Author : Akanksha Khullar

Published on Jul 31, 2023 Updated 0 Hours ago

तालिबान के विनाशकारी शासन के छह महीने पूरे होने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का इस समस्या को नज़रअंदाज़ करना जारी है.

अफ़ग़ानिस्तान संकट: दुनियाभर में फैली शोर करने वाली ख़ामोशी के क्या हैं कूटनीतिक मायने?
अफ़ग़ानिस्तान संकट: दुनियाभर में फैली शोर करने वाली ख़ामोशी के क्या हैं कूटनीतिक मायने?

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की ग़लत ढंग से वापसी और उसके बाद काबुल की सत्ता पर तालिबान के कब्ज़े ने अफ़ग़ानिस्तान के मानवीय हालात को विनाश में बदल दिया है. इसका नतीजा ये निकला है कि अफ़ग़ानिस्तान के लाखों नागरिक पैसे के मोहताज हो गए हैं और खाने-पीने के सामान की क़ीमत में काफ़ी बढ़ोतरी हो गई है. तालिबान के आगे बढ़ने के साथ हज़ारों अफ़ग़ानी या तो विस्थापित हो गए हैं या उनकी मौत हो गई है या ज़ख़्मी हैं. लेकिन इन अफ़ग़ानी नागरिकों के बीच भी महिलाएं- जिनके अधिकारों का उल्लंघन तालिबान की विचारधारा के केंद्र में है- तालिबान राज की सबसे ज़्यादा क़ीमत चुका रही हैं. 

ज़मीनी स्तर से जो ख़बरें आ रही हैं वो बताती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़्यादातर महिलाएं आज गंभीर पाबंदियां झेल रही हैं. इनमें ज़बरदस्ती बुर्क़ा पहनना, बिना किसी पुरुष संबंधी के सार्वजनिक जगहों पर जाने से रोक, पढ़ाई-लिखाई और रोज़ग़ार के अवसर में कमी इत्यादि शामिल हैं.

ज़मीनी स्तर से जो ख़बरें आ रही हैं वो बताती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़्यादातर महिलाएं आज गंभीर पाबंदियां झेल रही हैं. इनमें ज़बरदस्ती बुर्क़ा पहनना, बिना किसी पुरुष संबंधी के सार्वजनिक जगहों पर जाने से रोक, पढ़ाई-लिखाई और रोज़ग़ार के अवसर में कमी इत्यादि शामिल हैं. जहां ये सभी हरकतें 1990 से 2001 के बीच तालिबान के पहले शासन के दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ तालिबान के बेरहम ज़ुल्म को साफ़ तौर पर बयां करती हैं, वहीं ‘ज़िम्मेदार’ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने पिछले छह महीनों के दौरान महिलाओं के अधिकारों के धीरे-धीरे ख़त्म होने को लेकर ख़ामोशी का रुख़ अख़्तियार कर रखा है. 

वास्तव में अक्टूबर 2021 में महिला कार्यकर्ताओं ने अफ़ग़ान संकट को लेकर दुनिया के हाथ पर हाथ धरे रखने के ख़िलाफ़ सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन कर तालिबान की नाराज़गी मोल लेने का जोखिम उठाया. प्रदर्शनकारी महिलाओं के हाथ में जो बैनर थे उन पर लिखा था “दुनिया हमें मरते हुए ख़ामोशी से क्यों देख रही है?”. लेकिन ये जज़्बात भी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस बात के लिए उकसाने में नाकाम रहे कि लगातार तालिबान के ख़तरे में जी रही अफ़ग़ान महिलाओं की हिफ़ाज़त के लिए ज़रूरी क़दम उठाया जाए. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का इस तरह चुप्पी साधे रहना हैरान करता है क्योंकि 2001 में दुनिया के कई देशों ने महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रता में सुधार को अफ़ग़ानिस्तान में हस्तक्षेप के लिए एक प्रमुख औचित्य के तौर पर इस्तेमाल किया था. 

अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अलग-अलग देशों की सेना को अक्सर अफ़ग़ान नागरिकों को बचाने के लिए तालिबान लड़ाकों के साथ संघर्ष करना पड़ता था. इस तरह खर्च के मुताबिक़ फ़ायदे का विश्लेषण करने के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय आज वो रक़म अपने देश के विकास में खर्च कर रहा है जो पहले अफ़ग़ानिस्तान में खर्च किया जाता था.

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की ख़ामोशी के कारण?

