अब यह आने वाला समय ही बताएगा कि संसद को दोबारा बहाल किया जाता है या नहीं. नेपाल को नया प्रधानमंत्री मिलेगा या नहीं.
21 मई को नेपाल में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव होते हुए दिखा, जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सिफ़ारिश पर नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने देश की प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया. राष्ट्रपति ने इसके साथ ही 12 और 19 नवंबर को नेपाल में मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा भी कर दी, जो मौजूदा सदन के कार्यकाल से लगभग दो साल पहले होंगे. नेपाल में प्रतिनिधि सभा के चुनाव नवंबर में दो चरणों में कराने का फ़ैसला, देश के संविधान के अनुच्छेद 76 (7) के अंतर्गत लिया गया है. नेपाल में मध्यावधि चुनाव कराने की नौबत इसलिए आई, क्योंकि नेपाल की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी- एकीकृत माओवादी लेनिनवादी (CPN-UML) के नेता और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, सदन में अपना बहुमत साबित कर पाने में असफल रहे. प्रधानमंत्री ओली ने इसके बाद राष्ट्रपति से प्रतिनिधि सभा भंग करने की सिफ़ारिश कर दी, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि उनकी अपनी पार्टी (CPN-UML) के भीतर उनके विरोधी और अन्य पार्टियों ने उनकी सरकार को ठीक से काम करने का मौक़ा नहीं दिया.
नेपाल में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के बीच, ये दूसरी बार है जब नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या कुमारी भंडारी ने प्रधानमंत्री ओली की सिफ़ारिश पर देश की संसद को भंग किया है; पहली बार उन्होंने 20 दिसंबर 2020 को प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया था. इसके बावजूद, बाद में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में भंग प्रतिनिधि सभा को फिर से बहाल कर दिया था.
नेपाल में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के बीच, ये दूसरी बार है जब नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या कुमारी भंडारी ने प्रधानमंत्री ओली की सिफ़ारिश पर देश की संसद को भंग किया है
इस बार नेपाल में राजनीतिक संकट 21 मई को उस वक़्त अपने शीर्ष पर पहुंच गया. जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने दावा किया कि संसद में उनके पास 153 सांसदों का बहुमत है. इसमें 121 सांसद उनकी अपनी पार्टी के हैं और बाक़ी 32 जनता समाजबादी पार्टी (JSP) के सांसद हैं. वहीं दूसरी तरफ़, नेपाली कांग्रेस के नेता, शेर बहादुर देउबा ने अपने समर्थन में 149 सांसद होने की सूची जारी की; इनमें से 61 उनकी अपनी पार्टी के सांसद, 48 माओवादी केंद्रीयवादी, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी- एकीकृत माओवादी लेनिनवादी (CPN-UML) के माधव कुमार नेपाल धड़े के 27 सांसद और जनता समाजबादी पार्टी के उपेंद्र यादव धड़े के 13 सांसद शामिल थे.
271 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में किसी भी पक्ष को बहुमत साबित करने के लिए केवल 136 सांसदों के समर्थन की ज़रूरत थी. लेकिन, जब केपी शर्मा ओली और शेर बहादुर देउबा के साथ खड़े सांसदों की संख्या जोड़ी गई, तो पता चला कि ये सदन के 271 सांसदों से कहीं ज़्यादा 302 का आंकड़ा हो गया. इन्हीं गड़बड़ियों का फ़ायदा उठाकर राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने प्रतिनिधि सभा को भंग करने का एलान करते हुए मध्यावधि चुनावों की तारीख़ों की भी घोषणा कर दी.
भारत को लगता है कि प्रतिनिधि सभा भंग किया जाना, नेपाल का अंदरूनी मामला है. इस मामले में जारी एक बयान में भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण दिया कि, ‘हम इसे नेपाल के अंदरूनी मामले के तौर पर देखते हैं, जिसे नेपाल के घरेलू संवैधानिक ढांचे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सुलझाया जाना चाहिए.’
देश की संसद को भंग करने के ख़िलाफ़ नेपाल के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन की छिटपुट घटनाएं होने की ख़बरें आईं. ये विरोध प्रदर्शन नेपाली कांग्रेस की छात्र शाखा और अन्य राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने आयोजित किए थे. संसद भंग करने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन राजधानी काठमांडू, जनकपुर और अन्य इलाक़ों में हुईं.
अब ये देखने वाली बात होगी कि नेपाल का सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली द्वारा दूसरी बार देश की संसद को भंग करने के बारे में क्या फ़ैसला सुनाता है.
