Author : Basu Chandola

Published on May 22, 2024 Updated 0 Hours ago

डेटा के मामले में लोगों के बीच गहरी होती खाई 2030 के एजेंडे की प्रगति पर बहुत बुरा असर डाल सकती है. ऐसे में इस खाई को पाटना बहुत ज़रूरी है, ताकि कोई तरक़्क़ी में पीछे न रह जाए.

डेटा की खाई: डिजिटल असमानता का नया चेहरा!

Source Image: ©Valery Brozhinsky / Shutterstock

डिजिटल परिवर्तन और डिजिटल तकनीकों का उपयोग टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने और 2030 के एजेंडे की तरफ़ प्रगति की गति बढ़ाने में अभूतपूर्व अवसर उपलब्ध कराता है. जनसेवाओं की उपलब्धता में सुधार लाने से लेकर वित्तीय समावेशन में सहयोग देकर, कृषि क्षेत्र में कुशलता बढ़ाने से लेकर सम्मानजनक कार्य और आर्थिक वृद्धि तक, डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल 2030 के एजेंडे में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है. हालांकि, डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल कोई जादुई छड़ी नहीं है और इसके इस्तेमाल की अपनी कई चुनौतियां हैं.

 

डिजिटल फ़ासले- यानी जिनके पास डिजिटल ‘संसाधन हैं’ और जिनके पास ‘नहीं हैं’- को लेकर पिछले कई वर्षों से परिचर्चाएं हो रही हैं और बहस इस बात के इर्द गिर्द चल रही है कि इस डिजिटल खाई को पाटने की ज़रूरत है. इस फ़ासले को कम करने के लिए डिजिटल तकनीकों तक पहुंच में सुधार लाने और डिजिटिल कौशल को बढ़ावा देने को लेकर आम सहमति है. हालांकि, इस डिजिटल परिवर्तन से जुड़े जिस एक और मसले पर कम चर्चा होती है, वो ‘डेटा डिवाइड’ का है.

 

इस लेख में डेटा के विभाजन के मतलब और विकास पर उसके प्रभाव की चर्चा की गई है. इसके अलावा इस फ़ासले को पाटने के मौजूदा उपायों और उन अहम तत्वों को भी हमने इस लेख में शामिल किया है, जो इस फ़ासले को घटाने में मददगार साबित हो सकते हैं.

 

‘डेटा डिवाइड' क्या है?

 

इस वक़्त ऐसी किसी परिभाषा को लेकर आम सहमति नहीं है कि डेटा के विभाजन का मतलब क्या है, और मौजूदा परिचर्चाओं में इसको लेकर अलग अलग परिकल्पनाएं पेश की जाती रही हैं. लेव मनोविच ने ये साबित किया था कि, डेटा के जानकारों और कंप्यूटर साइंस की पर्याप्त ट्रेनिंग न पाने वालों के बीच ‘डेटा के विश्लेषण का फ़ासला’ बढ़ता जा रहा है. डेनाह बॉयड और केट क्रॉफर्ड ने इशारा किया था कि ‘बिग डेटा रिच’ और ‘बिग डेटा पुअर’ एक नए तरह का बंटवारा उभर रहा है, जो बिग डेटा के विश्लेषण के लिए ज़रूरी पहुंच और कौशल पर आधारित है. रैल्फ श्रोएडर ने समझाया था कि अकादमिक या वैज्ञानिक विश्लेषण में बिग डेटा के इस्तेमाल के मामले में खाई बढ़ती जा रही है. वहीं, मार्क आंद्रेजेविच ने रेखांकित किया था कि डेटा के इस्तेमाल के लिए पहुंच और महंगे मूलभूत ढांचे और डेटा के भंडार को संचालित करने की क्षमता की ज़रूरत होती है. उन्होंने कहा था कि ये विभाजन ‘डेटा को छांटने की प्रक्रिया और उन अलग अलग सोचों का नतीजा है कि ज्ञान और इस्तेमाल से डेटा का क्या संबंध है.’

 

उधर, मैथ्यू मैकार्थी कहते है कि इस मसले पर जो मौजूदा अध्ययन हैं वो डेटा के इस अंतर के दो प्रमुख तत्वों को रेखांकित करते हैं- पहुंच और बिग डेटा पर मालिकाना हक़, और ऐसे डेटा के इस्तेमाल के लिए ज़रूरी कौशल और क्षमता. डेटा के मामले में इस खाई का एक पहलू डेटा को जमा करने से जुड़ा है और इसे ‘उन व्यक्तियों और समुदायों जिनके पास उनके बारे में जुटाया और इस्तेमाल के लिए आवश्यक पर्याप्त डेटा है और वो जिनके पास नहीं है’, के तौर पर परिभाषित किया जा सकता है. लेकिन, डेटा डिवाइड की एक और परिभाषा इस अंतर को और सीमित करते हुए कहती है कि, ‘वो लोग जिनके पास ऐसे संसाधन, क्षमताएं और पहुंच है जिससे वो स्वतंत्र रूप से मौजूद सरकारी डेटा का इस्तेमाल कर सकते हैं, और वो जिनके पास ये सब नहीं है.’

