Issue BriefsPublished on Jul 27, 2023
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China’s sharp power: दुनिया की धार को करेगी कुंद या होगा ये वैश्विक जागरण का पल?

  • Kalpit A Mankikar

    शार्प पॉवर (sharp power) - एक देश की सांस्कृतिक, शैक्षणिक व्यवस्था और मीडिया बर्ताव में तिकड़म का उपयोग करते हुए परिवर्तन की कोशिश करते हुए दूसरे देश को प्रभावित करने का प्रयास - चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का मुख्य हथकंडा है. चीन (China) के शार्प पॉवर दृष्टिकोण को वहां के शासन की वैधता से संबंधित मुद्दों और सीसीपी की विकास प्राथमिकताओं ने गढ़ा है. सत्तारुढ़ दल में इस बात को लेकर कुछ चिंता है कि बाहरी परिस्थितियां शी जिनपिंग (Xi Jinping) के शासनकाल में चीन के खिलाफ़ जा रही है. अत: चीन को विश्व स्तर पर अपने नैरेटिव अर्थात आख्यान को आगे बढ़ाना चाहिए. इस इश्यू ब्रीफ़ में चीन की शार्प पॉवर रणनीति पर चर्चा करते हुए यह बताया गया है कि इसके परिणामस्वरूप अन्य देश कैसे इसका प्रतिरोध करने में जुट गए हैं.

China’s sharp power: दुनिया की धार को करेगी कुंद या होगा ये वैश्विक जागरण का पल?

एट्रीब्यूशन: कल्पित ए. मानकिकर, ‘‘चीन की शार्प पॉवर: दुनिया की धार को करेगी कुंद या होगा ये वैश्विक जागरण का पल?’’ओआरएफ़ इश्यू ब्रीफ नं. 585, अक्टूबर 2022, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन.


प्रस्तावना 

अपनी स्थापना के बाद से ही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) का ध्यान, देश और विदेश में अपनी वैधता को साबित करने की जद्दोजहद पर ही केंद्रीत रहा है. शुरुआात में, सीसीपी ने वैचारिक रूप से उसको लेकर प्रतिबद्ध सहानुभूति रखने वालों के माध्यम से यह संदेश वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाया. 2012 में शी जिनपिंग के सत्तारुढ़ होते ही सीसीपी के सिपाहियों में यह धारणा बढ़ने लगी कि अब चीन की कहानी को विश्व की कहानी[1]बनाने का वक्त आ गया है. लेकिन पार्टी के भीतर ही कुछ लोगों का यह भी मानना है कि 1970 के दशक के उत्तरार्ध में चीन की प्रगति में सहायता करने वाला बाहरी माहौल अब उसके खिलाफ़ होता जा रहा है. यह बात सरकारी मीडिया में ‘चीन विरोधी’ शब्द के बार-बार उल्लेख की वजह से स्पष्ट हो जाती है.

शी के उत्थान का असर यह भी हुआ कि चीन ने अब देंग शियाओ पिंग की उस सलाह पर चलना छोड़ दिया है जिसमें कहा गया था कि अधिक आक्रामक होकर फैन्फा यूवेई (उपलब्धि के प्रयास करना) के लिए ताओ गुआंग यांग हुई (लो प्रोफाइल बनाए रखना अर्थात ज्यादा चर्चा में न आना) अपनाए रखना आवश्यक होता है. इसे हासिल करने के लिए ही चीन अपनी शार्प पॉवर अर्थात एक देश की सांस्कृतिक, शैक्षणिक व्यवस्था और मीडिया बर्ताव में तिकड़म का उपयोग करते हुए परिवर्तन की कोशिश करते हुए दूसरे देश को प्रभावित करने का प्रयास करता है. इसके तहत वह वैश्विक स्तर पर अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाने, भ्रम फैलाने और वहां के राजनीतिक माहौल को बिगाड़ने की कोशिश करता है. 2021 में चीन के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर पहुंच जाने की वजह से अब सीसीपी के पास न केवल आत्मविश्वास है, बल्कि बाज़ार की ताकत भी आ गई हैं. इनके दम पर वह अन्य देशों के लिए एक चुनौती बन गया है.

शी के उत्थान का असर यह भी हुआ कि चीन ने अब देंग शियाओ पिंग की उस सलाह पर चलना छोड़ दिया है जिसमें कहा गया था कि अधिक आक्रामक होकर फैन्फा यूवेई के लिए ताओ गुआंग यांग हुई अपनाए रखना आवश्यक होता है. इसे हासिल करने के लिए ही चीन अपनी शार्प पॉवर अर्थात एक देश की सांस्कृतिक, शैक्षणिक व्यवस्था और मीडिया बर्ताव में तिकड़म का उपयोग करते हुए परिवर्तन की कोशिश करते हुए दूसरे देश को प्रभावित करने का प्रयास करता है.

कम्युनिस्ट दलों के उत्थान के साथ-साथ ही शार्प पॉवर की अवधारणा का भी उदय हुआ. 1917 की रूसी क्रांति के दौरान सोवियत नेता व्लादिमीर लेनिन ने एक ‘संयुक्तमोर्चे’ का ढांचा प्रस्तावित किया था. इसमें यह कहा गया था कि यदि कम्युनिस्ट आंदोलन को बड़ी शक्तियों के हाथ से सत्ता हथियाने के लिए उनके साथ ही सामरिक समझौते करने होंगे.[2]उदाहरण के तौर पर लेनिन ने रूसी साम्राज्य से लड़ने वाले जर्मनी से ही सहायता स्वीकार करते हुए इसे कार्यान्वित किया.[3]1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चीन के गठन के बाद, संयुक्त मोर्चे की अवधारणा का उपयोग सीसीपी के बाहरी और अंदरुनी दुश्मनों से निपटने के लिए किया गया. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बाहरी दुनिया की सोच, चीनी सत्तारुढ़ दल के हितों के अनुरूप ही रहें.[4]नतीजतन, सीसीपी नेतृत्व को तेज़ शक्ति के माध्यम ‘संदेश का प्रबंधन’ करते हुए घर और अन्य जगहों पर सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करना पड़ा.

शार्प पॉवर को एक ऐसा उपकरण समझा जा सकता है, जिसका उपयोग करते हुए दबंग अथवा सत्तावादी सरकार धुर्तता से ‘‘संस्कृति, शिक्षा प्रणालियों और मीडिया का सह-चयन’’ करते हैं.[5]चीन की शक्ति में वृद्धि – यह दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश होने के साथ-साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी है – के परिणामस्वरूप अब उसके पास दूसरे देशों के बर्ताव में परिवर्तन लाने की क्षमता भी मौजूद है.[6]शीत युद्ध के दौरान, जब अमेरिका और सोवियत संघ अन्य देशों में अपना प्रभाव फैलाने की होड़ में लगे हुए थे, राजनीतिक वैज्ञानिक जोसेफ नाइ ने कहा था कि अमेरिका को इस युद्ध में उसकी राजनीतिक व्यवस्था (लोकतंत्र) और अपने सांस्कृतिक उत्पादों के आकर्षण (जैसे हॉलीवुड और फास्ट फूड) के कारण बढ़त मिली है.[7]लेकिन अब चीन और अमेरिका के बीच चल रहे तनावों के बीच कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के पास ऐसे सांस्कृतिक उत्पाद नहीं हैं, जो दुनिया के अन्य क्षेत्रों को आकर्षित करें.[8]नतीजतन, चीन वैश्विक प्रभाव जमाने की राह में अपनी इस खामी की भरपाई शार्प पॉवर का उपयोग करके कर रहा है. शार्प पॉवर का उपयोग कर स्वतंत्र संस्थानों को प्रभावित करने के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कम करते हुए दूसरे देशों में राजनीतिक माहौल को विकृत किया जा सकता है.[9]

चीनी शार्प पॉवर के विकास की खोज

चीन के शार्प पॉवर दृष्टिकोण को वहां के शासन की वैधता से संबंधित मुद्दों और सीसीपी की विकास प्राथमिकताओं ने गढ़ा है. उदाहरण के तौर पर चीनी गृह युद्ध (1930 और 1940 के दशकों का) के दौरान माओ झेडॉन्ग (माओ से-तुंग) ने एडगर स्नो, अन्ना लुइस स्ट्रॉन्ग और एग्नेस समेडली([1]a)जैसे अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों को अपने हक में करते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी पार्टी के संदेश को पहुंचाया था. माओ ने इन विदेशी लेखकों जैसे अन्य लेखकों के लिए निर्देशित यात्राओं का प्रबंध किया. इसी वजह से सीसीपी अपने प्रतिद्वंद्वियों, चियांग काई-शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादियों की पार्टी के सीसीपी को बदनाम करने के प्रयासों पर काबू पाने में सफल हुई थी.[10]

अपनी किताब ‘रेड स्टार ओवर चाइना’, में स्नो ने माओ को अनेक साक्षात्कारों की श्रृंखला के माध्यम से अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के समान दर्शाने की कोशिश की थी.[11]अमेरिकी मान्यताओं को ध्यान रखते हुए यह भी बताने की कोशिश की गई थी कि माओ ‘मानवाधिकारों में विश्वास’ करने वालों में शामिल थे.[12]इस तरह सीसीपी ने वैश्विक स्तर पर अपने संदेश को विदेशी लोगों की सहायता करते हुए चालाकी से प्रचारित करने में सफलता हासिल की थी. इससे भी अहम था जब न तो अमेरिका और चीन के संबंध अच्छे थे और न ही अमेरिका ने वहां सीसीपी की सत्ता को मान्यता दी थी, माओ की एक मिलनसार नेता वाली छवि इन प्रयासों की वजह से गढ़ी गई थी.

