Published on Jan 31, 2022 Updated 0 Hours ago

इस लेख में मध्य पूर्व में जारी दूसरे टकरावों की ही तरह यमनी गृह युद्ध के भारत और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा हालातों पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया गया है.

यूएई पर हूती हमला: यमन में जारी संघर्ष के भारत पर पड़ने वाले संभावित असर की पड़ताल
यूएई पर हूती हमला: यमन में जारी संघर्ष के भारत पर पड़ने वाले संभावित असर की पड़ताल

परिचय

ईरान-समर्थित हूती लड़ाकों ने हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में कई ठिकानों पर हमलों को अंजाम दिया. अबु-धाबी में हुए हमलों से यमनी गृह युद्ध के चिंताजनक रुझान सामने आए हैं. ख़बरों के मुताबिक ड्रोन हमलों की वजह से अबु धाबी हवाई अड्डे पर आग लग गई. हालांकि, ये आग ज़्यादा बड़ी नहीं थी. इसके अलावा औद्योगिक ईंधन से जुड़े ठिकाने पर धमाका भी हुआ. इसमें तीन लोगों की जान चली गई और 6 लोग ज़ख़्मी हुए.  

ये हमले 17 जनवरी 2022 की सुबह हुए. हूतियों ने एक आधिकारिक बयान के ज़रिए हमलों में अपना हाथ होने का दावा किया. दरअसल, यमन में अपने लड़ाकों के ख़िलाफ़ यूएई की कार्रवाइयों का बदला लेने के इरादे से हूतियों ने इस हमले को अंजाम दिया था. हमला भले ही यूएई में हुआ लेकिन मारे गए लोगों में दो भारतीय और एक पाकिस्तानी शामिल थे. इससे साफ़ होता है कि इलाक़े में चल रहे संघर्ष से भारतीय हितों के प्रभावित होने की पूरी आशंका है. लिहाज़ा इस लेख में यमनी संघर्ष की पड़ताल की गई है. इस कड़ी में मध्य पूर्व में जारी दूसरे टकरावों की ही तरह यमनी गृह युद्ध के भारत और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा हालातों पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया गया है. साथ ही ये बताने की कोशिश भी की गई है कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए भारत भविष्य में क्या उपाय कर सकता है. 

यमन में अपने लड़ाकों के ख़िलाफ़ यूएई की कार्रवाइयों का बदला लेने के इरादे से हूतियों ने इस हमले को अंजाम दिया था. हमला भले ही यूएई में हुआ लेकिन मारे गए लोगों में दो भारतीय और एक पाकिस्तानी शामिल थे.

यमन में जारी संघर्ष की पेचीदगियों की पड़ताल

यमन में पिछले सात सालों से गृह युद्ध का दौर जारी है. हूती विद्रोही ज़ाएदी शिया (शिया इस्लाम की एक शाखा) के ताक़तवर क़बीले से ताल्लुक़ रखते हैं. दरअसल, 2014 में यही हूती क़बीला तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल्लाह सालेह के ख़िलाफ़ व्यापक विपक्ष का सबसे शक्तिशाली धड़ा बनकर उभरा था. सालेह अपने परिवार के लोगों को ही अपने सियासी वारिस के तौर पर स्थापित करना चाहते थे. उस वक़्त खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती क़ीमतों की वजह से यमन के नागरिकों में गहरी नाराज़गी भर गई थी. देश में चौतरफ़ा भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया था. इन तमाम हालातों के चलते 33 सालों से राष्ट्रपति के पद पर क़ाबिज़ सालेह को पद छोड़ना पड़ा.  

उत्तरी यमन में रहने वाले हूती क़बीले के पास फ़ौजी कार्रवाइयों का तजुर्बा था. लिहाज़ा उन्होंने हालात का फ़ायदा उठाते हुए यमन के प्रशासन पर अपना दबदबा क़ायम कर लिया. हूतियों ने सऊदी अरब द्वारा स्थापित अब्दरब्बू मंसूर हादी की अगुवाई वाले प्रशासन को ठेंगा दिखा दिया. हालांकि, हादी को दक्षिण यमन में भारी समर्थन हासिल था. दूसरी ओर हूतियों को भी ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) की ओर से थोड़ी-बहुत मदद मिल रही थी. IRGC ने हूतियों को आधुनिक सैन्य उपकरण और प्रशिक्षण मुहैया कराई थी. हूतियों ने यमनी फ़ौज के एक हिस्से को अपने पाले में कर लिया लिया था. लिहाज़ा उनके पास भी सैनिक साज़ोसामान का एक बड़ा भंडार मौजूद था.    

सऊदी अरब के साथ यमन की सरहद काफ़ी लंबी है. ऐसे में यमन को सऊदी प्रभाव के दायरे में आने वाले देश के तौर पर देखा जाता है. लिहाज़ा हूतियों को ईरानी समर्थन की बात साफ़ हो जाने पर सऊदी अरब ने इसे ईरान की आक्रामक गतिविधि के तौर पर देखा.

