Author : Sushant Sareen

Published on Jun 14, 2023 Updated 0 Hours ago
पाकिस्तान: द ‘माइनस एवरी-वन’ फॉर्मूला

इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ (PTI) पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से बिखर रही है और ऐसा होना, काफी कुछ कहता है. पार्टी के नेताओं के इस्तीफ़ों की रफ़्तार तूफ़ान में तब्दील हो चुकी है. अफ़वाह ये है कि सेना ने PTI के नेताओं को साफ़ तौर पर संदेश दे दिया है: या तो PTI छोड़ो (कुछ मामलों में तो राजनीति भी पूरी तरह) या हुकूमत के ग़ुस्से का सामना करो. कुछ दिन जेल में रहने के बाद PTI के नेताओं का क्रांतिकारी उत्साह ठंडा पड़ गया है. ज़्यादातर नेता जेल से सीधे अपने शहर के प्रेस क्लब पहुंचे जहां उन्होंने न सिर्फ़ PTI बल्कि राजनीति से भी संन्यास का एलान कर दिया. आज PTI में जो कुछ भी हो रहा है वो पुराने ‘माइनस वन’ फॉर्मूले को पूरी तरह पलटकर लागू किया जा रहा है जिसे अब ‘माइनस एवरी-वन’ फॉर्मूला कहा जा सकता है. ‘माइनस वन’ फॉर्मूले को इस तरह तैयार किया गया था कि सबसे ऊपर के शख़्स को ख़त्म करके पार्टी के छोटे नेताओं को उखाड़ फेंका जाए जैसा कि मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंट के मामले में हुआ था जब अल्ताफ़ हुसैन का कद घटाया गया और इसके ज़रिए पार्टी को लगभग सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं से अलग कर दिया गया और पार्टी ख़त्म हो गई. 

आज PTI में जो कुछ भी हो रहा है वो पुराने ‘माइनस वन’ फॉर्मूले को पूरी तरह पलटकर लागू किया जा रहा है जिसे अब ‘माइनस एवरी-वन’ फॉर्मूला कहा जा सकता है.

विडंबना ये है कि ‘माइनस एवरी-वन’ जहां PTI को बेअसर कर सकती है, वहीं ‘माइनस वन’ से पार्टी मुक़ाबले में बनी रहेगी क्योंकि PTI का मतलब इमरान ख़ान है. पार्टी छोड़ने वाले ज़्यादातर बड़े नेता जैसे कि शिरीन मज़ारी, अली ज़ैदी, मलिका बुखारी और फ़वाद चौधरी अपने दम पर स्थानीय पार्षद का चुनाव जीतने की भी क्षमता नहीं रखते हैं. राजनीति में उनकी तरक़्क़ी पूरी तरह से इमरान ख़ान की वजह से हुई है. अपने दम पर वो मतदाताओं को खींच नहीं पाए. लेकिन इमरान को नुक़सान उन नेताओं के जाने से होगा जिनके अपने समर्थक हैं और चुनाव में अतिरिक्त वोट पाने के लिए जो अक्सर अपनी वफ़ादारी बदलते हैं. इस बात की कोशिशें जारी हैं कि पार्टी छोड़ने वाले कुछ ऐसे नेताओं को एक नई PTI में शामिल किया जाए. ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि इमरान ख़ान के एक पूर्व दाहिने हाथ, फाइनेंसर और उनकी तरफ़ से डील करने वाले जहांगीर तरीन ऐसे नेताओं को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. सेना को पंजाब में ऐसे राजनीतिक लोगों की ज़रूरत है ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि जब चुनाव हों तो नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (PMLN) को लगभग वॉक-ओवर न मिल जाए.

