Published on Jul 29, 2023 Updated 0 Hours ago

कोरोना वायरस के नए ओमिक्रॉन वेरिएंट के प्रकोप से ये सवाल उठना मुनासिब ही है कि क्या इससे हमें दूरगामी संरक्षण मिलेगा?

दक्षिण अफ्रीका में ओमिक्रॉन का तजुर्बा: क्या कोविड-19 महामारी अब क़ाबू में आ गई है?
दक्षिण अफ्रीका में ओमिक्रॉन का तजुर्बा: क्या कोविड-19 महामारी अब क़ाबू में आ गई है?

पूरी दुनिया में कोविड-19 की महामारी न बिसरा हुआ इतिहास बनी है, और न ही अभी ये पूरी तरह ख़त्म हुई है. इस महामारी ने दुनिया को सेहत के साथ-साथ आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी तबाह कर दिया. कोविड-19 वायरस ने हमारी ज़िंदगी के हर पहलू पर गहरा असर डाला है. मानवता पर बरपे इस क़हर का एक बड़ा हिस्सा दक्षिण अफ्रीका ने झेला. कोविड-19 को लेकर दक्षिण अफ्रीका का अपना एक अलग तजुर्बा रहा है. ओमिक्रॉन वैरिएंट इस तजुर्बे का ही एक और आयाम है. 12 जनवरी 2022 तक दक्षिण अफ्रीका में इस वायरस के संक्रमण के 3,534,131 केस आ चुके थे. इनमें से 3,298,672 तो इस महामारी से उबर गए, जबकि 92,649 लोगों की जान चली गई. हालांकि, इस समय दक्षिण अफ्रीका में केस पॉज़िटिविटी रेट कम है. लेकिन मौत की दर एक लाख के क़रीब पहुंच रही है. ये चिंता की बात है, क्योंकि इस वायरस से एक भी इंसान की मौत, पूरी इंसानियत के लिए ख़तरा है. कोविड-19 वायरस का बार बार रूप बदलने और पहले बीटा, फिर डेल्टा और अब नवंबर 2021 में खोजे गए ओमिक्रॉन वैरिएंट ने हालात को और मुश्किल बना दिया है. अब तक के सबूत बताते हैं कि डेल्टा वेरिएंट जहां अधिक घातक था, वहीं ओमिक्रॉन वेरिएंट ज़्यादा संक्रामक है. दक्षिण अफ्रीका ने इसे पूरी गंभीरता से लिया और कोविड-19 प्रोटोकॉल के पालन को ख़ास तौर से भीड़-भाड़ वाले कार्यक्रमों और ठिकानों के लिए और भी सख़्त बनाया.

कोविड-19 वायरस का बार बार रूप बदलने और पहले बीटा, फिर डेल्टा और अब नवंबर 2021 में खोजे गए ओमिक्रॉन वैरिएंट ने हालात को और मुश्किल बना दिया है. अब तक के सबूत बताते हैं कि डेल्टा वेरिएंट जहां अधिक घातक था, वहीं ओमिक्रॉन वेरिएंट ज़्यादा संक्रामक है.

दक्षिण अफ्रीका के नेटवर्क फॉर जीनोमिक सर्विलेंस ने ही दुनिया में सबसे पहले ओमिक्रॉन वेरिएंट का पता लगाया था. डेल्टा की तरह ओमिक्रॉन वेरिएंट ने भी पूरी दुनिया को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है. हालांकि, डेल्टा वेरिएंट की तुलना में ओमिक्रॉन कम घातक है. लेकिन, आज दक्षिण अफ्रीका में सामने आ रहे कोरोना वायरस के 90 फ़ीसद केस में ओमिक्रॉन वैरिएंट ही मिल रहा है. अपनी भयंकर संक्रामक दर के चलते ये वेरिएंट पूरे यूरोप के लिए सिर दर्द बना हुआ है. दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सीरिल रामाफोसा अपने घाना के दौरे के दौरान कहा था कि, ‘हमारे यहां अस्पताल में भर्ती होने की दर अभी चिंताजनक स्तर पर नहीं पहुंची है. इसका मतलब ये है कि भले ही लोग कोरोना पॉज़िटिव हो रहे हैं, लेकिन उन्हें बड़ी संख्या में अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत नहीं पड़ रही है. इसी वजह से मैं ये कह रहा हूं कि हमें घबराने की ज़रूरत नहीं है. क्योंकि ओमिक्रॉन भले ही अधिक संक्रामक हो और तेज़ी से फैल रहा हो. लेकिन, इससे संक्रमित लोगों के बड़ी तादाद में अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत नहीं पड़ रही है. इसलिए हमें थोड़ी राहत की सांस लेनी चाहिए.’