इसके साथ साथ केंद्रीय मंत्री मंडल द्वारा प्रतिनिधि सभा को भंग करने की सिफ़ारिश करने और शेर बहादुर देउबा को देश का प्रधानमंत्री न बनाए जाने के ख़िलाफ़ 146 संसद सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल की है. वहीं दूसरी तरफ़ कुछ याचिकाएं प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के समर्थन में भी सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल की गई हैं.
अब ये देखने वाली बात होगी कि नेपाल का सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली द्वारा दूसरी बार देश की संसद को भंग करने के बारे में क्या फ़ैसला सुनाता है. लेकिन, केपी शर्मा ओली के उठाए कुछ क़दमों के दूरगामी नतीजे अभी से देखने को मिलने लगे हैं.
2017 के आम चुनाव में नेपाल की एकीकृत माओवादी लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPN-UML) को 275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में लगभग दो तिहाई बहुमत मिला था. तब माओवादी नेता पुष्प कमल दहल यानी प्रचंड भी ओली के साथ हुआ करते थे. दोनों के बीच ये सहमति बनी थी कि संसद के पांच साल के कार्यकाल के पहले ढाई साल तक ओली प्रधानमंत्री रहेंगे और उसके बाद के ढाई वर्षों तक प्रचंड को प्रधानमंत्री का पद मिलेगा. 2018 में इसी आधार पर दोनों नेताओं ने अपने अपने राजनीतिक दलों का विलय करने का निर्णय लिया था. ओली की एकीकृत माओवादी लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPN-ML) और पुष्प कमल दहल की नेपाली माओवादी मध्यमार्गी कम्युनिस्ट पार्टी ने एक होकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया था.
जब संसद के कार्यकाल के दूसरे दौर में समझौते की शर्तों के तहत प्रधानमंत्री बनने का मौक़ा नहीं मिला, तो उसके बाद से ही केपी शर्मा ओली और प्रचंड के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ती गई. इस साल 7 मार्च को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को तगड़ा झटका तब लगा, जब सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी के दोनों पुराने धड़ों को बहाल करने का फ़ैसला किया. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से ओली और प्रचंड की पार्टियों के बीच हुआ गठबंधन टूट गया.
दुर्भाग्य से नेपाल में ये घटनाएं तब हो रही हैं, जब कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई में सरकार और तमाम राजनीतिक दलों को एक साथ आकर आपसी तालमेल से ज़रूरी क़दम उठाने चाहिए थे.
नेपाल की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण बदलाव ये देखने को मिला है कि मधेशियों की समर्थक मानी जाने वाली जनता समाजबादी पार्टी के महंत ठाकुर और उपेद्र यादव धड़ों के बीच भी मतभेद बढ़ गए हैं. हाल की घटनाएं बताती हैं कि महंत ठाकुर की अगुवाई वाले धड़े ने खुलकर या अप्रत्यक्ष रूप से प्रधानमंत्री ओली का समर्थन किया है; वहीं, जनता समाजबादी पार्टी में महंत ठाकुर के विरोधी और वामपंथी झुकाव वाले उपेंद्र यादव की अगुवाई वाला धड़े ने नेपाली कांग्रेस और एकीकृत माओवादी लेनिनवादी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के माधव कुमार नेपाल के गुट का साथ दिया है. इसी वजह से जनता समाजबादी पार्टी के दोनों गुट भी अलगाव की ओर बढ़ रहे हैं. वामपंथी और जनता समाजबादी पार्टी में टूट इसीलिए हो रही है, क्योंकि न तो उनके पास मज़बूत वैचारिक आधार है और न ही कोई ठोस राजनीतिक बुनियाद है.
दुर्भाग्य से नेपाल में ये घटनाएं तब हो रही हैं, जब कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई में सरकार और तमाम राजनीतिक दलों को एक साथ आकर आपसी तालमेल से ज़रूरी क़दम उठाने चाहिए थे. अगर चुनाव होते हैं, तो चुनाव प्रचार और राजनीतिक रैलियों-सभाओं के चलते देश में कोरोना वायरस का संक्रमण और तेज़ी से फैल सकता है. अब चूंकि प्रतिनिधि सभा भंग करने का विवाद सुप्रीम कोर्ट के पाले में चला गया है, तो आने वाला समय ही बताएगा कि संसद को दोबारा बहाल किया जाता है या नहीं. नेपाल को नया प्रधानमंत्री मिलेगा या नहीं. संकट के इस मौक़े पर सभी राजनीतिक दलों से यही अपेक्षा की जाती है कि वो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने का इंतज़ार करें और अपनी पूरी ताक़त लगाकर कोविड-19 महामारी का मुक़ाबला करें.
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Hari Bansh Jha was a Visiting Fellow at ORF. Formerly a professor of economics at Nepal's Tribhuvan University, Hari Bansh’s areas of interest include, Nepal-China-India strategic ...
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