पाकिस्तान की परंपरागत राजनीतिक समझ ये है कि चुनाव जीतने वाले नेताओं के इस्तीफ़े के बाद भी इमरान ख़ान की PTI को चुनाव में वोट मिलेंगे लेकिन इतने वोट चुनाव में उसकी जीत के लिए पर्याप्त नहीं होंगे. हालांकि, सेना अपनी राजनीति सिर्फ़ परंपरागत समझ के आधार पर तय नहीं करेगी क्योंकि अतीत में ये पूरी तरह ग़लत साबित हो चुकी है. 1970 के चुनाव में किसी ने ये उम्मीद नहीं की थी कि शेख़ मुजीबुर रहमान पूर्वी पाकिस्तान में शानदार जीत हासिल करके संसद में बहुमत हासिल कर लेंगे. इसी तरह हर किसी ने ये सोचा था कि अप्रैल 2022 में विश्वास मत हासिल करने में नाकामी के बाद इमरान ख़ान कमज़ोर हो जाएंगे लेकिन उन्होंने ज़बरदस्त ढंग से वापसी की. इसलिए भले ही PTI के नेता इस्तीफ़ा दे रहे हों लेकिन सेना ये सुनिश्चित करेगी कि इमरान उन्हें फिर से ताज्जुब में नहीं डालें. आसान शब्दों में कहें तो पाकिस्तान की सेना और उसकी जूनियर पार्टनर (सत्ताधारी गठबंधन) उस वक़्त तक चुनाव का जोखिम नहीं उठाएगी जब तक कि इमरान राजनीतिक तौर पर पूरी तरह बेअसर नहीं हो जाते हैं. 

पाकिस्तान की परंपरागत राजनीतिक समझ ये है कि चुनाव जीतने वाले नेताओं के इस्तीफ़े के बाद भी इमरान ख़ान की PTI को चुनाव में वोट मिलेंगे लेकिन इतने वोट चुनाव में उसकी जीत के लिए पर्याप्त नहीं होंगे. 

पाकिस्तान की सेना अपने अनुभवों से जानती है कि एक लोकप्रिय नेता के वोट बैंक या समर्थकों को किसी गुट या दावेदार को ट्रांसफर करना बेहद मुश्किल है. बहुत ज़्यादा हुआ तो लोगों के समर्थन को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है. अतीत में कई पार्टियों ने PTI पर इस वक़्त हो रही कार्रवाई से भी ज़्यादा मुश्किल हालात का सामना किया है. 1977 की सैन्य बग़ावत के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के कई बड़े नेताओं ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था क्योंकि वो मुश्किल हालात का सामना नहीं कर पाए. लेकिन PPP के समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा पार्टी के साथ बना रहा. इसी तरह 1999 की बग़ावत के बाद PMLN को ध्वस्त कर दिया गया. ज़्यादातर बड़े नेताओं और सांसदों ने नवाज़ शरीफ़ का साथ छोड़ दिया और एक अलग पाकिस्तान मुस्लिम लीग क़ायद-ए-आज़म बना ली. लेकिन इन दोनों मामलों में से किसी में भी न तो पार्टी के मूल समर्थकों ने साथ छोड़ा, न ही पार्टी के प्रमुख की लोकप्रियता में गिरावट आई. जब सेना PTI को तोड़ रही है, उस वक़्त ये बात उसके दिमाग़ में भी निश्चित रूप से आई होगी. 