ओमिक्रॉन वेरिएंट से दक्षिण अफ्रीका में अस्पताल में भर्ती होने का जोख़िम कम है. ये बहुत बड़ी राहत की बात है, क्योंकि 2021 में दक्षिण अफ्रीका के लोगों ने बिना किसी भय के स्थानीय निकायों के चुनाव में हिस्सा लिया था. स्थानीय प्रशासन के सफल चुनाव से पहले दक्षिण अफ्रीका के राजनीतिक दलों ने सड़कों और गलियों में जाकर प्रचार किया था, और देश में संक्रमण की स्थिति क़ाबू में थी. अब दक्षिणी अफ्रीकी नागरिक नए साल यानी 2022 के अधिक उत्पादक होने की उम्मीद लगा रहे हैं. इस साल दक्षिण अफ्रीका में कई बड़े आयोजनों की योजना बनी हुई है. लेकिन, इसका ये मतलब नहीं है कि दक्षिण अफ्रीकी नागरिक, कोविड-19 महामारी को लेकर असंवेदनशील और बेपरवाह हो जाएं.

ओमिक्रॉन वेरिएंट का पता लगाने के चलते दक्षिण अफ्रीका को आर्थिक नुक़सान हो गया. यूरोप ने यात्रा पर जो प्रतिबंध लगए उससे दक्षिण अफ्रीका को बहुत वित्तीय झटके लगे. यानी ओमिक्रॉन वेरिएंट का पता लगाना, दक्षिण अफ्रीका के लिए नुक़सानदेह साबित हुआ.

जब दक्षिण अफ्रीकी वैज्ञानिकों ने दुनिया को कोरोना के नए ओमिक्रॉन वेरिएंट की जानकारी दी, तो इस कोशिश के लिए उसे शाबाशी दी जानी चाहिए थी. हालांकि, यूरोप ने दक्षिण अफ्रीका से बहुत बुरा बर्ताव किया. यूरोपीय देशों ने पूरे दक्षिण अफ्रीकी महाद्वीप से आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया. मिसाल के तौर पर ब्रिटेन की सरकार ने दक्षिण अफ्रीकी देशों से आने वाली सभी उड़ानों पर तुरंत रोक लगा दी. यानी ओमिक्रॉन वेरिएंट का पता लगाने के चलते दक्षिण अफ्रीका को आर्थिक नुक़सान हो गया. यूरोप ने यात्रा पर जो प्रतिबंध लगए उससे दक्षिण अफ्रीका को बहुत वित्तीय झटके लगे. यानी ओमिक्रॉन वेरिएंट का पता लगाना, दक्षिण अफ्रीका के लिए नुक़सानदेह साबित हुआ. यात्रा के प्रतिबंध और बाद में लगी पाबंदियों के चलते, दिसंबर 2021 में दक्षिण अफ्रीका के पर्यटन उद्योग को बहुत बड़ा झटका लगा. सभी तरह की बुकिंग में 85 फ़ीसद तक की गिरावट आई. दक्षिण अफ्रीका के राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और एयरपोर्ट एसोसिएशन ने दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया, ज़िम्बाब्वे, बोत्सवाना, लेसोथो और एस्वातिनी को ब्रिटेन द्वारा अपनी रेड लिस्ट में डालने की कड़ी आलोचना की. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी तमाम देशों को आगाह किया कि वो ओमिक्रॉन वेरिएंट के संक्रमण के चलते, यात्रा पर प्रतिबंध न लगाएं. आवाजाही की इन पाबंदियों ने दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डाला और इससे कूटनीति और बहुपक्षीय व्यापारिक समझौतों पर भी बुरा असर पड़ा.