 किसी आम सहमति वाली परिभाषा की ग़ैरमौजूदगी में डेटा के अंतर के दायरे को व्यापक रखना चाहिए औऱ इसमें डेटा को जमा करने, इसके मालिकाना हक़, कौशल, क्षमता और डेटा के इस्तेमाल से जुड़ी तमाम तरह की असमानताओं को शामिल किया जाना चाहिए.

किसी आम सहमति वाली परिभाषा की ग़ैरमौजूदगी में डेटा के अंतर के दायरे को व्यापक रखना चाहिए औऱ इसमें डेटा को जमा करने, इसके मालिकाना हक़, कौशल, क्षमता और डेटा के इस्तेमाल से जुड़ी तमाम तरह की असमानताओं को शामिल किया जाना चाहिए.

 

डेटा का फ़ासला विकास में विभाजन के बराबर है?

 

डेटा, विकास का एक अहम औज़ार और इसे आगे बढ़ाने वाली शक्ति है, क्योंकि इससे जवाबदेही, पारदर्शिता, नीति निर्माण और इसे लागू करने में काफ़ी सुधार हो सकता है. डेटा को बुद्धिमत्ता में तब्दील करने से चलन और उनके बीच आपसी संबंधों को समझने में मदद मिलती है, जिससे प्रभावी और सबूतों के आधार पर नीति निर्माण किया जा सकता है, और जनसेवा की उपलब्धता को सुधारा जा सकता है.

 

मोटे तौर पर डेटा 2030 के एजेंडे को हासिल करने में दो तरह से मदद कर सकता है: पहला, डेटा के अलग अलग स्रोत स्थायी विकास के लक्ष्यों (SDGs) को मापने, उनकी निगरानी और प्रगति के मूल्यांकन में सरकारी आंकड़ों के पूरक बन सकते हैं, और नीति निर्माण के लिए सटीक सबूत उपलब्ध करा सकते हैं. मिसाल के तौर पर मोबाइल फोन के ख़र्च के पैटर्न का इस्तेमाल SDG 1 (ग़रीबी नहीं) को आमदनी के स्तर के छद्म सूचकांक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. दूसरा, डेटा के अलग अलग स्रोतों से सार्वजनिक मूल्य से हासिल बुद्धिमत्ता को स्थायी विकास के लक्ष्यों की प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. जियोस्पैशियल डेटा के इस्तेमाल को SDG 2 (शून्य भुखमरी) के लिए खेती में कुशलता लाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है.

 ई-कॉमर्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था के बारे में सरकारों के समूह द्वारा ‘हाऊ टू मेक डेटा वर्क फॉर दि 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवेलपमेंट’ पर तैयार किए गए नोट में कहा गया था कि डेटा की खाई से देशों के बीच और उनके भीतर डिजिटल पहुंच और कनेक्टिविटी के मौजूदा अंतर और जटिल होते जा रहे हैं. 

डेटा के मामले में अंतर से 2030 के एजेंडे की प्रगति पर गहरा असर पड़ सकता है. समाज के एक प्रमुख तबक़े के बारे में डेटा के अभाव और डेटा तक पहुंच या इसके विश्लेषण की क्षमता के अभाव से मौजूदा असमानताओं में और पेचीदगियां जुड़ जाती हैं. डेटा का ये उभरता अंतर विकास के मामले में काफ़ी बड़े फ़ासलों को जन्म देता है और विशेष रूप से कम आमदनी वाले देशों में व्यापक विश्लेषण को बाधित कर देता है.

 

डेटा के अंतर को पाटने के लिए किए जा रहे मौजूदा उपाय

 

अलग अलग मंचों और संस्थाओं के लिए डेटा की ये खाई चिंता का विषय बनती जा रही है. भारत की अध्यक्षता के दौरान G20 के सदस्य देशों ने माना था कि विकसित और विशेष रूप से विकासशील देशों के अंदर डेटा का ये फ़ासला बढ़ता जा रहा है और इस फ़ासले को पाटने की ज़रूरत है. G20 ने G20 के डेटा को विकास के लिए इस्तेमाल करने के सिद्धांतों (D4D) पर सहमति जताई थी और ‘डेटा फॉर डेवेलपमेंट कैपेसिटी बिल्डिंग इनिशिएटिव’ का स्वागत किया था. इस पहल को भारत और संयुक्त राष्ट्र के क्षमता निर्माण की पहल के तहत विकसित किया जा रहा है, ताकि ग्लोबल साउथ के देशों में क्षमता विकसित की जा सके और तकनीकी एवं डिजिटल मूलभूत ढांचे को बेहतर बनाया जा सके.

