Published on Jul 31, 2023 Updated 0 Hours ago

इस साल की आईपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल) रिपोर्ट मांग-पक्षीय न्यूनीकरण (demand-side mitigation) की बात करती है, और कहती है कि इससे 2050 तक उत्सर्जन में 40-70 फ़ीसद की कमी लाने में मदद मिल सकती है.

आईपीसीसी रिपोर्ट में पहली बार : जलवायु परिवर्तन में कमी लाने के सामाजिक पहलू
आईपीसीसी रिपोर्ट में पहली बार : जलवायु परिवर्तन में कमी लाने के सामाजिक पहलू

4 अप्रैल 2022 को जारी हुई, जलवायु परिवर्तन में कमी लाने पर आईपीसीसी कार्य समूह तृतीय (WGIII) की छठी आकलन रिपोर्ट (एआर6) 2900 से ज़्यादा पन्नों की है. यह आईपीसीसी प्रक्रिया की छठी पुनरावृत्ति है. यह रिपोर्ट 17 अध्यायों में बंटी हुई है और हर अध्याय औसतन 150 पन्नों का है. पूरी रिपोर्ट को मंजूरी मिलनी अभी बाकी है और आगाह करती है कि ‘इसे उद्धृत या वितरित न करें.’ यह जलवायु परिवर्तन में कमी लाने के वैज्ञानिक, तकनीकी, पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक पहलुओं पर सामग्री का आकलन करती है.

लब्बोलुआब यह है कि 2025 तक उत्सर्जन अपने उच्चतम बिंदु पर होना चाहिए, ताकि दुनिया को तापमान-वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने के पेरिस समझौते के लक्ष्य को पूरा करने का एक मौक़ा मिल सके.

कार्य समूह प्रथम (WGI) की एआर6 रिपोर्ट ने जलवायु प्रणाली की फिजिकल साइंस पर ध्यान केंद्रित किया और यह अगस्त 2021 में प्रकाशित हुई. इसने कहा कि जलवायु वैज्ञानिकों ने जैसा पहले अनुमान लगाया था जलवायु उससे ज़्यादा तेज़ी से बदल रही है. कार्य समूह द्वितीय की एआर6 रिपोर्ट फरवरी 2022 में जारी हुई. इसने कहा कि वैश्विक जलवायु प्रणाली में व्यवधान के नतीजे भी उम्मीद से ज्यादा बुरे हैं. साथ ही यह मूल्यांकन किया कि मनुष्य और प्राकृतिक संसार उन नतीजों के लिए कितने अनुकूलित हो सकेंगे. लब्बोलुआब यह है कि 2025 तक उत्सर्जन अपने उच्चतम बिंदु पर होना चाहिए, ताकि दुनिया को तापमान-वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने के पेरिस समझौते के लक्ष्य को पूरा करने का एक मौक़ा मिल सके.

आईपीसीसी रिपोर्ट की दलील

WGIII रिपोर्ट उन क़दमों का ज़िक्र करती है, जिन्हें दुनिया सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में वृद्धि को एक निश्चित सीमा से परे जाने से रोकने के लिए उठा सकती है. तापमान-वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने के लिए, 2019 के मुक़ाबले 2050 में कोयला, तेल तथा गैस के इस्तेमाल में क्रमश: 95 फ़ीसद, 60 फ़ीसद और 45 फ़ीसद की कमी लानी होगी. आईपीसीसी रिपोर्ट की दलील है कि ‘अकेले तकनीक और क़ीमत के पक्ष को ध्यान में रखते हुए, तापमान-वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने के लिए उत्सर्जन में कमी लाना संभव है.’ रिपोर्ट कहती है कि 1.5°C से अधिक की तापमान-वृद्धि से बचने के लिए, वैश्विक उत्सर्जन को 2025 से पहले उच्चतम बिंदु पर पहुंच जाना चाहिए और फिर 2030 से पहले इसे 2019 के स्तरों के मुक़ाबले 43 फ़ीसद गिरना चाहिए. क्षेत्र-विशिष्ट न्यूनीकरण दृष्टिकोण (अध्याय 6 से 11 तक) ऊर्जा एवं सामग्री दक्ष विनिर्माण, नये प्रोडक्ट डिजाइन, ऊर्जा दक्ष भवनों, परिवहन अवसंरचना के डिजाइन में बदलावों और सघन शहरी रूपों में सुधार के ज़रिये न्यूनीकरण (mitigation) की संभावना पर जोर देते हैं.

