अंतर्राष्ट्रीय क़ानून की अमेरिकी समझ और चीन की तरफ़ से उसका ग़लत अर्थ निकालना दरअसल सही है. अभी तक चीन ने दक्षिणी चीन सागर पर संपूर्ण दावे के पक्ष में तथाकथित नाइन डैश लाइन को लेकर “कोई स्पष्ट क़ानूनी आधार” पेश नहीं किया है.
पिछले महीने चीन के ख़िलाफ़ चल रहे ‘युद्ध’ में अमेरिका ने सबसे ताज़ा निशाना साधा है. सभी संदेहों को साफ़ करते हुए अमेरिका ने ऐलान किया “हम साफ़ कर रहे हैं: ज़्यादातर दक्षिणी चीन सागर के तटीय संसाधनों पर चीन का दावा पूरी तरह अवैध है, साथ ही उन पर नियंत्रण के लिए उसका दादागीरी वाला अभियान भी.”
अभी तक अमेरिका दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के अधिकार पर चीन के सवाल खड़ा करने को लेकर उन देशों के समर्थन में तो था लेकिन 2010 में तत्कालीन विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने इस मामले में अमेरिका का रुख़ साफ़ करते हुए कहा था कि पूरे क्षेत्र में नौ-परिवहन की स्वतंत्रता के अधिकार का दृढ़ता से समर्थन करते हुए उनका देश इस मामले में विवाद पर तटस्थ रहेगा. लेकिन अब अमेरिका ने कहा है कि “अमेरिका तटीय संसाधनों पर अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के तहत उनके अधिकारों और दायित्वों के अनुरूप संप्रभु अधिकारों की रक्षा के लिए अपने दक्षिण-पूर्व एशियाई सहयोगियों और साझेदारों के साथ खड़ा है.”
अदालत ने अपने फ़ैसले में सबसे पहले कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दक्षिणी चीन सागर (SCS) के समुद्र और संसाधनों पर चीन का विशेष अधिकार है और इस तरह तथाकथित ‘नाइन-डैश लाइन’ के तहत समुद्री क्षेत्र में ऐतिहासिक अधिकार के उसके दावे का कोई क़ानूनी आधार नहीं है
अमेरिका ने कहा है कि वो संयुक्त राष्ट्र के समुद्री क़ानून संधि (UNCLOS) के तहत बनाई गई पंचाट अदालत के 12 जुलाई 2016 के फ़ैसले के अनुरूप अपना आधिकारिक दृष्टिकोण रखेगा. अदालत ने अपने फ़ैसले में सबसे पहले कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दक्षिणी चीन सागर (SCS) के समुद्र और संसाधनों पर चीन का विशेष अधिकार है और इस तरह तथाकथित ‘नाइन-डैश लाइन’ के तहत समुद्री क्षेत्र में ऐतिहासिक अधिकार के उसके दावे का कोई क़ानूनी आधार नहीं है. दूसरी बात ये कि जहां मछुआरों के छोटे समूह ने समुद्र के चट्टानी इलाक़े का इस्तेमाल किया है जिसे स्प्रैटली द्वीप कहा जाता है, लेकिन उनमें से कोई सुव्यवस्थित हिस्सेदारी बरकरार रखने में सक्षम नहीं है और इसलिए वो विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) का दावा नहीं कर सकते हैं. तीसरी बात ये कि कुछ इलाक़े वास्तव में फिलीपींस के EEZ में आते हैं और चीन ने फिलीपींस के मछुआरों और हाइड्रोकार्बन की खोज करने वाली टीम में दखल देकर उनके अधिकारों का उल्लंघन किया है. आख़िरी बात ये कि चीन के कृत्रिम द्वीप कार्यक्रम ने पर्यावरण की रक्षा को लेकर UNCLOS की शर्तों का उल्लंघन किया है.
उम्मीद के मुताबिक़ चीन ने इस फ़ैसले को खारिज किया है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ख़ुद दृढ़तापूर्वक कहा कि ‘ऐतिहासिक समय’ से इन द्वीपों के ऊपर चीन की संप्रभुता रही है. चीन के विदेश मंत्रालय ने एलान किया कि फ़ैसला “अवैध” है और इसे “लागू नहीं किया जा सकता.”
