Published on Mar 13, 2019 Updated 0 Hours ago

पूरी व्यवस्था का प्रबंधन सेना को फायदा पहुंचाने के इरादे से किया गया है, लेकिन इसकी कुंजी शायद ताकसिन शिनावात्रा के पास है।

थाईलैंड में निर्णायक चुनाव

थाईलैंड में सैनिक सरकार द्वारा बार-बार स्थगित किए जाने के बाद आखिरकार 24 मार्च को आम चुनाव होने जा रहे हैं। दिवंगत सम्राट भूमिबोल अदुल्यादेज की 67 वर्षीया पुत्री उबोलरत्ना राजकन्या सिरिवर्धना बरनावदी ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करके थाईलैंड में राजनीतिक भूचाल ला दिया। चारों भाई-बहनों में सबसे बड़ी उबोलरत्ना एक अमरीकी नागरिक से विवाह करने के बाद अपनी राजसी दर्जा और विशेषाधिकार त्याग चुकी हैं। उनकी राजनीतिक कोशिश को उनके भाई और थाईलैंड के मौजूदा सम्राट वजीरालोंगकोर्न बोडिन्द्रदेबयवरंगकुन ने यह कहकर खारिज कर दिया कि राज परिवार की इतनी शीर्ष सदस्या का राजनीतिक अखाड़े में उतरना देश की राजसी प्रथाओं, परम्परा और संस्कृति के खिलाफ है।

निर्वाचन संबंधी वास्तविकताएं

सुश्री उबोलरत्ना ने राज घराने के सदस्यों को राजनीति और चुनाव में शामिल करने वाली राजनीतिक पार्टियों को प्रतिबंधित करने संबंधी निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देशों को चुनौती देते हुए कहा कि उनका दर्जा एक आम नागरिक का है। सम्राट ने उनकी दलील पर आपत्ति करते हुए दावा किया कि अपना राजसी दर्जा त्याग देने के बावजूद वह अभी तक राजपरिवार की ही सदस्या हैं। सुश्री उबोलरत्ना की घोषणा और उनकी उम्मीदवारी का विरोध करने वाले सम्राट के सार्वजनिक बयान ने निर्वाचन आयोग के सामने और कुछ गुंजाइश ही नहीं छोड़ी और उसकी ओर से जारी की गई प्रधानमंत्री पद के आधिकारिक उम्मीदवारों के नामों की सूची में सुश्री उबोलरत्ना का नाम शामिल नहीं किया गया।

जीवंत व्यक्तित्व वाली सुश्री उबोलरत्ना सुशिक्षित हैं और थाईलैंड में समाज कल्याण की योजनाओं में सक्रिय रही हैं। इस समय निर्वासित जीवन बिता रहे थाईलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री ताकसिन शिनावात्रा के साथ उनकी घनिष्ठता रही है। उन्होंने थाई रक्सा चार्ट पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी उम्मीदवारी दर्ज करायी थी। थाई रक्सा चार्ट पार्टी, शिनावात्रा द्वारा स्थापित फियू थाई पार्टी की सहयोगी है। शिनावात्रा की बहन यिंगलक शिनावात्रा भी प्रधानमंत्री पद पर आसीन रह चुकी हैं, लेकिन 2014 में पूर्व सेना प्रमुख जनरल प्रयुत चान ओचा की अगुवाई वाली वर्तमान सैनिक सरकार ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया था। सेना ने सुश्री शिनावात्रा को किसानों के लिए चावल की सब्सीडी संबंधी मामले में दोषी ठहराया था, उसके बाद से वह भी निर्वासित जीवन बिता रही हैं।

फियू थाई पार्टी थाईलैंड की सबसे लोकप्रिय पार्टी है, मोटे तौर पर इसका विशाल ग्रामीण जनाधार देश के घनी आबादी वाले धान उगाने वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र में है। टेलिकॉम टाइकून शिनावात्रा ने थाईलैंड के ग्रामीण मतदाताओं और शहरों के कामकाजी वर्ग के बीच अपनी लोकप्रियता बरकरार रखी है। इसका प्रमुख कारण किफायती स्वास्थ्य सेवा को संस्थागत रूप प्रदान करने और कृषि के लिए सब्सिडी दिलाने के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयास हैं। ऐसा लगता है कि उनके समर्थक उनके वित्तीय दुराचारों को नजरंदाज कर चुके हैं।

सुश्री उबोलरत्ना 1932 में थाईलैंड के संवैधानिक राजतंत्र बनने के बाद से राजनीति के अखाड़े में उतरने वाली राजघराने की पहली सदस्या हैं। थाई जनता राज परिवार के लोगों का जितना सम्मान और गुणगान करती है, उसके मद्देनजर राजघराने के सदस्य के खिलाफ मैदान में उतरने से, जनरल प्रयुत को हार का सामना करना पड़ सकता था।

