Author : Ivan Lidarev

Published on Jul 31, 2023 Updated 0 Hours ago

यूक्रेन में अभी चल रहा युद्ध मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों (CEE) की सुरक्षा का माहौल ख़राब ज़रूर करेगा, मगर इसके साथ साथ वो इन देशों के सुरक्षा ढांचे को भी मज़बूती देगा.

यूक्रेन युद्ध और मध्य व पूर्वी यूरोप की सुरक्षा का विरोधाभास

यूक्रेन युद्ध और मध्य व पूर्वी यूरोप की सुरक्षा का विरोधाभास

यूक्रेन पर रूस के हैरान कर देने वाले हमले ने मध्य और पूर्वी यूरोप को हिलाकर रख दिया है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ये यूरोप की सबसे बड़ी जंग है. जिसकी वजह से चालीस लाख से ज़्यादा यूक्रेनी नागरिक शरणार्थी बन गए हैं. रूस की सेना की बर्बरता और इस युद्ध के कारण रूस से यूरोप के ऊर्जा आयातों की भारी क़ीमत को लेकर सख़्त फ़ैसलों ने मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों को तगड़ा सदमा दिया है और इन देशों की सुरक्षा का भाव बहुत बढ़ा दिया है. इन देशों को यूक्रेन युद्ध के अपने यहां तक पहुंचने का भी अंदेशा है. क्योंकि काला सागर या बाल्टिक सागर में उकसावे वाली कार्रवाई, साइबर हमलों, इन देशों की सीमाओं के क़रीब यूक्रेन की सप्लाई लाइन को निशाना बनाने या फिर पूरी तरह से ग़लत निशाना लगाने के चलते, जंग कभी भी इन देशों की सरहदों में दाख़िल हो सकती है. हालांकि फिलहाल ये आशंका बहुत मामूली है. पिछले हफ़्ते की घटनाओं के बाद से इस बात की आशंका भी बढ़ गई है कि पूर्वी यूरोप में नेटो और रूस के बीच भी युद्ध हो सकता है. वैसे तो ऐसी लड़ाई की आशंका बहुत कम है. मगर ऐसा हुआ तो इसके नतीजे में भारी तबाही मचेगी. कुल मिलाकर कहें तो मध्य और पूर्वी यूरोप की सुरक्षा पर यूक्रेन युद्ध का फ़ौरी तौर पर बहुत गहरा असर हुआ है.

इन देशों की सीमाओं के क़रीब यूक्रेन की सप्लाई लाइन को निशाना बनाने या फिर पूरी तरह से ग़लत निशाना लगाने के चलते, जंग कभी भी इन देशों की सरहदों में दाख़िल हो सकती है.

मध्य और पूर्वी यूरोप की सुरक्षा पर दूरगामी असर

लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि यूक्रेन में युद्ध का मध्य और पूर्वी यूरोप की सुरक्षा पर कैसा दूरगामी असर होगा? निश्चित रूप से इस सवाल का जवाब इस बात में छुपा है कि ये जंग कब और कैसे ख़त्म होगी और इसके बाद यूक्रेन और यूरोप का सियासी मंज़र कैसा होगा. इन बातों से इतर, अभी जो हालात दिख रहे हैं, उनसे ऐसा लगता है कि युद्ध का मध्य और पूर्वी यूरोप के सुरक्षा ढांचे पर विपरीत असर पड़ेगा. एक तरफ़ तो इस युद्ध से मध्य और पूर्वी यूरोप की सुरक्षा का माहौल बड़े पैमाने पर बिगड़ जाएगा. वहीं दूसरी तरफ़ इस जंग से सुरक्षा का से उस ढांचे की बुनियादें मज़बूत होंगी, जो इन देशों की हिफ़ाज़त करती हैं.

यूक्रेन पर रूस के हमले का एक नकारात्मक पहलू ये होगा कि इससे धीरे-धीरे रूस और पश्चिमी देशों, ख़ास तौर से अमेरिका के बीच टकराव बढ़ेगा और एक नए शीत युद्ध की शुरुआत होगी.

