Author : Maya Mirchandani

Published on Jul 30, 2023 Updated 0 Hours ago

जैसे-जैसे यूक्रेन की मदद के लिए विदेशी लड़ाके पहुंच रहे हैं, वैसे-वैसे सवाल उठ रहे हैं कि इन विदेशी नागरिकों का क्या होगा क्योंकि विदेशी लड़ाकों की परिभाषा धुंधली होती जा रही है.

यूक्रेन-रूस के बीच संघर्ष में, मदद करने आये विदेशी ग़ैरसरकारी ‘लड़ाकों’ पर असमंजस की स्थिति
यूक्रेन-रूस के बीच संघर्ष में, मदद करने आये विदेशी ग़ैरसरकारी ‘लड़ाकों’ पर असमंजस की स्थिति

ये लेख यूक्रेन संकट: संघर्ष के कारण और सिलसिला का हिस्सा है


इन दिनों पूरे यूरोप के नौजवान यूक्रेन के आम नागरिकों की सेना को मज़बूत कर रहे हैं. ये नौजवान यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की पुकार पर रूस के आक्रमण का मुक़ाबला करने में मदद के लिए आ रहे हैं लेकिन युद्ध में इनके आने की वजह से ‘विदेशी लड़ाकों’ की एक नई नस्ल बन गई है जिसकी वजह से सुरक्षा विशेषज्ञों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है. यूक्रेन के राष्ट्रपति के मुताबिक़ अभी तक 16,000 से ज़्यादा विदेशी नौजवानों ने युद्ध में उनका साथ दिया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार उन नौजवानों में से कई इस मौक़े को “लोकतंत्र और तानाशाही की ताक़तों के बीच अंतिम मुक़ाबले” के तौर पर देखते हैं.  

संयुक्त राष्ट्र में ये कहावत वर्षों से आतंकवाद की सर्वमान्य परिभाषा है कि ‘एक देश के लिए जो स्वतंत्रता सेनानी है वो दूसरे देश के लिए आतंकवादी हो सकता है’. इसकी वजह ये है कि कई देशों ने भू-राजनीतिक कारणों से अलग-अलग विदेशी लड़ाकों, सरकार से अलग किरदारों और जिहादी समूहों का समर्थन किया है.

दोहरा रवैया? 

भाषा बेहद महत्वपूर्ण है और रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी देशों को खड़ा करने वाले किसी ख़ास संदर्भ और सोच के अनुकूल ‘विदेशी लड़ाकों’ के इर्द-गिर्द चालाकी से शब्दों का इस्तेमाल वैश्विक राजनीति में केवल नैतिकता और व्यावहारिकता के बीच विरोधाभास पर ज़ोर देता है. संयुक्त राष्ट्र में ये कहावत वर्षों से आतंकवाद की सर्वमान्य परिभाषा है कि ‘एक देश के लिए जो स्वतंत्रता सेनानी है वो दूसरे देश के लिए आतंकवादी हो सकता है’. इसकी वजह ये है कि कई देशों ने भू-राजनीतिक कारणों से अलग-अलग विदेशी लड़ाकों, सरकार से अलग किरदारों और जिहादी समूहों का समर्थन किया है. शीत युद्ध के दौरान ख़ास तौर पर ये हुआ जब वैचारिक रूप से प्रेरित हिंसा को लक्ष्य हासिल करने का साधन माना जाता था.  

1979 के बाद अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ मुजाहिद्दीनों को अमेरिका का समर्थन या अगस्त 2021 में अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद इन दिनों रूस की अपनी स्थिति इसके कुछ उदाहरण हैं. आतंकवाद को परिभाषित करने के संदर्भ में विद्वान क्रिस मेसेरोल और डैन बायमैन दलील देते हैं कि “यहां तक कि लोकतांत्रिक सरकारों के द्वारा बनाई गई सूचियों में कुछ आतंकवादी समूहों को शामिल करने की संभावना ज़्यादा है.” 9/11 के बाद ख़ास तौर पर विश्व भर में सुरक्षा पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों ने अपने देश को छोड़कर इराक़, सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट के साथ मिलकर लड़ने वाले आतंकियों के लिए ‘विदेशी लड़ाके’ शब्द का इस्तेमाल किया है. इस शब्द का इतना ज़्यादा इस्तेमाल हुआ है कि दूसरे देश में जाकर लड़ने वाले आतंकियों और उनका समर्थन करने वाले नेटवर्क से निपटने के लिए नीति बनाने और न्यायिक प्रक्रिया में भी इसे अपना लिया गया है.

