Issue BriefsPublished on Feb 27, 2023
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आओ ‘मासिक-धर्म’ स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करें: सर्वव्यापी हो यौन और प्रजनन स्वास्थ्य

यौन और प्रजनन स्वास्थ्य (SRH) के मासिक धर्म स्वास्थ्य और हाइजीन अर्थात स्वास्थ्य विज्ञान (MHH) के साथ मजबूती से जुड़ा होने के सबूत मौजूद हैं. इसके बावजूद वौश्विक स्तर पर, सरकारें, नीति निर्माता और गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) MHH को अपने SRH एजेंडे में शामिल करने में विफल साबित हुए हैं. यह आलेख MHH और SRH के बीच संबंधों को उजागर करने वाले सबसे महत्वपूर्ण सबूतों की जांच करता है. इसका उद्देश्य MHH को भारत के SRH एजेंडे की मुख्यधारा में शामिल करने की अनिवार्यता को रेखांकित करने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करना है. इस आलेख में यह तर्क दिया गया है कि यदि वैश्विक समुदाय को स्वास्थ्य और खैरियत, शिक्षा और लैंगिक समानता पर सतत अथवा दीर्घकालीन विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना है, तो मासिक धर्म स्वास्थ्य को बढ़ावा देने को लेकर तय किए गए लक्ष्यों में जो खामियां हैं उन्हें दूर करना जरूरी हैं.

Attribution:

एट्रिब्यूशन: करण बब्बर और एम शिवकामी, "आओ मासिक-धर्म स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करें: सर्वव्यापी हो यौन और प्रजनन स्वास्थ्य," ओआरएफ़ इश्यू ब्रीफ नंबर 613, फरवरी 2023, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन.

परिचय

निम्न और मध्यम आय वाले देशों में मातृ मृत्यु दर उच्च बनी हुई है. इन देशों में मातृ मृत्यु दर के सभी मामलों में से 94 प्रतिशत मामले दर्ज किए जाते हैं.[1],[2] भारत में मातृ मृत्यु दर प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 113 है;[3] सरकार ने लक्ष्य रखा है कि 2030 तक इस दर को 70 से कम कर दिया जाएं.[4] जानकारों का मानना है कि यौन और प्रजनन स्वास्थ्य (SRH) को बढ़ावा देने से ही इस विकराल समस्या से निपटा जा सकता है. लेकिन यह देखा गया है कि विशेषतः विकलांग और संघर्ष या आपदाओं में फंसी महिलाओं[5],[6] और ट्रांसजेंडर अर्थात पारलैंगिक और नॉन-बाइनरी अर्थात ऐसा शख़्स जो न तो पूरी तरह स्त्री है और न ही पूरी तरह से पुरुष है, जैसे लोगों को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंचने में काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है.[7]

SRH पर वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करना, मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान (MHH) में सुधार के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता पर ही निर्भर करता है. भारत और अन्य विकासशील देशों से उपलब्ध होने वाले सबूतों का उपयोग करते हुए यह आलेख इस बात का तर्क देता है कि MHH में सुधार के बग़ैर विश्व SRH को हासिल करने से काफ़ी दूर रह जाएगा. [SRH प्रोग्रामिंग को जेंडर ट्रांसफॉर्मेटिव अर्थात लिंग-परिवर्तनकारी बनाने की ज़रूरत है. इसके पहले MHH और SRH के बीच की कड़ी की पहचान करना आवश्यक है. यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के आर्थिक पहलू  को देखते हुए यह काम अत्यावश्यक है: अर्थात, SRH को बढ़ावा देने से देश के आर्थिक, शैक्षिक और विकास परिणामों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है.[8],[9],[10]

दरअसल, सच्चाई यह है कि SRH से जुड़ी जानकारी अर्थात सूचना और सेवाओं तक मासिक धर्म वाले व्यक्तियों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पाती है.[11] ऐसे में वे SRH को लेकर अपने पूरे जीवन चक्र में अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकते या ऐसा करने में असमर्थ होते हैं.[12] ख़राब आर्थिक और शैक्षिक परिणाम, उनकी पहुंच को सीमित करने के अहम कारणों में शामिल हैं. विभिन्न विकासशील देशों में हुए कई अध्ययनों से पता चला है कि कम स्कूली शिक्षा वाले लोग जल्दी यौन संबंध की शुरुआत के साथ ही कम उम्र में ही वैवाहिक जीवन में प्रवेश कर लेते हैं. इस वज़ह से उनकी प्रजनन दर अधिक होती है, और उन्हें जल्द मातृत्व के दुष्परिणामों का सामना करना पड़ता है.[13],[14]

