Published on Aug 22, 2023 Updated 0 Hours ago
सोलर एनर्जी: धाराप्रवाह, सुसंगत और काबू में रहने वाली अनुकूल ऊर्जा!

मार्क्स, मस्क और मूर 

ज़्यादातर लोग कार्ल मार्क्स को ऊर्जा के साथ नहीं जोड़ेंगे लेकिन उनकी किताब ‘कैपिटल: ए क्रिटिक ऑफ पॉलिटिकल इकोनॉमी’, जो सबसे पहले 1867 में प्रकाशित हुई थी, को करीब से पढ़ने पर पता चलता है कि मार्क्स ने ऊर्जा को आज के अधिकतर लोगों से ज़्यादा अच्छी तरह समझा था. उन्होंने कहा कि औद्योगीकरण को बढ़ावा देने वाले ऊर्जा स्रोत को ‘भरोसेमंद, शहरी और पूरी तरह इंसान के नियंत्रण में’ होना चाहिए. ‘हॉर्स’ को ऊर्जा के सबसे खराब रूप के तौर पर खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि हॉर्स का अपना सिर होता है, उसका रख-रखाव महंगा होता है और फैक्ट्री में उसका इस्तेमाल सीमित होता है. उन्होंने पवन ऊर्जा को भी खारिज कर दिया क्योंकि ये ‘अस्थिर और बेकाबू’ है. बहते पानी की गतिज ऊर्जा (काइनेटिक एनर्जी) को लेकर उनके विचार बेहतर थे लेकिन उन्होंने ये कहा कि ‘इसे अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित नहीं किया जा सकता, किसी ख़ास मौसम में नाकाम है और वास्तव में स्थानीय है’. 

ऊर्जा के स्रोतों में ‘स्वच्छ और हरित’ मूल्यों की तलाश हमें पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा की तरफ ले गई है जिसे मार्क्स ने ‘बेकाबू और अविश्वसनीय’ बताकर खारिज कर दिया था.

मार्क्स का मत कोयले के लिए था (वॉट के स्टीम टरबाइट में पानी के साथ) जिसके बारे में उन्होंने कहा कि ये ‘पूरी तरह इंसान के नियंत्रण में, चलता-फिरता एवं गति का माध्यम और पवन ऊर्जा एवं जल ऊर्जा से हटकर शहरी है और जो ग्रामीण क्षेत्रों में उपर-नीचे बिखरा हुआ है’. मार्क्स ने ऊर्जा की प्रकृति पर ध्यान नहीं दिया लेकिन ऊर्जा की विशेषताओं जैसे कि ‘निश्चितता’ ‘गतिशीलता’ और ‘नियंत्रणशीलता’ (कंट्रोलेबिलिटी), जो कि ऊर्जा के कुछ ख़ास स्रोतों को आवश्यक बनाएंगे, को लेकर उनके विचार पूरी तरह सटीक थे. अब ऊर्जा के स्रोतों को शहरी, गतिशील और पूरी तरह इंसान के काबू में होने के अलावा स्वच्छ और हरित होना चाहिए. ऊर्जा के स्रोतों में ‘स्वच्छ और हरित’ मूल्यों की तलाश हमें पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा की तरफ ले गई है जिसे मार्क्स ने ‘बेकाबू और अविश्वसनीय’ बताकर खारिज कर दिया था. 

इलॉन मस्क की कंपनी टेस्ला के द्वारा विकसित पावरवॉल बैटरी सिस्टम से उम्मीद की जा रही है कि वो पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा के ‘अविश्वसनीय और बेकाबू’ होने की खामी से निपट लेगा और ‘बुनियादी तौर पर विश्व में ऊर्जा के इस्तेमाल को बदल देगा’. ये बयान मस्क ने जनवरी 2015 में पावरवॉल के लॉन्च के दौरान दिया था. सौर ऊर्जा पहले से ही शहरी है (ग्रामीण इलाकों में ऊपर-नीचे बिखरे होने के विपरीत) क्योंकि फोटोवोल्टिक पैनल शहरों की छत से सूरज की रोशनी को बिजली में बदल सकते हैं. उम्मीद है कि मस्क की लिथियम-आयन बैटरी (LIB) न केवल सौर ऊर्जा की ‘अनिश्चित और बेकाबू’ प्रकृति का ध्यान रखेगी बल्कि इसे गतिशील भी बना देगी. अनिश्चित सौर ऊर्जा को मस्क की असरदार बैटरी में स्टोर किया जा सकेगा और लोगों को इस बात की अनुमति होगी कि वो किसी भी समय, कुछ भी करने के लिए (बिजली के उपकरण चलाने के लिए या गाड़ी में चलने के लिए) ऊर्जा ले सकेंगे, यहां तक कि जब सूरज नहीं चमकेगा तब भी. 

