Published on Jul 29, 2023 Updated 0 Hours ago

यूरोपीय संघ ने एक नए हरित वर्गीकरण का प्रस्ताव दिया है. इसके तहत कुछ विशेष मानकों को पूरा करने पर प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं को "हरित" निवेश का दर्जा दिया जा सकेगा

यूरोपीय संघ में प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा को लेकर नया प्रस्ताव: समझदारी युक्त हरित विकास में ही छुपी है तरक्की
यूरोपीय संघ में प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा को लेकर नया प्रस्ताव: समझदारी युक्त हरित विकास में ही छुपी है तरक्की

ये लेख कॉम्प्रिहैंसिव एनर्जी मॉनिटर: इंडिया एंड द वर्ल्ड सीरीज़ का हिस्सा है.


पृष्ठभूमि

यूरोपीय संघ (EU) ने एक नए हरित वर्गीकरण का प्रस्ताव किया है. इसके तहत कुछ विशेष मानकों को पूरा करने पर प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं को “हरित” निवेश का दर्जा दिया जा सकेगा. परमाणु ऊर्जा प्लांट को हरित दर्जा देने के लिए कुछ शर्तों का प्रावधान है. मसलन प्लांट के पास विशिष्ट योजना, सुरक्षित कोष और रेडियोएक्टिव कचरे के सुरक्षित निपटारे के लिए  तयशुदा जगह होनी चाहिए. इसके साथ ही प्लांट को 2045 से पहले निर्माण परमिट हासिल करने की स्थिति में होना पड़ेगा. प्राकृतिक गैस प्लांट के लिए भी मानक तय किए गए हैं. प्लांट में कार्बन उत्सर्जन का स्तर 270 ग्राम कार्बन डाईऑक्साइड प्रति किलोवाट घंटा (gCO2eq/kWh) के बराबर की दर से नीचे होना चाहिए. प्राकृतिक गैस पर आधारित प्लांट ज़्यादा उत्सर्जन फैलाने वाले जीवाश्म ईंधन पर आधारित प्लांटों के बदले स्थापित होने चाहिए. उनके लिए 2030 से पहले निर्माण परमिट मिलना भी एक ज़रूरी शर्त है. साथ ही उनके पास 2035 के अंत तक कम कार्बन उत्सर्जित करने वाली गैसों के इस्तेमाल शुरू करने की योजना भी होनी चाहिए. ये पूरी क़वायद EU द्वारा तैयार किए जा रहे व्यापक हरित वर्गीकरण का हिस्सा है. वर्गीकरण से जुड़े नियम-क़ायदों का पहला हिस्सा जनवरी 2022 से लागू हो गया है. इनमें नवीकरणीय ऊर्जा (RE) में निवेश के पर्यावरणीय मानक, शिपिंग और कार निर्माण शामिल हैं. 

ये पूरी क़वायद EU द्वारा तैयार किए जा रहे व्यापक हरित वर्गीकरण का हिस्सा है. वर्गीकरण से जुड़े नियम-क़ायदों का पहला हिस्सा जनवरी 2022 से लागू हो गया है. 

पिछले दो दशकों (1999-2019) में EU के प्राथमिक ऊर्जा उपभोग में तक़रीबन 4 प्रतिशत की गिरावट (63 EJ से 60 EJ or exajoules) आ चुकी है. इसी कालखंड में EU के ऊर्जा गुच्छे (energy mix) में जीवाश्म ईंधनों के हिस्से में क़रीब 13 प्रतिशत की कमी (51.46 EJ से 44.57 EJ) आई है. जीवाश्म ईंधनों से जुड़े ऊर्जा के उपभोग में आई कमी का ज़्यादातर हिस्सा कोयले की वजह से है. इस कालखंड में कोयले के इस्तेमाल में 37 फ़ीसदी की गिरावट आई है. प्राकृतिक गैस के उपभोग में 11 प्रतिशत का इज़ाफ़ा और नवीकरणीय ऊर्जा के उपभोग में तक़रीबन 1200 फ़ीसदी की बढ़ोतरी (हालांकि बहुत नीचे आधार से) हुई है. 