यौन और प्रजनन स्वास्थ्य का मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान एक महत्वपूर्ण पहलू है.[15] हालांकि, मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान को बढ़ावा देने की राह में अनेक बाधाएं हैं; इनमें सामाजिक-सांस्कृतिक पैमाने शामिल हैं जो मासिक धर्म को निषिद्ध मानते हैं.[16],[17] इसी प्रकार जैविक और चिकित्सीय मुद्दे जैसे कि मूत्र पथ का संक्रमण, और फाइब्रॉएड अर्थात गैर कैंसरजन्य ट्यूमर अथवा वृद्धि के कारण होने वाली असामान्य यूरीनरी ब्लीडिंग अर्थात मूत्र रक्तस्राव भी इसमें बड़ी बाधा हो सकते हैं[18],[19],[20],[21],[22] ऐसे में ये मुद्दे मासिक धर्म वाले व्यक्तियों को सेक्स, रिश्ते, परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक का उपयोग करने से संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं. यह स्थिति उन्हें वापस कमजोर SRH के दुष्चक्र में धकेल देती है.[23]

भारतीय समाज में मौजूद वर्जनाएं और मिथक देश भर में सरकार द्वारा स्थापित 8,000 से अधिक किशोरों के अनुकूल स्वास्थ्य क्लिनिक (एएफएचसी) के सर्वश्रेष्ठ उपयोग में बाधा बने हुए हैं.[24] स्कूलों, कार्यस्थलों और समुदायों में मासिक धर्म से संबंधित चुनौतियां देखी जाती हैं, जहां मासिक धर्म वाले व्यक्ति गोपनीयता और गरिमा के साथ अपनी आवश्यकताओं को सुरक्षित रूप से प्रबंधित नहीं कर सकते हैं.[25],[26] कुछ समुदायों में प्रतिबंधात्मक सामाजिक मानदंड मासिक धर्म वाले व्यक्तियों को प्रार्थना करने, स्नान करने, दूसरों की तरह बिस्तरों पर सोने अथवा भोजन पकाने की प्रक्रिया से वंचित रखते हैं.[27],[28] अतः समुदायों और नीति निर्माताओं को मासिक धर्म चक्र को लेकर जागरूकता को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर उसे बढ़ावा देने की ज़रूरत है.[29]

बड़ी उम्र की महिलाओं के लिए चुनौतियां और भी बढ़ जाती हैं. ऐसी महिलाओं को रजोनिवृत्ति के बाद रक्तस्राव के मुद्दों का सामना करना पड़ता है.  यह स्थिति सीधे उनके यौन स्वास्थ्य को प्रभावित करती  है.[30] अतः विकासशील देशों में इस पहलू को लेकर विशेष रूप से अधिक सख्ती के साथ डेटा पर नज़र रखे जाने की ज़रूरत है.[31]

MHH और SRH के बीच संबंधों पर एकीकृत ध्यान ही दोनों क्षेत्रों के पारस्परिक लक्ष्यों को आगे बढ़ा सकता है. जिससे उन व्यक्तियों के स्वास्थ्य और ख़ैरियत में सुधार हो सकता है जो अपने पूरे जीवन चक्र में मासिक धर्म का सामना करते रहते हैं.

वैश्विक दृष्टिकोण

मासिक धर्म स्वास्थ्य के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के बीच अहम कड़ी होने के पुख्ता सबूत होने के बावजूद सरकारें, नीति निर्माता और गैर सरकारी संगठन यदा कदा ही मासिक धर्म स्वास्थ्य को अपने SRH एजेंडा में शामिल करती हैं. विश्व जनसंख्या दिवस और लैंगिक समानता फोरम 2021 दोनों में SRH पर ध्यान केंद्रित किया गया था. लेकिन इसमें भी मासिक धर्म स्वास्थ्य पर बेहद कम ध्यान दिया गया है.[32],[33]  यहां तक ​​कि SRH पर 2018 की गुटमाकर-लैंसेट की 43 पृष्ठों की  रिपोर्ट[34] में मासिक धर्म स्वास्थ्य का केवल एक बार ज़िक्र किया गया है. आरंभिक अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि कोविड-19 टीकों के उत्पादन के दौरान, टीके की प्रभावकारिता को समझने के लिए किए गए पायलट अध्ययन के दौरान मासिक धर्म स्वास्थ्य को ध्यान में नहीं रखा गया था.[35]