इंटेल के सह-संस्थापक गॉर्डन मूर की 1965 में कही गई ये बात मशहूर है कि सेमीकंडक्टर की सर्किट डेंसिटी हर 18 महीने के बाद दोगुनी हो जाएगी. ये बात मूर के नियम के नाम से मशहूर हो गई और ये माइक्रोचिप उद्योग में सही साबित हुई है.

इंटेल के सह-संस्थापक गॉर्डन मूर की 1965 में कही गई ये बात मशहूर है कि सेमीकंडक्टर (हाइ-ग्रेड सिलिकॉन से निर्मित) की सर्किट डेंसिटी हर 18 महीने के बाद दोगुनी हो जाएगी. ये बात मूर के नियम के नाम से मशहूर हो गई और ये माइक्रोचिप उद्योग में सही साबित हुई है. एक सर्किट में ट्रांज़िस्टर की संख्या लगभग हर दो साल में दोगुनी हो गई है और लागत में नाटकीय ढंग से गिरावट आई है. अगर फोटोवोल्टिक (PV) पैनल (सोलर ग्रेड सिलिकॉन से निर्मित) और स्टोरेज बैटरी के लिए मूर का नियम सही साबित होता है तो इन सिस्टम से विश्वसनीय और नियंत्रणशील बिजली कुछ ही वर्षों में ग्रिड आधारित बिजली (जीवाश्म ईंधन से हासिल) की तुलना में सस्ती होगी. 

सोलर मॉड्यूल की कार्यक्षमता में बढ़ोतरी

PV सिस्टम से DC पावर आउटपुट को AC पावर में बदलने के लिए आवश्यक PV मॉड्यूल और इन्वर्टर कमोडिटी उत्पाद हैं जिनका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार होता है. PV मॉड्यूल की लागत 1975 के 105 अमेरिकी डॉलर/वॉट से गिरकर 2020 में लगभग 0.20 अमेरिकी डॉलर/वॉट हो गई है यानी 45 वर्षों के दौरान इसमें सालाना 12 प्रतिशत की कमी आई है. ये गिरावट प्रभावशाली तो है लेकिन मूर के पैमाने पर गिरावट के करीब नहीं है. लागत में ज़्यादातर गिरावट कम इनपुट मैटेरियल कॉस्ट (सोलर ग्रेड सिलिकॉन), उत्पादन के पैमाने में बढ़ोतरी (पैमाने की अर्थव्यवस्था), मैन्युफैक्चरिंग में ऑटोमेशन के कारण कम श्रम लागत और कुशल प्रोसेसिंग से कम वेस्ट की वजह से आई है. दूसरे शब्दों में कहें तो PV मॉड्यूल की लागत में गिरावट उत्पादन अनुभव का नतीजा है न कि मूलभूत भौतिकी में बदलाव की वजह से जो कि मूर के नियम के काम करने के लिए आवश्यक है.

पिछले पचास वर्षों में एक माइक्रोचिप की ताकत में एक अरब गुना से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है लेकिन एक सोलर पैनल का पावर आउटपुट महज़ दोगुना हुआ है. इसका कारण रिसर्च और सोलर टेक्नोलॉजी में अपर्याप्त निवेश नहीं है. अमेरिका ने 40 के दशक के अंत में जब तेल का घरेलू भंडार घटने लगा तो सोलर तकनीक़ पर ढेर सारा पैसा लगाया. अमेरिका ने 70 के दशक के तेल संकट के बाद वैकल्पिक ऊर्जा तकनीकों पर रिसर्च में समर्थन को बढ़ा दिया. तेल की कीमत में गिरावट आने पर सामान्य रूप से वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के लिए उत्साह में कमी आई लेकिन पीक ऑयल (जब वैश्विक पेट्रोलियम उत्पादन अधिकतम स्तर पर होता है), ऑयल वेपन (तेल उत्पादकों के हाथ में), इत्यादि जैसे विचारों ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के लिए समर्थन को बनाये रखा है. इसके बावजूद सौर ऊर्जा माइक्रोचिप के पैमाने पर सफलता हासिल करने में कामयाब नहीं रही है. इसकी वजह क्रिस्टलाइन सिलिकॉन की मूलभूत तकनीकी सीमा है. 