जिन सुरक्षा विशेषज्ञों ने पिछले दो दशकों के दौरान वैश्विक जिहाद के संदर्भ में विदेशी लड़ाकों को लेकर ख़तरे की घंटी बजाई वो अब अमेरिका और यूके जैसे देशों से यूक्रेन के लिए हथियार उठाने वाले ग़ैर-सरकारी किरदारों- सैन्य और नागरिक- की प्रतिबद्धता की तारीफ़ कर रहे हैं.

इसके नतीजतन रातों-रात इस वक़्त का सुरक्षा नामकरण बदल गया है. जिन सुरक्षा विशेषज्ञों ने पिछले दो दशकों के दौरान वैश्विक जिहाद के संदर्भ में विदेशी लड़ाकों को लेकर ख़तरे की घंटी बजाई वो अब अमेरिका और यूके जैसे देशों से यूक्रेन के लिए हथियार उठाने वाले ग़ैर-सरकारी किरदारों- सैन्य और नागरिक- की प्रतिबद्धता की तारीफ़ कर रहे हैं. इसमें स्पष्ट अंतर ये है कि वो एक ‘अच्छे उद्देश्य’ के लिए लड़ रहे हैं. उनकी तारीफ़ में यूक्रेन से एक उम्मीद छिपी हुई है कि एक ज़िम्मेदार देश के तौर पर वो आम नागरिकों की इस सेना की जवाबदेही लेगा, उन्हें एक सामान्य सेना का रूप देगा जैसे कि रेजीमेंट और यूनिफॉर्म, उन्हें बताया जाएगा कि किसके आदेश का पालन करना है. यूक्रेन से ये उम्मीद भी की जाती है कि वो सुनिश्चित करेगा कि किसी भी देश की सेना की तरह ये ‘सैनिक’ अंतर्राष्ट्रीय संधियों के दायरे में रूस के हमले का जवाब देंगे. लेकिन क्या ये इतनी सामान्य बात होगी?

युद्ध के नये नायकों से सावधान

अगर किसी भी देश की सेना और प्रोफेशनल फ़ौज के द्वारा लड़ी गई लड़ाई वेस्टफेलियन सिस्टम (अंतर्राष्ट्रीय क़ानून का एक सिद्धांत जिसके तहत अपने क्षेत्र में हर देश की संप्रभुता है) का नतीजा है तो ये भी उतना ही सही है कि लड़ाई के मैदान में ग़ैर-सरकारी किरदारों में बढ़ोतरी युद्ध के बेहद पुराने रूप की तरफ़ लौटने के समान है चाहे वो यूक्रेन में विदेशी लड़ाके हों, मिडिल-ईस्ट में सक्रिय रूस और अमेरिकी कंपनियों के भाड़े के सैनिक हों या वास्तव में जिहादी आतंकवादी हों जिनका निशाना अंधाधुंध है.

ये सच है कि यूएन चार्टर के तहत हर सदस्य देश को बाहरी आक्रमण की स्थिति में आत्म-रक्षा का अधिकार है और इसमें बाहर से या बाहरी लोगों से मदद लेना शामिल है. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के तहत ऐसे बाहरी लोगों की स्थिति क्या है? क्या उन्हें योद्धा माना जाएगा या ग़ैर-क़ानूनी योद्धा? अगर वो युद्ध अपराध करते हैं तो उनके ख़िलाफ़ किस प्रक्रिया, किस संधि का इस्तेमाल होगा? क्या होगा अगर रूस की सेना उन्हें अपने कब्ज़े में ले लेती है? क्या जेनेवा समझौते के तहत उन्हें क़ानूनी रूप से युद्ध बंदी माना जाएगा? और सबसे बढ़कर ये कि कौन, किस तरह के लोग आज लड़ाई के लिए आ रहे हैं? 

चरमपंथी समूहों पर नज़र रखने वाले एक प्राइवेट रिसर्च ग्रुप साइट इंटेलिजेंस ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि उसने कई उग्र दक्षिणपंथी ऑनलाइन समूहों में रूस के ख़िलाफ़ लड़ने वाले यूक्रेन के लोगों के लिए समर्थन में बढ़ोतरी देखी है. यूक्रेन के समर्थन में एक-दूसरे से अलग, बेमेल लोग जमा हो गए हैं. फिनलैंड और फ्रांस जैसे देशों में उग्र दक्षिणपंथी नागरिक सेना (मिलिशिया) के द्वारा चलाए जा रहे टेलीग्राम चैनल में भर्ती से जुड़े दुष्प्रचार की बाढ़ आ गई है.