इसमें शिक्षा के पहलू का भी अभाव है. इक्कीस विकासशील देशों की शिक्षा नीति के दस्तावेज़ों के एक अध्ययन में पाया गया कि इनमें मासिक धर्म स्वास्थ्य पर बहुत कम ध्यान दिया गया है.[36] पिछले दशक के दौरान जिन देशों में स्वास्थ्य और शिक्षा एजेंडे में MHH का समावेश होते देखा गया, उनमें भी मुख्य रूप से स्कूली छात्राओं को डिस्पोज़ोबल सैनिटरी पैड वितरण करने पर ही ध्यान केंद्रित किया गया था. लेकिन इनमें भी मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित अन्य मुद्दों की उपेक्षा ही की गई हैं. इसमें सुरक्षा, निपटान, गरिमा का अधिकार - और मासिक धर्म वाले लोगों को विकल्प प्रदान करने जैसे अहम मुद्दों की अनदेखी की गई है.[37]

यदि वैश्विक समुदाय को स्वास्थ्य और ख़ैरियत, शिक्षा और लैंगिक समानता पर सतत अथवा दीर्घकालीन विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना है, तो इसके लिए मासिक धर्म स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लक्ष्यों में जो ख़ामी है उसे दूर करना होगा.[38] सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल पर वैश्विक लक्ष्यों में "किसी को भी पीछे नहीं छोड़ना" की आवश्यकता को रेखांकित करने वाली संयुक्त राष्ट्र उच्च स्तरीय बैठक (UNHLM), 2023 की कार्य योजना को मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान को SRH एजेंडे में सबसे ऊपर रखना होगा.

भारत के लिए एक रूपरेखा

मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान को भारत में यौन स्वास्थ्य वार्तालापों की मुख्यधारा में लाने के लिए यह आलेख निम्नलिखित सिफारिशें करता है.