2019 में EU की प्राथमिक ऊर्जा का 73 प्रतिशत हिस्सा जीवाश्म ईंधनों से आया. इसमें तेल का हिस्सा लगभग 38 प्रतिशत, प्राकृतिक गैस का 23 प्रतिशत और कोयले का 12 प्रतिशत था. प्राथमिक ऊर्जा उपभोग में परमाणु ऊर्जा का हिस्सा तक़रीबन 11 प्रतिशत, नवीकरणीय ऊर्जा का 10 प्रतिशत और पनबिजली का तक़रीबन 4 प्रतिशत रहा. 2019 में यूरोपीय संघ में ऊर्जा  उत्पादन में 37 प्रतिशत हिस्से के साथ नवीकरणीय ऊर्जा का ही दबदबा रहा. परमाणु ऊर्जा का हिस्सा 32 प्रतिशत, ठोस जीवाश्म ईंधनों का 19 प्रतिशत, गैस का 8 प्रतिशत और पेट्रोलियम का 4 प्रतिशत रहा. EU के ऊर्जा उपभोग में आयातित स्रोतों का हिस्सा तक़रीबन 60 फ़ीसदी रहा. यहां तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले के आयात का सबसे बड़ा स्रोत रूस रहा. 2000 में जर्मनी के ऊर्जा उपभोग में जीवाश्म ईंधनों का हिस्सा 84 प्रतिशत था. 2000 के बाद से जर्मनी ने नवीकरणीय ऊर्जा की 90 गीगावाट (GW) उत्पादन क्षमता विकसित कर ली. ये आंकड़ा जर्मनी के कुल ऊर्जा उत्पादन क्षमता के बराबर है. इसके बावजूद 2017 में ऊर्जा उपभोग की 80 फ़ीसदी आपूर्ति जीवाश्म ईंधनों से हुई. इससे ऊर्जा के क्षेत्र में परिवर्तनकारी बदलावों के सामने खड़ी चुनौतियों का पता चलता है. 

ऊर्जा के किसी स्रोत की ऊर्जा सघनता जितनी ज़्यादा होगी उसकी परिवहन और भंडारण लागत उतनी ही कम होती है. परमाणु शक्ति की ऊर्जा सघनता तेल के मुक़ाबले 10 अरब गुणा से भी ज़्यादा है. इससे पता चलता है कि सौर और दूसरे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ऊर्जा सघनताएं परमाणु ऊर्जा के मुक़ाबले काफ़ी कम हैं. 

ऊर्जा सघनता

ऊर्जा के क्षेत्र में परिवर्तनकारी बदलावों के रास्ते की सबसे अहम चुनौती ईंधनों की ऊर्जा सघनता से जुड़ी है. वज़न या भौतिक आयामों के हिसाब से ऊर्जा की मात्राएं मुहैया कराने की क़ाबिलियत को उर्जा सघनता कहते हैं. प्राकृतिक गैस की ऊर्जा सघनता 4 करोड़ जूल (joules) प्रति घनमीटर (J/m3) है. ये तेल की ऊर्जा सघनता का महज़ एक हज़ारवां हिस्सा है, लेकिन सौर ऊर्जा की सघनता से 10 खरब गुणा से भी ज़्यादा है. ऊर्जा के किसी स्रोत की ऊर्जा सघनता जितनी ज़्यादा होगी उसकी परिवहन और भंडारण लागत उतनी ही कम होती है. परमाणु शक्ति की ऊर्जा सघनता तेल के मुक़ाबले 10 अरब गुणा से भी ज़्यादा है. इससे पता चलता है कि सौर और दूसरे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ऊर्जा सघनताएं परमाणु ऊर्जा के मुक़ाबले काफ़ी कम हैं. प्राकृतिक गैस और परमाणु शक्ति की ऊर्जा और शक्ति सघनता ऊंची होने के मायने ये हैं कि ऊर्जा के इन स्रोतों के लिए सतह और ज़मीन की ज़रूरत काफ़ी कम है. दरअसल नवीकरणीय ऊर्जा की सीढ़ियां चढ़ते हुए EU और बाक़ी दुनिया के देश ऊर्जा सघनता की सीढ़ियों से नीचे उतर रहे हैं. बेहद सघन जीवाश्म ईंधनों की बजाए ज़्यादातर बिखरे हुए नवीकरणीय स्रोतों की ओर रुख़ करने में ऊर्जा उत्पादन के लिए आज के मुक़ाबले 100 या हज़ार गुणा ज़्यादा भूभाग की आवश्यकता होगी. मिसाल के तौर पर 2010 में आधुनिक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (पनबिजली को छोड़कर) से 130 GW बिजली हासिल करने के लिए तक़रीबन 270,000 वर्ग किमी भूभाग की ज़रूरत थी. दूसरी ओर जीवाश्म ईंधन-परमाणु और पनबिजली व्यवस्थाओं ने 14.3 टेरावाट घंटे (नवीकरणीय ऊर्जा से 100 गुणा से भी ज़्यादा) की बिजली शक्ति मुहैया कराने में तक़रीबन 230,000 वर्ग किमी भूभाग का इस्तेमाल किया. 

