Published on Jul 30, 2023 Updated 0 Hours ago

वर्ष 2002 में भारत के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी अधिकतम स्तर यानी 3.7 प्रतिशत की थी, जो 1990 के दशक के1.8 प्रतिशत से दोगुने से भी अधिक थी. इसे काफ़ी सुधार वाला प्रदर्शन ही कहा जाएगा.

भारत में परमाणु ऊर्जा: ज़्यादा उपयोगी नहीं होंगे छोटे ‘परमाणु’ रिएक्टर
भारत में परमाणु ऊर्जा: ज़्यादा उपयोगी नहीं होंगे छोटे ‘परमाणु’ रिएक्टर

ये लेख हमारी सीरीज़, कॉम्प्रिहेंसिव एनर्जी मॉनिटर: इंडिया ऐंड द वर्ल्ड का एक हिस्सा है.


भारत ने वर्ष 2004 में तय किया था कि वो वर्ष 2020 तक 20 गीगावाट बिजली बनाने की परमाणु ऊर्जा क्षमता को स्थापित करेगा. इसके बाद वर्ष 2007 में भारत सरकार ने बयान दिया कि वो इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने पर काम कर रही है. इसकी शुरुआत वर्ष 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा के 123 समझौते से होगी. वर्ष 2009 में भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड (NPCIL) ने कहा कि वो वर्ष 2032 तक परमाणु ऊर्जा से 60 गीगावाट बिजली बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है. इसमें प्रेशराइज्ड  वॉटर रिएक्टरों (pressurised water reactors) से 40 गीगावाट और प्रेशराइज्ड  हेवी वाटर रिएक्टर्स (PHWRs) से 7 गीगावाट बिजली बनाई जाएगी. ये सारे रिएक्टर आयातित यूरेनियम से चलेंगे. 2011 की ऊर्जा नीति के ड्राफ्ट में जो पूर्वानुमान लगाए गए हैं, वो और भी कम हैं. बेहद महत्वाकांक्षी स्थिति में भी भारत, वर्ष 2022 तक 12 गीगावाट और 2040 तक 34 गीगावाट बिजली ही परमाणु ऊर्जा से बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है. वर्ष 2021 में सरकार ने संसद में बयान दिया कि, साल 2031 तक देश में परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने की क्षमता बढ़कर 22,480 मेगावाट तक हो जाएगी. लेकिन, 2022 में देश की परमाणु ऊर्जा की क्षमता 6,885 मेगावाट बिजली उत्पादन की ही है. तय लक्ष्य हासिल करने में परमाणु ऊर्जा उद्योग के लगातार क्षमता से कम प्रदर्शन करने के चलते परमाणु ऊर्जा आयोग के विशेषज्ञों ने इन लक्ष्यों को अब उम्मीदों का नाम देना शुरू कर दिया है.

वर्ष 1970 में भारत में परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने की शुरुआत हुई है तब से लेकर अब तक देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की कुल हिस्सेदारी कभी भी चार फ़ीसदी से ज्यादा नहीं रही.

वर्ष 2020 में दुनिया भर में बनने वाली कुल बिजली का दस प्रतिशत हिस्सा परमाणु ऊर्जा से बनाया जाता था. ये 1996 के 17.45 प्रतिशत हिस्से से काफ़ी कम है, जो दुनिया के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी का कीर्तिमान है. वर्ष 1970 में भारत में परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने की शुरुआत हुई है तब से लेकर अब तक देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की कुल हिस्सेदारी कभी भी चार फ़ीसदी से ज्यादा नहीं रही. वर्ष 2002 में भारत के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी अधिकतम स्तर यानी 3.7 प्रतिशत की थी, जो 1990 के दशक के 1.8 प्रतिशत से दोगुने से भी अधिक थी. इसे काफ़ी सुधार वाला प्रदर्शन ही कहा जाएगा. जहां तक क्षमता बढ़ाने की बात है, तो बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए जाने, पूरा नीतिगत संरक्षण देने और उदार बजट आवंटन के बावजूद, तमाम ईंधनों में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र की विकास दर सबसे कम है. विशेषज्ञ परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में क्षमता के विकास की धीमी रफ़्तार के लिए कई वजहें बताते रहे हैं. जैसे कि, भारी पूंजी निवेश, लागत का लगातार बढ़ते जाना, तकनीकी समस्याएं और परमाणु संयंत्रों का स्थानीय स्तर पर विरोध होना.

