Author : Niranjan Sahoo

Published on Aug 26, 2022 Updated 0 Hours ago

नेशनल ज्युडिशियल डेटा ग्रीड, [vi] [vi] के आंकड़ों के अनुसार न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 24,280 है. वर्तमान में केवल 20,140 अदालती कक्ष उपलब्ध हैं और उसमें से 620 किराए पर लिए गए हैं. 2,423 अदालती कक्ष का निर्माण चल रहा है. इस बीच न्यायालयीन अधिकारियों के लिए 17,800 आवासीय यूनिटस उपलब्ध हैं, जिसमें से 3,988 किराए पर लिए गए हैं.

#Justice Delivery System in India: कैसी है भारत के न्यायिक बुनियादी ढांचे की स्थिति?

Justice Delivery Syste in India: भारत में बुनियादी न्यायिक ढांचे में मोटे तौर पर तीन आयाम शामिल होते हैं: (i) भौतिक अथवा ठोस सुविधाएं जैसे कि अदालती कक्ष, वकीलों के कक्ष और न्यायिक अधिकारियों और उनके सहायक कर्मचारियों के लिए आवासीय व्यवस्था; (ii) डिजिटल सुविधाएं, जिसमें वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग डिवाइस और इंटरनेट कनेक्टिविटी शामिल हैं और (iii) मानव संसाधन, जिसमें न्यायाधीश और उनके सहायक कर्मचारी शामिल होते हैं. इन तीनों ही आयामों में चुनौतियां हैं, लेकिन इस संक्षेप में भौतिक और डिजिटल बुनियादी ढांचे को ही केंद्र में रखा गया है. 

भौतिक सुविधाएं

न्यायिक इकोसिस्टम के सही ढंग से काम करने के लिए जो भौतिक घटक जरूरी होते हैं, वे घटक भौतिक सुविधाओं में शामिल होते हैं. इसमें अदालत सभागार, अधिवक्ताओं के कमरे और न्यायालयीन कर्मचारियों के लिए आवासीय इमारतें शामिल हैं.न्यायालयीन अफसरों को यह सुविधाएं उपलब्ध करवाने का लक्ष्य होना चाहिए, ताकि वह प्रत्येक को न्याय प्रदान करने का अपना रोजमर्रा का काम कर सकें. आखिरकार कार्य करने की बेहतर जगह से ही कार्य कुशलता सुनिश्चित होती है.

महज़ 2 प्रतिशत निचली और अधीनस्थ अदालतों में नेत्रहीनों के लिए स्पर्श मार्ग की व्यवस्था है, जबकि महज 20 प्रतिशत में गाइड मैप मौजूद हैं तथा 45 प्रतिशत में ही हेल्प डेस्क हैं.

ज़मीनी स्तर पर दिखाई देने वाले सबूतों, खासकर जिला और अधीनस्थ अदालतों से यह संकेत मिलता है कि वहां भौतिक सुविधाओं की भारी कमी है. नेशनल ज्यूडीशियल डेटा ग्रीड, [vi] [vi] के आंकड़ों के अनुसार न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 24,280 है. वर्तमान में केवल 20,140 अदालती कक्ष उपलब्ध हैं और उसमें से 620 किराए पर लिए गए हैं. 2,423 अदालती कक्ष का निर्माण चल रहा है. इस बीच न्यायालयीन अधिकारियों के लिए 17,800 आवासीय यूनिटस उपलब्ध हैं, जिसमें से 3,988 किराए पर लिए गए हैं. महज़ 2 प्रतिशत निचली और अधीनस्थ अदालतों में नेत्रहीनों के लिए स्पर्श मार्ग की व्यवस्था है, जबकि महज 20 प्रतिशत में गाइड मैप मौजूद हैं तथा 45 प्रतिशत में ही हेल्प डेस्क हैं. इसके अलावा, 68 प्रतिशत निचली अदालतों में रिकॉर्ड रखने के लिए विशेष कमरा नहीं है और उनमें से लगभग आधे में पुस्तकालय ही मौजूद नहीं है.