आतंक के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई का एक प्रमुख निष्कर्ष ये है कि जो लोग हथियार उठाते हैं वो न सिर्फ़ विचारधारा और पैसे से निर्देशित होते हैं बल्कि कबीलाई सोच का भी उन पर असर होता है.


साइट की निदेशक रीटा कैट्ज़ ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि युद्ध की ट्रेनिंग लेना एक प्रमुख प्रेरणा देने वाली चीज़ है. एक जटिल वैश्विक सुरक्षा के परिदृश्य में जहां उग्र दक्षिणपंथी चरमपंथ एक बढ़ता हुआ अंतर्राष्ट्रीय आतंकी ख़तरा घोषित हो गया है, वहां एक उद्देश्य के लिए विदेशी लड़ाकों की नई नस्ल बनाई जा रही है जो ख़ुद को कट्टरपंथ की चपेट में पा सकती है. आतंक के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई का एक प्रमुख निष्कर्ष ये है कि जो लोग हथियार उठाते हैं वो न सिर्फ़ विचारधारा और पैसे से निर्देशित होते हैं बल्कि कबीलाई सोच का भी उन पर असर होता है. ये कबीलियाई सोच किसी भी नागरिक या सामाजिक पहचान से अधिक महत्वपूर्ण होती है. अमेरिका में नव नाज़ी और श्वेत वर्चस्ववादी (व्हाइट सुप्रीमेसिस्ट) समूहों, जिन्हें व्यापक रूप से 6 जनवरी 2021 को अमेरिकी संसद में फ़साद का ज़िम्मेदार माना जाता है, उन्होंने विदेशी युद्ध भूमि में जाने वाले लड़ाकों पर विश्लेषण की कोशिशों को जटिल बना दिया है. इसकी वजह ये है कि ऑनलाइन वो जो बात करते हैं या उनके निर्णय गहराई से उनकी घरेलू राजनीति से प्रभावित होती है (इसे बाइडेन प्रशासन के ख़िलाफ़ उनकी नफ़रत पढ़िए). 

यूरोप से जो ख़बरें आ रही हैं वो डर, ग़ुस्सा, बदला लेने की ज़रूरत, नस्लवाद और दूसरे देशों के लोगों के प्रति बेहद नफ़रत की हैं. चाहे वो सीमा से आ रही ये ख़बर हो कि अपना देश छोड़ कर भाग रहे लोगों को उनकी त्वचा के रंग के आधार पर अलग-अलग किया जा रहा है या यूरोप में यूक्रेन के श्वेत शरणार्थियों का खुले दिल से स्वागत हो- बाल्कन प्रायद्वीप, सीरिया या अफ़ग़ानिस्तान के शरणार्थियों के ठीक विपरीत- यूक्रेन के लिए समर्थन विभाजनकारी पहचान और चरम राजनीति से जटिल तौर पर मिश्रित है. 

ऐसा नहीं होना चाहिए कि विदेशी लड़ाकों की तारीफ़ का नतीजा उग्र दक्षिणपंथी सैन्य संस्कृति का समर्थन करने या उसे बढ़ाने के रूप में निकले. ऐसा होने पर कट्टरपंथी ग़ैर-सरकारी किरदार पैदा होंगे जो एक ‘उचित’ अभियान के नाम पर हिंसा और ख़तरे को बढ़ावा देंगे.

वैसे तो यूक्रेन का अभियान एक उचित लड़ाई हो सकती है लेकिन ये ज़रूरी है कि इन विदेशी लड़ाकों को नियंत्रित करने वाली परिभाषाएं और उनकी हदों को शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया जाए. जिस तरह यूक्रेन की संप्रभुता की रक्षा करने को दुनिया को ज़िम्मेदारी के तौर पर देखा जा रहा है, उसी तरह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सुनिश्चित करना चाहिए कि अपनी मर्ज़ी से आने वाले विदेशी लड़ाकों के प्रति सराहना का ग़लत मतलब नहीं निकले. ऐसा नहीं होना चाहिए कि विदेशी लड़ाकों की तारीफ़ का नतीजा उग्र दक्षिणपंथी सैन्य संस्कृति का समर्थन करने या उसे बढ़ाने के रूप में निकले. ऐसा होने पर कट्टरपंथी ग़ैर-सरकारी किरदार पैदा होंगे जो एक ‘उचित’ अभियान के नाम पर हिंसा और ख़तरे को बढ़ावा देंगे. 

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Maya Mirchandani is a Senior Fellow at the Observer Research Foundation and Head of Department, Media Studies at Ashoka University. Maya is the Chair of ...

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