Published on Jul 29, 2023 Updated 0 Hours ago

सबसे वीभत्स घटनाएं देश के सबसे बड़े शहर और एक समय देश की राजधानी रहे अलमाटी में देखने को मिलीं. हिंसा पर उतारू प्रदर्शनकारियों ने कई दिनों तक शहर पर पूरी तरह से क़ब्ज़ा जमा लिया.

कज़ाख़िस्तान में विरोध-प्रदर्शन: संकट की घड़ी में देश में शासन और CSTO का इम्तिहान
कज़ाख़िस्तान में विरोध-प्रदर्शन: संकट की घड़ी में देश में शासन और CSTO का इम्तिहान

जनवरी 2022 की शुरुआत में मध्य एशियाई देश कज़ाख़िस्तान में ज़बरदस्त विरोध-प्रदर्शन और हिंसा का दौर देखने को मिला. 1991 में आज़ादी हासिल करने के बाद से ये कज़ाख़िस्तान के लिए सबसे त्रासदी भरा अध्याय रहा. दरअसल, कारों के लिए एलपीजी की क़ीमतों में बढोतरी के विरोध में देश के पश्चिमी हिस्से में लोग सड़कों पर उतर गए. देखते ही देखते ये विरोध प्रदर्शन दूसरे शहरों तक भी फैल गया. सबसे वीभत्स घटनाएं देश के सबसे बड़े शहर और एक समय देश की राजधानी रहे अलमाटी में देखने को मिलीं. हिंसा पर उतारू प्रदर्शनकारियों ने कई दिनों तक शहर पर पूरी तरह से क़ब्ज़ा जमा लिया. शहर के हवाई अड्डे, बैंकों और प्रशासनिक इमारतों में उपद्रवियों ने अड्डा जमा लिया. हिंसक भीड़ ने दुकानों में जमकर लूटपाट मचाई. प्रदर्शनकारियों का उत्पात इतना बढ़ गया कि कज़ाख़िस्तान में क़ानून का पालन सुनिश्चित कराने वाली एजेंसियों के लिए हालात पर क़ाबू पाना मुश्किल हो गया. 

तोकायेव के अनुरोध पर CSTO ने अपने सैनिकों को कज़ाख़िस्तान भेजा. इसके बाद हालात पर तेज़ी से क़ाबू पाया गया और तब जाकर देश में स्थिरता बहाल हो सकी. हालांकि क्षेत्रीय सुरक्षा पर इस संकट के नतीजों की आंच अभी लंबे समय तक महसूस की जाती रहेगी. 

ऐसे में देश के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्त तोकायेव (Kassym-Jomart Tokayev) को सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (Collective Security Treaty Organisation, CSTO) के साथी सदस्यों से मदद मांगनी पड़ीतोकायेव के अनुरोध पर CSTO ने अपने सैनिकों को कज़ाख़िस्तान भेजा. इसके बाद हालात पर तेज़ी से क़ाबू पाया गया और तब जाकर देश में स्थिरता बहाल हो सकी. हालांकि क्षेत्रीय सुरक्षा पर इस संकट के नतीजों की आंच अभी लंबे समय तक महसूस की जाती रहेगी. 

आर्थिक तौर पर देखें तो कज़ाख़िस्तान कई पैमानों पर इस इलाक़े में एक ताक़त बनकर उभरता दिखाई देता है. मिसाल के तौर पर भूतपूर्व सोवियत संघ से टूटकर बने गणराज्यों में (रूस को छोड़कर) निवेश को आकर्षित करने के पैमाने पर कज़ाख़िस्तान का स्थान निर्विवाद रूप से सबसे ऊपर है. यूरेनियम के खनन में  दुनिया में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ कज़ाख़िस्तान विश्व की अगुवाई करता है. पिछले साल कज़ाख़िस्तान में तेल का उत्पादन तक़रीबन 8.6 करोड़ टन रहा था. ज़ाहिर है कज़ाख़िस्तान में विकास की अपार संभावनाएं दिखाई देती हैं. ग़ौरतलब है कि कैस्पियन सागर में तेल के सबसे बड़े भंडार यानी कशागन तेल क्षेत्र में तेल का उत्पादन अब भी उच्चतम क्षमता तक नहीं पहुंच सका है. इसके अलावा तांबा, ज़िंक और दूसरे धातुओं के उत्पादन में भी कज़ाख़िस्तान काफ़ी आगे है. हाल के वर्षों में देश में कृषि क्षेत्र में भी तेज़ विकास देखा गया है. निश्चित रूप से आंकड़ों के नज़रिए से कज़ाख़िस्तान का प्रदर्शन काफ़ी प्रभापूर्ण दिखाई देता है. हालांकि, हक़ीक़त में हालात इससे अलग हैं. ख़ासतौर से देश के कुछ इलाक़ों में परिस्थितियां काफ़ी विकट बनी हुई हैं.  