वर्ष 2002 से 2006 के बीच भारत की परमाणु क्षमता क़रीब 23 प्रतिशत बढ़ी, जबकि 2006 से 2017 के बीच लगभग 9 फ़ीसद. लेकिन, 2017 के बाद से देश की परमाणु ऊर्जा की क्षमता में कोई प्रगति नहीं हुई है. वहीं नवीनीकरण योग्य ऊर्जा की विकास दर इसके ठीक उलट रही है. साल 1992 में नवीनीकरण योग्य ऊर्जा से कुल 32 मेगावाट बिजली बन रही थी, जो वर्ष 2021 में बढ़कर अधिकतम 100,000p मेगावाट तक पहुंच गई. इसकी वजह बताना कोई ख़ास मुश्किल नहीं है, क्योंकि परमाणु ऊर्जा के उलट, नवीनीकरण योग्य ऊर्जा (Renewable Energy) को पूरी दुनिया में भरपूर समर्थन मिलता है. फिर चाहे निवेशक हों या फिर किसी देश के नीति निर्माता. इस क्षेत्र को वैल्यू चेन के हर क़दम पर वित्तीय और ग़ैर वित्तीय प्रोत्साहन भी मिलता है. सबसे अहम बात कि नवीनीकरण योग्य ऊर्जा का विकेंद्रीकृत मॉड्यूल, और ख़ास तौर से सौर ऊर्जा के क्षेत्र में 4 से 5 लाख रुपए के मामूली निवेश की दरकार ने निजी क्षेत्र के छोटे छोटे निवेशकों को अपनी तरफ़ खींचा है. इसी वजह से नवीनीकरण योग्य ऊर्जा क्षेत्र की क्षमता तेज़ी से बढ़ी है. इस संदर्भ में ये जानकर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि भारत में परमाणु ऊर्जा का भविष्य रिएक्टर के आकार पर केंद्रित हो गया है. आज बहस ख़ास तौर से इस बात को लेकर हो रही है कि परमाणु ऊर्जा के क्षमता विकास के लिए क्या कम उत्पादन वाले छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) की मदद लेना ज़्यादा असरदार होगा.

भारत में परमाणु ऊर्जा का भविष्य रिएक्टर के आकार पर केंद्रित हो गया है. आज बहस ख़ास तौर से इस बात को लेकर हो रही है कि परमाणु ऊर्जा के क्षमता विकास के लिए क्या कम उत्पादन वाले छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) की मदद लेना ज़्यादा असरदार होगा.

छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर

दुनिया भर में छोटे मॉड्यूर रिएक्टर के लगभग 50 डिज़ाइनों पर काम चल रहा है, जो विकास के अलग अलग स्तर पर पहुंच चुके हैं. अर्जेंटीना, दक्षिण कोरिया, चीन, कनाडा और रूस में सरकारी मदद से इन रिएक्टरों पर काम चल रहा है और कुछ परमाणु ऊर्जा केंद्र तो काम भी करने लगे हैं. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे औद्योगिक देशों में निजी कंपनियां भी सरकारी मदद से छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर से कारोबारी स्तर की बिजली बनाने की कोशिश में जुटी हैं. जो छोटे रिएक्टर आज इस प्रयोग के हिस्से पर हावी हैं, वो प्रेसराइज़्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PWRs) हैं, जो परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली तकनीक है. प्रेशराइज्ड  हेवी वाटर तकनीक का लंबे समय से इस्तेमाल और इसको लाइसेंस देने का लंबा अनुभव, SMRs में इस तकनीक को बढ़ावा देने की बुनियाद बना है. चूंकि, PWR तकनीक पर आधारित SMRs उन बड़े परमाणु रिएक्टरों की तरह ही होते हैं, तो इसका विकास करने वालों के लिए लाइसेंस हासिल करने की प्रक्रिया भी उसी तरह की सीधी होगी. SMR के कुछ प्रयोग उन पुरानी तकनीकों पर आधारित हैं, जिनका इस्तेमाल 1970 के दशक के बाद से सक्रियता से नहीं हो रहा था. इनमें पेबल बेड रिएक्टर और मॉल्टेन साल्ट रिएक्टर शामिल हैं. SMR की दूसरी परिकल्पनाएं, परमाणु कचरे की समस्या से निपटने के लिए इस्तेमालशुदा ईंधन को जलाने या अलग अलग आइसोटोप को ट्रांसम्यूट करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. SMR की एक और परिकल्पना एक ऐसी परमाणु बैटरी या ईंधन वाले जीवनकाल पर आधारित है, जिसमें उसके बिजली उत्पादन के दौरान दोबारा ईंधन डालने की ज़रूरत नहीं होगी.

छोटे परमाणु रिएक्टरों का अर्थशास्त्र

किसी परमाणु रिएक्टर को छोटा तब कहा जाता है, जब वो 300 मेगावाट से कम बिजली उत्पादन करता है. ये किसी मानक परमाणु रिएक्टर की उत्पादन क्षमता का एक तिहाई होती है. एक बड़े रिएक्टर की जगह छोटे छोटे कई रिएक्टर के इस्तेमाल का विकल्प दो प्रतिद्वंदी आर्थिक सिद्धांतों पर आधारित है; बड़े पैमाने पर उत्पादन और बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता स्थापित करने का ख़र्च. 200 मेगावाट क्षमता के पांच SMRs लगाने का ख़र्च 1000 मेगावाट बिजली बनाने वाला रिएक्टर स्थापित करने से कहीं अधिक होगा. लेकिन, क्षमता स्थापित करने में होने वाले इस नुक़सान की भरपाई अधिक उत्पादन से की जा सकती है. इसके पीछे तर्क ये दिया जाता है कि अगर छोटे छोटे SMRs की मांग है, तो हर रिएक्टर की लागत कम होती जाएगी. फिर इससे परमाणु रिएक्टर को बनाने में आने वाला ख़र्च कम हो जाएगा. लेकिन, इस सोच को भारत के परमाणु ऊर्जा उद्योग से चुनौती मिलती है, क्योंकि भारत में ज़्यादातर छोटे परमाणु रिएक्टर ही हैं.

अगर 600 मेगावाट बिजली बनाने वाले सबसे पुराने रिएक्टर को छोड़ दें, तो चीन के इन सभी परमाणु केंद्रों की क्षमता एक हज़ार मेगावाट है. चीन की तुलना में भारत के दोगुने रिएक्टर हैं. फिर भी चीन की परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने की क्षमता भारत से छह गुना अधिक है.