कार्बन उत्सर्जन

प्राकृतिक गैस कंबाइंड साइकिल प्लांट अपने जीवनकाल के नज़रिए से 403-513 gCO2eq/kWh उत्सर्जित कर सकता है. साथ ही मिथेन उत्सर्जन समेत निकासी और परिवहन के चरणों में कार्बन कैप्चर और भंडारण (CCS) में 49-220 gCO2eq/kWh के बराबर उत्सर्जन संभव है. इसके मुक़ाबले सौर तकनीक के संकेंद्रित सौर शक्ति (CSP) से 27-122 gCO2eq/kWh के बीच और थिन फ़िल्म PV टेक्नोलॉजी के साथ फोटोवोल्टेक्स (PV) टेक्नोलॉजी से 8-83 gCO2eq/kWh उत्सर्जन होता है. इसमें उत्सर्जन का स्तर सिलिकॉन आधारित PV टेक्नोलॉजी से कम रहता है. परमाणु ऊर्जा से कार्बन उत्सर्जन सौर ऊर्जा के मुक़ाबले मात्रात्मक रूप से कम (5.1-6.4 gCO2eq/kWh) होता है. इसमें उत्सर्जनों के ज़्यादातर हिस्से में ईंधन श्रृंखला का योगदान होता है. दरअसल, नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार से वैश्विक रूप से एक लक्ष्य (कार्बन उत्सर्जन को कम करने) की पूर्ति होती है, सारे लक्ष्यों की नहीं. यूरोपीय संघ में नवीकरणीय ऊर्जा के स्तर को ऊंचा उठाने से जुड़ी क़वायदों के व्यापक अर्थव्यवस्था पर अनचाहे प्रभाव देखे जा रहे हैं. इनमें ऊर्जा की क़ीमतों में बढ़ोतरी और नतीजे के तौर पर असमानता बेहद अहम हैं. 

ईसीबी का आकलन है कि हरित ऊर्जा की ओर बदलाव से आपूर्ति और मांग के बीच का असंतुलन ज़ोर पकड़ेगा. दरअसल 2021 में प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों के चलते नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन में रुकावट आई. इससे गैस की क़ीमतें आसमान छूने लगीं.

ऊर्जा क़ीमतों में उछाल

2020 में EU में ऊर्जा की क़ीमतें अभूतपूर्व स्तरों तक पहुंच गईं. यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) ने स्वीकार किया है कि इसकी एक वजह ऊर्जा क्षेत्र में आ रहे मौजूदा परिवर्तन हैं. ईसीबी के मुताबिक अल्पकाल में नवीकरणीय ऊर्जा की अपर्याप्त उत्पादन क्षमता, जीवाश्म ईंधनों में निवेश की मंद रफ़्तार और बढ़ती कार्बन कीमतों के घालमेल से EU के लिए जोख़िम भरे हालात बन गए हैं. इससे वहां परिवर्तनकारी कालखंड के लंबा खिंच जाने का डर है जिसमें ऊर्जा की क़ीमतें लगातार बढ़ती रहेंगी. ईसीबी का आकलन है कि हरित ऊर्जा की ओर बदलाव से आपूर्ति और मांग के बीच का असंतुलन ज़ोर पकड़ेगा. दरअसल 2021 में प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों के चलते नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन में रुकावट आई. इससे गैस की क़ीमतें आसमान छूने लगीं. नवंबर 2021 में यूरोपीय संघ की मुद्रा यूरो में थोक बिजली का भाव 196 यूरो प्रति मेगावाट घंटा तक पहुंच गया. महामारी से पहले के 2 वर्षों के औसतन दर के मुक़ाबले ये क़ीमत क़रीब चार गुणा ज़्यादा थी. ECB के मुताबिक 1999 में यूरो की शुरुआत के बाद से महंगाई की सबसे ऊंची दरों के पीछे ऊर्जा की क़ीमतों में उछाल प्रमुख कारक रहा है. कार्बन क़ीमतों में सख़्ती के रुख़ से उत्सर्जन में गिरावट के साथ-साथ हरित नवाचार में बढ़ोतरी हुई है. हालांकि इसके चलते ऊर्जा पर ग़रीब परिवारों का ख़र्च बढ़ गया है. सालाना हिसाब से बिजली की थोक क़ीमतों के दोगुना होने से (50 यूरो मेगावाट प्रति घंटा से 100 यूरो मेगावाट प्रतिघंटा) उपभोक्ताओं पर 150 अरब यूरो का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. इससे अमीरों के मुक़ाबले ग़रीब परिवार ज़्यादा प्रभावित होंगे. पूर्वी यूरोप के देशों के कुल ऊर्जा गुच्छे में नवीकरणीय ऊर्जा का योगदान कम है. वहां ऊर्जा की क़ीमतें भी कम हैं. दूसरी ओर पश्चिमी यूरोप के देशों की कुल ऊर्जा में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा ज़्यादा है. वहां बिजली की दरें भी ऊंची हैं. इसके बावजूद EU में संपन्नता के मामले में निचले स्थान पर आने वाले देशों की तक़रीबन 30 प्रतिशत आबादी ने महंगी ऊर्जा क़ीमतों के चलते अपने घरों को पर्याप्त रूप से गर्म नहीं रख पाने की लाचारी जताई है. इसके साथ ही EU की अर्थव्यवस्था को लेकर हुए अध्ययनों से ये नतीजा निकला है कि बिजली की क़ीमतों में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी से फ़र्म के स्तर पर रोज़गार में 2 फ़ीसदी तक की गिरावट आ सकती है.    