  1. प्रजनन स्वास्थ्य पर स्कूलों और स्थानीय समुदायों में रजस्वला के बारे में होने वाली बातचीत अथवा कक्षाओं में मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान को शामिल किया जा सकता हैं.[39],[40],[41],[42] बातचीत के इन सत्रों के माध्यम से मासिक धर्म से जुड़े आम मिथकों और वर्जनाओं को दूर करने की कोशिश की जानी चाहिए. इसमें ऐसी चर्चाओं को शामिल करें जो परिवार नियोजन और गंभीर संक्रमण जैसी चुनौतियों के साथ मासिक धर्म का पालन करने वाली महिलाओं का मार्गदर्शन करें.[43],[44] भारत सरकार ने 2007 में MHH सहित यौन शिक्षा के बारे में चर्चाओं को बढ़ावा देने के लिए किशोर शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की है. लेकिन इस पहल का शिक्षकों और अभिभावकों ने विरोध किया. उन्होंने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इसमें शामिल सामग्री "बहुत ग्राफिक अर्थात दर्शनीय" है. अतः यह "भारतीय दर्शकों के लिए उपयुक्त नहीं है."[45] प्रजनन स्वास्थ्य के इर्द गिर्द अब तक किया गया कार्य पर्यावरणीय कारकों तक — अर्थात् वॉटर यानी जल, सैनिटेशन अर्थात स्वच्छता और हाइजीन अर्थात स्वास्थ्य विज्ञान (डबल्यूएएसएच) सुविधाओं और सैनिटरी पैड तक ही सिमट कर रह गया है. लेकिन, सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दे भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं. अतः हितधारकों को इस पर भी पर्याप्त ध्यान देना चाहिए.
  1. सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य हितधारकों को अपने मौजूदा कार्यक्रमों में सुधार करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि मासिक धर्म से पीड़ित लोगों को मासिक धर्म से जुड़े विभिन्न उत्पादों, उनके उपयोग और उनके पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में जानकारी देकर जागृत और शिक्षित किया जा सके.[46],[47],[48] ऐसे हस्तक्षेप से मासिक धर्म वाले व्यक्तियों की इन उत्पादों को अपनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा और वे मासिक धर्म स्वास्थ्य पर यथोचित निर्णय लेने में सक्षम होंगे.
  1. ऐसे कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए जो न केवल स्कूली छात्राओं को, बल्कि लड़कियों और महिलाओं को भी डिस्पोजेबल सैनिटरी पैड वितरित करने पर ध्यान केंद्रित करने का काम करें.[49] मासिक धर्म वालों को माहवारी उत्पादों के बारे में जानकारी देकर उन्हें सशक्त करने के लिए उनके समक्ष विकल्प उपलब्ध किए जाने की ज़रूरत है.[50] चूंकि अब मासिक धर्म पर चर्चा सतत अथवा स्थायी मासिक धर्म की ओर बढ़ रही है, अतः यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि मासिक धर्म वाले व्यक्तियों को उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले मासिक धर्म उत्पादों के संभावित नुकसान के बारे में भी जानकारी मुहैया कराई जाएं.[51]
  1. स्थानीय समुदायों में शिक्षकों, स्वास्थ्य कर्मियों और महिलाओं जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक पैरोकारों के लिए संवेदीकरण कार्यशालाओं का आयोजन करने से मासिक धर्म वाले युवा लोगों की सहायता करने में काफी मदद मिलेगी. हालिया अध्ययनों[52],[53] से पता चलता है कि भारत में मासिक धर्म के बारे में किशोर लड़कियों के लिए जानकारी का पहला स्रोत माताएं, शिक्षक और स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही होते हैं. इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि इन समूहों को MHH से जुड़ी जानकारी प्रदान की जाएं, ताकि ये लोग माहवारी से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए व्यावहारिक और वैज्ञानिक विशेषज्ञता हासिल कर सकें.
  2. किशोर लड़कों और पुरुषों को MHH से सम्बंधित बातचीत में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि बाद में वे इसे लेकर उठाए जाने वाले कदमों में सहायक साबित हो सकें.[54],[55] ये बातचीत उन्हें MHH के महत्व को समझने और मासिक धर्म से जुड़े कलंक को लेकर होने वाली भ्रांतियों को दूर करने सहित सामाजिक मानदंडों में तत्काल बदलाव लाने में सहायक साबित होगी.
  1. मासिक धर्म वाले व्यक्तियों के लिए कार्यस्थल नीतियां निर्धारित करने के साथ-साथ पर्याप्त डबल्यूएएसएच सुविधाओं का भी प्रावधान किया जाना चाहिए.[56],[57]
  1. रजस्वला को लेकर होने वाली बातचीत में ट्रांस और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों को भी शामिल किए जाने की आवश्यकता है. मासिक धर्म एक परिवर्तनशील अवधारणा है. मसलन कई महिलाएं मासिक धर्म का अनुभव नहीं करती हैं, जबकि कुछ ट्रांसमैन, नॉन-बाइनरी अर्थात गैर-द्विआधारी व्यक्ति और मैस्कुलाइन जेंडर अर्थात मर्दाना लिंग पहचान वाले लोग रजस्वला होते हैं.[58],[59],[60] हालांकि, मासिक धर्म से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करने वाले अकादमिक साहित्य और मुख्यधारा मीडिया कवरेज में ऐसे लोगों को सीसजेंडर महिला के लेंस से देखना जारी रखते हैं. इस वज़ह से ट्रांस समुदायों में मासिक धर्म के बारे में शर्म और चुप्पी और बढ़ गई हैं. मासिक धर्म के फेमिनाइजेशन अर्थात नारीकरण ने ट्रांसजेंडर और नॉन बाइनरी अर्थात गैर-द्विआधारी लोगों को इस मसले को लेकर चल रहे विमर्श से बाहर कर दिया है.[61] 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 5 मिलियन व्यक्ति तीसरे लिंग [के रूप में ख़ुद की शिनाख्त करवाते हैं.[62] इस पर होने वाले विमर्श में समुदायों को शामिल करने और उन्हें LGBTQIA प्लस आबादी के बारे में शिक्षित करने की आवश्यकता है. इसी प्रकार मासिक धर्म स्वास्थ्य विमर्श को देखते हुए समावेशिता के मूल सिद्धांत के साथ उनके SRH ज्ञान को बढ़ाने की भी ज़रूरत है.
  1. यदि मासिक धर्म स्वास्थ्य पर कोविड-19 वैक्सीन का कोई संभावित प्रभाव हो तो उसका मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है. सोशल मीडिया पर साझा किए गए फ़र्स्ट-पर्सन उपाख्यानों के अनुसार, माहवारी चक्र का अनुभव करने वाले कुछ लोगों को कोविड-19 का टीका लेने के बाद असामान्य रूप से भारी मासिक धर्म होने के साथ ही मासिक धर्म चक्र में परिवर्तन होने की बात कही है.[63] वर्तमान, ख़ोजपूर्ण अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने सावधानी बरतने की सलाह दी है. उनका कहना है कि वैक्सीन और उपरोक्त स्थिति अर्थात भारी रक्तस्राव अथवा मासिक धर्म चक्र में बदलाव के बीच सीधे संबंध बनाने से बचना होगा, क्योंकि मासिक धर्म चक्र किसी भी प्रकार के टीके के साथ या उसके बिना भी अनेक कारकों से प्रभावित होते हैं.[64]
  1. छोटे पैमाने पर कुछ ख़बरों में MHH के ख़राब बुनियादी ढांचे और संसाधनों का दस्तावेज़ीकरण किया गया है. इसमें डबल्यूएएसएच सुविधाओं की कमी और माहवारी उत्पादों तक पहुंच की कमी शामिल है.[65],[66],[67],[68],[69],[70] MHH बुनियादी ढांचे और संसाधनों में सुधार करने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रियाओं को, विशेष रूप से एलएमआईसी में, मज़बूत करने की आवश्यकता है. एक अन्य विकल्प बहु-क्षेत्रीय हितधारकों के साथ मिलकर काम करना हो सकता है जो MHH के बुनियादी ढांचे और डबल्यूएएसएच सुविधाओं को बेहतर बनाने का काम कर सकते हैं.