सिलिकॉन वेफर्स के विकल्पों जैसे कि गैलियम आर्सेनाइड, डायरेक्ट बैंड गैप के साथ एक कंपाउंड, की जांच की जा रही है लेकिन जो लोग ज़मीन पर काम कर रहे हैं उन्हें अगले दशक तक सिलिकॉन का व्यावसायिक तौर पर व्यावहारिक विकल्प नहीं दिख रहा है.

शुद्ध पदार्थों (प्योर मैटेरियल) में इलेक्ट्रॉन केवल ख़ास ऊर्जा बैंड में रह सकते हैं. मैटेरियल के इलेक्ट्रॉनिक गुण (प्रॉपर्टी) इन ऊर्जा बैंडों की प्रोफाइल और इन ऊर्जा बैंडों के बीच गैप पर निर्भर होते हैं. क्रिस्टलाइन सिलिकॉन जैसे सेमीकंडक्टर में बैंड गैप इंसुलेटर (ऐसे पदार्थ जो बिजली के वाहक नहीं हैं) के उच्च बैंड गैप और कंडक्टर (ऐसे पदार्थ जो बिजली के वाहक हैं) के ओवरलैपिंग बैंड के बीच कहीं होता है. बिल्कुल सही-सही कहें तो सिलिकॉन जैसे सेमीकंडक्टर में उनकी सामान्य स्थिति (लाइट/हीट के रूप में अतिरिक्त ऊर्जा की गैर-मौजूदगी में) के दौरान बिजली का संचालन (एक बैंड से दूसरे तक इलेक्ट्रॉन के आवाजाही की अनुमति) करने के लिए बैंड गैप बहुत ज़्यादा है लेकिन जब सूरज की रोशनी से अतिरिक्त ऊर्जा अवशोषण (एब्जॉर्प्शन) के लिए उपलब्ध है तो बिजली के संचालन के लिए बहुत कम है. बैंड गैप से ज़्यादा एनर्जी गैप के साथ एक सोलर सेल केवल फोटोन (प्रकाश) का अवशोषण कर सकता है. बैंड गैप एनर्जी वो अधिकतम ऊर्जा है जिसे सोलर सेल द्वारा अवशोषित हर फोटोन से इलेक्ट्रिकल एनर्जी के रूप में निकाला जा सकता है. क्रिस्टलाइन सिलिकॉन की एक मूलभूत सीमा है इसका इनडायरेक्ट बैंड गैप (जिसमें ऊर्जा में बदलाव और गति में बदलाव शामिल है) जिसकी वजह से प्रकाश का कमज़ोर अवशोषण होता है और इसके नतीजतन मोटे वेफर्स (सेमीकंडक्टर का टुकड़ा) एक ज़रूरत बन जाते हैं. इसके कारण पूंजी लागत बढ़ जाती है, पावर-टू-वेट रेशियो कम होता है और मॉड्यूल के लचीलेपन और डिज़ाइन में मजबूरियां खड़ी हो जाती हैं. 