प्रभाव

EU के हरित वर्गीकरण से कई पर्यावरणवादी समूह नाख़ुश हैं. दरअसल ये प्रस्ताव ऐसा एहसास दिलाते हैं कि जीवाश्म ईंधन और परमाणु ऊर्जा के ख़िलाफ़ वैचारिक विरोध की अगुवाई करने वाला यूरोपीय संघ अपनी भूमिका से पूरी तरह से पीछे हट रहा है. ये समूह इस बात को लेकर निराश हैं कि नए वर्गीकरण से 100 फ़ीसदी नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य हासिल करने के उनके सपने को चोट पहुंचेगी. उन्हें डर है कि गैस और परमाणु ऊर्जा में निवेश से इन तकनीकों के इस्तेमाल की मियाद बढ़ जाएगी. इससे नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की रफ़्तार मंद पड़ जाएगी. वैसे अगर यूरोपीय संघ का दीर्घकाल में हाइड्रोजन के ज़रिए डिकार्बनाइज़ेशन हासिल करने का लक्ष्य है, तो इस तरह की आशंकाएं हक़ीक़त से परे ही साबित होंगी. हाइड्रोजन उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस और परमाणु शक्ति- दोनों का ही इस्तेमाल किया जा सकता है. साथ ही प्राकृतिक गैस के लिए तैयार बुनियादी ढांचे को हाइड्रोजन के परिवहन के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है.   

नए वर्गीकरण के तहत भारत में प्राकृतिक गैस और परमाणु परियोजनाओं के क्षेत्र में निवेश और ज़्यादा आकर्षक विकल्प बन सकता है. संभावित जोख़िमों में गिरावट के चलते इन परियोजनाओं में पूंजी की लागत के कम होने के आसार हैं.

भारत डिकार्बनाइज़ेशन के लिए एक ही वक़्त पर नवीकरणीय ऊर्जा और हाइड्रोजन को प्रयोग में ला रहा है. लिहाज़ा भारत को EU के अनुभवों से बेशक़ीमती सबक़ मिल सकते हैं. इससे भी अहम बात ये है कि EU का नया हरित वर्गीकरण हरित निवेशों के लिए वैश्विक नियामक मानक बन सकता है. आगे चलकर भारत द्वारा भी इसे अपनाए जाने की संभावना बन सकती है. नए वर्गीकरण के तहत भारत में प्राकृतिक गैस और परमाणु परियोजनाओं के क्षेत्र में निवेश और ज़्यादा आकर्षक विकल्प बन सकता है. संभावित जोख़िमों में गिरावट के चलते इन परियोजनाओं में पूंजी की लागत के कम होने के आसार हैं. EU द्वारा प्राकृतिक गैस और परमाणु शक्ति को अपनाए जाने में भी एक सबक़ छिपा है. EU के लिए डिकार्बनाइज़ेशन के प्रति यथार्थवादी और तकनीक को लेकर संदेहवादी रुख़ से बच पाना लगभग नामुमकिन था. नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बढ़ाने के अनचाहे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिणामों की अनदेखी कर पाना आसान नहीं है. भारत में यूरोपीय संघ के मुक़ाबले संपन्नता कम और असमानता ज़्यादा है, लिहाज़ा भारत को इन बातों पर ज़रूर ग़ौर करना चाहिए. 

Source: BP statistical review of world energy 2021

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Authors

Vinod Kumar Tomar

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Vinod Kumar, Assistant Manager, Energy and Climate Change Content Development of the Energy News Monitor Energy and Climate Change. Member of the Energy News Monitor production ...

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Lydia Powell

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Ms Powell has been with the ORF Centre for Resources Management for over eight years working on policy issues in Energy and Climate Change. Her ...

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Akhilesh Sati

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Akhilesh Sati is a Programme Manager working under ORFs Energy Initiative for more than fifteen years. With Statistics as academic background his core area of ...

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