इस तरह जो महत्वपूर्ण सवाल उठाने की ज़रूरत है वो ये है कि जो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय एक समय अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं की स्थिति को लेकर इतना ज़्यादा चिंतित था, वो आज ख़ुद को ख़ामोश रखने को तरजीह क्यों दे रहा है? शायद आरोप-प्रत्यारोप के खेल में शामिल होने से पहले इसके कारणों को जानना ज़्यादा महत्वपूर्ण है और यही वैश्विक मंच पर सदियों से सामान्य परंपरा रही है. वैसे तो चुप्पी साधे रखने के लिए हर देश का अपना एक अलग कारण है लेकिन सबसे प्रमुख कारणों के बारे में नीचे बताया गया है: 

युद्ध ग्रस्त अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्र निर्माण- जिसमें महिलाओं के अधिकारों में बढ़ोतरी और उनकी हिफ़ाज़त शामिल हैं- में अरबों डॉलर लगाने के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के पास पैसे की कमी है. वास्तव में पिछले दो दशकों के दौरान अंतर्राष्ट्रीय सहायता प्रणाली का परंपरागत प्रावधान था जिसने पश्चिमी देशों के समर्थन से राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के नेतृत्व वाली सरकार, जो अब ध्वस्त हो चुकी है, को सत्ता में बनाए रखा. विश्व बैंक के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान की जीडीपी का 43 प्रतिशत हिस्सा विदेशी सहायता से मिलता था और लगभग 75 प्रतिशत सरकारी खर्च- ख़ास तौर पर महिलाओं की शिक्षा और विकास कार्यक्रमों पर- मदद देने वालों के अनुदान से चलता था. लेकिन इन प्रावधानों और लगातार कोशिशों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को बदले में बहुत कम हासिल हुआ. अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अलग-अलग देशों की सेना को अक्सर अफ़ग़ान नागरिकों को बचाने के लिए तालिबान लड़ाकों के साथ संघर्ष करना पड़ता था. इस तरह खर्च के मुताबिक़ फ़ायदे का विश्लेषण करने के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय आज वो रक़म अपने देश के विकास में खर्च कर रहा है जो पहले अफ़ग़ानिस्तान में खर्च किया जाता था. इस तरह सुविधाजनक ढंग से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अपने हितों की आड़ में अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है. 

अफ़ग़ान नागरिकों की खातिर कई देशों ने अतीत में तालिबान के साथ शांति प्रक्रिया में हिस्सेदारी की थी और उस दौरान तालिबान से अनुरोध किया गया था कि वो सैन्य आक्रमण के बदले अफ़ग़ानिस्तान के भीतर अलग-अलग समूहों से बातचीत में शामिल हो. लेकिन उस अनुरोध को भी नहीं माना गया. 

इस तरह की प्राथमिकता का एक प्रमुख उदाहरण 4 फरवरी 2022 को सामने आया जब अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अफ़ग़ानिस्तान को मदद के तौर पर दिए जाने वाले 7 अरब अमेरिकी डॉलर पर रोक लगा दी और इसका इस्तेमाल अपने देश में करने के एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किया. लेकिन वास्तविकता ये है कि 7 अरब अमेरिकी डॉलर अमेरिका के लिए कोई बड़ी रक़म नहीं है जबकि अफ़ग़ान महिलाओं के लिए ये रक़म उनकी जान बचाने में ज़रूरी है. इस तरह आर्थिक तनाव और खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही हज़ारों अफ़ग़ान महिलाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय मदद बेहद महत्वपूर्ण है. 

इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के भीतर भी कई लोग तालिबान को कूटनीतिक मान्यता देना तो दूर, महिलाओं की रक्षा को सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से उन इस्लामिक कट्टरपंथियों के समूह के साथ बात करने के भी इच्छुक नहीं हैं. इसका कारण सरल है: उन्हें इस बात में ज़रा भी भरोसा नहीं है कि तालिबान अपनी मूल सोच में बदलाव करेगा. सच्चाई ये है कि 90 के दशक में महिलाओं के मानवाधिकारों के लगातार उल्लंघन ने तालिबान के कट्टरपंथियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अछूत बना दिया था. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने 1999 में तालिबान को आतंकवादी संगठन घोषित किया था. 