एक नए शीत युद्ध की शुरुआत

यूक्रेन पर रूस के हमले का एक नकारात्मक पहलू ये होगा कि इससे धीरे-धीरे रूस और पश्चिमी देशों, ख़ास तौर से अमेरिका के बीच टकराव बढ़ेगा और एक नए शीत युद्ध की शुरुआत होगी. इससे मध्य और पूर्वी यूरोप के देशों को सुरक्षा के ज़्यादा अस्थिर और ख़तरनाक माहौल से दो-चार होना पड़ेगा, क्योंकि ये नया शीत युद्ध पिछली सदी के शीत युद्ध से बिल्कुल अलग होगा. आपसी भरोसा बढ़ाने और किसी संकट को टालने के सीमित उपाय होंगे. जंग की शुरुआत रोकने वाली लक्ष्मण रेखा बहुत अस्पष्ट होगी और पूर्वी यूरोप, कॉकेशस और बाल्कन को अस्थिर करने वाले संघर्षों की जगह लोहे की क्रूर मगर स्थिर दीवार ले लेगी. अहम बात ये है कि नेटो और रूस के बीच ताक़त की असमानता के चलते रूस, तनाव को सैन्य स्तर और यहा तक कि परमाणु युद्ध के मुहाने तक जल्दी ले जाएगा, ताकि तनाव बढ़ाने के मामले में वो आगे रहे और पश्चिमी देशों को अपने क़दम पीछे हटाने पर मजबूर कर सके. नए शीत युद्ध से काला सागर और बाल्टिक सागर इलाक़ों में सैन्य मोर्चेबंदी और बढ़ने की आशंका है. इससे तनाव और किसी भी ग़लती से टकराव होने की आशंका बढ़ जाएगी. हो सकता है कि इससे मॉल्दोवा, जॉर्जिया, पश्चिमी बाल्कन देशों और कुछ ख़ास हालात में बेलारूस जैसे मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों की सीमाओं पर संघर्ष छिड़ने का ख़तरा बढ़ जाएगा. निश्चित रूप से नए शीत युद्ध से मध्य और पूर्वी यूरोप पर आर्थिक बोझ भी पड़ेगा. उन्हें रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में ज़्यादा रक़म ख़र्च करनी पड़ेगी. अगर गहराई से देखें, तो नए शीत युद्ध से मध्य और पूर्वी यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा के लिए अन्य वैश्विक कारणों पर अधिक निर्भर हो जाएंगे, जो उनके अपने प्रभाव क्षेत्र के दायरे से बाहर होंगे. मसलन, अमेरिका और रूस के बीच मध्य पूर्व और एशिया में होड़ और चीन- अमेरिका- रूस के त्रिकोण के बीच सामरिक संबंध भी इन देशों की सुरक्षा पर असर डालेंगे.

मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों की जो भौगोलिक स्थिति है और रूस की सीमा पर नेटो और यूरोपीय संघ के रक्षक वाली जो भूमिका है, उससे उनका राजनीतिक वज़न दोनों ही संगठनों में बढ़ेगा, जो हाल के वर्षों में काफ़ी घट गया था. ये बात पोलैंड पर तो ख़ास तौर से लागू होती है