पार्सेल द्वीप पर चीन ने पूरी तरह कब्ज़ा कर रखा है लेकिन स्प्रैटली के 25 फीचर पर वियतनाम, आठ पर फिलीपींस, सात पर चीन, तीन पर मलेशिया और एक पर ताइवान का नियंत्रण है. ये देश अक्सर एक-दूसरे के फीचर, जो कि चट्टान होते हैं और संसाधनों से प्रचुर इलाक़ों में समुद्री दावा करने के लिए बनाए जाते हैं, पर दावा करते हैं. इन द्वीपों में देर से शुरू करने के बाद भी चीन का निर्माण सबसे ज़्यादा है और ऐसा करने के पीछे साफ़ तौर पर सैन्य मंशा है.
अमेरिका ने तथाकथित “नौ-परिवहन गश्त की स्वतंत्रता (FONOPS)” अभियान के ज़रिए उन देशों को (2017 में भारत समेत दूसरे देशों को) चुनौती दी जिनके बारे में अमेरिका मानता है कि वो समुद्र पर हद से ज़्यादा दावा करते हैं लेकिन दक्षिणी चीन सागर में चीन के साथ उसके गतिरोध ने पूरी तरह से अलग रुख़ अख्तियार कर लिया है
अमेरिका ने ख़ुद भी UNCLOS को मंज़ूर नहीं किया है लेकिन उसका कहना है कि वो इसके प्रावधानों का प्रचलित अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के तौर पर समर्थन करता है. इन प्रावधानों में किसी तटीय देश की सीमा के समुद्र से जहाज़, सेना और नागरिकों की आवाजाही के अधिकार के साथ-साथ नौ-परिवहन की स्वतंत्रता और EEZ के ऊपर से विमानों की आवाजाही शामिल है. अमेरिका ने तथाकथित “नौ-परिवहन गश्त की स्वतंत्रता (FONOPS)” अभियान के ज़रिए उन देशों को (2017 में भारत समेत दूसरे देशों को) चुनौती दी जिनके बारे में अमेरिका मानता है कि वो समुद्र पर हद से ज़्यादा दावा करते हैं लेकिन दक्षिणी चीन सागर में चीन के साथ उसके गतिरोध ने पूरी तरह से अलग रुख़ अख्तियार कर लिया है. इस क्षेत्र में अपनी बढ़ी हुई दिलचस्पी के संकेत के तौर पर अमेरिका ने दक्षिणी चीन सागर में FONOPS की संख्या में ज़ोरदार बढ़ोतरी की है. 2018 में छह और 2019 में नौ अभियान अमेरिका ने चलाया. इसके अलावा वो नियमित तौर पर इस क्षेत्र में सैन्य प्रशिक्षण और अभियान चलाता है और उसकी तैनाती साफ़ तौर पर बताती है कि वो इसे अमेरिका-चीन संघर्ष का बड़ा युद्ध क्षेत्र मानता है.
अंतर्राष्ट्रीय क़ानून की अमेरिकी समझ और चीन की तरफ़ से उसका ग़लत अर्थ निकालना दरअसल सही है. अभी तक चीन ने दक्षिणी चीन सागर पर संपूर्ण दावे के पक्ष में तथाकथित नाइन डैश लाइन को लेकर “कोई स्पष्ट क़ानूनी आधार” पेश नहीं किया है. तब भी पंचाट के फ़ैसले में द्वीपों पर अलग-अलग दावों की तरफ़ ध्यान नहीं दिया गया. लेकिन ये घोषणा करके कि UNCLOS के अनुच्छेद 121 के तहत कोई भी स्प्रैटली द्वीप वाकई में “द्वीप” नहीं है, पंचाट ने नियंत्रण के आधार पर अलग-अलग देशों के व्यापक समुद्री दावे को खोखला कर दिया है. चीन का मामला भी साफ़ नहीं है. चीन साफ़ तौर पर नहीं कहता है कि नाइन डैश लाइन उसकी समुद्री सीमा में है और इसलिए इसके भीतर सभी “द्वीप” चीन के हैं. या फिर वो सिर्फ़ इस क्षेत्र के समुद्री सतह वाले संसाधनों पर दावा कर रहा है. नाइन डैश लाइन समुद्री सीमा के निर्धारण के लिए UNCLOS द्वारा तय किए गए सिद्धांतों को नहीं मानती है.
