Author : Sauradeep Bag

Published on Aug 07, 2023 Updated 0 Hours ago

केवल डिजिटल करेंसी ही किसी देश की आर्थिक चुनौतियों के लिए जादुई समाधान नहीं हो सकती है.

डिजिटल हर सवाल का जवाब नहीं

दुनिया भर में सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को लेकर बढ़ता आकर्षण वित्त और तकनीक में अहम तरक्की को दिखाता है. वैसे तो CBDC कोई नया कॉन्सेप्ट (धारणा) नहीं है लेकिन उसके संभावित फायदों ने हाल के वर्षों में पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. सेंट्रल बैंक के द्वारा जारी नकदी के इस रेगुलेटेड (विनियमित) डिजिटल वर्ज़न ने पारंपरिक क्रिप्टो करेंसी  के मुकाबले बेहतर सुरक्षा, स्थिरता और कार्यक्षमता का भरोसा दिया है.

CBDC का सफर 1993 में शुरू हुआ जब बैंक ऑफ फिनलैंड ने अवांत स्मार्ट कार्ड को जारी किया था. इसे दुनिया की पहली CBDC माना जाता है. हालांकि बाद में बैंक ने इस सिस्टम को बंद कर दिया लेकिन इसने डिजिटल करेंसी के मामले में भविष्य की तरक्की की नींव रखी. आज तकनीकी प्रगति और नोट-सिक्के के रूप में नकद के घटते इस्तेमाल के साथ भुगतान प्रणाली (पेमेंट सिस्टम) की कार्यक्षमता और सुरक्षा को सुधारने के लिए दुनिया भर के सेंट्रल बैंक सक्रिय तौर पर CBDC की संभावना की जांच-पड़ताल कर रहे हैं. अलग-अलग CBDC के संभावित लाभों के बावजूद केंद्रीय बैंकों को इसकी मांग की सावधानीपूर्वक समीक्षा करनी चाहिए और डिजिटल करेंसी को मुख्यधारा में लाने से पहले इस पर अमल के लिए एक ठोस आधार बनाना चाहिए.

डिजिटल करेंसी के संभावित लाभों और उनकी सीमाओं की पूरी समझ के साथ किस तरह CBDC बनाई जा सकती है और उनका इस्तेमाल किया जा सकता है. इस तरह का नज़रिया अलग-अलग देशों और केंद्रीय बैंकों को डिजिटल करेंसी के बारे में झूठी उम्मीदों से परहेज करते हुए इसके असली बदलाव की ताकत का उपयोग करने में सक्षम बनाएगा.

चर्चा के अनुसार समाधान

वैसे तो CBDC के भरपूर फायदों को लेकर कोई शक नहीं है लेकिन ये स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि केवल मुद्रा के डिजिटल रूप की तरफ बदलाव से मौजूदा मौद्रिक मुद्दों का अपने-आप समाधान नहीं हो जाएगा. डिजिटल मुद्रा जहां कई तरह के संभावित हल की पेशकश करती हैं लेकिन उन्हें हर समस्या के समाधान के तौर पर नहीं देखा जा सकता है. अलग-अलग देशों और केंद्रीय बैंकों को पहले बुनियादी समझ हासिल करनी चाहिए और निवेश एवं संसाधनों के आवंटन के माध्यम से आगे की रिसर्च और डेवलपमेंट पर ध्यान देना चाहिए. उन्हें सावधानीपूर्वक उन विशेष चुनौतियों पर विचार और विश्लेषण करना चाहिए जिनका हल CBDC कर सकती है. साथ ही ये भी देखना चाहिए कि डिजिटल करेंसी के संभावित लाभों और उनकी सीमाओं की पूरी समझ के साथ किस तरह CBDC बनाई जा सकती है और उनका इस्तेमाल किया जा सकता है. इस तरह का नज़रिया अलग-अलग देशों और केंद्रीय बैंकों को डिजिटल करेंसी के बारे में झूठी उम्मीदों से परहेज करते हुए इसके असली बदलाव की ताकत का उपयोग करने में सक्षम बनाएगा.

डिजिटल दलदल

करेंसी से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करने और लेन-देन की सुविधा के लिए रिज़र्व बैंक ऑफ ज़िम्बाब्वे ने सोना समर्थित डिजिटल करेंसी की शुरुआत की है. इस पहल का उद्देश्य राष्ट्रीय मुद्रा के मूल्य में गिरावट के बीच कीमत प्रदान करते हुए पीयर-टू-पीयर और पीयर-टू-बिज़नेस लेन-देन को सक्षम बनाना है.