सिलिकॉन वेफर्स के विकल्पों जैसे कि गैलियम आर्सेनाइड, डायरेक्ट बैंड गैप (सिर्फ ऊर्जा में बदलाव शामिल है) के साथ एक कंपाउंड, की जांच की जा रही है लेकिन जो लोग ज़मीन पर काम कर रहे हैं उन्हें अगले दशक तक सिलिकॉन का व्यावसायिक तौर पर व्यावहारिक विकल्प नहीं दिख रहा है. पतली फिल्म वाली PV तकनीक़, जिसे एडिटिव फैब्रिकेशन प्रोसेस के द्वारा बनाया जाता है, मैटेरियल के इस्तेमाल और पूंजीगत खर्च को कम करती है. वैश्विक PV उत्पादन क्षमता में इसका हिस्सा 10 प्रतिशत है. व्यावसायिक पतली फिल्मों में हाइड्रोजेनेटेड एमॉरफॉस सिलिकॉन (नॉन-क्रिस्टलाइन सिलिकॉन), कैडमियम टैलुराइड और कॉपर इंडियम गैलियम डिसेलेनाइड का इस्तेमाल किया जाता है. ये मैटेरियल सिलिकॉन के मुकाबले 10-100 गुना ज़्यादा दक्षता से लाइट को एब्जॉर्ब करते हैं. ये गुण लाइट को एब्जॉर्ब करने के लिए आवश्यक मैटेरियल की मोटाई को घटाकर केवल ग्लास जैसे सपोर्ट मैटेरियल पर कोटेड फिल्म की एक परत तक कर देता है. कैडमियम टैलुराइड एक प्रमुख PV टेक्नोलॉजी है. इसका कारण क्रिस्टलाइन सिलिकॉन के द्वारा 1.12 इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) के इनडायरेक्ट बैंड गैप की तुलना में 1.45 eV के डायरेक्ट बैंड गैप के साथ कैडमियम टैलुराइड के द्वारा सौर ऊर्जा को पैदा करने की क्षमता है. पतनी फिल्म वाली PV टेक्नोलॉजी क्रिस्टलाइन सिलिकॉन के मुकाबले 10 से 1000 गुना कम मैटेरियल का उपयोग करती है. इससे प्रति यूनिट एरिया में सेल का वज़न कम होता है और प्रति यूनिट वज़न में पावर आउटपुट बढ़ता है. पेरोव्स्काइट सोलर सेल पतली फिल्म डिवाइस हैं जिसने अधिक कार्यक्षमता का प्रदर्शन किया है. इसमें और भी सुधार की गुंजाइश है लेकिन प्रमुख PV तकनीक़ के मुकाबले उनकी स्थिरता सीमित है. व्यावसायिक पतली फिल्म टेक्नोलॉजी का एक प्रमुख नुकसान है क्रिस्टलाइन सिलिकॉन की तुलना में उनकी कम औसत दक्षता. पतली फिल्म तकनीक़ के साथ एक और मुख्य समस्या है कि इन्हें अक्सर दुर्लभ तत्वों की आवश्यकता होती है जिसे आसानी से बदला नहीं जा सकता है. इसकी वजह से पतली फिल्म पर निर्भर सौर ऊर्जा की क्षमता को एक हद तक ही बढ़ाया जा सकता है. चाहे किसी भी सामग्री का इस्तेमाल हो, औद्योगिक प्रक्रिया की कार्यक्षमता में सुधार से भविष्य में लागत काफी कम होने की उम्मीद है. 

स्टोरेज टेक्नोलॉजी की कार्यक्षमता में बढ़ोतरी

सोलर PV सिस्टम की परिवर्तनशीलता (वैरिएबिलिटी) और अधूरा पूर्वानुमान, ऐसे लक्षण जिन्होंने पहली औद्योगिक क्रांति के दौरान पवन ऊर्जा और पनबिजली जैसे ऊर्जा के स्रोतों की जगह कोयला आधारित भाप से बिजली पैदा करने की अनुमति दी, एक चुनौती है जो बैटरी स्टोरेज से हल होने की उम्मीद की जाती है. लिथियम-आयन बैटरी (LIB) के अधिक ऊर्जा घनत्व और विशिष्ट ऊर्जा ने तकनीक़ को ग्रिड स्टोरेज एप्लिकेशन में निकल कैडमियम और निकल मेटल हाइड्राइड बैटरी को बदलने की अनुमति दी है. LIB दूसरे विकल्पों की तुलना में सेल वोल्टेज के स्तर को लगभग तीन गुना ज़्यादा बनाये रख सकता है. कूलम्बिक एफिशिएंसी (फैराडे एफिशिएंसी या करंट एफिशिएंसी) एक पूरे चक्र (साइकिल) के दौरान बैटरी में डाले गए कुल चार्ज से निकाले गये चार्ज का अनुपात है जो कि बैटरी की दक्षता को मापता है. ये रिचार्ज होने वाली बैटरियों में लिथियम-आयम बैटरी के लिए सबसे ज़्यादा है. ये ऐसी दक्षता पेश करती है जो सामान्य करंट और ठंडे तापमान पर चार्ज करने पर 99 प्रतिशत से अधिक है. LIB की दक्षता में अधिकतर सुधार की वजह एक्टिव मैटेरियल कैपेसिटी और सेल या इलेक्ट्रोड ऑप्टिमाइज़ेशन के मामले में इंजीनियरिंग में तरक्की है. लेकिन ये सुधार पिछले कुछ वर्षों के दौरान धीमे हो गये हैं जिससे बैटरी स्टोरेज के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती खड़ी हो गई है. जब LIB सेल को बैटरी पैक में असेंबल किया जाता है तो सुरक्षा जोखिमों में बढ़ोतरी के साथ-साथ लागत दो से चार गुना बढ़ सकती है. अगर उद्योग 200 अमेरिकी डॉलर/kWh (किलोवॉट आवर) बैटरी लागत को हासिल करने में सफल हो जाता है तो 200 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की कीमत की बैटरियां (2020 के अनुसार अमेरिका की GDP का 10 गुना) केवल 2 हफ़्ते का स्टोरेज मुहैया करा सकती हैं जो सर्दियों में घरों को गर्म रखने के लिए पर्याप्त नहीं है. 2022 में मस्क के पावरवॉल में लेवलाइज़्ड कॉस्ट ऑफ स्टोरेज (LCOS) 0.30 अमेरिकी डॉलर/kWh रखी गयी थी जो कि मौजूदा एक्सचेंज रेट के मुताबिक 24 रुपये/kWh है. ये ग्रिड आधारित बिजली की टैरिफ के आस-पास भी नहीं है लेकिन उम्मीद है कि सोलर पैनल और बैटरी से बिजली की लागत में तेज़ी से गिरावट आएगी और ये ग्रिड आधारित बिजली को मुकाबले से बाहर कर देगी.  