सतत विकास लक्ष्यों में निहित SRH लक्ष्यों को प्राप्त करना, मासिक धर्म वाले लोगों के मासिक धर्म स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए एक सार्वभौमिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगा.

निष्कर्ष

मासिक धर्म के साथ यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के संबंध पर वैश्विक और राष्ट्रीय एजेंडा बहुत कम ध्यान देते हैं. सतत विकास लक्ष्यों में निहित SRH लक्ष्यों को प्राप्त करना, मासिक धर्म वाले लोगों के मासिक धर्म स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए एक सार्वभौमिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगा.

लिंग-परिवर्तनकारी नीतियों को बनाने के लिए MHH को सभी SRH पहलुओं में एकीकृत करना अहम है, जो सामाजिक मानदंडों को चुनौती देते हुए समावेशिता के मूल सिद्धांत द्वारा निर्देशित मासिक धर्म और मासिक धर्म स्वास्थ्य के विषय को देखते हैं.  MHH और SRH के बीच संबंधों पर एकीकृत ध्यान दोनों क्षेत्रों के पारस्परिक लक्ष्यों को आगे बढ़ा सकता है, और मासिक धर्म वाले व्यक्तियों के पूरे जीवन चक्र में उनके स्वास्थ्य और ख़ैरियत में सुधार कर सकता है.

(करण बब्बर, जिंदल ग्लोबल बिजनेस स्कूल, ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर हैं. वह शिक्षा, स्वास्थ्य और लिंग के इंटरसेक्शन अर्थात प्रतिछेद मुद्दों पर काम करते हैं.)

(शिवकामी, स्कूल ऑफ हेल्थ सिस्टम्स स्टडीज, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर हैं. वह जनसांख्यिकी, लिंग और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में काम करती हैं.)


Endnotes

[a] This brief defines MHH as the process of adequately and safely managing menstrual needs by using a clean menstrual management material to absorb the menstrual blood in a private place; using soap and water for cleaning the body; having access to disposal facilities; receiving adequate social support and resources to manage pain. MHH also includes understanding the menstrual cycle and managing it in a dignified and comfortable way in a socio-cultural environment without discomfort, fear, or worry. See: Elizabeth R MacRae et al., “’It’s like a burden on the head': Redefining adequate menstrual hygiene management throughout women’s varied life stages in Odisha, India." PloS one 14, no. 8 (2019): e0220114.