हालांकि इस सोना समर्थित डिजिटल करेंसी को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया ठंडी रही है. वैसे तो सोने का समर्थन ज़रूरत से ज़्यादा लिक्विडिटी को खपा सकता है और स्थानीय मुद्रा को अपेक्षाकृत स्थिरता की पेशकश कर सकता है लेकिन ये ज़िम्बाब्वे को परेशान कर रहे करेंसी से जुड़े गहरे मुद्दों का हल निकालने में नाकाम है. ये लोगों के बीच विश्वास और भरोसे के बुनियादी मुद्दों का समाधान करने में भी नाकाम है. इस तरह की करेंसी को शुरू करने को अक्सर चरम ग़रीबी में फंसे आम लोगों की दुर्दशा को नज़रअंदाज़ करते हुए पैसे वालों की सेवा करने के तौर पर देखा जाता है.

बेलगाम महंगाई और एक से ज़्यादा करेंसी जैसे कि अमेरिकी डॉलर और ज़िम्बाब्वियन डॉलर पर निर्भरता के इतिहास के साथ ज़िम्बाब्वे महत्वपूर्ण लेकिन छिपी हुई चुनौतियों का सामना कर रहा है जिसका हल सिर्फ़ डिजिटल करेंसी को शुरू करने से नहीं हो सकता है. ज़िम्बाब्वे ने 2009 में अमेरिकी डॉलर को अपनाया और बाद में अपनी करेंसी को स्थिर करने के लिए बॉन्ड नोट जारी किए. दुर्भाग्य की बात है कि ये उपाय भी बड़ी मुद्राओं के ख़िलाफ़ ज़िम्बाब्वे के डॉलर के तेज़ अवमूल्यन (डिवैलुएशन) को रोकने में बेअसर साबित हुए. इस तरह CBDC की शुरुआत फिर से डॉलर के इस्तेमाल के उद्देश्य से एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकती है.

ज़िम्बाब्वे के पूर्व वित्त मंत्री टेंडाई बिटि एक वैकल्पिक दृष्टिकोण की सलाह देते हैं, वो सेंट्रल बैंक से ज़िम्बाब्वे के डॉलर को स्वतंत्र रूप से चलने की अनुमति मांग कर  बाज़ार स्थिरता की स्थापना को प्राथमिकता देने का अनुरोध करते हैं. ये नज़रिया महज़ डिजिटल करेंसी की शुरुआत से आगे बढ़कर ज़िम्बाब्वे की आर्थिक और सामाजिक जटिलताओं को संबोधित करने वाले व्यापक समाधानों की ज़रूरत को उजागर करता है.

अस्थिर ज़मीन पर खड़ी इमारत

नाइजीरिया में भी 2021 में सरकार द्वारा समर्थित डिजिटल करेंसी ई-नायरा (eNaira) की शुरुआत अपने बताए गए उद्देश्य को पूरा करने में नाकाम रही है और देश में डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल करने वाले लोग इसके प्रभाव के बारे में सवाल उठा रहे हैं. कुल जनसंख्या के महज़ 0.5 प्रतिशत से भी कम लोगों यानी 11.50 लाख लोगों के द्वारा इसके इस्तेमाल की दर के साथ ई-नायरा किसी भी तरह का असर छोड़ने में विफल रहा है. इसके पीछे कई कारण ज़िम्मेदार है. ज़्यादा प्रगतिशील और रूपांतरण के योग्य (एडेप्टेबल) क्रिप्टोकरेंसी जैसे कि बिटकॉइन के मुकाबले ई-नायरा को कामकाज  और प्रतिस्पर्धा के मामले में कमजोर माना जाता है. साथ ही इसके विकेंद्रित और सरकार के नेतृत्व वाले स्वरूप ने लोगों के बीच संदेह पैदा किया है जो अपनी वित्तीय जानकारी सीधे सरकार को बताने के बारे में चिंतित हैं.

दुर्भाग्य की बात है कि ये उपाय भी बड़ी मुद्राओं के ख़िलाफ़ ज़िम्बाब्वे के डॉलर के तेज़ अवमूल्यन (डिवैलुएशन) को रोकने में बेअसर साबित हुए. इस तरह CBDC की शुरुआत फिर से डॉलर के इस्तेमाल के उद्देश्य से एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकती है.

नाइजीरिया के लोगों के बीच क्रिप्टोकरेंसी की लोकप्रियता का कारण महंगाई से रक्षा करने की उनकी क्षमता, स्थानीय करेंसी का अवमूल्यन और अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन पर कड़े नियम हैं. देश के युवाओं, जो क्रिप्टो करेंसी  का इस्तेमाल करने वाला महत्वपूर्ण वर्ग है, के लिए ई-नायरा ऐसी किसी ख़ास वजह की पेशकश नहीं करता है जिसके कारण वो अपने मौजूदा बैंकिंग ऐप्लिकेशन को छोड़कर ई-नायरा का इस्तेमाल करें. ई-नायरा लगभग क्रिप्टोकरेंसी जैसी ही सेवाएं मुहैया कराता है और उसमें कोई ख़ास फायदा भी नहीं है. इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की सीमित उपलब्धता ने ई-नायरा के व्यापक रूप से इस्तेमाल में रुकावट डाली है.

