एक सकारात्मक प्रवृत्ति कहा जाएगा, लेकिन जीवन के इस महत्वपूर्ण चरण में प्रत्येक बच्चे के लिए अहम बहु आवश्यकताओं को पूरा करने में यह प्रति व्यक्ति ख़र्च पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है.

इस अवधि के दौरान, औसतन इस ख़र्च का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 39.4 प्रतिशत) स्वास्थ्य पर व्यय हुआ था, जिसमें उच्चतम हिस्सेदारी पोषण लेखांकन (59.9 प्रतिशत) पर किया गया था. दूसरी ओर, इसी अवधि में संरक्षण (बाल संरक्षण के लिए लक्षित योजनाएं और कार्यक्रम), जिसके महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं, पर हुए ख़र्च की हिस्सेदारी मात्र 0.4 प्रतिशत थी.

चित्र 3: भारत में प्रारंभिक बाल्यावस्था विकास पर प्रति व्यक्ति ख़र्च (2015-2024)

 

स्रोत: भारतीय बजट और पॉप्यूलेशन प्रोजेक्शन फिगर्स अर्थात जनसंख्या प्रक्षेपण के आंकड़ों से उपलब्ध व्यय डेटा के आधार पर लेखकों की गणना.

छोटे बच्चों में निवेश करना एक नैतिक अनिवार्यता है और यह अनिवार्यता मज़बूत आर्थिक और सामाजिक समझदारी भी है. सतत विकास लक्ष्यों ने बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य के लिए एक आशाजनक दृष्टि प्रदान की है, लेकिन इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने अथवा उन तक पहुंचने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और ECD में निवेश में वृद्धि की आवश्यकता है.

सिफ़ारिश 7: ECD को हस्तक्षेपों के लिए वित्तपोषण के अभिनव तरीकों का पता लगाना चाहिए, जिसमें निजी फंड भी शामिल हैं

अध्ययनों ने पाया है कि ECD के लिए केवल अधिक धन मुहैया करने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, एक डोनर इन्वेस्टमेंट फ्रेमवर्क अर्थात दाता निवेश ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया जाना चाहिए. यह ढांचा ख़र्च को परिणामों और आउटपुट अर्थात उत्पादकता से जोड़ता है. एक अध्ययन से पता चला है कि कैसे उप-सहारा अफ्रीका ने निवेश में उच्चतम संभावित लाभ हासिल करने की पेशकश की: "यह अनुमान लगाया गया है कि सबसे वंचित बच्चों के लिए बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा में केवल $1 का निवेश करने पर रिटर्न $17 जितना अधिक हो सकता है. यह अनुमान लगाया गया है कि उप-सहारा अफ्रीका में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा में दाखिलों को तीन गुना करने के लिए ख़र्च किए गए प्रत्येक डॉलर के निवेश से $33 का यील्ड अर्थात प्रतिफल प्राप्त होगा."

हालांकि, ये परिणाम संदर्भ विशिष्ट से जुड़े हैं. कुछ परिदृश्यों में, विशेषत: उन क्षेत्रों में जहां प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा है, वहां पूरे समाज के दृष्टिकोण को अपनाकर ख़र्च के उपयोग में सुधार करते हुए निवेश के अतिरिक्त स्रोतों को सुरक्षित करने की आवश्यकता है.

भारत में, सामान्य रूप से बच्चों और विशेष रूप से ECD के लिए वित्त पोषण अनेक स्रोतों से आता है. इनमें सरकारी बजटीय आवंटन; बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, माइकल एंड सुसान डेल फाउंडेशन, और चिल्ड्रन इन्वेस्टमेंट फंड फाउंडेशन द्वारा किए गए निवेश; कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) कार्यक्रमों के माध्यम से कॉर्पोरेट वित्त पोषण; और बहुपक्षीय और द्विपक्षीय एजेंसियों से ऋण और अनुदान शामिल हैं.

MWCD द्वारा प्रबंधित नेशनल चिल्ड्रेन्स फंड अर्थात राष्ट्रीय बाल कोष (सार्वजनिक सहयोग और बाल विकास के राष्ट्रीय संस्थान के माध्यम से) CSR, परोपकारी नागरिकों, निजी दाताओं और उच्च-नेट-वर्थ अर्थात धनाढ्य व्यक्तियों (HNWI) से संसाधन जुटाता है. हालांकि, विभिन्न दस्तावेज़ों - जैसे कि भारत सरकार और राज्य सरकार के बजट, CSR फंडिंग पर रिपोर्ट, और सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध फाउंडेशन्स की वार्षिक रिपोर्ट हैं – से पता चलता है कि किसी विशेष वर्ष के लिए भारत में बच्चों के कल्याण के लिए किए गए निजी निवेश का अनुमान लगाने के लिए आंकड़ों का मिलान करना बेहद मुश्किल है.