देंग शियाओ पिंग के युग के दौरान (1970 के उत्तरार्ध में जब सीसीपी के शासन को दी गई मान्यता की वजह से चीन और अमेरिका के बीच संबंध सामान्य होने लगे थे), शार्प पॉवर नीति ने अपना ध्यान चीन की तकनीकी घाटे को दूर करने पर लगाना शुरू कर दिया. उसने ऐसा वु वेई की ऐतिहासिक अवधारणा को अपनाते हुए किया था. हडसन इन्स्टीट्यूट के सेंटर ऑन चाइनीज स्ट्रैटेजी के निदेशक माइकल पिल्सबरी के अनुसार इस अवधारणा में अपना काम दूसरों से करवाने की नीति अपनाई जाती थी.[13]देंग ने प्रौद्योगिकी को सबसे महत्वपूर्ण घटक करार दिया था, जो आर्थिक विकास को गति प्रदान करेगा. ऐसे में चीन के लिए अमेरिकी ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक हो गया था.[14]उस समय, अमेरिका ने चीन को परिष्कृत प्रौद्योगिकी के निर्यात और दोनों देशों के वैज्ञानिक समुदायों के बीच किसी भी प्रकार के आदान-प्रदान पर रोक लगा रखी थी. देंग ने चीन के जनवादी गणराज्य के साथ विद्वानों के संचार पर अमेरिकी समिति के एक प्रतिनिधिमंडल पर इस बात के लिए ज़ोर डाला(b[2]) कि अकादमिक क्षेत्र में सहयोग को पुनर्जीवित करने से दोनों देशों के बीच गतिरोध टूट जाएगा. देंग की इन कोशिशों को अमेरिका में जिमी कार्टर प्रशासन ने स्वीकार कर लिया. क्योंकि कार्टर प्रशासन का मानना था कि द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य होने के बाद चीन-अमेरिकी सहयोग को मज़बूत भी किया जाए.[15]देंग ने चीनी छात्रों को इंजीनियरिंग और भौतिक विज्ञान से संबंधित अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अकादमिक पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिए इसे लेकर औपचारिक समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए.(c[3]) ऐसा होने से यह सुनिश्चित हुआ कि अमेरिका की ओर से चीनी वैज्ञानिकों को वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी जानकारी प्रदान की जाएगी.[16]

1989 में अधिक लोकतांत्रिक सुधार की मांग करने वाले छात्रों पर थियानमेन स्क्वेयर की कार्रवाई और बाद में चीन को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए हंगामे और इसके कारण लगे प्रतिबंधों की वजह से सीसीपी को शार्प पॉवर रणनीति में बदलाव लाना पड़ा. शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ को लेकर बढ़े वैमनस्य की वजह से चीन और अमेरिका की नजदीकियां बढ़ी. लेकिन इसी कारण अमेरिका और चीन के बीच सहयोग को लेकर सबसे अहम कारण भी ख़त्म हो गया था.[17]इस परिप्रेक्ष्य में, चीन ने इस कथन को बढ़ावा देना शुरू दिया कि वह एक ‘ज़िम्मेदार शक्ति’ है, जो अपने अलगाव को खत्म करने के लिए आर्थिक कूटनीति का उपयोग करती हैं. इसका सबूत था कि चीन अब अपने आसपास के पश्चिम समर्थक देशों, जैसे इंडोनेशिया (1990), सिंगापुर (1990), और दक्षिण कोरिया (1992) के साथ राजनायिक संबंधों को स्थापित करने या उन्हें पुनर्जीवित करने में जुट गया था.[18]कुवैत पर इराक़ के हमले (1990) के बाद उपजे पश्चिम एशियाई संकट से ठीक पहले चीन ने एक कूटनीतिक पहल शुरू की, चीन ने तत्कालीन विदेश मंत्री कियान कीचेन ने मुख्य क्षेत्रीय शक्तियों (सऊदी अरब, मिस्त्र और जॉर्डन) के नेताओं से मुलाकात की, ताकि एक शांतिपूर्ण समझौता संभव हो सके.[19] 1992 में देंग ने चीन में ‘दक्षिणी दौरा’ शुरू करते हुए आर्थिक सुधारों, जो 1989 से ठंडे बस्ते में चले गए थे, की वकालत की. ताकि इन सुधारों के चलते विदेशी निवेशकों को लुभाकर अपने बाजारों के आकार और लोगों के जीवन स्तर में सुधार का लाभ उठाया सके. इस तरह, थियानमेन कार्रवाई के बाद शुरू हुए ‘‘आक्रोश के क्रमिक डीसेंसिटाइजेशन अर्थात असंवेदनीकरण’’ पर काम करने की सीसीपी ने शुरुआत की.[20]

1989 में अधिक लोकतांत्रिक सुधार की मांग करने वाले छात्रों पर थियानमेन स्क्वेयर की कार्रवाई और बाद में चीन को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए हंगामे और इसके कारण लगे प्रतिबंधों की वजह से सीसीपी को शार्प पॉवर रणनीति में बदलाव लाना पड़ा. शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ को लेकर बढ़े वैमनस्य की वजह से चीन और अमेरिका की नजदीकियां बढ़ी. लेकिन इसी कारण अमेरिका और चीन के बीच सहयोग को लेकर सबसे अहम कारण भी ख़त्म हो गया था.

सन् 2000 में जब चीन की आर्थिक रफ्तार और उसके पथ को लेकर कुछ विदेशी हलकों में निराशा के स्वर उभरने लगे तो सीसीपी ने चीन की छवि को चमकाने और वैश्विक स्तर पर अपने बारे में चल रही चर्चाओं को प्रभावित करने की कोशिश शुरू कर दी.  2003 में सीसीपी के विचारक झेंग बीजियन ने चीन की ‘शांतिपूर्ण उत्थान ‘ (हेपिंग जुएकी) की धरना को आगे किया. इसने वैश्विक स्तर पर चिंता को और भी बढ़ा दिया. ऐसे में क्षति नियंत्रण के लिए राष्ट्रपति हू जिनताओ ने  ‘सामंजस्यपूर्ण विश्व’ (हेक्सी शिजिए) और ‘शांतिपूर्ण विकास’ (हेपिंग फाज़ान) के नारे को आगे बढ़ाया. सन् 2007 में जब हू ने पार्टी की 17 वीं कांग्रेस को संबोधित किया तो पार्टी के शब्दकोश में ‘सॉफ्ट पॉवर’ अर्थात ‘सौम्य शक्ति’ का प्रवेश हुआ.[21] 2004 में चीन ने पुटोंगहुआ (मेनलैंड पर बोली जानेवाली मैंडरिन) और चीनी संस्कृति को बढ़ावा देने का अभियान चलाने के लिए विदेशों में कन्फ्यूशियस सेंटर्स खोले. इसे शार्प पॉवर अर्थात तीक्ष्ण शक्ति के उपयोग में  सीसीपी के इतिहास में एक मील का पत्थर कहा जाता हैं. इन सेंटर्स को फ्रेंच एलायंस फ्रेंचाइज़ी पर आधारित किया गया था. सीसीपी ने इन्हें विश्वविद्यालयीन शिक्षा के हृदय स्थल में रखते हुए अकादमिक प्रतिष्ठानों पर अपना वर्चस्व बनाते हुए अपना फायदा देखा. इन केंद्रों को सॉफ्ट पॉवर का उपकरण बताया गया, लेकिन ये सेंटर्स सीपीपी की शार्प पॉवर स्ट्रैटजी का अहम हिस्सा थे. तत्कालीन पोलित ब्यूरो के सदस्य ली चंगचुन इन्हें ‘चीन के विदेशी प्रोपेगंडा अर्थात प्रचार सेटअप’ का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते थे.[22] उल्लेखनीय है कि इन सेंटर्स में ताइवान, तिब्बत और थियानमेन घटना पर चर्चा करना गैरकानूनी था. इनके कर्मचारियों को 1992 में स्थापित किए गए फालुन गोंग में शामिल होने की अनुमति नहीं थी. फालुन गोंग एक सांस्कृतिक अभियान है जो चाइनीज किगोंग (गहरी सांस लेने की एक प्रणाली) से प्रेरणा लेता है, लेकिन इसे चीन ने अपनी धरती पर प्रतिबंधित कर रखा है.[23]खैर, इन सेंटर्स की स्थापना, चीन की सामरिक सोच में एक अहम मंथन को उजागर करती है.काफी लंबे समय से कैंपस क्रांतिकारियों और शिक्षाविदों ने समान रूप से माओ को पूजा था.लेकिन चीनी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कन्फ्यूशियस के नाम का ब्रांड बनाना यह साबित करता था कि सीसीपी ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि कम्युनिज्म़ अर्थात साम्यवाद का आकर्षण अब घट रहा है.[24]इसका कारण यह था कि किसी वक्त़ में सीसीपी ने कन्फ्यूशियस को ही चीन की सारी समस्याओं की जड़ बताया था.

हाल के वर्षो में चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा है. अब यह तनाव आर्थिक और मानव अधिकार के क्षेत्र में भी दिखाई देने लगा है. उदाहरण के तौर पर चीन के शिनजियांग प्रांत में वीगर मुस्लिमों के कथित मानवाधिकार हनन को लेकर वहां के कुछ बड़े आपूर्तिकर्ताओं पर 2020 से यूएस को सामान बेचने पर रोक लगी हुई है.[25]दरअसल, अमेरिका और कई अन्य पश्चिमी देशों ने चीन के अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर किए जा रहे व्यवहार को नरसंहार करार दिया है.[26]

अपने आर्थिक और अन्य हितों के प्रभावित होने की वजह सेसीसीपीअब अपने दृष्टिकोण से चीन की छवि को चित्रित करने के लिए ‘एडगर स्नो’ के सांचे का इस्तेमाल करना चाहता है. चीन के सरकारी मीडिया ने ट्वीट किया था, ‘‘चीन को एडगर स्नो जैसे और लोगों की ज़रूरत हैं, जिन्होंने चेयरमैन माओ का साक्षात्कार लेकर चीन के कम्युनिस्ट आंदोलन को दुनिया के सामने पेश किया था.’’[27]अपने संबद्ध मीडिया की तर्ज पर ही चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने भी ट्वीट किया कि ‘‘चीन को उम्मीद है कि वह इस नए युग में काम कर रहे विदेशी पत्रकारों में एडगर स्नो जैसे कई और लोगों को देखेगा और चीन उनका स्वागत भी करेगा.’’[28]