शुरुआत में लोगों ने दिलचस्पी दिखाई लेकिन बाद में ई-नायरा का इस्तेमाल प्राथमिक रूप से सरकार की अगुवाई में चलाए जा रहे सामाजिक कल्याण की योजनाओं तक ही सीमित है, कुछ ही परिवारों और व्यापारियों ने इस प्लेटफार्म  को अपनाया है. ई-नायरा को इस्तेमाल करने की धीमी गति और कम ट्रांज़ैक्शन वैल्यू नाइजीरिया के भीतर व्यापक स्वीकृति हासिल करने में ई-नायरा के सामने आ रही चुनौतियों के बारे में बताती है.

तुर्की भी धीरे-धीरे इसी तरह की समस्या की तरफ बढ़ रहा है. तुर्की के केंद्रीय बैंक ने पिछले दिनों डिजिटल लीरा के लिए शुरुआती परीक्षण के पूरा होने की घोषणा की. तुर्की की मुद्रा के महत्वपूर्ण अवमूल्यन पर विचार करते हुए डिजिटल लीरा लाने की कोशिश ने वहां के नागरिकों में बिटकॉइन जैसी वैकल्पिक डिजिटल एसेट में दिलचस्पी दिखाने के लिए प्रेरित किया है. लेकिन इसके बावजूद इस बात को लेकर संदेह बना हुआ है कि क्या डिजिटल लीरा असरदार ढंग से देश के सामने खड़ी आर्थिक बाधाओं का समाधान कर सकता है.

पुरानी बातों पर वापस

दुनिया डिजिटल करेंसी को लेकर बढ़ते आकर्षण को देख रही है और इसमें सेंट्रल बैंक भी शामिल हो रहे हैं. ये समझना महत्वपूर्ण है कि केवल डिजिटल नज़रिया अपनाना रामबाण नहीं है. इसके विपरीत, ऐसा करने से नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) की शुरुआत उन देशों में आसानी से हो सकती है जहां राजनीतिक स्थिरता, मज़बूत संस्थान और ठोस मैक्रोइकोनॉमिक नीतिया हैं. इन ज़रूरी पूर्व शर्तों के बिना डिजिटल करेंसी के वादे अधूरे रहने की आशंका है. इसके अतिरिक्त, इंफ्रास्ट्रक्चर एक अहम भूमिका निभाता है; कम दाम पर हर जगह उपलब्ध इंटरनेट ऐसी तकनीकी छलांग की बुनियाद है.

तुर्की की मुद्रा के महत्वपूर्ण अवमूल्यन पर विचार करते हुए डिजिटल लीरा लाने की कोशिश ने वहां के नागरिकों में बिटकॉइन जैसी वैकल्पिक डिजिटल एसेट में दिलचस्पी दिखाने के लिए प्रेरित किया है.

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने डिजिटल मुद्रा के परिदृश्य में भारत की स्थिति को आगे बढ़ाने के लिए 2022 में डिजिटल रुपये की शुरुआत की. कम लेन-देन की लागत और अधिक कार्यक्षमता के मामले में स्थिरता और संभावित लाभों को पेश करते हुए डिजिटल रुपये का उद्देश्य करेंसी नोट की तुलना में डिजिटल गतिशीलता (मोबिलिटी) मुहैया कराना है. हालांकि पहले से मौजूद UPI (यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस) जैसी मज़बूत भुगतान प्रणाली की वजह से सवाल खड़ा होता है कि क्या CBDC मौजूदा परिदृश्य को और बेहतर कर सकती है.

उभरते देशों को ये ज़रूर समझना चाहिए कि विकसित देश फायदेमंद स्थिति में हैं और हो सकता है कि वो जिस समाधान का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो पूरी दुनिया पर लागू नहीं हो. संदर्भ काफी मायने रखता है. डिजिटल करेंसी को अपनाने से पहले केंद्रीय बैंकों को अपने देश की ज़रूरी आवश्यकताओं के बारे में गहरी समझ बनानी होगी. वैसे तो डिजिटल मुद्रा में काफी संभावनाएं हैं लेकिन इसके लिए बुनियादी चीज़ों में निवेश की आवश्यकता है. मज़बूत मैक्रोइकोनॉमिक नीतियों, डिजिटल साक्षरता और एंटरप्रेन्योर एवं व्यवसायियों के समर्थन पर ध्यान देना ज़रूरी है क्योंकि डिजिटल करेंसी अकेले किसी देश की आर्थिक चुनौतियों का जादुई हल नहीं हो सकती है.

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Sauradeep Bag is Associate Fellow at ORF. Sauradeep has worked in several roles in the startup ecosystem and in international development with the United Nations Capital ...

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