Published on Dec 18, 2021 Updated 0 Hours ago

अगर सिलिकॉन वैली की तरह भारत में भी लंबी अवधि के निवेश के लिए बड़ा पूंजी भंडार होता, तो इस बात की काफ़ी संभावना है कि, भारत के आविष्कारक और स्टार्टअप कंपनियां आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और उन्नत तकनीक के विकास और उन पर आधारित सेवाओं को आगे बढ़ाते.

तक़नीकी विकास के उभार को बढ़ावा देने के लिये, लंबी अवधि के पूंजी निवेश की दरकार: भारत के साहसी निवेशकों से क़दम उठाने की मांग

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उभरती हुई तकनीकों (जिसे डीप टेक – Deep tech – भी कहा जाता है) का विकास पूरी दुनिया में रफ़्तार पकड़ रहा है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, 3D प्रिंटिंग, एडवांस्ड मैटेरियल, इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स (IoT), ब्लॉकचेन और ऑग्यूमेंटेड और वर्चुअल रियलिटी को आज बड़ी-बड़ी कंपनियां, नए कारोबारी और यहां तक कि सरकारें भी ज़्यादा तेज़ी से अपना रही हैं. इन उभरती तकनीकों से कई आर्थिक सामाजिक और पर्यावरण की रक्षा करने वाले लाभ मिले हैं. उदाहरण के लिए, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके आज ये तय किया जा रहा है कि किसान कब अपनी फसलों पर कीटनाशक और दूसरे उपाय करें, जो सबसे ज़्यादा प्रभावी रहें. ये फ़ैसला बहुत स्थानीय स्तर पर सलाह मशविरे के आधार पर लिया जा रहा है, जिससे उपज भी बढ़ रही है और किसानों की आमदनी में भी इज़ाफ़ा हो रहा है. 3D प्रिंटिंग की तकनीक का इस्तेमाल करके प्रोस्थेटिक हाथ पैर बनाए जा रहे हैं. वहीं, ब्लॉकचेन का इस्तेमाल करके बड़े दानदाताओं द्वारा बांटे जाने वाले खाने के बारे में डिजिटल तरीक़े से फीडबैक जुटाया जा रहा है.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके आज ये तय किया जा रहा है कि किसान कब अपनी फसलों पर कीटनाशक और दूसरे उपाय करें, जो सबसे ज़्यादा प्रभावी रहें.

ऐसे बदलाव लाने वाली तकनीकों के विकास की अगुवाई, ख़ुद स्टार्टअप कंपनियां कर रही हैं. हालांकि, ऐसी उभरती हुई तकनीकों का सफल विकास बहुत चुनौती भरा होता है. अक्सर इसमें काफ़ी पूंजी और समय लगता है. ये मुख्य धारा की तकनीकों के विकास की उन परिस्थितियों से बिल्कुल अलग होता है, जिनका फ़ायदा वेंचर कैपिटलिस्ट (VC) उठाते हैं. किसी भी देश में स्टार्ट-अप के इकोसिस्टम को तैयार करने और उसे आगे बढ़ाने में ऐसे पूंजी निवेश करने वाले (VC) बहुत अहम भूमिका निभाते हैं. वो न सिर्फ़ स्टार्ट अप कंपनियों को पूंजी उपलब्ध कराते हैं, बल्कि उनकी क्षमता बढ़ाने में भी काफ़ी मदद करते हैं. भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक अग्रणी देश बनने के कगार पर है. लेकिन, अंतरिक्ष के क्षेत्र में काम कर रही भारत की कई स्टार्ट-अप कंपनियों का विकास सिर्फ़ लंबी अवधि का पूंजी निवेश न हो पाने की वजह से रुका हुआ है. इसीलिए वेंचर कैपिटलिस्ट (VC) को चाहिए कि वो अपने निवेश पर जोखिम सहने की क्षमता को थोड़ा और बढ़ाएं और इसके साथ साथ उभरती हुई तकनीकों का मूल्यांकन कर पाने की क्षमता भी बढ़ाएं. इससे डीप टेक में काफ़ी मात्रा में निवेश का फ़ायदा मिलेगा और इससे भारत में आविष्कारकों के लिए संभावनाओं के नए दरवाज़े खुलेंगे.