कज़ाख़िस्तान की आबादी में तेज़ गति से बढ़ोतरी देखी जा रही है. ख़ासतौर से देश के दक्षिणी ग्रामीण इलाक़ों की जनसंख्या काफ़ी तेज़ी से बढ़ रही है. तेज़ रफ़्तार से बढ़ती इस आबादी को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोज़गार मुहैया करा पाने में राज्यसत्ता नाकाम साबित हो रही है.

बढ़ती जनसंख्या के कारण ख़राब होते हालात

दरअसल, इस मध्य एशियाई देश में कई तरह की समस्याएं और असंतुलन मौजूद हैं. सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है कि कज़ाख़िस्तान के विभिन्न इलाक़ों और सामाजिक वर्गों के बीच आय के वितरण में भारी असमानता क़ायम है. मिसाल के तौर पर अक्टाऊ (मांगेस्टाऊ क्षेत्र की राजधानी) और आसपास के ज़िलों में हालात इतने अस्थिर क्यों हैं? ऐसा पहली बार नहीं है कि इन इलाक़ों में इस तरह का विरोध-प्रदर्शन हुआ हो. ठीक 10 साल पहले भी मज़दूरों के मुद्दे पर हुए टकराव के चलते झानाज़ेन में पुलिस के साथ संघर्ष और विरोध-प्रदर्शनों की गंभीर घटनाएं देखने को मिली थीं. इसमें कई लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा था. इसी तरह 2016 में भी ज़मीन के मसले पर भारी बवाल हुआ था. उस समय हुए विरोध प्रदर्शनों में चीन के ख़िलाफ़ भावनाएं देखने को मिली थीं. दरअसल, उस वक़्त कज़ाख़िस्तान की सरकार ने ज़मीन को लेकर एक नए कोड को मंज़ूरी दी थी. इस नए नियम के तहत विदेशी निवेशकों समेत तमाम किरदारों को दीर्घकाल के लिए ज़मीन लीज़ पर मुहैया कराने की छूट दी गई थी. इसके ख़िलाफ़ कज़ाख़िस्तान की जनता में नाराज़गी फैल गई थी. लोगों को डर था कि दीर्घकालिक लीज़ के बहाने चीन आगे चलकर कज़ाख़िस्तान की ज़मीन पर क़ब्ज़ा जमा सकता है.

हाल में हुए उत्पात के पीछे एक और बड़ा सामाजिक-आर्थिक कारण मौजूद है. दरअसल, कज़ाख़िस्तान की आबादी में तेज़ गति से बढ़ोतरी देखी जा रही है. ख़ासतौर से देश के दक्षिणी ग्रामीण इलाक़ों की जनसंख्या काफ़ी तेज़ी से बढ़ रही है. तेज़ रफ़्तार से बढ़ती इस आबादी को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोज़गार मुहैया करा पाने में राज्यसत्ता नाकाम साबित हो रही है. नतीजतन इस इलाक़े की एक बड़ी आबादी ने देश के सबसे बड़े शहर अलमाटी का रुख़ कर लिया है. और जैसा कि अक्सर देखने को मिलता है इस बार भी प्रवासियों की इसी आबादी ने अलमाटी में विरोध-प्रदर्शनों की शुरुआत की थी. 

अलमाटी में तो हालात हाथ से निकल गए थे. शहर पर पूरी तरह से प्रदर्शनकारियों और लुटेरी भीड़ का क़ब्ज़ा हो गया था. देश में क़ानून का राज स्थापित करने वाली एजेंसियां इन प्रदर्शनकारियों से मुक़ाबला करने में भीगी बिल्ली साबित हुईं. 