सऊदी अरब के साथ यमन की सरहद काफ़ी लंबी है. ऐसे में यमन को सऊदी प्रभाव के दायरे में आने वाले देश के तौर पर देखा जाता है. लिहाज़ा हूतियों को ईरानी समर्थन की बात साफ़ हो जाने पर सऊदी अरब ने इसे ईरान की आक्रामक गतिविधि के तौर पर देखा. ग़ौरतलब है कि 1979 से ही सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे टकराव का दौर चला आ रहा है. नतीजतन सऊदी अरब और उसके क़रीबी साथी यूएई ने यमनी सरकार की मदद करने का फ़ैसला लिया. उन्होंने हूती विद्रोहियो से निपटने में मदद के लिए वहां फ़ौजी टुकड़ियां, हवाई सहायता और सैनिक सलाहकार भेज दिए.   

यूएई पर ही और इसी वक़्त हमला क्यों?

यमन में जारी सत्ता संघर्ष में यूएई भी एक अहम किरदार रहा है. शुरुआती दौर में वो भी वहां के जंग में शामिल रहा था. हालांकि हूतियों के साथ झड़प में अपने नागरिकों की मौत के बाद यूएई का हौसला पस्त हो गया था. नतीजतन 2019 में यूएई ने यमन में जारी टकराव से ख़ुद के बाहर निकलने का एलान कर दिया. हालांकि हूतियों के ख़िलाफ़ जंग लड़ रहे यमनी सैनिकों के साथ यूएई के सलाहकारों का जुड़ाव जारी रहा. 2019 से ही हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कई आक्रामक कार्रवाइयों को अंजाम दिया जाता रहा है. 

जनवरी 2022 में यूएई समर्थित सुरक्षा बलों ने एक बड़ी मुहिम के ज़रिए शबवाह शहर पर क़ब्ज़ा जमा लिया. शबवाह शहर ईंधन के लिहाज़ से संपन्न मारिब प्रांत के प्रवेश द्वार पर स्थित है. सामरिक और वित्तीय अहमियत रखने वाले इस प्रांत को हूती नियंत्रण से सुरक्षित बनाने के इरादे से ये क़दम उठाया गया. हूतियों ने इस कार्रवाई का बदला लेने की धमकी दी थी. ज़ाहिर तौर पर यूएई पर हुए हालिया हमले के पीछे यही प्रमुख वजह मानी जा रही है. 

यूएई पर हुआ हमला कूटनीतिक तौर पर ईरान और सऊदी के बीच अमन चैन बहाल करने के प्रयासों के लिए एक झटका है. इससे ईरान और यूएई में भी क़रीबी लाने की क़वायद को चोट पहुंची है. 

अब भी ये साफ़ नहीं है कि हूतियों ने यमन से इतनी दूर अबु धाबी पर ड्रोन के ज़रिए हमले को आख़िर कैसे अंजाम दिया. इस सिलसिले में भी ईरान पर शक़ जताया गया है. हूतियों की ओर से इतने अत्याधुनिक तरीक़े के हमलों को अंजाम देने में ईरान फ़ौजी तौर पर कहीं ज़्यादा सक्षम है. हालांकि ईरान द्वारा समर्थन मिलने के बावजूद हूतियों ने ईरानी प्रभाव से आज़ाद अपनी अलग नीतियां बना रखी हैं. ऐसे में पूरे हालात को लेकर भ्रम का माहौल और गहरा हो जाता है.  

यूएई पर हुआ हमला कूटनीतिक तौर पर ईरान और सऊदी के बीच अमन चैन बहाल करने के प्रयासों के लिए एक झटका है. इससे ईरान और यूएई में भी क़रीबी लाने की क़वायद को चोट पहुंची है. इन पेचीदगियों के बीच भारत के लिए भी यहां के हालात बेहद अहम हो जाते हैं. ज़ाहिर है भारत को यहां जारी टकराव के बीच अपने विकल्पों का आकलन करना होगा.   

भारत पर प्रभाव

साफ़ है कि यमन में जारी संघर्ष से भारतीय नागरिक भी अछूते नहीं रहे हैं. 2015 में हज़ारों भारतीयों को यमन से निकालने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया गया था. हाल में हुए हमले में भारतीय नागरिक भी मारे गए हैं. जनवरी 2022 के दूसरे हफ़्ते में यूएई के मालवाहक जहाज़ पर हूती विद्रोहियों ने क़ब्ज़ा जमा लिया था. जहाज़ के चालक दल के 11 सदस्यों में से 7 हिंदुस्तानी थे.    

हूती विद्रोहियों के प्रवक्ता ने ऐलान किया है कि अगर यूएई ने यमन में अपनी फ़ौजी गतिविधियों में कमी नहीं की तो वो यूएई पर निशाना बनाना जारी रखेगा. अगर भविष्य में भी ऐसे हमले जारी रहे तो भारतीय नागरिकों के प्रभावित होने की आशंका बरकरार रहेगी. दरअसल, यूएई की कुल आबादी में हिंदुस्तानियों की तादाद 30 फ़ीसदी से भी ज़्यादा है. यूएई में रहने वाले भारतीय रिफ़ाइनरियों और उन तमाम सामरिक ठिकानों में काम करते हैं जिनको हूती विद्रोही अपना निशाना बना सकते हैं. 