ECD की दिशा में लक्षित पहलों को शुरू करने और बढ़ाने के लिए अन्य स्रोतों - जैसे CSR और जिला खनिज निधि - से व्यवस्थित रूप से धन प्राप्त करने के लिए एक संस्थागत तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है. इसके साथ कॉरपोरेट्स और परोपकारी लोगों को ऐसी पहल में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने वाला एक निश्चित निगरानी तंत्र भी होना चाहिए. MWCD के प्रशासनिक दायरे में एक ऑटोनॉमस स्पेशल पर्पज व्हीकल (SPV) की स्थापना की जा सकती है, जिसमें फंडिंग के लिए तीन विंडो हो सकते हैं. (चित्र 4 देखें)

चित्र 4: प्रस्तावित स्पेशल पर्पज व्हीकल की संरचना

 

स्रोत: UNICEF द्वारा प्रस्तावित और MWCD को प्रस्तुत मॉडल

 SPV का उद्देश्य विशेष रूप से बच्चों की प्राथमिकताओं पर केंद्रित परियोजनाओं के लिए निजी क्षेत्र, दानदाताओं, परोपकारी लोगों और HNWI से धन जुटाना होगा, जो विशेष रूप से उन गतिविधियों पर ध्यान देगा जो Covid-19 के कारण असमान रूप से प्रभावित हुई हैं. MWCD की विभिन्न ज़रूरतों और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वायत्त SPV में कई विंडो हो सकते हैं और यह SPV, कंपनी अधिनियम 2016 के वैधानिक प्रावधानों के तहत धारा 8 कंपनी/ट्रस्ट/समाज के रूप में काम करेगी. इस SPV का संचालन करने की ज़िम्मेदारी एक स्वतंत्र बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को दी जाएगी; SPV के सभी कार्यों को निष्पादित करने के लिए एक अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक (CMD); और CMD की सहायता करने के लिए एक कार्यकारी परिषद होगी, जो सहायक स्टाफ सदस्यों के सहयोग से कार्यों को निष्पादित करने का काम करेगी. चूंकि किशोर लड़कियों और संभावित गर्भवती महिलाओं अर्थात माताओं का स्वास्थ्य और पोषण बाल्यावस्था की भलाई सुनिश्चित करने के लिए विशेष रूप से गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, अत: प्रस्तावित SPV के दायरे में किशोर लड़कियों को शामिल किया है.

G20 भी सरकार के नेतृत्व और पूरे समाज द्वारा समन्वित प्रयासों को बहु-क्षेत्रीय भागीदारों की ताकत का लाभ उठाते हुए सुसंगत ECD कार्यक्रमों को वित्तपोषित करने और विकसित करने के लिए चलाने का विचार कर सकता है.


Endnotes

[1] UNICEF’S Programme Guidance for Early Childhood Development, UNICEF Programme Division 2017 https://www.unicef.org/media/107616/file/UNICEF-Programme-%20Guidance-for-Early-Childhood-Development-2017.pdf

[2] M. Blacket et al., “Early childhood development coming of age: science through the life course,” The Lancet, Vol. 389, No. 10064 (2017); 77-90, https://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736(16)31389-7/fulltext

[3]Stunting is defined as low height-for-age. It is the result of chronic or recurrent undernutrition. Wasting is defined as low weight-for-height. It often indicates recent and severe weight loss, although it can also persist for a long time.

[4] M De Onis et al., “Childhood stunting: a global perspective.” Maternal & Child Nutrition 12 (2016): 12-26,https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC5084763/

[5]  World Health Organization, “Malnutrition”, https://www.who.int/health-topics/malnutrition

[6] UNICEF, “Additional 67 million children under 5 could suffer wasting year due to Covid-19”, July 28, 2020, https://www.unicef.org/eap/press-releases/unicef-additional-67-million-children-under-5-could-suffer-wasting-year-due-covid-19

[7] Dana C. McCoy et al., “Global estimates of the implications of COVID‐19‐related preprimary school closures for children’s instructional access, development, learning, and economic wellbeing,” Child Development 92, no. 5 (2021): e883-e899, https://srcd.onlinelibrary.wiley.com/doi/10.1111/cdev.13658