विरोध-प्रदर्शनों के पीछे की सामाजिक-आर्थिक वजहों के अलावा प्रभावशाली गुटों के आपसी सत्ता संघर्ष का भी हाल में हुए उपद्रवों में बड़ा हाथ रहा है. ग़ौरतलब है कि संकट के इस मौक़े पर देश में सत्ता की दोहरी व्यवस्था के तहत पूरा कामकाज चलाया गया. दरअसल देश के मौजूदा राष्ट्रपति कासिम-जोमार्त तोकायेव ही देश के इकलौते नेता नहीं हैं.  कज़ाख़िस्तान के पहले राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबायेव का आज भी देश में जलवा क़ायम है. बहरहाल पिछले कुछ महीनों में दोनों ही ख़ेमों के बीच अपने-अपने रसूख़ को लेकर टकराव बढ़ गया है. अलमाटी में 5 जनवरी को हुए नाटकीय घटनाक्रमों के साथ-साथ राजधानी नूर-सुल्तान में भी कई अहम बदलाव देखने को मिले. मौजूदा राष्ट्रपति तोकायेव ने आनन-फ़ानन में नज़रबायेव के क़रीबियों को उनके पद से हटाकर उनकी जगह अपने समर्थकों को बहाल कर दिया. सबसे पहले राष्ट्रपति ने कद्दावर प्रधानमंत्री अस्कार मामिन को पद से हटाकर उनकी जगह अपने बेहद क़रीबी सहयोगी उपप्रधानमंत्री अलीख़ान समाइलोव को अंतरिम प्रधानमंत्री बना दिया. उसके बाद राष्ट्रपति तोकायेव ने राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के पूरे नेतृत्व को ही पद से बर्ख़ास्त कर दिया. इनमें नज़रबायेव के भतीजे फ़र्स्ट डिप्टी समात अबीश भी शामिल थे. उसी शाम राष्ट्रपति तोकायेव ने ख़ुद को ही देश की सुरक्षा परिषद का मुखिया नियुक्त कर डाला. दरअसल, देश के पहले राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबायेव के पास यही आख़िरी पद रह गया था. ज़ाहिर है अभी कम से कम ऐसा कहा जा सकता है कि तोकायेव और उनकी टीम ने हाल के गंभीर संकट काल का फ़ायदा उठाते हुए कज़ाख़िस्तान के भीतर सत्ता और प्रभाव के तमाम स्तरों पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया. 

हालांकि, केवल राजधानी में सत्ता के केंद्र में हेरफ़ेर के ज़रिए देश की परिस्थितियों को पटरी पर लाना मुमकिन नहीं था. अलमाटी में तो हालात हाथ से निकल गए थे. शहर पर पूरी तरह से प्रदर्शनकारियों और लुटेरी भीड़ का क़ब्ज़ा हो गया था. देश में क़ानून का राज स्थापित करने वाली एजेंसियां इन प्रदर्शनकारियों से मुक़ाबला करने में भीगी बिल्ली साबित हुईं. इन्हीं हालातों के बीच राष्ट्रपति तोकायेव ने 7 जनवरी को CSTO के साथीदारों से मदद मांगने का फ़ैसला किया. मदद की इस अपील के पीछे का आधार कज़ाख़िस्तान की सुरक्षा पर मंडरा रहा आतंकी ख़तरा रहा. कज़ाख़िस्तान के अहम ठिकानों की सुरक्षा के लिए अगले ही दिन फ़ौज की पहली टुकड़ी वहां पहुंच गई. रूस, बेलारुस, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान और आर्मिनिया से कुल मिलाकर 2500 सैनिक कज़ाख़िस्तान पहुंच गए. CSTO के संपर्क के ज़रिए देश में हालात को स्थिर बनाने की क़वायद पर नाटकीय असर पड़ा. कज़ाख़िस्तान की क़ानूनी एजेंसियों ने कुछ ही घंटों के भीतर अलमाटी पर दोबारा नियंत्रण क़ायम कर लिया. इसके बाद लूटमार और बर्बादी में शामिल लोगों की सघन तलाशी का काम शुरू कर दिया गया.

 कज़ाख़िस्तान के अधिकारियों ने शुरुआत में बयान दिए थे कि देश में हमलों को अंजाम देने के लिए 20 हज़ार आतंकी घुसा दिए गए हैं. हालांकि, जांच पड़ताल के बाद इस तरह के दावों में कोई दम नज़र नहीं आया. 

कज़ाख़िस्तान के अधिकारियों ने शुरुआत में बयान दिए थे कि देश में हमलों को अंजाम देने के लिए 20 हज़ार आतंकी घुसा दिए गए हैं. हालांकि, जांच पड़ताल के बाद इस तरह के दावों में कोई दम नज़र नहीं आया. बहरहाल प्रदर्शनकारियों के मुख्य गुटों के बीच ज़बरदस्त तालमेल और संगठित होकर उत्पात मचाने की उनकी क़ाबिलियत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. इसी तालमेल के बूते ये तमाम उपद्रवी अलमाटी की सभी अहम इमारतों पर  एक के बाद एक क़ाबिज़ होने में कामयाब रहे थे. 

कज़ाख़िस्तान का भविष्य क्या है? 

मौजूदा प्रशासन के सामने सबसे पहली चुनौती जल्द से जल्द देश में अमन चैन बहाल करने की है. इसके साथ ही प्रदर्शनों और लूटमार में शामिल लोगों की फ़ौरन गिरफ़्तारी का भी सवाल है. कुल मिलाकर जनवरी के पहले हफ़्ते में हुई पूरी वारदात की गहराई से जांच कर उनके लिए तमाम ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा दिए जाने की ज़रूरत है. ऐसा होने पर ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को दोहराए जाने से रोका जा सकेगा. 