देश में तकनीक का आधुनिक इकोसिस्टम

भारत में दुनिया का सबसे बहुआयामी और तकनीक का आधुनिक इकोसिस्टम मौजूद है. पिछले एक दशक में भारत के जोखिम लेने वाले निवेशकों ने भी इसे बढ़ाने की दिशा में काफ़ी प्रगति की है. ये बात लगातार पूंजी जुटाने, पूंजी के प्रवाह और निवेश के सक्रिय भंडारों में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी से स्पष्ट है. लेकिन, भारत में लगभग 11 हज़ार से अधिक स्टार्ट-अप कंपनियों में से केवल नौ फ़ीसद को ही बाहर से पूंजी मिल रही है. इस उद्योग से जुड़े हुए लोग कहते हैं कि अगर हम भारत के स्टार्ट-अप की तुलना अमेरिका की सिलिकॉन वैली से करें, तो यहां पर नए कारोबार के निवेशक बहुत कम जोखिम लेते हैं. ज़्यादातर निवेशक आम तौर पर अपनी पूंजी ऐसी स्टार्ट-अप कंपनियों में लगाते हैं, जिनकी परिकल्पना ठोस होती है और जिनके उत्पादों का बाज़ार मौजूद रहने से उनके मुनाफ़ा कमाने की काफ़ी अधिक संभावना रहती है. इसका एक नतीजा ये होता है कि नए क्षेत्र में आविष्कार करने वाले शुरुआती आविष्कारकों को विचार के स्तर से अपने उत्पाद का प्रोटोटाइप बनाने तक कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. जिससे किसी आविष्कार को व्यवहार में लाने तक का सफ़र काफ़ी लंबा हो जाता है.

ज़्यादातर निवेशक आम तौर पर अपनी पूंजी ऐसी स्टार्ट-अप कंपनियों में लगाते हैं, जिनकी परिकल्पना ठोस होती है और जिनके उत्पादों का बाज़ार मौजूद रहने से उनके मुनाफ़ा कमाने की काफ़ी अधिक संभावना रहती है. 

रिसर्च, विकास में धन और समय की ज़्यादा खपत

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जैसी उभरती तकनीक के मामले में तो ये दुविधा और भी पेचीदा हो जाती है. क्योंकि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से जुड़े किसी भी आविष्कार में काफ़ी लागत आती है. इस पर रिसर्च और विकास करने में समय भी काफ़ी अधिक लगता है, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के आविष्कारकों को लंबे समय तक धीरज बनाए रखने वाले निवेशकों की ज़रूरत होती है- यानी ऐसे निवेशक जो तुरंत मुनाफ़ा कमाने के बजाय भविष्य में किसी तकनीक से बेहतर रिटर्न की अपेक्षा रखते हों. इसके अलावा, भारत के ज़्यादातर वेंचर कैपिटलिस्ट अभी साबित हो चुके और मुख्य धारा में शामिल किए जा चुके उत्पादों, जैसे कि वित्तीय तकनीक, मीडिया और गेम के क्षेत्र में निवेश करने में दिलचस्पी लेते हैं. इसीलिए, डीप टेक को अच्छे से समझने और फिर निवेश करने वाले विशेषज्ञों की कमी भी है. निवेशक कंपनियों में तकनीक की समझ न रखने वाले लोगों की कमी के कारण, ये निवेशक अक्सर किसी भी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाले उत्पाद की तकनीकी उपयोगिता समझने और उसके कारोबारी मुनाफ़े की संभावनाएं देखने में नाकाम रहते हैं. ऐसी दुविधा और जानकारी की कमी, उभरती हुई तकनीक के अन्य क्षेत्रों में भी आम हैं. इसके कारण, इनोवेशन के शुरुआती चरणों में निवेश हासिल करने की संभावनाएं और भी कम हो जाती हैं.