भारत में लगे कुल 23 परमाणु रिएक्टरों में से 18 की क्षमता 300 मेगावाट से कम बिजली उत्पादन की है. इसका मतलब यही है कि भारत के ज़्यादातर रिएक्टर ‘छोटे’ हैं. भारत के ज़्यादातर परमाणु रिएक्टरों के आकार में छोटे होने का एक नतीजा ये हुआ है कि संख्या में अधिक होने के बाद भी भारत की कुल परमाणु ऊर्जा क्षमता तुलनात्मक रूप से कम ही है. उदाहरण के लिए, चीन के 10 सबसे बड़े परमाणु रिएक्टरों की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 45.6 गीगावाट है. अगर 600 मेगावाट बिजली बनाने वाले सबसे पुराने रिएक्टर को छोड़ दें, तो चीन के इन सभी परमाणु केंद्रों की क्षमता एक हज़ार मेगावाट है. चीन की तुलना में भारत के दोगुने रिएक्टर हैं. फिर भी चीन की परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने की क्षमता भारत से छह गुना अधिक है. इससे भी बेहतर मिसाल दक्षिण कोरिया की है. दक्षिण कोरिया के पास 24 परमाणु रिएक्टर हैं, यानी भारत से सिर्फ़ एक ज़्यादा. लेकिन, दक्षिण कोरिया की परमाणु बिजली उत्पादन की कुल क्षमता 23.15 गीगावाट है, जो भारत के तीन गुने से भी अधिक है. इसके अलावा, भारत में छोटे परमाणु रिएक्टर लगाने का ये नतीजा भी नहीं निकला है कि लागत कम लगी हो. न ही इससे भारत को प्रति रिएक्टर कम विशेषज्ञ तैनात करने का फ़ायदा ही मिल पाया है. सच तो ये है कि छोटे परमाणु रिएक्टर लगाने से देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा के योगदान को कम कर दिया है और इससे भारत को कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने में भी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र से कोई ख़ास मदद नहीं मिल पाई है. छोटे रिएक्टर लगाने से परमाणु बिजली की क़ीमत भी बढ़ गई है क्योंकि अगर क्षमता ज़्यादा बिजली बनाने की होती, तो कम से कम लागत वसूली जा सकती थी. ऐसे में अभी इस सोच को सही साबित किया जाना बाक़ी है कि, छोटे परमाणु रिएक्टरों लगाने के ख़र्च की भरपाई बड़े स्तर पर बिजली उत्पादन से की जा सकती है. क्योंकि, वर्ष 2022 तक छोटे परमाणु रिएक्टरों के बड़े ऑर्डर भी नहीं देखे जा रहे हैं. हालांकि, वेस्टिंगहाउस एपी के अमेरिका और चीन में बनाए गए 1000 मेगावाट के रिएक्टर, मॉड्यूलर निर्माण पर आधारित थे. लेकिन, उनकी लागत अनुमान से बहुत ज़्यादा बढ़ गई और उन्हें बनाने में भी तय समय से ज़्यादा वक़्त लगा. अगर छोटे परमाणु रिएक्टर की परिकल्पना साकार होत भी है और उनके मॉड्यूलर निर्माण के लिए आपूर्ति श्रृंखलाएं भी स्थापित हो जाती हैं, तो भी ये सब भारत के बाहर ही होगा. इसका मतलब ये होगा कि भारत को छोटे परमाणु रिएक्टर आयात करने होंगे, जिसके लिए भारी क़ीमत चुकानी होगी और देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी ख़र्च होगा.