ठोस सुविधाओं में शामिल और बेहद ज़रूरी घटक है सार्वजनिक परिवहन तक आसान पहुंच. कानूनी थिंक टैंक विधि की एक गहन रिपोर्ट के अनुसार,[vii][vii] गुजरात, सिक्किम और त्रिपुरा में अधिकांश निचली अदालतों तक सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से पहुंचा नहीं जा सकता. सिक्किम में, चार निचले न्यायालयों में पार्किंग सुविधा नहीं है, जबकि केवल एक न्यायालय तक ही सार्वजनिक परिवहन से पहुंचा जा सकता है. उधर त्रिपुरा में पांच न्यायालयों में से चार में पार्किंग सुविधा तो है, लेकिन वहां किसी भी न्यायालय तक सार्वजनिक परिवहन से पहुंचा नहीं जा सकता.

ज़िला और अधीनस्थ न्यायालयों पर विधि की इसी रिपोर्ट के अनुसार जिन न्यायालयों का सर्वेक्षण किया गया (665 कोर्ट परिसरों में से 266 अथवा 40 प्रतिशत) उसमें से आधे से कम न्यायालयों में ही संपूर्ण रूप से काम करने वाले शौचालय पाए गए. केवल आधे से थोड़े ज्यादा (665 कोर्ट परिसरों में से 354) में ही हर मंजिल पर एक शौचालय उपलब्ध है. ज्य़ादा उल्लेखनीय बात तो यह है कि 26 प्रतिशत जिला अदालतों में महिलाओं के शौचालयों के नलों में पानी नहीं आता और दिव्यांगों के लिए केवल 11 प्रतिशत सुलभ शौचालय हैं.

ज़िला और अधीनस्थ न्यायालयों पर विधि की इसी रिपोर्ट के अनुसार जिन न्यायालयों का सर्वेक्षण किया गया (665 कोर्ट परिसरों में से 266 अथवा 40 प्रतिशत) उसमें से आधे से कम न्यायालयों में ही संपूर्ण रूप से काम करने वाले शौचालय पाए गए.

2021 में सीजेआई कार्यालय ने एक अध्ययन, जिसमें बड़ी संख्या में कोर्ट परिसर (3,028) में शामिल थे, में पाया गया कि उनमें से 30 प्रतिशत से भी कम में दिव्यांगों के लिए शौचालय उपलब्ध थे (फिगर 1 देखें). [viii] [viii] गोवा, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मिजोरम में काम में आने लायक शौचालयों वाले कोर्ट परिसरों का प्रतिशत सबसे कम था (टेबल 1 देखें). [ix] [ix] गोवा में किसी भी अदालत परिसर में पूरी तरह से काम करने वाले शौचालय नहीं थे. इतना ही नहीं वहां पानी सप्लाई  या नियमित सफाई के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी. झारखंड में, 24 अदालत परिसरों में से केवल दो (8 प्रतिशत) पूरी तरह काम करने लायक थे, उत्तर प्रदेश के 74 अदालत परिसरों में से आठ अथवा 11 प्रतिशत और मिजोरम में आठ अदालत परिसरों में से 1 या 13 प्रतिशत में पूरी तरह से काम करने वाले शौचालय पाए गए.


नोट: यह लेख NIRANJAN SAHOO और JIBRAN A KHAN द्वारा लिखे गये ओआरएफ़ हिंदी के लॉन्ग फॉर्म सामयिक रिसर्च पेपर ” भारत की न्याय वितरण व्यवस्था (justice delivery system) में सुधार: बुनियादी ढांचा क्यों है महत्वपूर्ण!” से लिया गया एक छोटा सा हिस्सा है. इस पेपर को विस्तार से पढ़ने के लिये संलग्न occasional paper के हिंदी लिंक को क्लिक करें, जिसका शीर्षक है- भारत की न्याय वितरण व्यवस्था (justice delivery system) में सुधार: बुनियादी ढांचा क्यों है महत्वपूर्ण!

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Niranjan Sahoo

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Niranjan Sahoo, PhD, is a Senior Fellow with ORF’s Governance and Politics Initiative. With years of expertise in governance and public policy, he now anchors ...

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Jibran A Khan

Jibran A Khan

Jibran A Khan is a graduate of Dr. Ram Manohar Lohia National Law University Lucknow and an Associate with PLR Chambers Delhi.

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