 

ई-कॉमर्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था के बारे में सरकारों के समूह द्वारा ‘हाऊ टू मेक डेटा वर्क फॉर दि 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवेलपमेंट’ पर तैयार किए गए नोट में कहा गया था कि डेटा की खाई से देशों के बीच और उनके भीतर डिजिटल पहुंच और कनेक्टिविटी के मौजूदा अंतर और जटिल होते जा रहे हैं. यही नहीं, विकास के लिए विज्ञान और तकनीक पर आयोग ने अपनी ‘डेटा फॉर डेवेलपमेंट’ रिपोर्ट में कहा था कि डेटा इकॉनमी के लाभों का असमान वितरण और पूरी दुनिया में डेटा के मामले में बढ़ती खाई विशेष रूप से कम आमदनी वाले देशों पर गहरा असर डाल रही है. ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट का ज़ीरो ड्राफ्ट ये स्वीकार करता है कि डेटा के मामले में इस अंतर से इसका दुरुपयोग बढ़ सकता है, और डेटा के लाभ इस समय असमान रूप से वितरित हो रहे हैं.

 

डेटा की इस खाई को कैसे पाटें?

 

डेटा के मामले में इस अंतर को पाटने के लिए लंबी अवधि की प्रतिबद्धता और दुनिया भर के भागीदारों के बीच सहयोग ज़रूरी है. वैसे तो इस क्षेत्र में कुछ काम हुआ है, लेकिन ये प्रयास अब तक सीमित ही रहे हैं. अब डेटा डिवाइड को ख़त्म करने के लिए एक व्यापक नज़रिए की ज़रूरत है, ताकि डेटा के फ़ायदों का समान रूप से वितरण सुनिश्चित किया जा सके. ऐसे किसी भी नज़रिए को क्षमता के विकास, पर्याप्त मूलभूत ढांचे और डेटासेट तक पहुंच मुहैया कराने और ऐसे नियम और नीतियों के विकास पर ध्यान केंद्रित करना ज़रूरी है, जो स्थायी विकास के लिए डेटा पर आधारित तरीक़ों के विकास में मदद करें.

 डिजिटल जानकारी से लैस प्रतिभाओं के कुशल समूह को विकसित करना और डेटा की साक्षरता भी ज़रूरी है. ऐसी प्रतिभाओं के समूह का विविधता भरा और समावेशी होना आवश्यक है ताकि डेटा के समाधानों में अलग अलग दृष्टिकोण शामिल हों.

डिजिटल जानकारी से लैस प्रतिभाओं के कुशल समूह को विकसित करना और डेटा की साक्षरता भी ज़रूरी है. ऐसी प्रतिभाओं के समूह का विविधता भरा और समावेशी होना आवश्यक है ताकि डेटा के समाधानों में अलग अलग दृष्टिकोण शामिल हों, जिससे डेटा पर आधारित समाधानों में पूर्वाग्रह और भेदभावों को घटाया जा सके. डेटा के मामले में इस अंतर को पाटने के लिए डेटा के इकोसिस्टम, क्षमता के निर्माण और मूलभूत ढांचे को मदद देने के लिए निवेश को बढ़ावा देना ज़रूरी है. आख़िर में लिए डेटा के प्रशासन की उचित रूप-रेखा, डेटा के अंतर को पाटने के प्रयासों का अभिन्न अंग हैं.

 

स्थायी विकास के लगभग 50 प्रतिशत लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने के मामले में कमज़ोर और अपर्याप्त प्रगति और 30 फ़ीसद लक्ष्यों को पाने में प्रगति के हाथ से निकल जाने को देखते हुए, अब बिल्कुल सही समय है कि हम स्थायी विकास के लिए डेटा की वास्तविक संभावनाओं को पूरा करने के लिए काम करें. लाभ असमान रूप से न वितरित हों, इसे सुनिश्चित करने के लिए हमें अपना ध्यान डेटा की खाई को पाटने पर लगाना चाहिए, ताकि डेटा पर केंद्रित भविष्य में कोई विकास के मामले में पीछे न रह जाए.

 

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