जुलाई 2021 में सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, भारत में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से नए आविष्कार करने वाली 2700 से ज़्यादा स्टार्ट-अप कंपनियां हैं. इसी बीच, भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित स्टार्ट अप कंपनियों ने वर्ष 2020 में 83 करोड़ डॉलर से अधिक का पूंजी निवेश हासिल किया था. वैसे तो ये रक़म काफ़ी सम्मानजनक है. लेकिन, स्टार्ट-अप कंपनियों और वीसी के अधिकारी इशारा करते हैं कि इसमें से ज़्यादातर पूंजी कुछ गिनी चुनी ही नई कंपनियों में निवेश की गई है. इसके अलावा अमेरिका स्थित निवेश कंपनियों जैसे कि सेकुओया, एक्सेल और टाइगर ग्लोबल, जापान के सॉफ्ट बैंक ने ही इसमें से सबसे अधिक निवेश किया है. वहीं, भारत में अपने शुरुआती दौर वाली स्टार्ट अप कंपनियों को अक्सर पूंजी निवेश हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. क्योंकि, पश्चिमी देशों और पूर्वी एशिया के निवेशकों की तुलना में भारत के निवेशक जोखिम लेने को तैयार नहीं होते हैं.

भारत के ज़्यादातर वेंचर कैपिटलिस्ट अभी साबित हो चुके और मुख्य धारा में शामिल किए जा चुके उत्पादों, जैसे कि वित्तीय तकनीक, मीडिया और गेम के क्षेत्र में निवेश करने में दिलचस्पी लेते हैं. 

भारतीय स्टार्ट-अप कंपनियों का योगदान

पूंजी निवेश की ये कमी ही वो वजह है कि भारत आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप टेक के इकोसिस्टम में दुनिया भर का अगुवा बनने की अपनी क्षमता हासिल नहीं कर पाया है. दुनिया के अग्रणी कोड शेयरिंग मंच गिटहब पर 30 प्रतिशत से अधिक योगदान भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी स्टार्ट-अप कंपनियां कर रही हैं. जो किसी भी दूसरे देश की तुलना में कहीं ज़्यादा है. इससे पता चलता है कि भारत में प्रतिभा का विशाल भंडार है. अगर, भारत में सिलिकॉन वैली जैसे बड़े और धैर्य रखने वाले निवेशक होते, तो इस बात की काफ़ी संभावना थी कि भारत के इनोवेटर और स्टार्ट अप कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप टेक पर आधारित नए उत्पादों का न केवल विकास करतीं, बल्कि इनसे जुड़ी सेवाएं भी प्रदान करतीं.

पहले के उदाहरण साबित करते हैं कि जो कंपनियां तकनीकी रूप से काबिल अधिकारियों की कमान में होती हैं, वो भविष्य के तकनीकी ट्रेंड का अंदाज़ा लगाकर निवेश करते हैं. 

नए कारोबार में निवेश करने वाली कंपनियों को चाहिए कि वो उभरती हुई तकनीक पर आधारित कंपनियों की तुलना किसी आम सॉफ्टवेयर कंपनी से करने से बचें. उभरती हुई तकनीकों के विकास के लिए लंबे समय तक रिसर्च करनी पड़ती है. इसलिए उन्हें ऐसे निवेश की ज़रूरत होती है, जिसकी तरफ़ से न ये अपेक्षा हो और न ही कोई दबाव हो कि वो फौरन ही मुनाफ़ा कमाने लगे. पहले के उदाहरण साबित करते हैं कि जो कंपनियां तकनीकी रूप से काबिल अधिकारियों की कमान में होती हैं, वो भविष्य के तकनीकी ट्रेंड का अंदाज़ा लगाकर निवेश करते हैं. उदाहरण के लिए कभी दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी रही नोकिया ने एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट की तुलना में बहुत कम प्रबंधकों और तकनीकी हुनर वाले लोगों को रखा. वहीं एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट ने दूसरी रणनीति अपनाई, जो आज आईफोन और एंड्रॉयड स्मार्टफोन की शक्ल में हमारे सामने है. इसी तरह भारत की वीसी कंपनियों को भी चाहिए कि वो अपनी अंदरूनी तकनीकी क्षमताएं विकसित करने पर भी ध्यान दें.