अब भी अमेरिका प्रादेशिक विवादों में पंचाट के फ़ैसले के तहत तटस्थ बना रहेगा. अमेरिका ने कहा है कि स्कारबोरो रीफ, मिसचीफ रीफ या सेकेंड थॉमस शोल पर चीन का कोई वैध समुद्री दावा नहीं है और इसलिए इन इलाक़ों पर किसी हमले की हालत में ये अमेरिका-फिलीपींस पारस्परिक रक्षा संधि के तहत आता है. इसके अलावा अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा है कि मलेशिया के नज़दीक जेम्श शोल, वियतनाम के नज़दीक वैनगार्ड तट के समुद्र, ब्रुनेई के नज़दीक ल्यूकोनिया शोल और इंडोनेशिया के नज़दीक नटूना बेसर पर दावे का चीन के पास कोई आधार नहीं है. इस साल की शुरुआत से ही इलाक़े में तनाव बढ़ रहा है. कोविड-19 की वजह से ध्यान हटने के बावजूद अमेरिका और चीन- दोनों देश इलाक़े में सैन्य प्रशिक्षण और अभ्यास में सक्रिय हैं या महज़ अपनी मौजूदगी दिखा रहे हैं.
अप्रैल की शुरुआत में पार्सेल द्वीप के नज़दीक चीन के कोस्टगार्ड जहाज़ ने वियतनाम के मछली पकड़ने वाले जहाज़ को टक्कर मार दी और उसके चालक दल के सदस्यों को कब्ज़े में ले लिया. अप्रैल के मध्य में चीन के एक निरीक्षण जहाज़ ने मलेशिया की कंपनी पेट्रोनास के खोजी जहाज़ का पीछा शुरू कर दिया. हेयांग डिझी 8 नाम का ये जहाज़ पहले वियतनाम के पास देखा गया और रिपोर्ट के मुताबिक़ वो ब्रुनेई और मलेशिया के समुद्री इलाक़े का सर्वेक्षण कर रहा था जिसको लेकर वियतनाम और चीन के बीच लड़ाई है. उसके साथ चीन के सात कोस्ट गार्ड जहाज़ थे. अप्रैल के आख़िर में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की नौसेना के जहाज़ जो पास में अभ्यास कर रहे थे, वो इस क्षेत्र में दिखे. इसके बाद मई की शुरुआत में अमेरिका ने जिस जगह मलेशिया का जहाज़ था, वहां गश्त करने के लिए जहाज़ों का एक और जोड़ा भेजा.
हेयांग डिझी 8 नाम का ये जहाज़ पहले वियतनाम के पास देखा गया और रिपोर्ट के मुताबिक़ वो ब्रुनेई और मलेशिया के समुद्री इलाक़े का सर्वेक्षण कर रहा था जिसको लेकर वियतनाम और चीन के बीच लड़ाई है
इससे पहले चीन ने भी स्प्रैटली और पड़ोस के पार्सेल द्वीप का प्रशासन चलाने के लिए दो नये ज़िलों के निर्माण का एलान किया. एक ज़िला जहां स्प्रैटली का प्रशासन चलाएगा वहीं दूसरा ज़िला पार्सेल का और दोनों ज़िले हैनान के सांशा शहर की स्थानीय सरकार के अधीन काम करेंगे. सांशा शहर को प्रांतीय स्तर का शहर घोषित किया गया और इसके अधिकार क्षेत्र में दक्षिणी चीन सागर पर चीन के दावे वाले इलाक़े आते हैं.
अभी तक चीन के बाहुबल से प्रभावित देशों को अमेरिका की मदद किसी-किसी मामले में मिली है. अमेरिकी जहाज़ अपना नौ-परिवहन स्वतंत्रता अभियान चलाते हैं और कभी-कभी अपनी ताक़त भी दिखाते हैं जैसा कि उन्होंने मलेशिया के मामले में किया. ये तरीक़ा अब बदलेगा या नहीं ये देखना बाक़ी है. महत्वपूर्ण बात ये है कि फिलीपींस अमेरिका के साथ इस साल की शुरुआत में जिस विज़िटिंग फोर्सेज़ एग्रीमेंट को ख़त्म करना चाहता था, उसने अपने फ़ैसले को पलट दिया है. एग्रीमेंट का ख़त्म होना अगले महीने से लागू होने वाला था. जानकारों का कहना है कि ये इस क्षेत्र में चीन की हरकतों का नतीजा है.
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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