रिपोर्ट का आकलन है कि तापमान-वृद्धि को 2°C के नीचे रखने के लिए जिन क़दमों को उठाने की ज़रूरत है वे 2050 तक वैश्विक जीडीपी को 1.3 फ़ीसद से 2.7 फ़ीसद तक घटा सकते हैं

रिपोर्ट का आकलन

हालांकि, इन सबकी एक ख़ासी क़ीमत है. रिपोर्ट का आकलन है कि तापमान-वृद्धि को 2°C के नीचे रखने के लिए जिन क़दमों को उठाने की ज़रूरत है वे 2050 तक वैश्विक जीडीपी को 1.3 फ़ीसद से 2.7 फ़ीसद तक घटा सकते हैं. लेकिन ऐसा न करने की अपनी क़ीमत है, जो ज़िंदगियों व रोज़ी-रोटी के नुक़सान, चरम मौसमी घटनाओं से बर्बादी, उत्पादकता के नुक़सान वग़ैरह के रूप में है. ग्लोबल वॉर्मिंग को 2°C तक या उससे नीचे सीमित करने से अच्छी ख़ासी मात्रा में जीवाश्म ईंधन धरती के नीचे पड़ा रह जायेगा और इसका नतीजा बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन अवसंरचना के बेकार हो जाने के रूप में सामने आ सकता है. 2015 से 2050 तक बिना जले रह गये जीवाश्म ईंधन और बेकार हुए जीवाश्म ईंधन अवसंरचना की संयुक्त बट्टा कटी क़ीमत (डिस्काउंटेड वैल्यू) एक से चार ट्रिलियन डॉलर के बीच रहने का अनुमान है. अगर ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5°C तक सीमित रखा गया तब भी यह अधिक होगा.

चुनाव छोटी अवधि में आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक व्यवधानों (जो अनिवार्य रूप से अस्तित्व से जुड़े नहीं हैं) और मझोली से लंबी अवधि में वैश्विक आबादी के बड़े हिस्सों के लिए अस्तित्व संबंधी व्यवधानों (ख़ासकर दुनिया के सबसे ग़रीब हिस्सों और निचले इलाक़ों के लिए, जिन पर चढ़ते समुद्र और विध्वंसकारी तूफानी बाढ़ का ख़तरा मंडरा रहा है) के बीच करना है. निकट-कालिक व्यवधानों में ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) की अधिकता वाले उद्योगों की जगह बदलना और वैल्यू चेन्स का पुनर्गठन शामिल हो सकता है. निम्न जीएचजी वाली ऊर्जा एवं कच्चे माल से भरपूर क्षेत्रों के पास निम्न-कार्बन बिजली और हाइड्रोजन का इस्तेमाल कर तैयार किये गये हाइड्रोजन-आधारित रसायनों और पदार्थों का निर्यातक बनने की क्षमता है. इस तरह के पुनर्स्थापन के रोज़गार और आर्थिक ढांचे पर वैश्विक वितरणात्मक प्रभाव होंगे.

न्यूनीकरण की लागत उन देशों को वहन करनी होगी जो क़दम उठायेंगे, जबकि जलवायु परिवर्तन में कमी के फ़ायदे सिर्फ़ उन तक सीमित नहीं रहेंगे. आर्थिक शब्दावली में कहें, तो यह ‘नॉन-एक्सक्लूडेबल’ होगा

न्यूनीकरण की लागत उन देशों को वहन करनी होगी जो क़दम उठायेंगे, जबकि जलवायु परिवर्तन में कमी के फ़ायदे सिर्फ़ उन तक सीमित नहीं रहेंगे. आर्थिक शब्दावली में कहें, तो यह ‘नॉन-एक्सक्लूडेबल’ होगा. निष्क्रियता की लागत या मझोली से लंबी अवधि के व्यवधानों के लिए भी यही बात लागू होती है, ज़रूरी नहीं कि मुफ़्त फ़ायदा उठानेवाले जलवायु परिवर्तन से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हों. यह रिपोर्ट न्यूनीकरण, जिसमें जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध ढंग से हटाना भी शामिल है, के अवरोधों के रूप में राजनीति और सत्ता संबंधों को तथा यथास्थिति बनाये रखने में निहित हितों को चिह्नित करती है. बहुत कम जनसंख्या घनत्व और उच्च जीवाश्म ईंधन भंडार व अवसंरचना वाले देशों की न्यूनीकरण में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं होगी. उदाहरण के लिए, पिछले साथ अमेरिका ने 2030 तक उत्सर्जन घटाकर आधा करने का वादा किया, लेकिन 2021 में उत्सर्जन 7 फ़ीसद बढ़ गया. इसे बड़ी आबादी तथा कम या बिना तेल भंडार, क्षारीय धातुओं के बड़े भंडार और/या हाइड्रोजन अवसंरचना वाले देशों द्वारा प्रतिसंतुलित किया जा सकता है.