भू-राजनीतिक दृष्टिकोण

इसके उलट, मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों के लिए युद्ध के सकारात्मक नतीजे भी निकलेंगे. इससे मध्य और पूर्वी यूरोप को सुरक्षा देने वाले ढांचे की बुनियादें भी मज़बूत होंगी. पहले तो ये कि यूक्रेन युद्ध और नए शीत युद्ध से नेटो और इसके पूर्वी क्षेत्र के प्रति अमेरिका की सुरक्षा संबंधी प्रतिबद्धता बढ़ेगी, जो मध्य और पूर्वी यूरोप की सुरक्षा की बुनियाद है. अमेरिका की प्रतिबद्धता में इस इज़ाफ़े की अभिव्यक्ति मध्य और पूर्वी यूरोप में अमेरिकी सैनिकों और हथियारों की ज़्यादा संख्या में तैनाती के रूप में दिखेगी. इसके साथ साथ, अमेरिका और मध्य व पूर्वी यूरोप के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग भी बढ़ेगा. इन बातों और अमेरिका द्वारा रूस को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानने से मध्य और पूर्वी यूरोप की सुरक्षा संबंधी वो चिंताएं दूर हो जाएंगी, जो हिंद प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते मुक़ाबले से पैदा हुई हैं और जिनके चलते अमेरिका ने धीरे-धीरे ख़ुद को यूरोप की सुरक्षा से दूर करना शुरू कर दिया था. दूसरा, ये कि नए शीत युद्ध से नेटो को म़बूती मिलेगी. अहम मुद्दों, जैसे कि गठबंधन के भविष्य, रूस का मुक़ाबला करने और साथी देशों के रक्षा व्यय को लेकर नेटो के सदस्य देशों और अमेरिका व यूरोप के बीच मतभेद कम होंगे. इससे गठबंधन में ब्रिटेन की भूमिका भी बढ़ेगी और ब्रिटेन, रूस पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित करते हुए और भी आक्रामक होगा. मध्य और पूर्वी यूरोपीय देश जो यूरोप में नेटो के सबसे कट्टर समर्थकों में से हैं और रूस के प्रति सख़्त रवैये की वकालत करते हैं, उनके लिए ये वरदान साबित होगा. तीसरा, ये कि यूक्रेन में युद्ध से नेटो और यूरोपीय संघ दोनों में ही मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों की भूमिका मज़बूत होगी और उन्हें आर्थिक और सुरक्षा नीतियां तय करने में अपनी बात रख पाने का ज़्यादा मौक़ा मिलेगा. मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों की जो भौगोलिक स्थिति है और रूस की सीमा पर नेटो और यूरोपीय संघ के रक्षक वाली जो भूमिका है, उससे उनका राजनीतिक वज़न दोनों ही संगठनों में बढ़ेगा, जो हाल के वर्षों में काफ़ी घट गया था. ये बात पोलैंड पर तो ख़ास तौर से लागू होती है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान पोलैंड की सरकार के यूरोपीय संघ और अमेरिका के बाइडेन प्रशासन, दोनों से ही तनावपूर्ण संबंध रहे हैं. लेकिन, यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पोलैंड, यूरोपीय संघ और नेटो के सबसे अहम देश के तौर पर उभरा है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि यूक्रेन युद्ध के नतीजे के अलावा भी मध्य और पूर्वी यूरोप की सुरक्षा पर असर डालने वाले कई ऐसे कारक होंगे, जिनकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. रूस को लेकर पश्चिमी देशों की एकता इसकी एक मिसाल है. ये बात युद्ध को लेकर नेटो देशों के नज़रिए में मतभेद के तौर पर साफ़ दिख रही है. ख़ास तौर से अमेरिका, फ्रास और जर्मनी के बीच के मतभेद, युद्ध के बाद व्यापक नीतिगत मतभेदों में तब्दील हो सकते हैं. रूस और यूक्रेन को लेकर मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों की एकता में भी दरार देखने को मिल सकती है. हंगरी के रुख़ के रूप में इसे अभी से चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. यूरोपीय संघ के बीच रक्षा सहयोग और रूस से इस पर होने वाला पलटवार भी एक कारक हो सकता है. इन सब बातों से इतर अमेरिका- रूस और चीन के आपसी संबंधों का समीकरण भी एक कारक है, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि रूस और चीन, अमेरिका के ख़िलाफ़ कितने क़रीब आते हैं. क्या यूरोप में अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध और एशिया में अमेरिका और चीन के बीच शीत युद्ध मिलकर एक वैश्विक मुक़ाबले में तब्दील होंगे? मध्य और पूर्वी यूरोप के लिए इसका क्या मतलब होगा?

युद्ध के बाद मध्य और पूर्वी यूरोप को सुरक्षा के बेहद ख़राब माहौल का सामना करना पड़ेगा. लेकिन, इसके उलट, वो बुनियादें भी मज़बूत होंगी, जिन पर मध्य और यूरोपीय देशों का सुरक्षा ढांचा टिका हुआ है. 

यूक्रेन युद्ध का मध्य और पूर्वी यूरोप की सुरक्षा पर कैसा दूरगामी असर होगा, इसे तय करने वाली बहुत सी बातें अनिश्चितता के भंवर में हैं. लेकिन, दो बातें बिल्कुल तय लग रही हैं. युद्ध के बाद मध्य और पूर्वी यूरोप को सुरक्षा के बेहद ख़राब माहौल का सामना करना पड़ेगा. लेकिन, इसके उलट, वो बुनियादें भी मज़बूत होंगी, जिन पर मध्य और यूरोपीय देशों का सुरक्षा ढांचा टिका हुआ है. लेकिन, इस विरोधाभास को पूरी तरह उभरकर सामने आने के लिए पहले युद्ध को ख़त्म होना होगा. जंग कब और किस रूप में ख़त्म होगी, यही बात मध्य और पूर्वी यूरोप के सुरक्षा के माहौल और उसकी हिफ़ाज़त के ढांचे का भविष्य तय करेगी.

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Ivan Lidarev is a Visiting Research Fellow at the Institute of South Asian Studies, the National University of Singapore (ISAS-NUS). ...

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