अन्य चुनौतियां छोटे रिएक्टरों से ये उम्मीद की जा रही है कि परमाणु रिएक्टर स्थापित करने में समय कम लगेगा. लेकिन, अगर इन रिएक्टरों में नई ख़ूबियां डाली जाती हैं, तो लाइसेंसिग वग़ैरह के झंझट के चलते ज़्यादा समय लग ही जाएगा. SMRs को नवीनीकरण योग्य ऊर्जा से बिजली बनाने में मददगार के तौर पर पेश किया जा रहा है. लेकिन, ये परमाणु ऊर्जा बनाने के पीछे के तर्क के ही ख़िलाफ़ है. परमाणु ऊर्जा बनाने की भारी स्थायी लागत होती है और बिजली बनाने के अन्य तरीक़ों से उत्पादन का ख़र्च कम आता है. ऐसे में परमाणु ऊर्जा को उचित दरों पर बुनियादी ज़रूरत की बिजलीबनाने के लिए सही माना जाता है. नवीनीकरण योग्य ऊर्जा से तुलना करने पर हमें पता चलता है कि जब इन माध्यमों से बिजली नहीं बन रही होगी, उस वक़्त परमाणु बिजली बनाने से लागत भी बढ़ेगी और तकनीकी जोखिम बढ़ने का भी डर है. मिसाल के तौर पर अगर छोटे रिएक्टरों से उस वक़्त कम बिजली पैदा की जाती है, जब सौर ऊर्जा से बिजली बनाने का विकल्प उपलब्ध हो, और शाम को उस समय परमाणु रिएक्टर से उत्पादन बढ़ाया जाए, जब सूरज ढल चुका हो, तो उस दौरान बिजली उत्पादन के तरीक़ों में तापमान में बहुत अंतर (450 डिग्री सेल्सियस से 1600 डिग्री सेल्सियस) होगा. इससे यूरेनियम ऑक्साइड के ईंधन में दरार पैदा हो सकती है, जिससे ईंधन को ढकने वाला कवच फट सकता है, तब रिएक्टर से परमाणु ईंधन रिसने का डर होगा. इससे रिएक्टर ख़तरनाक क्षेत्र में पहुंच जाएगा.

नवीनीकरण योग्य ऊर्जा से तुलना करने पर हमें पता चलता है कि जब इन माध्यमों से बिजली नहीं बन रही होगी, उस वक़्त परमाणु बिजली बनाने से लागत भी बढ़ेगी और तकनीकी जोखिम बढ़ने का भी डर है.

1950 के दशक में जब परमाणु ऊर्जा बनाने की स्थापना हुई थी, तब परमाणु रिएक्टरों का आकार 60 मेगावाट का होता था. तब से लेकर अब तक तक रिएक्टर की क्षमता बढ़कर 1600 मेगावाट तक बिजली उत्पादन की हो चुकी है. इससे रिएक्टर के संचालन की लागत भी कम हो जाती है. नवीनीकरण योग्य ऊर्जा से मुक़ाबले के चलते परमाणु ऊर्जा उद्योग को उल्टी दिशा में धकेल दिया गया है. आज वो छोटा और धीरे-धीरे बढ़ने वाला उद्योग बन गया है. नौसैनिक इस्तेमाल के लिए कम बिजली उत्पादन (190 मेगावाट) वाली इकाइयों को बनाने में इंजीनियरिंग के व्यापत तजुर्बे की ज़रूरत और न्यूट्रॉन के स्रोत के तौर पर परमाणु ऊर्जा उद्योग को SMRs बनाने में मदद दी जा सकती है. इससे वो बड़ी संख्या में छोटे रिएक्टर लगाकर, ज़्यादा से ज़्यादा बिजली बनाने के बीच संतुलन की परिकल्पना को साकार कर सकता है. लेकिन तब तक, 700 मेगावाट क्षमता वाले प्रेसराइज़्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) ही सबसे स्वदेशी, सुरक्षित और कम लागत वाले रिएक्टर होंगे, जिन्हें बनाकर बिजली उत्पादन किया जा सकता है. भारत के परमाणु उद्योग के लिए छोटे परमाणु रिएक्टर की तुलना में ये रिएक्टर ‘नौ नगद न तेरह उधार’ वाले साबित होंगे.

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Authors

Vinod Kumar Tomar

Vinod Kumar Tomar

Vinod Kumar, Assistant Manager, Energy and Climate Change Content Development of the Energy News Monitor Energy and Climate Change. Member of the Energy News Monitor production ...

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Lydia Powell

Lydia Powell

Ms Powell has been with the ORF Centre for Resources Management for over eight years working on policy issues in Energy and Climate Change. Her ...

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Akhilesh Sati

Akhilesh Sati

Akhilesh Sati is a Programme Manager working under ORFs Energy Initiative for more than fifteen years. With Statistics as academic background his core area of ...

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