[b] The Supreme Court of India formally recognised the third gender in India in April 2014. There is no formal definition of third gender, however, individuals who do not identify as men or women are commonly referred to as transgender and hijras.

[1] World Health Organization, “Trends in maternal mortality 2000 to 2017: estimates by WHO, UNICEF, UNFPA, World Bank Group and the United Nations Population Division,” (2019).

[2] World Health Organization, “Maternal mortality”, WHO. www.who.int.

[3] Office of the Registrar General & Census Commissioner, India (ORGI), (2022).

[4] Kerean Watts, “Maternal mortality ratio in decline,” Health Issues India, (2019).

[5] Penelope A Phillips-Howard, “What’s the bleeding problem: menstrual health and living with a disability,” The Lancet Regional Health–Western Pacific no. 19 (2022).

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[9] Marni Sommer et al., “How addressing menstrual health and hygiene may enable progress across the Sustainable Development Goals,” Global Health Action 14, no. 1 (2021): 1920315.

[10] Karan Babbar and Pritha Dev, “Modelling the impact of ovulatory cycle knowledge on the number of children and age of women at first birth,” IIM A Working Papers, (2021).

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[15] Sommer et al., “How addressing menstrual health and hygiene may enable progress across the Sustainable Development Goals”

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[21] Negi, Mishra, and Lakhera, “Menstrual abnormalities and their association with lifestyle pattern in adolescent girls of Garhwal, India”

[22] Whitaker and Critchley, “Abnormal uterine bleeding”

[23] Chau, “Technical brief on the integration of menstrual health into sexual and reproductive health and rights policies and programmes”

[24] Andrea J. Hoopes et al., “Measuring adolescent friendly health services in India: A scoping review of evaluations,” Reproductive Health 13, no.137 (2016).

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[28] Karan Babbar et al., “Menstrual health is a public health and human rights issue,” The Lancet Public Health 7, no. 1 (2022): e10-e11.

[29] Babbar, “Taboos and myths as a mediator of the relationship between menstrual practices and menstrual health”

[30] Chau, “Technical brief on the integration of menstrual health into sexual and reproductive health and rights policies and programmes”

[31] Chau, “Technical brief on the integration of menstrual health into sexual and reproductive health and rights policies and programmes”

[32] World Population Day, United Nations, July 11, 2021,

[33] Generation Equality Forum. Paris | Generation Equality Forum. Gender Equality Forum 2021.

[34] Ann M Starrs et al., “Accelerate progress—sexual and reproductive health and rights for all: report of the Guttmacher–Lancet Commission,” The Lancet 391, no. 10140 (2018): 2642-2692.

[35] Jennifer Couzin Frankel, “Thousands report unusual menstruation patterns after COVID-19 vaccination,” Science, July 15, 2022.

[36] Marni Sommer et al., “Attention to menstrual hygiene management in schools: An analysis of education policy documents in low-and middle-income countries,” International Journal of Educational Development 57 (2017): 73-82.

[37] Sommer et al., “Attention to menstrual hygiene management in schools: An analysis of education policy documents in low-and middle-income countries”

[38] Sommer et al., “How addressing menstrual health and hygiene may enable progress across the Sustainable Development Goals”

[39] Karan Babbar, Deepika Saluja, and Muthusamy Sivakami, “How socio-demographic and mass media factors affect sanitary item usage among women in rural and urban India,” Waterlines 40, no. 3 (2021): 160-178.

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[42] Enu Anand, Jayakant Singh, and Sayeed Unisa, “Menstrual hygiene practices and its association with reproductive tract infections and abnormal vaginal discharge among women in India, Sexual & Reproductive Healthcare 6, no. 4 (2015): 249-254.

[43] Anand, Singh and Unisa, “Menstrual hygiene practices and its association with reproductive tract infections and abnormal vaginal discharge among women in India”

[44] Babbar and Dev, “Modelling the impact of ovulatory cycle knowledge on the number of children and age of women at first birth”

[45] Dhruv Krishna, “Sex education: Still a taboo in India?,” Times of India (2020).

[46] Babbar, Saluja and Sivakami, “How socio-demographic and mass media factors affect sanitary item usage among women in rural and urban India”

[47] Goli et al., “Geographical disparity and socio-demographic correlates of menstrual absorbent use in India: A cross-sectional study of girls aged 15–24 years”

[48] Anand, Singh, and Unisa, “Menstrual hygiene practices and its association with reproductive tract infections and abnormal vaginal discharge among women in India”

[49] Karan Babbar and Pritha Dev, “COVID-19 and period products usage among menstruating women in urban and rural India,” IIMA Working Papers (2021).