सीसीपी की दृष्टि से, स्नो विशेष रूप से बेशकीमती है, क्योंकि एक विदेशी होने के बावजूद, स्नो पार्टी की आलोचना कम ही करते थे. इसके अलावा उन्होंने विदेशों में चीन के बारे में सकारात्मक संदेशों को बढ़ावा भी दिया था. इतना ही नहीं स्नो को, चीन में लाओ पेंगयु (पुराने मित्र) के रूप में देखा जाता है. यह बात सीसीपी के विश्व में अपने ‘मित्रों’ को देखने के दृष्टिकोण के साथ मेल खाती है, क्योंकि सीसीपी के अनुसार उसके हितों का समर्थन करने वाले ‘मित्र’ है, जबकि इसके विरोध में खड़े होने वाले लोग सीसीपी के हिसाब से ‘दुश्मन’ होते है.[29]यह दृष्टिकोण सीसीपी के इस विश्वास से उपजता है कि वह एक पार्टी की तानाशाही अर्थात वर्चस्व है, जिसे अपने सभी आंतरिक और बाहरी विरोधों को समाप्त करना चाहिए.[30]

सीसीपी का मानना है कि उसे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को अपना दृष्टिकोण समझाने में माहिर होना चाहिए. द ‘चाइना स्टोरी’ की अवधारणा 2012 में शी के सत्तारुढ़ होने के बाद उभरी है. सीसीपी ने 2013 में हुए अपनी राष्ट्रीय प्रचार और वैचारिक कार्य सम्मेलन में इस पर चर्चा की थी. इसके बाद ही उसने अपने हुयुक्वान (प्रवचन शक्ति) के माध्यम से वैश्विक असंतुलन को दूर करने का इरादा बना लिया.[31]चीनी संपन्न वर्ग में इस बात लेकर शिकायत के स्वर सुनाई देते हैं कि उसकी प्रचार क्षमता में कमी का लाभ पश्चिमी देशों को मिलता है और इस वजह से वैश्विक स्तर पर चीन के हित प्रभावित होते हैं. इसी धारणा का समर्थन करते हुए शी ने अपने कैडर्स को मज़बूती के साथ द ‘चाइना स्टोरी’ को दुनिया के सामने रखने के लिए, राष्ट्रीय क्षमता विकसित करने को कहा. ताकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले प्रचार की शक्ति, चीन के समग्र राष्ट्रीय शक्ति के अनुरूप बन सके.

कोविड-19 की महामारी और उसके परिणामस्वरूप चीन के अलगाव के कारण अब सीसीपी में अपनी कहानी अर्थात स्टोरी को और भी मज़बूती से दुनिया के सामने रखने की इच्छा दिखाई दे रही है. इसे सीसीपी के अधिकृत अख़बार, पीपुल्स डेली में फैनहुआ (चीन विरोधी) शब्द के बढ़ते हुए उपयोग से साफ़ देखा जा सकता है. अकेले 2020 में ही इस शब्द का उपयोग 80 बार किया गया है. यह इसके पहले के वर्षो की तुलना में कहीं ज्य़ादा है.

चित्र1: 2013 और 2020 के बीच पीपुल्स डेली में चीन विरोधी शब्द का उल्लेख

स्त्रोत: चीन मीडिया प्रोजेक्ट[32]

कोविड-19 महामारी के दौरान एशिया, यूरोप एवं उत्तर अमेरिकी देशों में चीन को लेकर ‘नकारात्मक पर्सेप्शन’ अर्थात नकारात्मक समझ में वृद्धि हुई,[33]

इसके साथ ही अमेरिका के साथ संबंधों में भी गिरावट आने से सीसीपी को बढ़ते हुए ख़तरे का अहसास होने लगा, (d[4])और अब वह अपने दृष्टिकोण को तेज़ीसे बढ़ावा देकर इस मुद्दे से निपटने को लेकर काफी उत्सुक है.

शार्प पॉवर पर कार्यान्वयन 

सीसीपी की शार्प पॉवर रणनीति में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगाने के लिए और वैश्विक स्तर पर पार्टी के दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए विदेशों में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों का उपयोग किया जा रहा है. इसके अलावा वह वहां के संपन्न वर्ग और बहुसदस्यीय संगठनों में घुसपैठ करते हुए राजनीतिक माहौल को भी विकृत अथवा खराब करने की कोशिश करना चाहती है.

पार्टी के संस्थान

सीसीपी का अंतर्राष्ट्रीय संपर्क विभाग अर्थात इंटरनेशनल लायसन डिपार्टमेंट (आईएलडी) और संयुक्त मोर्चा कार्य विभाग अर्थात यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (यूएफडब्ल्यूडी) चीन की शार्प पॉवर रणनीति के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने में अग्र स्थान पर हैं.

आईएलडी, जो सीसीपी और विदेशी राजनीतिक दलों के बीच संबंध बनाए रखता है, का गठन 1951 में किया गया था. शुरूआत में यह पूर्वी यूरोप में केवल समविचारी और बिरादराना दलों के साथ ही बातचीत करता था. 1955 में बांडुंग सम्मेलन हुआ, जिसका उद्देश्य एशियाई और अफ्रीकी देशों के बीच अधिक सहयोग को बढ़ावा देना था. इस सम्मेलन के बाद अफ्रीका और पश्चिम एशिया में समाजवादी पार्टियों के साथ संबंध विकिसत करने के लिए आईएलडी ने अपनी पहुंच का विस्तार किया.[34]आईएलडी का लक्ष्य क्रांति का निर्यात करने से आगे बढ़ते हुए चीन के पक्ष में वैश्विक सहमति बनाने में योगदान करने तक पहुंच गया.आईएलडी का वर्तमान उद्देश्य विदेशी राजनीतिक दलों के साथ नए गठबंधन बनाकर सीसीपी को विदेशों में अपनी विवादास्पद तर्क शक्ति को बढ़ाने का अवसर उपलब्ध करवाना है.[35]यह ‘‘चीनी विशेषताओं वाली पार्टी कूटनीति’’ विदेशी राजनीतिक दलों को ‘‘चीनी मूल्यों और हितों को समझने और उनका सम्मान करने’’ के लिए प्रोत्साहित करने के लिए है.[36]यह विदेशों में पार्टी की सकारात्मक छवि फैलाने के लिए एक माध्यम के रूप में कार्य करता है.[37]

यूएफडब्ल्यूडी अपना नाम संयुक्त मोर्चा की अवधारणा से लेता है, जो कम्युनिस्ट पार्टी के एजेंडे को क्रियान्वित करते समय या उसके हित में अस्थायी रूप से एक सामरिक समझौते की वकालत करता है.[38]माओ ने यूएफडब्ल्यूडी की स्थापना सीसीपी के राजनीतिक एजेंडे को क्रियान्वित करने के लिए विदेश में एक अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए की थी. माओ इस यूनिट को ‘जादुई हथियार’ बताते थे.[39]

हाल के वर्षों में चीनी लोगों के दूसरे देशों में स्थानांतरण होने के कारण यूएफडब्ल्यूडी के उद्देश्य भी विकसित हुए हैं. 2015 में, यूएफडब्ल्यूडी को सीसीपी के निर्देश में कहा गया था कि उसका मिशन विदेशों में रहने वाले चीनी लोगों का मार्गदर्शन करना है,[40]सीसीपी के हितों की वकालत करने और शासन के विरोधियों को हाशिए पर रखने के लिए विदेश में रहने वाले चीनी समुदायों को लामबंद करना है.[41] यूएफडब्ल्यूडी विदेश में रहने वाले चीनी नागरिकों के साथ रिश्तेदारी की भावना को रेखांकित करना चाहता है ताकि सीसीपी के लिए राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए उनमें वफादारी की भावना पैदा की जा सके.[42]

विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों को विभिन्न श्रेणियों में बांटा गया है. जैसे हॉन्ग-कॉन्ग, मकाउ और ताइवान के जो नागरिक विदेश में रहते हैं उन्हें हुआक्वियो कहा जाता हैं. हुआरेन, उन लोगों को कहा जाता हैं जिन्होंने अपने चीनी पासपोर्ट को त्याग दिया है और वे जिस देश में रहते हैं उन्होंने वहाँ की नागरिकता ले ली है. इसके अलावा हुआई होते हैं जो चीनी वंश से आते हैं. शी का ‘सभी चीनी नागरिकों के लिए राष्ट्र का पुनरुत्थान’ का प्रस्ताव तथा ‘एक बड़े चीनी परिवार’ के दृष्टिकोण का अर्थ यह है कि राष्ट्रीयता के आधार पर होने वाला भेदभाव अब धुंधलाने लगा है.

कई चीनी लोग ऐसे पश्चिमी देशों में रहते हैं, जहाँ इन्हे चीन से ज्य़ादा स्वतंत्रता प्राप्त है. इन नागरिकों को वहां बग़ैर किसी रोक-टोक अथवा सेंसरशिप के जानकारी हासिल करने के अनेक स्त्रोत आसानी से उपलब्ध हैं. ऐसे में उन्हें सीसीपी की आलोचना और खामियों की जानकारी आसानी से मिलती रहती है. और वे यह जानकारी चीन की धरती पर रहने वाले अपने रिश्तेदारों तक पहुंचा सकते हैं. इसी वजह से सीसीपी विदेश में रहने वाले अपने नागरिकों पर भी नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, ताकि यह सत्तारुढ़ दल के लिए कोई खतरा न बन सकें और इन्हें एकत्रित करके इनका उपयोग अपने दृष्टिकोण और हितों की रक्षा के लिए किया जा सके.

विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों को विभिन्न श्रेणियों में बांटा गया है. जैसे हॉन्ग-कॉन्ग, मकाउ और ताइवान के जो नागरिक विदेश में रहते हैं उन्हें हुआक्वियो कहा जाता हैं. हुआरेन, उन लोगों को कहा जाता हैं जिन्होंने अपने चीनी पासपोर्ट को त्याग दिया है और वे जिस देश में रहते हैं उन्होंने वहाँ की नागरिकता ले ली है. इसके अलावा हुआई होते हैं जो चीनी वंश से आते हैं.[43]शी का ‘सभी चीनी नागरिकों के लिए राष्ट्र का पुनरुत्थान’ का प्रस्ताव तथा ‘एक बड़े चीनी परिवार’ के दृष्टिकोण का अर्थ यह है कि राष्ट्रीयता के आधार पर होने वाला भेदभाव अब धुंधलाने लगा है.[44]पीपल्स लिबरेशन आर्मी के एक जनरल की एक चाइनीज़ – अमेरिकन सर्विसमैन को लेकर की गई एक टिप्पणी से यह बात साफ हो जाती है. चीनी जनरल ने कहा था कि, “आपकी रगों में चीनी खून दौड़ रहा है…इस बात से कोई फर्क़ नहीं पड़ता है कि आप कौन सा झंडा अपने कंधों पर धारण करते हैं, आप सदैव और हमेशा चीनी ही रहेंगे.”[45]

युवाओं को बनायाहथियार

2015 से विदेशों में शिक्षा ग्रहण करने वाले चीनी युवाओं पर यूएफडबल्यूडी का ध्यान केंद्रित होने लगा है. शी का मानना है कि विश्वविद्यालयों की शिक्षा के केंद्र में विचारधारा और राजनीतिक कार्य ही होते हैं.[46]क्षेत्रीय अखंडता को लेकर चीन के दावे पर विदेशों में ज़ोर देने के लिए विदेशी छात्र समुदाय ही अनाधिकृत माध्यम अर्थात चैनल बन गए हैं. 2017 में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय में छात्रों के एक समूह ने वहाँ के एक लेक्चरर को एक ऐसा नक्शा इस्तेमाल करने के लिए माफी मांगने पर मजबूर कर दिया था, क्योंकि उस नक्शे में भारत – भूटान – चीन के तिराहे पर क्षेत्रीय अखंडता को लेकर भारत के दावे का पक्ष लिया गया था. इस घटना को चीनी मीडिया में काफी कवरेज दिया गया था. एक चीनी अखबार ने तो यहां तक दावा कर दिया था कि चीन ने अपने सीमा विवाद को लेकर भारत पर ऑस्ट्रेलिया की धरती पर जीत दर्ज की थी.[47]उसी वर्ष यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो में चीनी छात्रों ने तिब्बती आध्यात्मिक गुरू दलाई लामा को यूनिवर्सिटी की ओर से भेजा गया न्यौता वापस लेने की मांग को लेकर अभियान चलाया था.

इसी प्रकार, 2019 में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में मार्क वॉलिंगर के एक आर्ट वर्क, जिसमें ताइवान को एक सार्वभौमिक राष्ट्र दर्शाया गया था, को लेकर चीनी छात्रों का गुस्सा भड़क उठा था.[48]प्रदर्शनकारी छात्रों का मानना था कि यह संस्था ताइवानी राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन की मातृ संस्था हैं अतः यह आर्ट वर्क उनकी धारणा को आगे बढ़ाने के लिए ही स्थापित किया जा रहा है. इन छात्रों का यह दावा था कि त्साई इंग-वेन ताइवान की आजादी के समर्थक हैं. दूसरी ओर कैंपस अधिकारियों को ज्ञापन सौंपने वाले छात्रों का कहना था कि अधिकारी चीन के हितों को बनाए रखने के लिए बाध्य हैं. ऐसे में, विदेशों में रहने वाले चीनी छात्रों का समुदाय औरविश्वविद्यालयों के कन्फ्यूशियस सेंटर्स चीनी कथा को बढ़ावा देने वाले पिन्सर अभियानकासाधन अथवा माध्यम बने हुए हैं.

इस रणनीति की साफ दिखाई देने वाली सफलता से चीनी प्रशासन को अपने राजनयिक दूतवर्ग के माध्यम से एकेडमिक लड़ाई का हिस्सा बनने का दुस्साहस करने की हिम्मत मिली हैं. उदाहरण के तौर पर 2017 में जब ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यू कैसल के एक लेक्चरर ने हॉन्गकॉन्ग और ताइवान को देश के रूप में सूचीबद्ध किया तो वहां के चीनी दूतावास ने इसकी शिकायत विश्वविद्यालय से की थी.[49]अतः सीसीपी, अपने छात्रों और विदेशों में स्थित कन्फ्यूशियस सेंटर्स के माध्यम से यह बताने में सफल हो जाती है कि क्षेत्रीय अखंडता को लेकर दूसरे देशों का दावा कोई मायने नहीं रखता. ऐसा करते हुए वह दूसरी सरकारों पर अपना ही वैश्विक दृष्टिकोण थोपने का दबाव बनाती है.

संभ्रात अथवाकुलीन ट्रोजन हॉर्स

सीसीपी का यह प्रयास है कि वैश्विक समुदाय उसकी कथा में विश्वास करें. उसकी यह कोशिश काफी हद तक उसके संभ्रात अथवा कुलीन वर्ग के सामाजिककरण पर निर्भर करती है. ऊपर बताए गए ‘बॉटम-अप अप्रोच’ के अलावा, चीन विदेशों में एक अनुकूल राजनीतिक माहौल बनाने के लिए ‘टॉप-डाउन अप्रोच’ का भी प्रयास कर रहा है.[50]यह दोतरफ़ा हुआरेन कैनझेंग रणनीति (विदेशी राजनीति में चीनी भागीदारी)-विदेशों में अभिजात वर्ग को प्रभावित करना और प्रवासी लोगों को सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने के माध्यम से किया जाता है. उदाहरण के तौर पर, 2017 में, ऑस्ट्रेलियाई राजनेता सैम दस्त्यारी को राजनीतिक पद छोड़ना पड़ा था. दरअसल जब यह बात उजागर हुई कि उन्होंने दक्षिण चीन सागर पर अंतर्राष्ट्रीय अदालत के फैसलों का पालन करने से चीनी सरकार के इंकार का समर्थन करने के लिए सीसीपी से जुड़ी हुई एक चीनी फर्म से पैसा स्वीकार किया था, तो उन्हें अपना पद गंवाना पड़ा.[51]परिणामस्वरूप, सीसीपी से संबंध रखने वाले राजनीतिक पैरवीकार हुआंग जियांगमो का, ऑस्ट्रेलिया में स्थायी निवास रद्द कर, ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीयता के लिए उनके आवेदन को ठुकरा दिया गया.[52]ऑस्ट्रेलिया से ही जुड़े एक अन्य मामले में लिबरल पार्टी के सदस्य बो झाओ ने दावा किया कि उन्हें 2018 में चीनी एजेंटों ने संघीय संसद का चुनाव लड़ने के लिए नगदी देने की पेशकश की थी. मार्च 2019 में मेलबर्न के एक होटल के कमरे में वे मृत पाए गए थे.[53]

लोकतंत्र में राजनीति की प्रकृति ऐसी है कि यहां विभिन्न राजनीतिक दल सत्ता में आ सकते हैं या फिर विपक्ष की भूमिका अदा कर सकते हैं. ऐसे में सीसीपी ने हमेशा ही सभी पक्षों के साथ संबंध बनाने में अपना भला देखा है. यह कहा गया था कि ब्रिटेन में 2022 में एक ब्रिटिश-चीनी नागरिक क्रिस्टिन चिंग कुई ली के स्वामित्व वाली एक लॉ फर्म, लेबर पार्टी के सांसद बैरी गार्डिनर के कार्यालय को पैसा दे रही थी. इसी दौरान ब्रिटिश सरकार के सबसे अहम कार्यालय वेस्टमिनिस्टर में गार्डिनर के कार्यालय ने उनके (गार्डिनर) बेटे को ही उनकी नियुक्तियों अर्थात अप्वाइंटमेंट्स का प्रबंधन करने के लिए नियुक्त कर दिया था.[54]ली की फर्म, लंदन में चीनी दूतावास को कानूनी सलाह देती है. और इस फर्म ने ब्रिटिश सरकार के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विभाग के लिए भी काम किया है. कहा जाता है कि पिछले कुछ वर्षों से ब्रिटिश सार्वजनिक जीवन में सक्रिय ली को कथित तौर पर वेस्टमिनिस्टर के कुलीन वर्ग से संबंध बनाने की ज़िम्मेदारी मिली हुई है.

2019 में उन्हें चीन-यूके संबंधों में उनके योगदान के लिए पूर्व प्रधानमंत्री थेरेसा मे के कार्यकाल में एक पुरस्कार भी दिया गया था. चीनी मूल के यूके के नागरिकों को स्थानीय राजनीति में अधिक सक्रिय होने के लिए संगठित करने में भी ली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.[55]यहां उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन की प्रति-खुफिया एजेंसी, एमआई5, ने राजनीतिक प्रतिष्ठान को चेतावनी दी थी कि ली सीसीपी के यूएफडबल्यूडी के इशारे पर काम कर रहे थे, ताकि ब्रिटिश राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए राजनीतिक हल्कों में सार्वजनिक रूप से महत्वपूर्ण लोगों तक अपनी पहुंच बना सकें. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि यूके का राजनीतिक परिदृश्य “सीसीपी के एजेंडा के अनुकूल है.”[56]

चीन का ‘टॉप-डाउन अप्रोच’ इस बात में भी दिखाई देता है कि धारणाओं को आकार देने वाले अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से पार्टी-सरकार कैसे बातचीत करती हैं. उदाहरण के लिए, अमेरिका और भारत जैसे देशों के चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के विरोध के कारण चीन अब अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय निकायों का उपयोग करने के लिए प्रेरित हो रहा है.

चीन ने एक ओर जहां विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों को राजनीतिक जीवन में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया है, वहीं ‘चाइना स्टोरी’ में सेंध लगाने वालों से वह सावधान भी रहता है.मार्च 2022 में, यूएस जस्टिस डिपार्टमेंट अर्थात अमेरिकी न्याय विभाग ने चीन पर आरोप लगाया कि चीन ने निजी जासूस का उपयोग करते हुए प्रतिनिधि सभा में न्यूयॉर्क सीट से डेमोक्रेटिक पार्टी का नामांकन पाने की कोशिश कर रहे चीनी नस्ल के एक राजनेता को फंसाने की कोशिश की है.[57]1989 के थियानमेन प्रदर्शनों में शामिल यान जिओंग अमेरिकी सेना में भी सेवा दे चुके हैं. अमेरिका में उनका राजनीतिक उदय इस संभावना को पैदा करता है कि एक सजातीय चीनी के द्वारा ही सीसीपी के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठाया जा रहा है. इस आशंका से सीसीपी घबरा जाती है.

