अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका का बाज़ी समेटना विद्रोहियों के हाथों एक सैन्य पराजय के बाद इज़्ज़त बचाने की मंशा से प्रेरित है, जिसमें विद्रोहियों के साथ से ठीक से राजनीतिक समझौते की बातचीत भी नहीं हुई है.
अंतर-अफ़ग़ान वार्ता आखिरकार अपने तय समय से लगभग छह महीने बाद 12 सितंबर को दोहा में शुरू हुई. संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा आयोजित और उसकी निगरानी में, ग़नी सरकार और तालिबान के नुमाइंदों ने ऐतिहासिक शांति वार्ता शुरू की, जिसका मक़सद दशकों पुरानी जंग को ख़त्म करने के लिए राजनीतिक समझौता करना था.
वार्ता के उद्घाटन समारोह में प्रमुख क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितधारकों की भागीदारी रही, साथ ही हर भागीदार ने प्रक्रिया से संबंधित अपनी उम्मीदों के बारे में हताया, और अफ़ग़ानिस्तान में स्थायी शांति के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. हालांकि, तालिबान और अफ़ग़ान सरकार के वार्ताकारों के बीच सीधी बातचीत की शुरुआत अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, लेकिन आगे की राह में कई चुनौतियां पेश आने वाली हैं.
हालांकि,अफ़ग़ान सरकार और तालिबान ने पूरी गंभीरता से एक-दूसरे से बात करने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की है, लेकिन विवाद के निपटारे के बुनियादी साधनों पर असहमति के कारण वास्तविक बातचीत अब तक नहीं हुई है. उद्घाटन के तुरंत बाद, दोनों पक्षों द्वारा संपर्क समूह बना दिए गए थे, ताकि उन नियमों और शर्तों का पता लगाया जा सके जिन पर बातचीत में अमल करना होगा, साथ ही बातचीत के लिए अंतिम एजेंडा तैयार किया जा सके.
अफ़ग़ान सरकार और तालिबान ने पूरी गंभीरता से एक-दूसरे से बात करने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की है, लेकिन विवाद के निपटारे के बुनियादी साधनों पर असहमति के कारण वास्तविक बातचीत अब तक नहीं हुई है.
विवाद के एक महत्वपूर्ण बिंदु संघर्ष ख़त्म होने के बाद के अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी विधिशास्त्र की हनफ़ी मान्यता को कानून बनाने का मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने की तालिबान की मांग पर सरकार की असहमति है. सरकार ने चिंता जताई की कि इस्लामी कानून या शरीयत की सुन्नी व्याख्या शिया आबादी के ख़िलाफ भेदभावपूर्ण हो सकती है, जो अफ़ग़ान आबादी का 15% है.
हाल ही में आई रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय सुलह के लिए उच्चस्तरीय परिषद के अध्यक्ष, अब्दुल्ला अब्दुल्ला के हवाले से कहा गया है कि विवादास्पद मुद्दा हल होने के क़रीब है. रिपोर्ट में यहां तक संकेत दिया गया है कि अफ़ग़ान वार्ताकारों द्वारा सीधी वार्ता के लिए एक बाधा को दूर कर लिया गया है, मगर अल्पसंख्यकों के बारे में उनकी शुरुआती चिंता अभी भी बनी हुई है.
अफ़ग़ान प्रतिनिधिमंडल ने हालांकि, महिलाओं और अन्य हाशिए के समूहों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपने संकल्प को दोहराया है, मगर अफ़ग़ानों के लिए नागरिक स्वतंत्रता पैरोकार समेत बहुत से समूह छोड़ दिए गए हैं. दूसरी ओर, हालांकि, तालिबान ने इस्लाम के तहत महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का वादा किया है, लेकिन उन्होंने साफ़ बताने से परहेज़ किया कि यह गारंटी किस रूप में होगी. इसके अलावा, 1996-2001 के तालिबान शासन के दौरान महिलाओं के साथ किए गए बर्ताव को विद्रोही गुटों द्वारा शरिया की कठोर व्याख्या के आधार पर कट्टरपंथी मान्यता से सही ठहराया गया था. यह देखते हुए कि तालिबान की वैचारिक स्थिति बदली नहीं है, अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के भविष्य को लेकर चिंता है.
इसके अलावा, 1996-2001 के तालिबान शासन के दौरान महिलाओं के साथ किए गए बर्ताव को विद्रोही गुटों द्वारा शरिया की कठोर व्याख्या के आधार पर कट्टरपंथी मान्यता से सही ठहराया गया था. यह देखते हुए कि तालिबान की वैचारिक स्थिति बदली नहीं है, अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के भविष्य को लेकर चिंता है.
बड़ी चुनौती, जिसमें विवादास्पद प्रक्रियात्मक और वैचारिक मतभेद शामिल हैं, अफ़ग़ान सरकार और तालिबान द्वारा लागू की जाने वाली क्रमशः परस्पर विरोधी व्यवस्था है. जैसा कि वरिष्ठ अफ़ग़ान नेतृत्व द्वारा बताया गया है, ग़नी सरकार लोकतंत्र और संप्रभुता के मूल्यों की रक्षा करना चाहती है, भले ही चल रही वार्ताओं में जैसा भी शक्ति-साझेदारी समझौता होता है.