[50] Alejandra Almeida-Velasco and Muthusamy Sivakami, “Menstrual hygiene management and reproductive tract infections: a comparison between rural and urban India.” Waterlines 38, no. 2 (2019): 94-112.

[51] Goli et al., “Geographical disparity and socio-demographic correlates of menstrual absorbent use in India: A cross-sectional study of girls aged 15–24 years”

[52] Anna Maria van Eijk et al., “Menstrual hygiene management among adolescent girls in India: a systematic review and meta-analysis. BMJ Open 6, no.3 (2016): e010290.

[53] Shantanu Sharma et al., “Menstrual hygiene preparedness among schools in India: A systematic review and meta-analysis of system-and policy-level actions.” International Journal of Environmental Research and Public Health 17, no. 2 (2020): 647.

[54] Linda Mason et al., “‘We do not know’: a qualitative study exploring boys’ perceptions of menstruation in India,” Reproductive Health 14, no. 1 (2017): 1-9.

[55] Therese Mahon, Anjali Tripathy, and Neelam Singh, “Putting the men into menstruation: the role of men and boys in community menstrual hygiene management,” Waterlines, (2015): 7-14.

[56] Rachel B Levitt and Jessica L. Barnack-Tavlaris, “Addressing menstruation in the workplace: the menstrual leave debate,” The Palgrave Handbook of Critical Menstruation Studies (2020): 561-575.

[57] Marni Sommer et al., “Managing menstruation in the workplace: an overlooked issue in low-and middle-income countries,” International Journal for Equity in Health 15, no. 1 (2016): 1-5.

[58] A. J. Lowik, “Just because I don’t bleed, doesn’t mean I don’t go through it: Expanding knowledge on trans and non-binary menstruators,” International Journal of Transgender Health 22, no. 1-2 (2020): 113-125.

[59] Joan C. Chrisler et al., “Queer periods: attitudes toward and experiences with menstruation in the masculine of centre and transgender community,” Culture, Health & Sexuality 18, no. 11 (2016): 1238-1250.

[60] Babbar et al., “Menstrual health is a public health and human rights issue”

[61] Nalini Kaushik and Karan Babbar, “Re-imagining menstruation under the lens of new normal,” Gender & Covid-19 (2021).

[62] Registrar General of India (2011)., Census of India, Provisional Population Totals, New Delhi: Government of India, 409-413.

[63] Kate Clancy (@KateClancy), “A colleague told me she has heard from others that their periods were heavy post-vax. I’m curious whether other menstruators have noticed changes too? I’m a week and a half out from dose 1 of Moderna, got my period maybe a day or so early, and am gushing like I’m in my 20s again” Twitter Thread, Feb 25, 2021.

[64] Gemma C Sharp, Abigail Fraser, Gemma Sawyer, Gabriella Kountourides, Kayleigh E Easey, Gemma Ford, Zuzanna Olszewska et al., “The COVID-19 pandemic and the menstrual cycle: research gaps and opportunities,” International Journal of Epidemiology 51, no. 3 (2022): 691-700.

[65] Prachi Sharma, “Implications Of A Lack Of Gender Lens In India’s Vaccine Roll-Out Policy,” Feminism In India, Nov 18, 2021.

[66] “Introduction: Periods Don’t Stop for Pandemics,” PLAN International (2020).

[67] Sommer et al., “Menstrual Product Insecurity Resulting From COVID-19‒Related Income Loss, United States, 2020,” American Journal of Public Health 112, no. 4 (2022): 675-684.

[68] Jacqueline Coombe, Helen Bittleston, and Jane S. Hocking, “Access to period products during the first nation-wide lockdown in Australia: Results from an online survey,” Women & Health 62, no. 4 (2022): 287-292.

[69] Karan Babbar, Niharika Rustagi, and Pritha Dev. “How COVID‐19 lockdown has impacted the sanitary pads distribution among adolescent girls and women in India.” Journal of Social Issues (2022). DOI: 10.1111/JOSI.12533.

[70] Karan Babbar and Pritha Dev, “COVID-19 and period products usage among menstruating women in urban and rural India,” IIMA Working Papers (2021).

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