कट्टर राजभक्त जनरल प्रयुत को शायद सम्राट से मदद मिल रही है, जो शायद मई में होने वाली अपनी विधिवत औपचारिक ताजपोशी से पहले किसी भी तरह की राजनीतिक उठा-पटक से बचना चाहते हैं। सेना-समर्थक पालांग प्रचारत पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे जनरल प्रयुत पहले ही प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। जनरल प्रयुत को मुख्य चुनौती फियू थाई पार्टी से मिलेगी।

चुनाव के नतीजों से अगली सरकार का आकार निर्धारित होगा। क्या प्रमुख पार्टियों की भागीदारी से राष्ट्रीय एकता वाली सरकार का गठन होगा? यह प्रश्न इसलिए उठा है, क्योंकि सम्राट शायद खुद को एकता के प्रतीक के तौर पर दर्शाते हुए सभी को एकजुट दिखाना चाहते हैं। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि सम्राट के शिनावात्रा के साथ करीबी संबंध थे।

पूर्व प्रधानमंत्री अभिसित वेज्जाजीवा के नेतृत्व वाली राजतंत्र समर्थित डेमोक्रेटिक पार्टी अपने पत्ते नहीं खोल रही है; उनका सार्वजनिक रुख यह है कि उनकी पार्टी फियू थाई या किसी भी ऐसी अन्य पार्टी के साथ किसी तरह के गठबंधन में शामिल नहीं होगी, जिसे सेना का मुखौटा माना जाता है।

थाईलैंड में फियू थाई पार्टी के स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव जीतने का अनुमान है। हालांकि सैनिक सरकार ने इस संभावना को नष्ट करने के लिए कड़ी मशक्कत की है। एक संभावित खतरा यह है कि यदि शिनावात्रा इस पार्टी के निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल पाए गए, तो निर्वाचन आयोग इस पार्टी पर प्रतिबंध लगा सकता है। इस बीच शिनावात्रा सैन्य आदेशों के सामने सिर झुकाने से इंकार करते रहे हैं और अपने विचार प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते आए हैं, उनके कुछ विचार सत्तारूढ़ सैनिक सरकार की आलोचना से संबंधित हैं। बदले में फियू थाई पार्टी अपने प्रचार और सार्वजनिक घोषणाओं में सख्ती के साथ शिनावात्रा के नाम के उल्लेख से बचना चाहती है।

सेना की रणनीति

थाईलैंड की सैनिक सरकार ने सबसे पहले 2017 में नया संविधान लागू करने, राजनीतिक सभाओं पर रोक लगाने और राजनीतिक पार्टियों के प्रचार पर रोक लगाने के साथ बार-बार राजनीति को नया रूप देने की कोशिश की है। ऐसा करके उसे राजनीतिक अवसरों का तैयार समूह, सत्ता की उत्कंठा प्राप्त हुई। जनरल प्रयुत ने इस अवसर का फायदा उठाकर घुमंतु कैबिनेट बैठकों की आड़ में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचार किया। 2017 में फियू थाई पार्टी को दोबारा सरकार बनाने से रोकने के लिए संविधान का निर्माण किया गया और समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली इसलिए तैयार की गई कि यदि वह अधिकतर निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल कर भी ले, तो भी उसे संसदीय सीटों से वंचित रखा जाए। इसलिए फियू थाई ने अनेक राजनीतिक पार्टियों का मोर्चा तैयार कर लिया है, ताकि उन सभी को समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत कुछ सीटें हासिल हो जाएं। यह नेटवर्क उसे खुद पर किसी तरह का प्रतिबंध लगने जैसी चरम स्थिति में भी काम करने में सहायता करेगा।

थाई राजनीति पर लम्बे समय से राज परिवार और बैंकाक स्थित प्रमुख उद्योगपतियों के समर्थन से थाई सेना का प्रभुत्व रहा है और यह व्यवस्थित लोकतांत्रिक बदलाव की अनंत तलाश में लीन रही है। सेना नियमित रूप से इसकी निर्वाचित नागरिक सरकारों का तख्ता पलट करती आई है, जिससे थाईलैंड को सबसे ज्यादा तख्ता पलट की घटनाओं के कारण संदिग्ध पहचान मिली है। यहां सेना और राजनीतिक पार्टियों के बीच चूहे-बिल्ली का खेल दशकों से बरकरार है।

थाईलैंड की सेना को सत्ता से दूरी कतई नापसंद है, इसलिए वह मजबूत और जीवंत लोकतंत्र को जड़े जमाने से रोकने के लिए राज्य व्यवस्था को तोड़ती-मरोड़ती रही है। इसके बावजूद थाई जनता की लोकतांत्रिक इच्छा को दबाया नहीं जा सका है। दोषपूर्ण संविधान के तहत होने जा रहे आगामी चुनावों का परिणाम-भले ही सही मायनों को जनादेश को व्यक्त न करे, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली कुछ हद तक लोगों की लोकतांत्रिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करेगी।


यह लेख मूल रूप से द हिन्दू अखबार में प्रकाशित हो चुका है।

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