[8] “Global estimates of the implications of COVID‐19‐related preprimary school closures for children’s instructional access, development, learning, and economic wellbeing”

[9] Heckman, James J. “Invest in early childhood development: Reduce deficits, strengthen the economy,” The Heckman Equation 7, no. 1-2 (2012), https://heckmanequation.org/resource/invest-in-early-childhood-development-reduce-deficits-strengthen-the-economy/ 

[10] Government of Burundi and UNICEF, “Cost– Benefit Analysis of Investments in Early Childhood Development in Burundi”, 2021, https://www.unicef.org/esa/media/10781/file/UNICEF-Burundi-Cost-Benefit-Analysis-Investments-Early-Childhood-2021-EN.pdf

[11] Mebrahtu, S., and V. Sethi, “Nutrition—Budget disconnect,” CBGA Budget Track 11 (2016)

[12] World Food Programme, “Global Food Crisis”, https://www.wfp.org/global-hunger-crisis

[13] FAO, IFAD, UNICEF, WFP and WHO, “The State of Food Security and Nutrition in the World 2022: Repurposing food and agricultural policies to make healthy diets more affordable,” Rome, FAO, https://www.fao.org/3/cc0639en/cc0639en.pdfhttps://www.fao.org/3/cc0639en/cc0639en.pdf

[14]  World Economic Forum, “These will be the world’s most populous countries by 2030”, August 11, 2022, https://www.weforum.org/agenda/2022/08/world-population-countries-india-china-2030/

[15]  IGC, “Nutrition in India: A look at the policy initiatives, investments and outcome indicators”, February 10, 2021, https://www.theigc.org/blogs/nutrition-india-look-policy-initiatives-investments-and-outcome-indicators

[16] UNICEF Indonesia, “Nutrition”, https://www.unicef.org/indonesia/nutrition

[17] Makanjana O and Naicker A, “Nutritional Status of Children 24-60 Months Attending Early Child Development Centres in a Semi-Rural Community in South Africa,” International Journal of Environmental Research and Public Health 18, no.1(2020), https://pubmed.ncbi.nlm.nih.gov/33396403/

[18] Reny Joseph et al., “Potential Determinants and Effects of Exclusive Breastfeeding Among Infants at a Tertiary Care Center, Kerala, India,” Cureus Journal of Medical Science 14, no. 3 (2022), https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC9009538/

[19] National Health Mission, Ministry of Health & Family Welfare, “Mother’s Absolute Affection (MAA)”, https://nhm.gov.in/index1.php?lang=1&level=4&sublinkid=1413&lid=330

[20] United Nations, “Nutrition and Food Security”, https://india.un.org/en/171969-nutrition-and-food-security

[21]  “Nutrition in India: A look at the policy initiatives, investments and outcome indicators”

[22] “Nutrition in India: A look at the policy initiatives, investments and outcome indicators”

[23] Childhood Education International, “Impact of Investment in ECD Highlighted in Report on Inclusive Education”, November 25, 2020, https://ceinternational1892.org/article/impact-of-investment-in-ecd-highlighted-in-report-on-inclusive-education/

[24] Union Budget, Government of India, https://www.indiabudget.gov.in/ ; National Commission on Population Ministry of Health & Family Welfare, Government of India, “Census of India 2011”, https://main.mohfw.gov.in/sites/default/files/Population%20Projection%20Report%202011-2036%20-%20upload_compressed_0.pdf

[25] Maureen M. Black et al.,”Advancing Early Childhood Development: From Science to Scale 1: Early childhood development coming of age: Science through the life course,” Lancet (London, England) 389, no. 10064 (2017): 77.

[26]  Asma Zubairi & Pauline Rose, “Leaving the Youngest Behind: Declining aid to early childhood education”, TheirWorld, April 2019, https://theirworld.org/wp-content/uploads/2019/04/Theirworld-Leaving-The-Youngest-Behind-2nd-Edition-April-2019.pdf

[27] A special purpose vehicle is a company (a legal entity) created for a limited purpose (in this case for financing ECD priorities). This is often done to isolate financial risk from a parent or primary company and to dedicate of funds for a priority sector/ specific purpose.

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Authors

Shoba Suri

Shoba Suri

Dr. Shoba Suri is a Senior Fellow with ORFs Health Initiative. Shoba is a nutritionist with experience in community and clinical research. She has worked on nutrition, ...

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Subhasree Ray

Subhasree Ray

Dr. Subhasree Ray is the Lead - Nutrition & Wellness (Corporate Medical Services), at Reliance Industries Limited. She writes on nutrition policies, sustainable food systems ...

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