चीन का ‘टॉप-डाउन अप्रोच’ इस बात में भी दिखाई देता है कि धारणाओं को आकार देने वाले अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से पार्टी-सरकार कैसे बातचीत करती हैं. उदाहरण के लिए, अमेरिका और भारत जैसे देशों के चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के विरोध के कारण चीन अब अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय निकायों का उपयोग करने के लिए प्रेरित हो रहा है.2016 में, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (डीईएसए) ने एक चीनी अर्थशास्त्री के अध्ययन को प्रकाशित किया गया था. इसमें यह दिखाया गया था कि कैसे बीआरआई, संयुक्त राष्ट्र को उसके दीर्घकालीन विकास लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक साबित हो रहा है.[58]  इसके अतिरिक्त, उस समय डीईएसए के शीर्षस्थ अधिकारी वू होंगबो ने एक चीनी राज्य-संबद्ध मीडिया संगठन को दिए साक्षात्कार में कहा था कि इंटरनेशनल ब्यूरोक्रेसी अर्थात अंतर्राष्ट्रीय नौकरशाही में काम करने वाले चीनी नागरिकों को देश के हितों की रक्षा करने के लिए बाध्य होना चाहिए.[59]कहा जाता है कि वू ने ही विश्व वीगर कांग्रेस के अध्यक्ष डोल्कम ईसा को संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर आने से रोकने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया था.[60]

आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन

सीसीपी, ने दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में चीन की स्थिति का उपयोग बार-बार अपने हितों को नुकसान पहुंचाने वाली जानकारी को रोकने के साथ अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया है. चीनी निजी प्रतिष्ठान भी इसमें, सीसीपी की सहायता करते हैं. उदाहरण के लिए, 2019 में, जब एक अमेरिकी पेशेवर बास्केटबॉल टीम ह्यूस्टन रॉकेट्स, के एक वरिष्ठ कार्यकारी डेरिल मोरे ने हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों के समर्थन में ट्वीट किया – जिसे उन्होंने बाद में वापस ले लिया – तो नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन के सामने अपने सबसे बड़े बाजार (चीन) का एक बड़ा हिस्सा खोने का खतरा मंडरा रहा था.[61]चीनी दर्शकों को खोने की संभावना को रोकने और दर्शकों को नियंत्रित करने के साथ ही मुक्त भाषण के समर्थकों की नाराजगी से बचने के लिए, स्पोर्ट्स लीग ने कहा कि मोरे के ट्वीट ने चीन में लोगों को आहत तो किया है, लेकिन मोरे के पास भी अपने विचारों को व्यक्त करने का अधिकार है. हालांकि, साइनो वीबो (ट्विटर का चीनी समकक्ष) पर एक पोस्ट में, लीग ने कहा कि कार्यकारी मोरे की टिप्पणी अनुचित थी और लीग इसे लेकर बेहद निराश थी.[62]चीनी बास्केटबॉल एसोसिएशन और ह्यूस्टन में चीनी वाणिज्य दूतावास ने इस घटना की निंदा की. जबकि निजी प्रतिष्ठानों ने आलोचना का समर्थन किया.[63]इंटरनेट की दिग्गज कंपनी टेंसेंट ने चीन में ह्यूस्टन रॉकेट्स के खेलों की स्ट्रीमिंग अर्थात प्रसारण बंद कर दिया. चीनी स्पोर्ट्स किट कारोबारी ली निंग और कमर्शियल बैंक, शंघाई पुडोंग डेवलपमेंट बैंक ने घोषणा की कि वे टीम के साथ अपनी साझेदारी को स्थगित कर रहे हैं.[64]इस घटना का अन्य कॉर्पोरेट समूहों पर व्यापक असर हुआ. इस विवाद पर हंगामा चलता ही रहा. ऐसे में अमेरिकी स्पोर्ट्स चैनल ईएसपीएन ने निर्णय लिया कि वह अपने नेटवर्क के कवरेज से चीन और हॉन्गकॉन्ग के बारे में होने वाली राजनीतिक चर्चाओं को दरकिनार कर देगा. इतना ही नहीं, ईएसपीएन नेटवर्क ने ताइवान को चीन के हिस्से के रूप में दिखाने वाला नक्शा प्रसारित करने के साथ नक्शे पर, दक्षिण चीन सागर में चीन के विवादित दावों का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षेत्र को रेखांकित भी किया.[65] इस बात से साफ़ हो जाता है कि कैसे चीन की शार्प पॉवर का असर एक टार्गेटेड अर्थात लक्षित इकाई से परे जाकर होता है. दरअसल, आर्थिक खतरों का अंदेशा न होने के बावजूद ईएसपीएन ने चीनी प्रचार को आगे बढ़ाने का फैसला लिया था. इसे चीन की शार्प पॉवर का ही असर माना जा रहा था.

सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों (एसओई) के रूप में सीसीपी के पास जो आर्थिक शास्त्रागार मौजूद है, शायद ही कोई उसकी बराबरी कर सकता है. पार्टी के मालिकाना अधिकार वाली 50,000 से अधिक फर्म हैं, जिसकी वजह से लगभग 20 मिलियन लोगों को रोजगार उपलब्ध होता हैं. इनका सामूहिक मूल्य लगभग 29 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है.[66]‘गो आउट’ अर्थात बाहर जाओ नीति के तहत, एसओई को विदेशों में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था. और अब यह शार्प पॉवर को क्रियान्वित करने का महत्वपूर्ण साधन बनाकर उभरे हैं. जब सारी दुनिया 2021 में कोविड-19 का सामना कर रही थी, तब चीन ने ही अन्य देशों को टीके उपलब्ध कराने का बीड़ा उठाया. हालांकि जब टीकों की प्रभावशीलता पर संदेह उठाया गया, तो सीसीपी ने काफी मज़बूती के साथ इसका बचाव किया. फरवरी 2021 में ही चीन ने सिंगापुर को साइनोवैक खुराक की शीघ्रता से डिलीवरी भेज दी. जब सिंगापुर को यह खुराक भेजी गई तब तक टीकों को चीन में ही विनियामक अनुमोदन प्राप्त नहीं हुआ था.[67]इसे वैक्सीन को मंजूरी देने और चीनी निर्मित टीकाकरण की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए सिंगापुर पर कूटनीतिक दबाव डालने की रणनीति के रूप में देखा गया.

एक ओर जहां CCP अपने प्रचार-प्रसार के लिए वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करती है, वहीं ये चीन में रहने वाले नागरिकों को उपलब्ध ही नहीं होते. शंघाई पुलिस की एक इकाई ने मई 2021 में ट्विटर, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्ज़ी खातों के निर्माण के माध्यम से ‘जनमत प्रबंधन’ के लिए निजी ठेकेदारों की मांग की. बॉट जैसे ये नेटवर्क, लाइक और रिपोस्ट के माध्यम से सरकार के दृष्टिकोण का समर्थन दिखाने में सहायक साबित होते हैं.

इसी तरह, चीनी एसओई साइनोफार्म और पेरू के बीच समझौते के दस्तावेज़ों को हासिल करने वाले पेरू के पत्रकारों ने बताया कि जिन अधिकारियों को दवाओं की सुरक्षा और प्रभावकारिता की समीक्षा करने का काम सौंपा गया था, उन अधिकारियों को साइनोफार्म ने अतिरिक्त खुराक मुहैया करवाई थी, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया था.[68],[69]इनमें से कुछ अतिरिक्त खुराक ऐसे लोगों को मुहैया करवाई गई, जो जनता के लिए मंगवाई गई स्वीकृत वैक्सीन का ठेका देने की प्रक्रिया में शामिल थे. विशेष बात यह थी कि राजनीति और नौकरशाही के संपन्न लोगों को दी जाने वाली यह अतिरिक्त खुराक़ मुहैया करवाने की पेशकश, आधिकारिक वार्ता के ढांचे के भीतर ही हुई थी. यह लेवरेज अर्थात प्रभाव जमाने का एक साधन था. और इस वजह से टीकों की खरीद पर बातचीत करते वक्त चीनी एसओई को सुविधा हुई थी.

सोशल मीडिया पर ताबड़तोड़ हमला

अपने प्रभाव को बढ़ाने और आलोचकों को काबू में करने के लिए सीसीपी ने अब वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को नवीनतम अखाड़ा बना लिया है. ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया सीसीपी के लिए, सत्य के बाद की दुनिया में बेहद काम आया है. सत्य के बाद की एक ऐसी दुनिया, जहां जनमत को ढालने में सोशल मीडिया पर चल रहे भावनात्मक वर्णन में तथ्यों और अनुभवजन्य साक्ष्यों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता.

चीनी राजनायिक झाओ लिजियान ने नवंबर 2020 में अफ़ग़ानिस्तान में ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के खिलाफ़ युद्ध अपराध के आरोपों का एक चित्र ट्वीट किया था. ऑस्ट्रेलियाई सामरिक नीति संस्थान ने झाओ के पोस्ट को रिट्वीट करने वाले 600 से अधिक खातों को खंगालने पर पाया कि इसमें लगभग तीन प्रतिशत झाओ के ट्वीट किए जाने वाले दिन या तो पहली बार या फिर उसके अगले दिन बनाए गए थे.[70]एक हफ्ते के भीतर ही झाओ के ट्वीट को 18,000 से अधिक बार रिट्वीट किया गया और उसे 71,000 लाइक्स मिले थे. हालांकि, ट्वीट को पसंद करने वाले खातों के नमूने में से, 35 प्रतिशत से अधिक का कोई फॉलोअर नहीं था, जबकि लगभग 80 प्रतिशत मामलों में दस से कम फालोअर्स थे.

सीसीपी प्रभाव संचालन में उपयोगी सामग्री का उत्पादन करने का काम भी निजी फर्मों को सौंप रहा है. इसे “पब्लिक ओपिनियन मैनेजमेंट” अर्थात “जनमत प्रबंधन” कहा जाता है.[71]एक ओर जहां CCP अपने प्रचार-प्रसार के लिए वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करती है, वहीं ये चीन में रहने वाले नागरिकों को उपलब्ध ही नहीं होते. शंघाई पुलिस की एक इकाई ने मई 2021 में ट्विटर, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्ज़ी खातों के निर्माण के माध्यम से ‘जनमत प्रबंधन’ के लिए निजी ठेकेदारों की मांग की.[72]बॉट जैसे ये नेटवर्क, लाइक और रिपोस्ट के माध्यम से सरकार के दृष्टिकोण का समर्थन दिखाने में सहायक साबित होते हैं.