इसके अलावा निजी तौर पर तोकायेव के सामने भी कई तरह की चुनौतियां है. उन्हें देश में अपनी निजी सत्ता को और मज़बूत करते हुए पूर्व राष्ट्रपति नज़रबायेव के प्रभाव को धीरे-धीरे कुंद करना है. लिहाज़ा आने वाले वक़्त में नज़रबायेव के कुनबे को इसी तरह से निशाना बनाया जाता रहेगा. इस कुनबे में संसद की सदस्य और नज़रबायेव की बेटी दारिगा नज़रबायेव के अलावा तिमुर कुलीबायेव भी शामिल हैं. कुलीबायेव पूर्व राष्ट्रपति नज़रबायेव के मंझले दामाद होने के साथ-साथ देश के सबसे दौलतमंद कारोबारी भी हैं. इसके अलावा उद्यमी संघ “Atameken” के प्रमुख भी राष्ट्रपति तोकायेव के निशाने पर रहेंगे. KNB के फ़र्स्ट डिप्टी हेड समात अबीश के भतीजे और कारोबारी कैराट सटिबाल्डे के अलावा तमाम दूसरे बड़े कारोबारियों पर भी राष्ट्रपति की नज़र रहेगी. इनमें यूरेशियन ग्रुप के मालिक़ों में से एक पटोख सोहिदियेव भी शामिल हैं. 

शुरुआती आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2022  की शुरुआत में कज़ाख़िस्तान में हुए दंगों से तक़रीबन 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर की बर्बादी हुई है. देश की व्यापक अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से ये नुकसान अब भी केवल सांकेतिक हैं. 

कज़ाख़िस्तान में हाल में हुई घटनाओं के विश्लेषण से इतना कहा जा सकता है कि इनसे प्रमुख तौर पर देश की इज़्ज़त और सियासी रसूख़ को चोट पहुंची है. सोवियत संघ के विघटन के बाद के कालखंड में कज़ाख़िस्तान उस इलाक़े की एक प्रमुख अर्थव्यवस्था रहा है. वहां की राज्यसत्ता स्थिर और स्थायित्व वाली रही है. देश बहुआयामी विदेश नीति पर चलता रहा है. इन सबके बावजूद वो अपने आंतरिक संकट से ख़ुद नहीं निपट सका और उसे अपने यहां अमनचैन क़ायम करने के लिए बाहरी मदद बुलानी पड़ी. अर्थव्यवस्था को भी थोड़े-बहुत झटके लगे हैं, लेकिन वो ज़्यादा गंभीर नहीं हैं. शुरुआती आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2022  की शुरुआत में कज़ाख़िस्तान में हुए दंगों से तक़रीबन 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर की बर्बादी हुई है. देश की व्यापक अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से ये नुकसान अब भी केवल सांकेतिक हैं. देश की जीडीपी में मुख्य योगदान देने वाले तमाम बड़े उद्यम पहले की तरह अपना कामकाज चलाते आ रहे हैं. इसके मायने ये हैं कि देश से कच्चे मालों और सस्ते सामानों का निर्यात तक़रीबन उसी स्तर पर बरकरार रहेगा जैसा इस ताज़ा संकट से पहले था. ज़ाहिर है कज़ाख़िस्तान से वस्तुओं का निर्यात पहले की ही तरह जारी रहेगा. 

कज़ाख़िस्तान का हाल का घटनाक्रम CSTO के लिए भी एक अग्निपरीक्षा साबित हुआ. इस दौरान संकट की घड़ी में आगे आकर तेज़ी के साथ उसका निपटारा करने की सदस्य देशों की क़ाबिलियत का इम्तिहान हुआ. कज़ाख़िस्तान के संदर्भ में बेहद कम समय में शांति स्थापना दल को भेजने का फ़ैसला किया गया. नतीजतन फ़ौजी टुकड़ियों को वहां भेजने और उनको दिए गए काम के तेज़ गति से निपटारे से प्रदर्शनकारियों के साथ टकराव भरे हालात पर क़ाबू पाना मुमकिन हो सका. 11 जनवरी को राष्ट्रपति तोकायेव ने शांति स्थापना दल की वापसी की शुरुआत करने का एलान कर दिया. इसके साथ ही CSTO के सैनिक कज़ाख़िस्तान से रवाना होने लगे.

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Author

Stanislav Pritchin

Stanislav Pritchin

Stanislav Pritchin (PhD in History) is a Senior Research Fellow Center for Post-Soviet Studied Institute of World Economy and International Relations Russian Academy of Science.

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