तकनीक की गहरी समझ ज़रूरी

सबसे अहम बात तो ये है कि इन निवेशकों को चाहिए कि वो ऐसे साझीदार ले आएं, जिन्हें उभरती हुई तकनीकों के विकास का तजुर्बा हो और जो भविष्य में पूंजी के इस्तेमाल का एक दूरगामी नज़रिया क़ायम कर सकें. मुख्य अधिकारी, उसके सहयोगियों और विश्लेषकों को चाहिए कि वो लगातार रिसर्च और विकास के काम में जुटी टीम के साथ संपर्क में रहें. इसके लिए वो सलाह मशविरों के साथ-साथ आयोजनों का भी सहारा ले सकते हैं, जिससे वो ख़ुद को नए-नए तकनीकी विकास की जानकारी से जोड़े रख सकें. इसके अलावा, कर्मचारियों को चाहिए कि वो नई और आने वाली तकनीकों के बारे में अपनी जानकारी और समझ को लगातार बढ़ाते रहें. इसके बाद वीसी कंपनियां अपनी जानकारी का इस्तेमाल करके इनोवेशन करने वालों के मूल्यांकन कर सकती हैं, जिससे वो ये तय कर सकेंगी कि कौन सी विकसित हो रही तकनीक में संभावनाएं हैं. किस प्रोजेक्ट में निवेश से भविष्य में मुनाफ़ा कमाया जा सकता है. इसके बाद वो पूंजी निवेश करें और पोर्टफोलियो का प्रबंधन करें. उभरती हुई तकनीकों में निवेश कर रही बैंगलोर की एक शुरुआती दौर की वेंचर कैपिटल कंपनी, कलारी कैपिटल के प्रणव कौशल के मुताबिक़, ‘उभरती हुई नई-नई तकनीकों के बारे में जानकारी रखना और अपनी समझ बढ़ाना, हमारे काम का हिस्सा है. इसके लिए मूल तकनीक की गहरी समझ होनी चाहिए. जिससे आने वाले समय में तमाम उद्योगों में उससे जुड़े इनोवेशन के फ़ायदे समझे जा सकें. हो सकता है कि आज वो बातें दिख ही न रही हों.’ हालांकि ऐसे उत्पाद विकसित करने वालों के बारे में समझ रखने वाले तजुर्बेकार अधिकारियों के होने से वो आने वाले समय की तकनीक में निवेश का एक नज़रिया विकसित कर सकेंगे और सही क़दम उठाकर सही मूल्यांकन के ज़रिए सटीक स्टार्ट-अप कंपनी का चुनाव कर सकेंगे.

 ‘उभरती हुई नई-नई तकनीकों के बारे में जानकारी रखना और अपनी समझ बढ़ाना, हमारे काम का हिस्सा है. इसके लिए मूल तकनीक की गहरी समझ होनी चाहिए. 

इसके साथ-साथ, वेंचर कैपिटलिस्ट को चाहिए कि वो अपनी वैकल्पिक क्षमताओं का भी विकास करें. जैसे कि ऐसी पोर्टफोलियो कंपनियों की मदद करने की क्षमता का विकास, जो किसी उत्पाद के परीक्षण और स्थानीय स्तर पर उसके उपयोग, बौद्धिक संपदा की चुनौतियों से निपटने, नियामक अनिश्चितताओं, धोखाधड़ी, आपसी तालमेल की गड़बड़ियों, मार्केटिंग और व्यक्तिगत विज्ञापन में महारत रखती हों. निवेश तो अहम है ही. किसी भी उभरती तकनीक के विकास और उसके सफल होने के दौरान अन्य कारण भी होते हैं, जो काफ़ी अहम भूमिका निभाते हैं. उदाहरण के लिए, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित एप्लिकेशन के लिए उच्च गुणवत्ता वाले किसी ख़ास सेक्टर से जुड़े आंकड़ों की ज़रूरत होती है, जिससे वो ऐप्लिकेशन असरदार ढंग से काम कर सके. किसी तकनीक के प्रयोग के दौरान ग़लत नतीजा निकलने पर जुर्माने की व्यवस्था से जुड़े नियमों को लेकर अनिश्चितता से भी कई परेशानियां खड़ी होती हैं. शुरुआती स्तर पर पूंजी जुटाने के साथ-साथ अगर नए कारोबार के निवेशक, नागरिक संगठन और नगर निगम, राज्य और केंद्र सरकार द्वारा ऐसी चुनौतियों का समाधान करने से भारत में उभरती तकनीकों के विकास के इको-सिस्टम को काफ़ी बढ़ावा मिलेगा. चूंकि भारत उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बीच उभरती तकनीक का अग्रहणी देश है. ऐसे में अगर भारत इस क्षेत्र में कामयाबी हासिल कर पाता है, तो ये भारत जैसी आबादी और सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों वाले अन्य देशों, जैसे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, नाइजीरिया और ब्राज़ील के लिए भी प्रेरणा और उदाहरण का काम करेगा.

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