सोशल मीडिया पर सीसीपी की नीतियों की आलोचना करने वाले, विशेषत: चीनी नस्ल की महिलाएं, इस तरह के बॉट नेटवर्कस् के माध्यम से होने वाले हमलों के बीच में फंस जाते हैं. उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में एक शोधकर्ता विक्की जू को शिनिजयांग में हिरासत, कैद और जबरन मजदूरी को लेकर बनाई गई रिपोर्ट के लिए सोशल मीडिया पर ‘जाति के गद्दार’ बताते हुए उसकी निंदा की गई थी.[73]इसी तरह, चेंगदू में पूर्व अमेरिकी महावाणिज्य दूत की पत्नी त्ज़ु-आई चुआंग को जुलाई 2020 में एक ऑनलाइन अभियान के रोष का सामना करना पड़ा.[74]तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब ह्यूस्टन में चीनी वाणिज्य दूतावास को बंद करने का फैसला लिया तो चीन ने चेंगदू में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास को बंद करने का आदेश दे दिया. इसके बाद चुआंग ने वेइबो पर एक पोस्ट लिखा, जिसमें राजनायिक परिवारों की निकासी की तुलना उन्होंने जर्मनी से यहूदियों के पलायन से कर दी थी. ऐसे में सीसीपी ने इस पोस्ट को ऐसा देखा कि उसमें CCP की तुलना नाज़ियों से की गई है. नतीजतन, चुआंग के परिवार को धमकियां मिली और चुआंग ने जिस घर को अमेरिका में खाली किया था, उसकी तस्वीरों को सोशल मीडिया पर जारी कर दिया गया. वाणिज्य दूतावास को बंद करने का आदेश दिए जाने के बाद एक सप्ताह के भीतर ही कम से कम छह सोशल मीडिया पोस्ट और चुआंग की पोस्ट को लेकर समाचार जारी करते हुए चीनी सरकारी मीडिया ने भी इस विवाद को हवा दी.[75]जब चीन कोविड-19 की उत्पत्ति और शिनिजयांग और हॉन्गकॉन्ग में मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर आलोचना का सामना कर रहा है, तब यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक बातचीत को आकार देकर सूचना के माहौल को चुनौती देने की चीन की रणनीति पर प्रकाश डालता है.

अंतरराष्ट्रीय प्रतिकार

चीन के शार्प पॉवर नीति का अब पिछले कुछ वर्षो से प्रतिकार होने लगा है उदाहरण के तौर पर सितंबर 2020 में यूके सरकार ने अपनी विदेशी छात्रों की पुनरीक्षण अथवा जांच की प्रक्रिया के दायरे का विस्तार किया. अब राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले विषयों जैसे केमेस्ट्री अर्थात रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र, कम्प्यूटर साइंस और एआई अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की पढ़ाई के लिए आने वाले छात्रों की कड़ाई से जांच होने लगी. इन विषयों में शिक्षा अथवा शोध के लिए आने वाले विद्यार्थियों के लिए अकादमिक टेक्नोलॉजी अप्रुवल स्कीम सर्टिफिकेट(e[5]) लेना अनिवार्य कर दिया गया. यह प्रमाणपत्र उन्हें यूके में ऐसे क्षेत्रों का ज्ञान अजिर्त करने से पहले लेना था, जिसका उपयोग उन्नत पारंपारिक सैन्य तकनीक और सामूहिक विनाश के हथियारों का निर्माण करने अथवा उनके वितरण की प्रणाली को विकसित करने के लिए किया जा सकता है.[76]

शार्प-पॉवर दृष्टिकोण से चीन को कुछ लाभ भी हुआ हो, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि विदेशों में चीनी छात्रों को लेकर उठने वाले विरोध के स्वर चीन के मानव पूंजी निर्माण पर एक दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ेंगे. इसके अलावा विभिन्न देशों में, विशेषत: पश्चिमी देशों में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगी है, जिनका चीन को लेकर दृष्टिकोण नकारात्मक है. ऐसे में सीसीपी प्रशासन को अपनी आक्रामक शार्प पॉवर रणनीति को लेकर आत्मनिरीक्षण और पुनर्विचार करना चाहिए.

अपने ही विदेशी नागरिकों का उपयोग अब संभवत: चीन की सीसीपी के उद्देश्यों में बाधा बनने लगा है. क्योंकि यह धारणा कि सभी चीनी विद्यार्थी चीन के शार्प पॉवर का साधन है, चीन के लिए ही चोट पहुंच रही है. उदाहरण के तौर पर यूएस ने अब विज्ञान और टेक्नोलॉजी जैसे शैक्षणिक पाठयक्रमों में प्रवेश के इच्छुक चीनी विद्यार्थियों को दिए जाने वाले वीज़ा पर प्रतिबंध लगा दिया है.[77]और यूके ने स्नातकोत्तर अर्थात पोस्ट-ग्रैज्युएट विद्यार्थियों को राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले विषयों का अध्ययन करने से रोक दिया है.[78]

फैनफा युवेई (उपलब्धि के लिए कोशिश करना) को लेकर चीन की नई सोच में अब विश्व के मामलों में चीनी नेतृत्व के लिए एक बड़ी भूमिका की वकालत की गई है. लेकिन सीसीपी के कुलीन अथवा आला वर्ग को इस सोच पर पुनर्विचार करना होगा. क्योंकि इस वजह से विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों की वफादारी पर निरंतर सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं. ऐसे में उन्हें हिंसा अथवा र्दुव्‍यवहार का आसान निशाना बनाया जा रहा है.[79]ऐसे में वे यह विचार करने लग सकते हैं कि आखिर चीनी होने के क्या मायने होते हैं.

उदाहरण के तौर पर यूके में इस वक्त इस बात पर विचार किया जा रहा है कि क्या विदेशी हस्तक्षेप विरोधी कानून बनाया जाए, जो ‘‘विदेशी राज्य के लिए या उसकी ओर से की गई घोषित गतिविधियों’’ का एक रजिस्टर तैयार करने में सहायक साबित हो.[80]इसी प्रकार 2021 में आस्ट्रेलिया ने अपने यहां विदेशी हस्तक्षेप कानून के दायरे को बढ़ाते हुए इसमें विश्वविद्यालयों को शामिल कर लिया हैं. इसके तहत नए नियम बनाए गए हैं, जिसमें विद्यार्थियों को विदेशी शक्तियों की ओर से होने वाले किसी भी हस्तक्षेप को पहचानकर उसकी जानकारी देने का प्रशिक्षण दिया जाएगा.[81]

अनेक देशों में चीनी भाषा सीखने वाले प्रशिक्षकों की मांग है, लेकिन अनेक देशों ने अब इस बात को समझना शुरू कर दिया है कि कन्फ्यूशियस सेंटर्स की नुकसान पहुंचाने की संक्षारक क्षमताएं क्या है. 2020 में यूएस ने शैक्षणिक संस्थानों को चेताया था कि कन्फ्यूशियस सेंटर्स की व्यवस्था की आड़ में सीसीपी, अमेरिकी धरती पर अपने पैर जमा रहा है और इसके चलते वह अभिव्यक्ति की आजादी को खतरे में डाल रहा है.[82]2020 में भारत के साथ सीमा पर हुई झड़प के बाद भारत ने 50 ऐसे समझौतों की समीक्षा की, जो भारतीय और चीनी संस्थाओं के बीच किए गए थे. इसके बाद 2022 में किसी भी भारतीय शैक्षणिक संस्थान और कन्फ्यूशियस सेंटर्स के बीच हुए समझौते के लिए फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन (रेग्युलेशन) एक्ट के तहत मान्यता लेना अनिवार्य कर दिया गया.[83]

इन उदाहरणों से यह साफ हो जाता है कि चीन की आक्रामक शार्प पॉवर रणनीति ने अनजाने में ही उसके मानव संसाधन निर्माण और सॉफ्ट पॉवर कोशंट अर्थात अनुपात को नुकसान पहुंचाया है.

निष्कर्ष

अनेक वर्षों तक, चीन ने जटिल ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक कारकों के संयोजन और अपने यहां के संभावित राजनीतिक कायापलट को लेकर पश्चिम के आशावादी आकलन के कारण अपनी शार्प पॉवर रणनीति पर आजादी के साथ अमल किया. 19वीं सदी में, अमेरिका ने चीन को अपने जैसा बनाने के लिए एक सांचे में ढालने की कोशिश की. इसके तहत अमेरिका ने मानव पूंजी निर्माण में सुधार के लिए शीर्ष श्रेणी के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की. लेकिन इन प्रयासों को दबा दिया गया. और जब कम्युनिस्टों ने वहां सत्ता का अधिग्रहण किया तो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध बिगड़ गए.[84]1970 के दशक के मध्य में, चीन ने अमेरिका के साथ संबंध बढ़ाने की कोशिश की. वॉशिंगटन भी पश्चिमी व्यवस्था में बीजिंग के एकीकरण को लेकर उत्सुक था ताकि उसे कम्युनिस्ट ब्लॉक से दूर कर किया जा सके.[85]शीत युद्ध में अमेरिका की जीत का अर्थ यह था कि मानवाधिकार और लोकतंत्र की जीत हुई है. ऐसे में अमेरिका के राजनीतिक नेताओं को लगा कि वे सीसीपी के मानवाधिकार संबंधी इतिहास को लेकर सवाल उठा सकते हैं, विशेषत: थियानमेन की घटना के बाद की अवधि में वे ऐसा करना चाहते थे.[86]हालांकि, 1990 के दशक में आर्थिक मंदी और इसके परिणामस्वरूप व्यावसायिक लॉबी के दबाव के बाद (इस डर से कि अगर अमेरिका ने मानवाधिकारों के मुद्दे को उठाया तो वे चीन के बड़े बाजार तक अपनी पहुंच खो देंगे), वॉशिंगटन ने अपना दृष्टिकोण बदल दिया. हालांकि यूएस ने चीन के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक क्षेत्रों में अपना सहयोग जारी रखा, जो ट्रंप प्रशासन के आने तक चला.[87]चीन की ‘शांतिपूर्ण विकास’ और खुद के सॉफ्ट पॉवर को बढ़ाने की रणनीति ने भी इस सहयोग को सराहा ही था. परिणामस्वरूप, चीन को वैश्विक स्तर पर ज्य़ादा नज़दीकी से स्वीकार किया गया. 2008 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की मेजबानी इसका एक उदाहरण है. शायद इसलिए कि चीन ने वैश्विक स्तर पर अपने लिए नेतृत्व की भूमिका की तलाश नहीं की. और न ही उसने वैश्विक समुदाय को अपनी महत्वाकांक्षा के प्रति सजग रहने दिया.