LIB की दक्षता में अधिकतर सुधार की वजह एक्टिव मैटेरियल कैपेसिटी और सेल या इलेक्ट्रोड ऑप्टिमाइज़ेशन के मामले में इंजीनियरिंग में तरक्की है. लेकिन ये सुधार पिछले कुछ वर्षों के दौरान धीमे हो गये हैं जिससे बैटरी स्टोरेज के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती खड़ी हो गई है.

फायर सेफ्टी और बैटरी की रिसाइक्लिंग उभरती चुनौतियां हैं जिन पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है. सुरक्षा और आर्थिक चिंताओं के अलावा सोलर पैनल और LIB के उत्पादन में खनिज की गहनता (मिनरल इंटेंसिटी) जलवायु से जुड़ी रणनीतियों के लिए एक कठिन समस्या का निर्माण करती है. खनिज के खनन, सोलर पैनल और LIB उत्पादन से काफी मात्रा में CO2 का निर्माण होता है. सोलर पैनल और LIB का काम पूरा हो जाने के बाद उन्हें लैंडफिल या समुद्र में फेंका जाता है जिससे बड़ी मात्रा में प्लास्टिक वेस्ट और भारी धातु उत्पन्न होती है जो पर्यावरण के लिए गंभीर ख़तरा पेश करती हैं. 

मार्क्स के ‘हॉर्स’ की तरह सौर ऊर्जा का भी अपना एक सिर बना हुआ है, इसका रखरखाव महंगा है और बैटरी स्टोरेज के होने पर भी इसका इस्तेमाल सीमित है. चूंकि सोलर एनर्जी को बेरोकटोक और काबू में रखने पर संदेह है, ऐसे में नीतिगत कोशिशें भी की जा रही हैं ताकि उपभोक्ताओं को सही और गलत समय में ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए इंसेंटिव (प्रोत्साहन) और पेनाल्टी (पैसे का दंड) के ज़रिये बेरोकटोक और काबू में रखा जा सके. इसी तरह अगर उम्मीद के मुताबिक सोलर PV प्लस बैटरी स्टोरेज की लागत में कमी नहीं आई तो कार्बन की कीमत या कार्बन पर टैक्स जीवाश्म ईंधन से हासिल ऊर्जा को ज़्यादा खर्चीली बनाएगा. इससे सोलर प्लस बैटरी अपेक्षाकृत सस्ती हो जाएगी. किसी भी तरह से, जैसा कि हम जानते हैं, ये ख़त्म हो जाएगी.

स्रोत: अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी
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Authors

Lydia Powell

Lydia Powell

Ms Powell has been with the ORF Centre for Resources Management for over eight years working on policy issues in Energy and Climate Change. Her ...

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Akhilesh Sati

Akhilesh Sati

Akhilesh Sati is a Programme Manager working under ORFs Energy Initiative for more than fifteen years. With Statistics as academic background his core area of ...

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