हूतियों के पास अपनी धमकियों को हक़ीक़त में बदलने की क़ाबिलियत मौजूद है. लिहाज़ा भारत को इस बारे में किसी गफ़लत में नहीं रहना चाहिए. यूएई में हुए अनेक हमलों में हूती अपना हाथ होने का दावा करते रहे हैं. हालांकि यूएई की सरकार इनका खंडन करती रही है. इसके अलावा सऊदी अरब ने 2015 के बाद से 900 से भी ज़्यादा मिसाइल और ड्रोन हमलों का पता लगाकर उन्हें नाकाम करने का दावा किया है. इससे हूती विद्रोहियों की क़ाबिलियत का पता चलता है. यूएई और सऊदी अरब में बड़ी तादाद में रहने वाले भारतीय अलग-अलग काम धंधों में लगे हैं. मौजूदा तनाव भरे दौर में भारतीय नागरिकों के लिए ख़तरे और भी ज़्यादा बढ़ गए हैं.   

भारत ने अतीत में हूतियों के साथ जंग में घायल हुए सैनिकों को मेडिकल सहायता मुहैया कराई थी. ऐसे में भारत को भी हूती विद्रोहियों के हमलों को लेकर सतर्क रहना होगा.

अपहरण और क़त्लेआमों से साफ़ है कि भारत को अपने नागरिकों की हिफ़ाज़त के लिए तमाम पक्षों के साथ पर्दे के पीछे की कूटनीतिक क़वायदों में जुटना होगा. ग़ौरतलब है कि भारत ने अतीत में हूतियों के साथ जंग में घायल हुए सैनिकों को मेडिकल सहायता मुहैया कराई थी. ऐसे में भारत को भी हूती विद्रोहियों के हमलों को लेकर सतर्क रहना होगा. इसके मायने ये भी हैं कि यमन में भारतीय कारोबारों को भी निशाना बनाया जा सकता है. हालांकि अब तक ऐसा कोई वाक़या देखने को नहीं मिला है.   

भविष्य में भारत के लिए संभावनाएं

भविष्य के लिहाज़ से देखें तो यहां के संघर्ष से अपने नागरिकों के जानमाल को होने वाले संभावित नुकसानों से भारत का चिंतित होना लाज़िमी है. हालांकि इराक़ी संघर्ष की तुलना में मौजूदा दौर के ख़तरे अब भी काफ़ी कम हैं. ग़ौरतलब है कि इस्लामिक स्टेट ने इराक़ में काम करने वाले कई भारतीयों का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी. बहरहाल, हूती विद्रोहियों से जुड़े हालात के भी तेज़ी से बिगड़ने का ख़तरा बना हुआ है.   

ऐसे में भारत को ईरान जैसे देशों के साथ अपने कूटनीतिक जुड़ावों को और मज़बूत करना होगा. ईरान के साथ दीर्घकाल से भारत के अच्छे संबंध रहे हैं. दूसरी ओर यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ भी तक़रीबन पिछले एक दशक से भारत के रिश्तों में काफ़ी तरक्की हुई है. टकरावों से भरे माहौल में आगे बढ़ने के लिए ऐसी क़वायद भारत के लिए काफ़ी मददगार साबित होगी. इससे ख़ासतौर से हालिया हमलों और अपहरणों जैसी वारदातों से निपटने में आसानी होगी. मध्य पूर्व में जारी विभिन्न संघर्षों में भारत को अपनी तटस्थ भूमिका बनाए रखनी चाहिए. इसके साथ ही भारत को इस इलाक़े के देशों के लिए एक बड़े बाज़ार के तौर पर अपने आप को लगातार उभारते रहना होगा. इससे यहां के संघर्षों में शामिल गुट भारतीय ठिकानों को निशाना बनाने से पहले दो बार सोचने को मजबूर हो जाएंगे.  

हालांकि, बीतते वक़्त के साथ पश्चिम एशियाई सियासत के पर्यवेक्षकों के लिए कुछ बातों को समझना ज़रूरी हो जाएगा. इलाक़े में बड़ी तादाद में बसे भारतीयों के चलते हालिया वारदातों जैसे वाक़ये पेश आते रहेंगे. ऐसे में भारत को इस पूरे इलाक़े में अपने ठिकानों की मज़बूती और नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर संभव कोशिश करनी होगी. 

ओआरएफ हिन्दी के साथ अब आप FacebookTwitter के माध्यम से भी जुड़ सकते हैं. नए अपडेट के लिए ट्विटर और फेसबुक पर हमें फॉलो करें और हमारे YouTube चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें. हमारी आधिकारिक मेल आईडी [email protected] के माध्यम से आप संपर्क कर सकते हैं.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.