चीन ने शी युग में इसलिए खुल्लमखुल्ला अपनी शार्प पॉवर रणनीति को अपनाया है, क्योंकि वह विश्व व्यवस्था को बदलने का एक बेहतरीन मौका देख रहा है.[88]इसी वजह से अब उसके बर्ताव पर सारे विश्व की निगाहें जम गई है. चीन ने अपने यहां की राजनीतिक व्यवस्था को ‘लोकतंत्र’ के रूप में प्रचारित करने का प्रयास किया है, लेकिन ऐसा करते हुए उसने अपनी खामियां ही उजागर की है. उदाहरण के लिए, एक ओर जहां आम चीनी की घर पर ही ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच नहीं हैं, वहीं सरकार ने अपनी बात और कहानी फैलाने के लिए इस माध्यम को हथियार बना दिया है. इसी प्रकार सीसीपी ने, हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र के समर्थकों का दमन करते हुए इसके समर्थकों पर विदेशी सहायता स्वीकार करने का आरोप लगाया है. लेकिन दूसरी ओर वह अपने हितों को साधने के लिए विदेश में रहने वाले चीन नागरिकों का उपयोग वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था में घुसपैठ करने और कानून निर्माताओं के साथ सामाजिक संबंध बनाने में कर रहा है.

हालांकि,शार्प-पॉवर दृष्टिकोण से चीन को कुछ लाभ (जैसे कि कुछ क्षेत्रों अथवा हल्कों में उसके क्षेत्रीय दावों की स्वीकृति) भी हुआ हो, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि विदेशों में चीनी छात्रों को लेकर उठने वाले विरोध के स्वर चीन के मानव पूंजी निर्माण पर एक दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ेंगे. इसके अलावा विभिन्न देशों में, विशेषत: पश्चिमी देशों में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगी है, जिनका चीन को लेकर दृष्टिकोण नकारात्मक है.[89]ऐसे में सीसीपी प्रशासन को अपनी आक्रामक शार्प पॉवर रणनीति को लेकर आत्मनिरीक्षण और पुनर्विचार करना चाहिए. एक ऐसी रणनीति जो विश्व स्तर पर पार्टी की छवि को सुधारने के लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल रही है.


[1]Edgar Snow, an American journalist, crossed over to territory controlled by the Chinese Communist Party in the 1930s to report on the fledgeling movement. Anna Louise Strong and Agnes Smedley were American journalists who travelled to China in the 1920s to chronicle the Chinese civil war. The three journalists were known to be close to the party leadership.

[2]The Committee on Scholarly Communication with the People’s Republic of China (jointly sponsored by the US National Academy of Sciences, the American Council of Learned Societies, and the Social Science Research Council) was established in 1966 to arrange exchange visits by scholars from the US and China, organising the exchange of publications.

[3]During Deng Xiaoping’s 1979 visit to the US, China’s State Science and Technology Commission concluded agreements to expedite scientific exchanges. Between 1979 and 1983, as many as 19,000 students got admission into US universities in physics, chemistry, and engineering. China got the US National Academy of Sciences to dispatch scientists to boost cooperation.

[4]China is ruled by the Communist Party, thus the conflation of nation with the party means any threat to the nation is a threat to the political establishment.

[5]The Academic Technology Approval Scheme certificate, issued by the UK’s Foreign and Commonwealth Office, gives students the security clearance to study subject areas where the knowledge obtained may be used in the development or delivery of weapons of mass destruction.

[1]全国宣传思想工作会议 (National Propaganda and Ideological Work Conference), 共产党员网首页 (Communist Party Members Network), August 19, 2013, http://www.12371.cn/special/qgxcsxgzhy/

[2]Vladmir Lenin, Left-Wing Communism: An infantile disorder (Progress Publishers, 1964), pp. 17–118.

[3]Robert Harvey, Comrades: The Rise and Fall of World Communism (London: John Murray, 2003), pp. 48-49.

[4]Emmanuel Jourda, “The Post-Revolutionary Uses of an Orthodox Canon: The United Front and the Political Revolution of the After-Revolution in China” (PhD thesis, École des hautesétudesen sciences sociales, 2012), pp. 17.

[5]Simon Shen, “The World Is Awakening to China’s Sharp Power,” The Diplomat, June 23, 2020, https://thediplomat.com/2020/06/the-world-is-awakening-to-chinas-sharp-power/

[6]Evelyn Goh, Rising China’s Influence in Developing Asia (Oxford University Press, 2016), pp. 25.

[7]G. John Ikenberry, “Soft Power: The Means to Success in World Politics,” review of Soft Power: The Means To Success In World Politics, by Joseph S. Nye, Jr. Foreign Affairs, May/June 2004

[8]David Shambaugh, China Goes Global: The Partial Power (Oxford University Press, 2013), pp 6-12, 309-311.

[9]Christopher Walker, “‘What is Sharp Power?’,” Journal of Democracy 29, no. 3 (2018), https://www.journalofdemocracy.org/articles/what-is-sharp-power/

[10]Marie Ann-Brady, Making the Foreign Serve China: Managing Foreigners in the People’s Republic (Rowman and Littlefield Publishers, 2003), pp. 45.

[11]Edgar Snow, Red Star Over China (New York: Grove Press, 1968), pp. 90, 124.

[12]Snow, Red Star Over China, pp. 124.

[13]Michael Pillsbury, The Hundred-Year Marathon: China’s Secret Strategy to Replace America as the Global Superpower (Macmillan, 2019) [e-book], chap. 3.; Edward Slingerland, Effortless Action: Wu-Wei as Conceptual Metaphor and Spiritual Ideal in Early China (New York: Oxford University Press, 2003), pp.53.

[14]Deng Xiaoping, “Realize the Four Modernizations and Never Seek Hegemony,” May 7, 1978, http://dengxiaopingworks.wordpress.com/2013/01/25/realize-thefour-modernizations-and-never-seek-hegemony/.

[15]Pillsbury, The Hundred-Year Marathon: China’s Secret Strategy to Replace America as the Global Superpower [e-book], chap. 3.

[16] Pillsbury, The Hundred-Year Marathon: China’s Secret Strategy to Replace America as the Global Superpower [e-book], chap. 3.

[17]Peter Martin, China’s Civilian Army: The Making of Wolf Warrior Diplomacy (Oxford University Press, 2021), pp. 152.

[18]Martin, China’s Civilian Army: The Making of Wolf Warrior Diplomacy, pp. 153-154.

[19]Martin, China’s Civilian Army: The Making of Wolf Warrior Diplomacy, pp. 154.

[20]James Mann, About Face: A History of America’s Curious Relationship with China from Nixon to Clinton (New York: Alfred Knopf, 1998), pp. 246.

[21]David Shambaugh, China’s Leaders: From Mao to Now (Polity, 2021), pp. 246-248.

[22]U.S. Department of State, United States Government, https://2017-2021.state.gov/confucius-institute-u-s-center-designation-as-a-foreign-mission/index.html

[23]Clive Hamilton &MareikeOhlberg, Hidden Hand: Exposing How the Chinese Communist Party is Reshaping the World (Oneworld Publications, 2020) [e-book], chap. 12.

[24] “A message from Confucius,” The Economist, October 24, 2009, https://www.economist.com/special-report/2009/10/24/a-message-from-confucius

[25]U.S. Department of State, United States Government, https://www.state.gov/xinjiang-supply-chain-business-advisory/

[26]U.S. Department of State, U.S. Government. https://2017-2021.state.gov/determination-of-the-secretary-of-state-on-atrocities-in-xinjiang/index.html

[27]People’s Daily, China, (@PDChina), Twitter, October 13, 2016, https://twitter.com/PDChina/status/786383781980610560?s=20&t=o2Am1G6AhBpgF0fybVwzfw

[28] Hua Chunying, (@SpokespersonCHN), Twitter, March 7, 2021, https://twitter.com/SpokespersonCHN/status/1368507146254512129?s=20&t=V0qZ3b2boW0Mc2PiLsEwPQ

[29]Matt Schrader, Friends and Enemies: A framework for Understanding Chinese Political Interference in Democratic Countries, Washington DC, German Marshall Fund, 2020, https://securingdemocracy.gmfus.org/wp-content/uploads/2020/04/Friends-and-Enemies-A-Framework-for-Understanding-Chinese-Political-Interference-in-Democratic-Countries.pdf

[30]Clive Hamilton, Silent Invasion: China’s influence in Australia (Richmond: Hardie Grant

Books, 2018) [e-book], chap. 13.

[31]全国宣传思想工作会议 (National Propaganda and Ideological Work Conference), 共产党员网首页 (Communist Party Members Network), August 19, 2013, http://www.12371.cn/special/qgxcsxgzhy/

[32]China’s Political Discourse in 2020: China Media Project, in Sinocism, https://sinocism.com/p/chinas-political-discourse-in-2020. Sinocism. https://sinocism.com

[33]Laura Silver, Kat Devlin And Christine Huang, “Unfavorable views of China reach historic highs in many countries,” Pew Research Center, October 6, 2020, https://www.pewresearch.org/global/2020/10/06/unfavorable-views-of-china-reach-historic-highs-in-many-countries/

[34]David Shambaugh, “China’s ‘Quiet Diplomacy’: The International Department of the Chinese Communist Party,” China: An International Journal, 5:1 (2007), pp. 35

[35]P. Charon and JB JeangèneVilmer, Chinese Influence Operations: A Machiavellian Moment, Paris, Institute for Strategic Research, Ministry for the Armed Forces, 2021. https://www.irsem.fr/report.html

[36] Yu Hongjun, 中国特色政党外交 (Party-to-Party Diplomacy with Chinese Characteristics), (Beijing: Social Sciences Academic Press, Jun. 2017), 36-37

[37]Jin Xin, “国内外关于中国共产党对外交往的研究综述” (“Overview of Chinese and Foreign Research on Party Diplomacy”), CPC News, March 16, 2015, https://archive.vn/8bf89.