लेकिन इस घोषणा के बावजूद अफ़ग़ान नागरिकों की खातिर कई देशों ने अतीत में तालिबान के साथ शांति प्रक्रिया में हिस्सेदारी की थी और उस दौरान तालिबान से अनुरोध किया गया था कि वो सैन्य आक्रमण के बदले अफ़ग़ानिस्तान के भीतर अलग-अलग समूहों से बातचीत में शामिल हो. लेकिन उस अनुरोध को भी नहीं माना गया. हाल के दिनों में तालिबान के सैन्य आक्रमण के दौरान सीधे तौर पर महिलाओं के अधिकारों पर निशाना साधा गया, उनके जीवन और स्वतंत्रता पर ग़ैर-क़ानूनी पाबंदियां लगाई गई हैं. 

तालिबान का ‘डर’

इस तरह जहां तालिबान ने इस बार महिलाओं को लेकर अपनी ज़्यादा नरम छवि पेश करने की पूरी कोशिश की है लेकिन हक़ीक़त में उसके वादों की नाकामी देखने के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के कुछ देशों ने आगे बढ़कर तालिबान के साथ किसी भी तरह की बातचीत या अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया को बेकार की कवायद ठहरा दिया है. वास्तव में उन देशों को लगता है कि एक आतंकवादी संगठन के साथ बातचीत का कोई मतलब नहीं है और उसके साथ पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय क़ानून और परंपरा के मुताबिक़ व्यवहार किया जाना चाहिए. लेकिन ऐसा कहने के बावजूद तालिबान के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए अफ़ग़ानिस्तान की आर्थिक और मानवीय समस्याओं, जो महिलाओं और लड़कियों को ज़्यादा प्रभावित करती हैं, को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. 

मौजूदा वैश्विक चुप्पी की एक संभावित वजह तेज़ी से उभर रही भू-राजनीतिक चुनौतियां हो सकती हैं जहां इस्लामिक कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ या समर्थन में किसी भी बातचीत के गंभीर नतीजे हो सकते हैं, इससे उस देश की स्थिति और अहमियत ख़तरे में पड़ सकती है. इसलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अनिश्चित की स्थिति में है.

इसके अलावा मौजूदा वैश्विक चुप्पी की एक संभावित वजह तेज़ी से उभर रही भू-राजनीतिक चुनौतियां हो सकती हैं जहां इस्लामिक कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ या समर्थन में किसी भी बातचीत के गंभीर नतीजे हो सकते हैं, इससे उस देश की स्थिति और अहमियत ख़तरे में पड़ सकती है. इसलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अनिश्चित की स्थिति में है. उदाहरण के लिए, अगर वैश्विक शक्तियां तालिबान को किसी भी तरह की राजनीतिक और कूटनीतिक वैधता प्रदान करती हैं तो इससे इस आतंकवादी समूह को नाराज़ और कंगाल अफ़ग़ान लोगों को तोड़-मरोड़ कर अपने लिए मौक़ा बनाने का अवसर मिल सकता है, वो ऐसी नीतियां और व्यवहार शुरू कर सकता है जो महिलाओं को और नुक़सान पहुंचाएगा. ये तालिबान को मान्यता देने वाले देशों के कार्यकलापों और धैर्य की तरफ भी नकारात्मक राय आकर्षित कर सकती है. 

इसके विपरीत अगर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय महिलाओं के ख़िलाफ़ हरकतों के लिए तालिबान को ज़िम्मेदार ठहराने में मुखर रहता है तो इससे इस संगठन की आतंकवादी कार्रवाईयों को बढ़ावा मिल सकता है. तालिबान ऐसा करके अपने ख़िलाफ़ बयानों को वापस लेने के लिए उन देशों पर दबाव डाल सकता है. जैसा कि हम सभी पहले से जानते हैं तीन बड़े देशों- रूस, पाकिस्तान और चीन- ने अफ़ग़ानिस्तान की नई हुकूमत के लिए अलग-अलग स्तर पर उत्साह और समर्थन का संकेत दिया है. इस तरह तालिबान के ख़िलाफ़ बोलना इस उभरते हुए ताक़तवर समूह के साथ संबंधों में रुकावट पैदा कर सकता है. इस उधेड़-बुन के साथ दुनिया शायद इस बात का इंतज़ार कर रही है कि तालिबान आगे क्या करता है. लेकिन हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना ठीक नहीं है. महत्वपूर्ण सेवाएं मुहैया कराने से भागने, महिलाओं की स्थिति को नज़रअंदाज़ करने या राजनीतिक तौर पर अफ़ग़ानिस्तान को अलग-थलग करने से तालिबान रुकेगा नहीं बल्कि अफ़ग़ानिस्तान के लोगों- ख़ास तौर पर महिलाओं- को ज़्यादा नुक़सान होगा. 

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