इसके विपरीत, अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी अमीर या इस्लामी शासन व्यवस्था स्थापित करने के लिए तालिबान पूरी तरह प्रतिबद्ध है. राजनीतिक परिभाषाओं के अनुसार भी, सरकार की दो अलग विचारधाराओं में एकता होना नामुमकिन है. दोहा में हालांकि, अफ़ग़ान प्रतिनिधिमंडल को बातचीत में लचीलेपन का रुख़ रखने का निर्देश दिया गया है, राष्ट्रपति ग़नी ने हाल ही में दोहा से लौट रहे पत्रकारों के साथ बैठक में देश के मौजूदा स्वरूप और अफ़ग़ान समाज के “बहुलवादी और स्वतंत्र” स्वरूप की रक्षा के लिए मज़बूत संकल्प का संकेत दिया.
ट्रंप प्रशासन अफ़ग़ानिस्तान से 2021 के मध्य तक सभी सैनिकों की वापसी पर आमादा हुआ है, फिर भी आधिकारिक तौर पर बाहर निकलने के बाद भी किसी न किसी स्तर पर अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य उपस्थिति बनाए रखने की ज़रूरत पर बड़े पैमाने ज़ोर दिया जा रहा है. अमेरिकी सैनिकों की ग़ैरमौजूदगी में तालिबान न सिर्फ़ युद्धक्षेत्र में बल्कि राजनीतिक क्षेत्र में भी मज़बूत हो जाएगा.
यह देखते हुए कि तालिबान तब भी हिंसा जारी रखे है जब दोनों पक्ष शांति के एजेंडे आगे बढ़ रहे हैं, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि विद्रोही गुट वैध राजनीतिक ढांचे में एकीकृत होने के लिए अपना रास्ता बदलेंगे. असल में अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सैनिकों की काफी कम मौजूदगी होने पर, तालिबान सरकार से देश पर पूर्ण राजनीतिक नियंत्रण लेने के लिए हिंसा से दबाव बनाने के लिए आज़ाद होगा.
एक बार अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकल जाता है, तो यह आगामी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए राष्ट्रपति ट्रंप के चुनावी एजेंडा के अनुरूप, अपना प्राथमिक उद्देश्य प्राप्त कर लेगा. अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका का बाज़ी समेटना विद्रोहियों के हाथों एक सैन्य पराजय के बाद इज़्ज़त बचाने की मंशा से प्रेरित है, जिसमें विद्रोहियों के साथ से ठीक से राजनीतिक समझौते की बातचीत भी नहीं हुई है.
इस पर ध्यान देना ज़रूरी है कि चंद को छोड़कर अधिकांश वरिष्ठ अफ़ग़ान नेतृत्व तालिबान के साथ बातचीत शुरू करने में जल्दबाज़ी के पक्ष में नहीं था, लेकिन बातचीत की प्रक्रिया में तेज़ी लाने के लिए अमेरिकी मदद में कटौती की धमकी देकर उन पर दबाव डाला गया.
शांति प्रक्रिया में अमेरिका की घटती रुचि की पृष्ठभूमि के बीच, संभावना है कि एक बार अमेरिकी सेना के चले जाने के बाद अफ़ग़ान सरकार की आंतरिक असहमति से नाज़ुक शांति प्रक्रिया बिखर सकती है. इस पर ध्यान देना ज़रूरी है कि चंद को छोड़कर अधिकांश वरिष्ठ अफ़ग़ान नेतृत्व तालिबान के साथ बातचीत शुरू करने में जल्दबाज़ी के पक्ष में नहीं था, लेकिन बातचीत की प्रक्रिया में तेज़ी लाने के लिए अमेरिकी मदद में कटौती की धमकी देकर उन पर दबाव डाला गया. इसके अलावा, यहां तक कि जबकि बातचीत जारी है, तालिबान के साथ संभावित शक्ति-साझाकरण समझौते के संदर्भ में अलग-अलग राय, और सरकार में राजनीतिक समझौते की स्वीकार्यता, संभवतः मुश्किल पैदा करेगी.
हालांकि, इसमें कोई शक नहीं है कि अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया देश के लिए युद्ध का निर्णायक अंत करने और शांति स्थापित करने का एक मौक़ा है, इस मक़सद को हासिल करना किसी भी तरह आसान नहीं होगा और इसके लिए दोनों तरफ़ से काफ़ी रियायतें देने की ज़रूरत होगी. हालांकि, भले ही सरकार परस्पर किसी सहमति पर पहुंच जाती है, तो भी इस तरह के समझौते को लागू करने की ख़ुद अपनी जटिल चुनौतियां होंगी.
यह लेख मूल रूप से ओआरएफ़ के साउथ एशिया वीकली में प्रकाशित हो चूका है.
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Shubhangi Pandey was a Junior Fellow with the Strategic Studies Programme at Observer Research Foundation. Her research focuses on Afghanistan particularly exploring internal political dynamics ...
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