Author : Simran Sodhi

Published on Jul 31, 2023 Updated 0 Hours ago

क्या यूक्रेन संकट जैसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बाहर के टकराव क्वॉड की एकजुटता के लिए ख़तरा पैदा करेंगे?

क्या यूक्रेन संकट की आज़माइश से गुज़र चुका है क्वॉड?
क्या यूक्रेन संकट की आज़माइश से गुज़र चुका है क्वॉड?

भारत के लिए यूक्रेन संकट का मतलब है एक मुश्किल और नाजुक संतुलन साधना. रूस की निंदा के लिए संयुक्त राष्ट्र (यूएन) द्वारा लाये गये कई प्रस्तावों पर तटस्थ रहना साउथ ब्लॉक के लिए क़तई आसान फ़ैसला नहीं था. एक तबके ने महसूस किया कि भारत के लिए अपनी पुरानी हिचकिचाहट छोड़ने और अमेरिका के साथ खड़े होने का वक़्त आ गया है. लेकिन रूसी रिश्ता भारत के लिए वक़्त की आज़माइश पर खरा उतरा है और अंत में, रिश्तों में संतुलन बिठाने में ही ज़्यादा समझदारी थी. यूक्रेन संकट कूटनीतिक और रणनीतिक मोर्चे पर भारत को आज़मा ही रहा है, क्वॉड भी इसमें उलझता दिख रहा है.

भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका का चतुष्पक्षीय समूह, क्वॉड चारों देशों के बीच कई पहलक़दमियों का केंद्र बन गया है, क्योंकि वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र को स्वतंत्र और खुला रखना चाहते हैं. अंतर्निहित रुझान और चारों देशों को साथ बांधने वाली चीज़ है, चीन का निरंतर और तेज़ उदय. चीन की आर्थिक और साथ ही सैन्य ताक़त वैश्विक समुदाय को असहज बनाती है, और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की चीनी वैश्विक दबदबे की खुली इच्छा बहुत से वैश्विक नेताओं को काफ़ी चिंता में डालती है.

क्वॉड के भीतर विभाजन इतने सरल हैं कि जिन्हें कोई भी देख सकता है. रूस की निंदा वाले प्रस्तावों पर संयुक्त राष्ट्र में व अन्य मंचों पर तटस्थता पर अड़े रहकर भारत एक तरफ़ खड़ा है, जबकि अन्य सदस्य देश रूस की कठोर आलोचना के साथ सामने आये हैं और कड़े प्रतिबंध लगाये हैं.

मार्च महीने की शुरुआत में, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने यूक्रेन के मुद्दे पर क्वॉड नेताओं की अचानक बैठक बुलायी. क्वॉड के भीतर विभाजन इतने सरल हैं कि जिन्हें कोई भी देख सकता है. रूस की निंदा वाले प्रस्तावों पर संयुक्त राष्ट्र में व अन्य मंचों पर तटस्थता पर अड़े रहकर भारत एक तरफ़ खड़ा है, जबकि अन्य सदस्य देश रूस की कठोर आलोचना के साथ सामने आये हैं और कड़े प्रतिबंध लगाये हैं. रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दक्षिण एशिया में अमेरिका के सहायक विदेश मंत्री, डोनाल्ड लू ने सीनेट की एक उप-समिति की सुनवाई में कहा कि, ‘यूक्रेन में रूसी कार्रवाई के ख़िलाफ़ एक साफ़ स्थिति अपनाने के लिए भारत को बाध्य करने के वास्ते वाशिंगटन उसके साथ कूटनीतिक चैनलों में एक योजनाबद्ध लड़ाई लड़ रहा था.’ उसी रिपोर्ट में, उनके हवाले से कहा गया है कि क्या रूस के साथ हथियार सौदे को लेकर भारत पर प्रतिबंध लगाना है, अमेरिका इस मामले को क़रीब से देख रहा है.

रूस भारत का हथियारों का मुख्य आपूर्तिकर्ता रहा है और अब भी बना हुआ है. दिसंबर 2021 में, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नयी दिल्ली की काफ़ी झटपट यात्रा की. और इसका संदेश साफ़ था – यह अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन से मुलाकात के लिए जून में जिनेवा की यात्रा के बाद पुतिन की पहली विदेश यात्रा थी. इरादा दुनिया को यह बताने का था कि रूस के अब भी कई दोस्त हैं. 5.4 अरब अमेरिकी डॉलर के एक एयर मिसाइल सिस्टम सौदे पर दस्तख़त करना, इस संबंध को बनाये रखने के लिए जोखिम उठाने की भारत की मंशा के बारे में एक और संकेत था. अमेरिकी प्रतिबंधों के ख़तरे के बावजूद, रूस के साथ अपने सौदे पर भारत आगे बढ़ा.