बूस्टर डोज़ और वैक्सीन लेने के प्रति बढ़ती हिचक

कोविड-19 वायरस और इसके तमाम वेरिएंट से पैदा हुई एक और समस्या है टीकाकरण की. दक्षिण अफ्रीका की जनता धीरे-धीरे टीका लगवाने की अपील पर ध्यान दे रही है. मगर जो सबसे ज़्यादा परेशानी की बात है, वो ये है कि दक्षिण अफ्रीका में टीकाकरण के लिए बुनियादी पहली और दूसरी डोज़ ही नहीं, बूस्टर डोज़ भी लगवानी ज़रूरी है. इसका मतलब ये है कि कोई इंसान नए वैरिएंट से बचने के लिए कई बार टीका लगवा सकता है. जब भी नया वेरिएंट आता है, तो वैक्सीन की बूस्टर डोज़ लेनी होगी. हालांकि, ये बात बहुत दिनों तक चल नहीं सकती. इसीलिए, दक्षिण अफ्रीका में वैक्सीन लगवाने को लेकर हिचक बढ़ती जा रही है. ऐसे में अगर वायरस का कोई नया वैरिएंट सामने आता है, तो उस पर बुनियादी टीकाकरण और बूस्टर डोज़ से निपट पाने में मुश्किल आएगी. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साफ़ किया है कि वैक्सीन की तीसरी डोज़, आबादी के सबसे कमज़ोर तबक़े को दिए जाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. यानी बूस्टर डोज़ सबसे पहले उन्हें दी जानी चाहिए, जिन्हें सबसे ज़्यादा ख़तरा हो या जिन लोगों में भयंकर रोगों से लड़ने और मौत से बचने की इम्युनिटी कम होती दिख रही हो. हालांकि, टीके की तीसरी ख़ुराक ‘स्वस्थ और फिट’ लोगों के लिए नहीं होने का तर्क, वैक्सीन की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साफ़ किया है कि वैक्सीन की तीसरी डोज़, आबादी के सबसे कमज़ोर तबक़े को दिए जाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. यानी बूस्टर डोज़ सबसे पहले उन्हें दी जानी चाहिए, जिन्हें सबसे ज़्यादा ख़तरा हो या जिन लोगों में भयंकर रोगों से लड़ने और मौत से बचने की इम्यूनिटी कम होती दिख रही हो.

इससे भी ख़राब बात तो तब हुई जब दक्षिण अफ्रीका के ज़्यादातर विश्वविद्यालयों ने अपने यहां उन्हीं छात्रों के प्रवेश की शर्त लगा दी, जिन्होंने टीके लगवा लिए हैं. इससे छात्रों के एक तबक़े के पढ़ने लिखने से वंचित होने का अंदेशा पैदा हो गया. दक्षिण अफ्रीका में टीका लगवाने को अनिवार्य बनाने को लेकर सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि एक तरफ़ तो ये सवाल लोगों के मानव अधिकारों का है. वहीं दूसरी तरफ़, ये ऐसा मुद्दा है जो जनता की सेहत से जुड़ा है. इसी वजह से दक्षिण अफ्रीका में सबके लिए टीकाकरण लगवाना अनिवार्य बनाने को लेकर कोई ठोस राय नहीं बन सकी है.

मानवता के लिये ख़तरा

कुल मिलाकर, कोरोना वायरस के तीन वेरिएंट (बीटा, डेल्टा और ओमिक्रॉन) के पैदा होने की कल्पना किसी ने नहीं की थी. नए नए वेरिएंट के सामने आने से पता चलता है कि ये महामारी लंबे समय तक इसलिए मानवता के लिए ख़तरा बनी हुई है कि क्योंकि वायरस में बहुत से म्यूटेशन हो रहे हैं और हम इसका स्थायी समाधान खोजने में नाकाम रहे हैं. ये अनुभव हमें ये बताता है कि कोविड-19 के संक्रमण को तेज़ी से फैलने से रोकने में लॉकडाउन कारगर साबित नहीं हुए हैं. इसके बजाय, लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था ज़रूर बुरी तरह प्रभावित होती है. राष्ट्रपति सीरिल रामाफोसा की अध्यक्षता वाली दक्षिण अफ्रीका की नेशनल कोरोना वायरस कमांड काउंसिल ने इस चेतावनी को गंभीरता से लिया और ओमिक्रॉन वेरिएंट के तेज़ी से बढ़ते प्रकोप के बावजूद, सख़्त लॉकडाउन नहीं लगाया.

कोविड-19 के संक्रमण को तेज़ी से फैलने से रोकने में लॉकडाउन कारगर साबित नहीं हुए हैं. इसके बजाय, लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था ज़रूर बुरी तरह प्रभावित होती है.

अब जबकि हम साल 2022 में प्रवेश कर चुके हैं, तो हमें कोरोना वायरस के नए वैरिएंट के प्रति सजग रहना चाहिए. निगरानी को चौकस रखना चाहिए और कोरोना वायरस के बुरे असर और भयंकर संक्रमण से जनता को बचाने के लिए सही समय पर स्थायी समाधान वाले क़दम उठाने चाहिए.

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