सेना व इमरान आमने-सामने

पाकिस्तान की सेना जिस एक बड़ी परेशानी से जूझ रही है वो ये है कि PTI के भीतर इमरान ख़ान की जगह लेने वाला कोई नेता नहीं है. अगर इमरान ख़ान को छोड़ दिया जाए तो PTI कुछ भी नहीं है. पूर्व वित्त मंत्री असद उमर या पूर्व विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी या पूर्व रक्षा मंत्री परवेज़ खट्टक की अगुवाई में नया गुट बनाने की सेना की कोई भी योजना काम करने वाली नहीं है. ये नेता PTI को नुक़सान पहुंचा सकते हैं और कुछ हद तक समर्थकों को अपने साथ जोड़ सकते हैं लेकिन इमरान ख़ान की जगह नहीं ले सकते हैं क्योंकि इमरान के वफ़ादार समर्थक उन्हें कभी स्वीकार नहीं करेंगे. लेकिन यही बात PTI के ख़िलाफ़ सेना के लिए सबसे फ़ायदे की भी है. PMLN और PPP तो राजनीतिक दमन, न्यायिक अयोग्यता और अपने नेता के विदेश चले जाने के बावजूद बची रही लेकिन PTI इमरान ख़ान के बिना खड़ी नहीं रह पाएगी. चूंकि PMLN, PPP और लगभग हर दूसरी राजनीतिक पार्टी किसी-न-किसी परिवार से जुड़ी हुई है, ऐसे में उनके भीतर हमेशा कोई-न-कोई ऐसा नेता था जिसको पार्टी की बागडोर विरासत में मिली. लेकिन PTI के साथ ऐसा नहीं है. इसका ये मतलब है कि अगर इमरान को हटा दिया जाता है तो ये उनकी पार्टी का अंत होगा. साथ ही पाकिस्तान की सेना के वर्चस्व और प्रधानता को मिल रही चुनौती भी ख़त्म हो जाएगी. जब तक इमरान हैं- चाहे वो जेल में हों या विदेश चले जाएं या ज़बरन उन्हें रिटायर कर दिया जाए- वो पाकिस्तान की सेना के लिए ख़तरा बने रहेंगे. 

इमरान ख़ान आज पाकिस्तान में सबसे लोकप्रिय राजनीतिक हस्ती हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. अगर वाकई में सैन्य संस्थानों और स्मारकों पर हमले के बाद उनकी लोकप्रियता को गंभीर और कभी भरपाई न होने वाला नुक़सान हुआ है तो पाकिस्तान की सेना और सत्ताधारी गठबंधन को चुनाव कराने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. लेकिन चुनाव के लिए उनका तैयार नहीं होना इस बात का सबूत है कि पाकिस्तान की सेना और सत्ताधारी गठबंधन को हार का डर है. हालांकि, बिना चुनाव के भी इस बात की संभावना है कि इमरान सत्ताधारी गठबंधन के ख़िलाफ़ शेख़ मुजीबुर रहमान या फिर ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो जैसी कामयाबी हासिल कर सकते हैं. ये संभावना कितनी भी कम क्यों न हो लेकिन कोई भी इस हालात का सामना नहीं करना चाहेगा. इसका ये मतलब है कि इमरान और उनकी पार्टी PTI- दोनों को जाना होगा.  

PMLN और PPP तो राजनीतिक दमन, न्यायिक अयोग्यता और अपने नेता के विदेश चले जाने के बावजूद बची रही लेकिन PTI इमरान ख़ान के बिना खड़ी नहीं रह पाएगी.

इमरान ख़ान पर कार्रवाई अगले कुछ दिनों और हफ़्तों में और तेज़ होने की संभावना है. उनकी पार्टी को नीचा दिखाया जाएगा, उसे कई हिस्सों में बांटा जाएगा और बर्बाद किया जाएगा. इसके साथ-साथ इमरान को पूरी तरह तबाह करने से पहले उन्हें बेहद मुश्किल हालात से गुज़ारा जाएगा. जब ये सभी चीज़ें पूरी हो जाएंगी तब जाकर चुनाव कराए जाएंगे. पाकिस्तान की इस तरह की नई जम्हूरियत में आपका स्वागत है जो कि पुरानी जम्हूरियत की तरह ही है.

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Sushant Sareen

Sushant Sareen

Sushant Sareen is Senior Fellow at Observer Research Foundation. His published works include: Balochistan: Forgotten War, Forsaken People (Monograph, 2017) Corridor Calculus: China-Pakistan Economic Corridor & China’s comprador   ...

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