ठीक यही चालक शक्तियां (डाइनैमिक्स) क्वॉड के भीतर काम कर रही हैं, जो इस मुश्किल में है कि यूक्रेन संकट को लेकर कैसे एक एकताबद्ध प्रतिक्रिया दी जाए. भारत के लिए, तीन अन्य सदस्यों के मुक़ाबले, रूस की निंदा करना अगर सीधे-सीधे नामुमकिन नहीं, तो मुश्किल ज़रूर है. ख़ासकर अमेरिका, और उत्तरोत्तर ऑस्ट्रेलिया और जापान के लिए, इस भारतीय दुविधा को स्वीकार करना आसान नहीं है. भारत ने साउथ ब्लॉक से निकले इस तर्क के साथ ख़ामोश प्रतिवाद किया है कि क्वॉड की स्वीकृति हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक ही रहने की है. निक्केई एशिया की एक रिपोर्ट ने क्वॉड के भीतर के तनावों को खोलकर रख दिया. रिपोर्ट ने कहा कि मार्च की शुरुआत में हुई क्वॉड की वर्चुअल बैठक में, ‘अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने यूक्रेन पर आक्रमण को लेकर रूस की निंदा में बाक़ी समूह के साथ शामिल होने के लिए भारत से मांग की. जापानी प्रधानमंत्री फुमिओ किशिदा ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन से लगभग एक घंटे तक बात की. इस बातचीत के उद्देश्यों में से एक था, रूस की निंदा के लिए भारत को साथ लाना.’

भारत के लिए, तीन अन्य सदस्यों के मुक़ाबले, रूस की निंदा करना अगर सीधे-सीधे नामुमकिन नहीं, तो मुश्किल ज़रूर है. ख़ासकर अमेरिका, और उत्तरोत्तर ऑस्ट्रेलिया और जापान के लिए, इस भारतीय दुविधा को स्वीकार करना आसान नहीं है.

जापानी प्रधानमंत्री फुमिओ किशिदा की हालिया भारत यात्रा को यूक्रेन संकट और इस तथ्य की वजह से बहुत क़रीब से देखा गया कि भारत और जापान दोनों ही क्वॉड के सदस्य हैं. संयुक्त बयान में कहा गया कि मोदी और किशिदा ने, आपसी बातचीत में, यूक्रेन में हिंसा तुरंत समाप्त करने का आह्वान किया, उस देश की परमाणु सुविधाओं की संरक्षा व सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करने के साथ ही टकराव को बातचीत के ज़रिये हल करने की पैरवी की. इस तरह, रूस की निंदा नहीं करने के अपने रुख पर भारत टिका रहा. किशिदा ने मीडिया में की गयी अपनी टिप्पणियों में फिर ज़ोर दिया कि रूस ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की जड़ों को ‘हिला’ दिया है. दो नेता और दो देश भिन्न नज़रिये के साथ दिखायी दिये. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रूस के साथ इस रिश्ते ने यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को निकालने में भारत की मदद की है.

क्वॉड का यूक्रेन टेस्ट

तो सवाल है कि क्या यूक्रेन संकट की आज़माइश से क्वॉड सुरक्षित बाहर आ पायेगा? फ़िलहाल, अभी ऐसा लगता है कि तनावों को पर्दे में रखा जा रहा है, और आंतरिक रूप से अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया एक दिशा में ज़ोर लगा रहे हैं, जबकि भारत इसमें शामिल होने को अनिच्छुक है. इस क्षेत्र में चीन के मंडराते ख़तरे और भारत द्वारा पेश किये जाने वाले रणनीतिक फ़ायदों को देखते हुए, अमेरिका शायद ही भारत पर एक सीमा के परे दबाव बनाए. लेकिन हो सकता है कि यूक्रेन जैसे भावी संकट को संभालना क्वॉड के लिए उतना आसान न हो. एक देश और एक क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए चार राष्ट्र साथ आये हैं, लेकिन इससे परे कोई विस्तार क्वॉड की मज़बूती को संभवत: आज़मायेगा.

अभी ऐसा लगता है कि तनावों को पर्दे में रखा जा रहा है, और आंतरिक रूप से अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया एक दिशा में ज़ोर लगा रहे हैं, जबकि भारत इसमें शामिल होने को अनिच्छुक है.

भारत के लिए चुनौती यहीं पर है, क्योंकि वह क्वॉड में रहने के लिए प्रयत्न करता है, लेकिन ठीक उसी समय अपने कई बहुपक्षीय संबंधों के लिए भी प्रयत्नशील रहता है. क्वॉड अनिवार्य रूप से भारत को अमेरिका के क़रीब लाता है और पिछले कुछ सालों में इस दिशा में ग्राफ ऊपर की ओर रहा है. लेकिन संतुलन साधने के नाजुक काम में, अभी तक भारत द्वारा पुराने मित्रों को नहीं छोड़ा गया. भारत कब तक दो नावों की सवारी कर सकता है, यह निकट भविष्य में उसके लिए कूटनीतिक चुनौती होगी.

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