विकल्पों की बात

WGIII एआर6 रिपोर्ट दूसरे न्यूनीकरण विकल्पों की बात करती है, जिनके कम विवादित रहने की उम्मीद है. उदाहरण के लिए, मांग पक्षीय (डिमांड साइड) न्यूनीकरण. ‘सभी सेक्टरों में मांग-पक्षीय रणनीतियों से अनुमानित संभावना 2050 तक उत्सर्जन 40-70 फ़ीसद कम होने की है (उच्च विश्वास).’ यह रिपोर्ट के अध्याय 5 में है, जो दूसरे अध्यायों से बिल्कुल अलग है. इसका शीर्षक है- ‘मांग, सेवाएं और न्यूनीकरण के सामाजिक पहलू’. आईपीसीसी आकलन रिपोर्ट में शायद पहली बार इसे शामिल किया गया है. इस अध्याय के भीतर भाग तीन, अवसरों के लिए जगह (opportunity space) का ख़ाका तैयार करने पर है, और यह मूलतत्व है. इसकी बानगी है, ‘कुशलक्षेम बढ़ाने के लिए, लोग सेवाओं की मांग करते हैं, न कि प्राथमिक रूप से ख़ुद ऊर्जा और भौतिक संसाधनों की. सेवाओं के लिए मांग और लोगों द्वारा निभायी जाने वाली विभिन्न सामाजिक एवं राजनीतिक भूमिकाओं पर ध्यान केंद्रित करना जलवायु संबंधी कार्रवाई में भागीदारी को व्यापक बनाता है.’ इसका तर्क है कि मांग-पक्षीय न्यूनीकरण और सेवाएं प्रदान करने के नये तरीक़े अंतिम सेवा मांग में ‘बचाव, बदलाव और सुधार’ (avoidshift, and improve) को लागू करने में मदद कर सकते हैं. ‘बचाव  की सबसे बड़ी संभावना है लंबी दूरी की उड़ानों में कमी तथा कम दूरी की निम्न-कार्बन शहरी अवसंरचना मुहैया कराने में. बदलाव  की सबसे बड़ी संभावना होगी पेड़-पौधों पर आधारित भोजन की ओर जाने में. सुधार  की सबसे बड़ी संभावना भवन क्षेत्र के अंदर है, और ख़ासकर ऊर्जा दक्ष एंड-यूज टेक्नोलॉजी और पैसिव हाउसिंग का इस्तेमाल बढ़ाने में.’

सेवाओं के लिए मांग और लोगों द्वारा निभायी जाने वाली विभिन्न सामाजिक एवं राजनीतिक भूमिकाओं पर ध्यान केंद्रित करना जलवायु संबंधी कार्रवाई में भागीदारी को व्यापक बनाता है.’ इसका तर्क है कि मांग-पक्षीय न्यूनीकरण और सेवाएं प्रदान करने के नये तरीक़े अंतिम सेवा मांग में ‘बचाव, बदलाव और सुधार’ को लागू करने में मदद कर सकते हैं. 

अध्याय 5 के लेखक यह विश्वास करते प्रतीत होते हैं कि अब इस बात के काफ़ी प्रमाण हैं और काफ़ी सहमति है कि कोविड-19 महामारी ने सार्वजनिक वस्तुओं (जिनमें जलवायु परिवर्तन नीतियां भी शामिल हैं) के प्रावधानों के लिए सेवाओं को समर्थन देने की बड़े पैमाने पर सरकारी कार्रवाई की राजनीतिक व्यवहार्यता को बढ़ाया है. दोनों संकटों के वैश्विक होने और समग्र सामाजिक प्रतिक्रिया की ज़रूरत के बावजूद यह बात सही नहीं लगती. कोविड-19 के प्रकोप का नतीजा तेज़ी से जानों के नुक़सान और पाबंदियों के रूप में सामने आया, जिसके बाद सामर्थ्य में मज़बूती और बढ़ी हुई एकजुटता देखने को मिली. लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के नतीजे इतने नाटकीय ढंग से सामने आने की संभावना नहीं है और इसलिए देखभाल, आजीविका संरक्षण, सामूहिक कार्रवाई और बुनियादी सेवाओं के प्रावधानों के इर्द-गिर्द अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण के लिए सरकारों और जनता से समर्थन की उम्मीद कम है.

सेवाओं की मांग पर ध्यान केंद्रित करना जलवायु समाधान के दायरे को आपूर्ति पक्ष तक सीमित तकनीकी बदलावों से परे विस्तृत करता है, लेकिन यह शायद उन्हीं आबादियों तक सीमित है जिसने एक ख़ास स्तर तक कुशलक्षेम हासिल कर लिया है. ग़रीबों के लिए, कुशलक्षेम में वृद्धि केवल पोषण, आश्रय और गतिशीलता (मोबिलिटी) से संबंधित नहीं है, जो निरपेक्ष रूप से ज़्यादा ऊर्जा और मटेरियल इनपुट की मांग करेंगे, बल्कि यह आकांक्षाओं और अधिकार में चीज़ों के बारे में भी है. यहां तक कि आबादी के ख़ुशहाल तबक़ों के लिए, उपभोग में बदलाव लाने की बात मनवाना कठिन है, क्योंकि उपभोग महज कुछ व्यक्तिगत निर्णयों का समुच्चय होने के बजाय आदत-संचालित और सामाजिक चलन है.

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Author

Anamitra Anurag Danda

Anamitra Anurag Danda

Anamitra Anurag Danda is Senior Visiting Fellow with ORF’s Energy and Climate Change Programme. His research interests include: sustainability and stewardship, collective action and institution ...

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