[38] Lenin, Left-Wing Communism: An infantile disorder, pp. 17–118.

[39] Samir Saran &AkhilDeo, PaxSinica: Implications for the Indian Dawn (Rupa, 2019) [e-book], chap. 7.

[40]中共中央印发《中国共产党统一战线工作条例(试行》[Central Committee of Communist Party of China issued regulations on work of the United Front of the Communist Party of China (for trial implementation)], Xinhua, September 22, 2015, http://www.xinhuanet.com/politics/2015-09/22/c_1116645297_5.htm.

[41]Michael McGowan, “Chinese government exerts influence across Australian society, MPs told,” The Guardian, January 30, 2018, https://www.theguardian.com/australia-news/2018/jan/31/chinese-government-exerts-influence-across-australian-society-mps-told

[42] Little Red Podcast, “How To Make Friends And Influence People: Inside the Magic Weapon of the United Front,” April 9, 2018. https://soundcloud.com/user-340830825/how-to-make-friends-and-influence-people-inside-the-magic-weapon-of-the-united-front; James Kynge, Lucy Hornby, and Jamil Anderlini,

[43]James Jiann Hua To, Qiaowu: Extra-Territorial Policies for the Overseas Chinese (Leiden: Brill, 2014), pp.108.

[44]Laura Grunberg, “Business Moguls and Chinese (Soft) Power: The ‘Huaren’ of Southeast Asia, The Diplomat, May 4, 2021, https://thediplomat.com/2021/05/business-moguls-and-chinese-soft-power-the-huaren-of-southeast-asia/

[45]Eric Chan, “Fifth Column Fears: the Chinese Influence Campaign in the United States,” The Diplomat, September 24, 2019, https://thediplomat.com/2019/09/fifth-column-fears-the-chinese-influence-campaign-in-the-united-states/

[46] 张峰:习近平中央统战工作会议重要讲话的8个创新性亮点 (Highlights of Xi Jinping’s speech at Central United Front Work Conference), People’s Daily, June 6, 2015, http://politics.people.com.cn/n/2015/0606/c1001-27113670.html

[47]Emma Reynolds, “Tensions rise as Chinese government’s influence infiltrates Aussie universities,” News.com.au, September 1, 2017, https://www.news.com.au/finance/economy/australian-economy/tensions-rise-as-chinese-governments-influence-infiltrates-aussie-universities/news-story/e7768b0bb1f5953a7608884527387372

[48]“A cartographic clash between the LSE and its Chinese students,” The Economist, April 13, 2019, https://www.economist.com/britain/2019/04/13/a-cartographic-clash-between-the-lse-and-its-chinese-students

[49] Primrose Riordan & Rowan Callick, “China consulate involved in Newcastle Uni Taiwan row,” The Australian, August 28, 2017, https://www.theaustralian.com.au/nation/politics/china-consulate-involved-in-newcastle-uni-taiwan-row/news-story/14dceb31c1e72807c9f006936784c601

[50] Bonny Lin, “China’s Sharp Power: A Conversation with Kevin Sheives and Jessica Ludwig.” China Power, December 7, 2021, Podcast, 00.39. https://www.csis.org/node/63270

[51]Quentin McDermott, “Sam Dastyari defended China’s policy in South China Sea in defiance of Labor policy,  secret recording reveals,” ABC News, November 29, 2017, https://www.abc.net.au/news/2017-11-29/sam-dastyari-secret-south-china-sea-recordings/9198044?nw=0&r=HtmlFragment

[52]Rod McGuirk, “Australia Revokes Residency of High-Profile Chinese Businessman,” The Diplomat, February 07, 2019, https://thediplomat.com/2019/02/australia-revokes-residency-of-high-profile-chinese-businessman/

[53]Dan Conifer, “How a dead Liberal Party member put a fresh spotlight on Beijing’s foreign interference efforts,” ABC News, November 25, 2019, https://www.abc.net.au/news/2019-11-25/chinese-spy-parliament-foreign-interference-in-hong-kong-taiwan/11735176

[54]Naomi Canton, “MI5 names Chinese ‘agent’ linked to Labour MP awarded Padma Shri by India,” The Times of India, January 14, 2022, https://timesofindia.indiatimes.com/world/uk/mi5-names-chinese-agent-linked-to-labour-mp-awarded-padma-shri-by-india/articleshow/88885093.cms

[55] Nina dos Santos, “Exclusive: UK government promoted firm at center of alleged Chinese influence operation for years,” CNN, January 20, 2022, https://edition.cnn.com/2022/01/14/uk/uk-parliament-china-firm-gbr-intl/index.html

[56]Gordon Corera& Jennifer Scott, “MI5 warning over ‘Chinese agent’ in Parliament,” BBC, January 13, 2022, https://www.bbc.com/news/uk-politics-59984380

[57]Jan Wolfe, “Justice Department accuses China of spying on, intimidating dissidents living in U.S,” Reuters, March 17, 2022, https://www.reuters.com/world/us/us-accuses-chinese-agent-scheme-undermine-congressional-candidate-2022-03-16/

[58]Interview: China’s Belt and Road Initiative conducive to efforts to carry out UN sustainable development agenda,” Xinhua, July 20, 2016.

[59]CCTV, “开讲啦我的时代答卷 · 前联合国副秘书长吴红波:优秀的外交官要有强烈的爱国心和进取精神.” (Former UN Deputy Secretary-General Wu Hongbo: Excellent diplomats must have strong patriotism and enterprising spirit], YouTube video, 44.58 min, December 22, 2018.

[60]World Uyghur Congress (@UyghurCongress), “In an interview with @CCTV, former UN Under-Secretary-General & head of @UNDESA Wu Hongbo said he represented Chinese national interests in his position as a UN official, saying he ordered that WUC President @Dolkun_Isa be expelled from the 2017 UN Indigenous Forum @UN4Indigenous,” Twitter, April 25, 2019.

[61]Sopan Deb & Marc Stein, “N.B.A. Executive’s Hong Kong Tweet Starts Firestorm in China,” New York Times, October 6, 2019.

[62]Deb & Stein, “N.B.A. Executive’s Hong Kong Tweet Starts Firestorm in China”

[63] Deb & Stein, “N.B.A. Executive’s Hong Kong Tweet Starts Firestorm in China”

[64] Deb & Stein, “N.B.A. Executive’s Hong Kong Tweet Starts Firestorm in China”

[65]ESPN faces criticism over its coverage of Hong Kong tweet and the NBA,” CNN, October 9, 2019.

[66]Hal Hodson, “With the state’s help, Chinese technology is booming,” The Economist, January 2, 2020.

[67] Dewey Sim, “Is Sinovac’s early shipment to Singapore ‘unusual’ or just part of China’s vaccine diplomacy?,” SCMP,  February 25, 2021.

[68] Rowan Philp, “Insider Access to Chinese Vaccines: A Case Study in Pandemic Corruption from Peru,” Global Investigative Journalism Network, August 4, 2021.

[69]Lucien Chauvin, “Peruvian COVID-19 vaccine scandal spreads,” The Lancet 397, no. 10276 (2021).

[70]Albert Zhang, Ariel Bogle and Jake Wallis, “Tweet storm shows China aims to project power through provocation,” The Strategist, December 9, 2020.

[71]Muyi Xiao, Paul Mozur and Gray Beltran, “Buying Influence: How China Manipulates Facebook and Twitter,” New York Times, December 20, 2021.

[72]Xiao, Mozur and Beltran, “Buying Influence: How China Manipulates Facebook and Twitter”

[73]‘Bewitched’ Vicky Xu who Fabricates Xinjiang Story Stokes anti-China Sentiment in Australia: Observer,” Global Times, April 11, 2021.

[74]Liza Lin, “A U.S. Diplomat’s Wife Was a Social Media Star—Until Chinese Trolls, Aided by State Media, Came After Her,” WSJ.

[75]Lin, “A U.S. Diplomat’s Wife Was a Social Media Star—Until Chinese Trolls, Aided by State Media, Came After Her”

[76] Academic Technology Approval Scheme, Foreign & Commonwealth Office and Foreign, Commonwealth & Development Office, March 25, 2013.

[77]US cancels over 1,000 visas for Chinese deemed security risks,” Nikkei Asia, September 10, 2020.

[78]Lucy Fisher, “Chinese students face ban amid security fears,” The Times, October 1, 2020.

[79] Katerina Ang, “Chinese Australians feel heat from worsening diplomatic friction,” Nikkei Asia, December 7, 2020.

[80]United Kingdom, Home Office, Consultation document: legislation to counter state threats (London, Home Office, 2021).

[81]John Power, “Update to Australia’s foreign interference guidelines for universities could fuel prejudice against Chinese, academics warn,” South China Morning Post, September 2, 2021.

[82]U.S. Department of State, United States Government.

[83]India makes FCRA clearance mandatory for tie-ups with China’s Confucius Institutes,” The Indian Express, April 29, 2022.

[84]Samir Saran &Kalpit A Mankikar, “A New Cold War,” SanjayaBaru& Rahul Sharma, eds (Harper Collins, 2021), pp. 121-124.

[85] Saran, “A New Cold War”

[86]Bob Davis &Lingling Wei, Superpower Showdown (Harper Business, 2020), pp. 54.

[87]Davis & Wei, Superpower Showdown, pp. 64.

[88]Rush Doshi, The Long Game: China’s Grand Strategy to Displace American Order (Oxford University Press, 2021) (e-book), introduction.

[89] Laura Silver, Christine Huang And Laura Clancy, “How Global Public Opinion of China Has Shifted in the Xi Era,” Pew Research Center, September 28, 2022.


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